"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


24 June 2011

Yogeshwaranand Saraswati Paramhans - योगेश्वरानंद सरस्वती परमहंस


(जन्म 1887.  निर्वाण 23 अप्रैल 1985 को-निन्यानबे वर्ष की आयु में)

मेरा बचपन धार्मिक वातावरण में बीता. पिता जी कई वर्ष पूर्व स्वामी शिवानंद से मार्गदर्शन ले चुके थे. तुलसी की विनय पत्रिका के पद भावविभोर हो कर गाया करते थे. और 1963 तक वे बाबा फकीर चंद जी के संपर्क में आ गए और उनकी जीवन-धारा बदल गई. वे साधक थे और उससे घर का वातावरण सुगंधित था. टोहाना स्थित हमारा सरकारी स्कूल जैन साध्वियों, स्वामियों (जिनमें स्वामी हरमिलापी जी भी थे) और कई योगाचार्यों के आगमन से सुशोभित होता रहता था.


इन्हीं दिनों पिता जी तीन वृह्दाकार पुस्तकें ले कर आए जिनके शीर्षक थे- बहिरंग योग, आत्म-विज्ञान और ब्रह्म-विज्ञान. मैं उस समय सातवीं कक्षा में था. बहुत जानकारी नहीं थी. आत्म-विज्ञान और ब्रह्म-विज्ञान पुस्तकें बहुत आकर्षक थीं. उलट-पलट कर देखीं लेकिन उनका कथ्य समझ में नहीं आया. फिर बहिरंग योग पढ़नी शुरू की. इसके शुरू में ही अष्टांग योग का वर्णन था जो मेरी बालसुलभ बुद्धि में सहज ही बैठता चला गया. यम, नियम, आसन,  प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को जिस परिमार्जित भाषा में समझाया गया था वह कठिन नहीं थी. मैं समाधि लगाने की ओर अधिक प्रवृत्त हुआ. लेकिन जैसा कि मैंने कहा है तब मैं सातवीं कक्षा में था. किशोरावस्था आ चुकी थी (स्कूल में दाखिला छः वर्ष की आयु में होता था). इस आयु में जिन विचारों का विकास हो रहा होता है, सभी जानते हैं. समाधि में जिस प्रकार के हमारे विचार-वृत्तियाँ होती हैं उन्हें बल मिल जाता है. इससे मुझे आगे चल कर हानि उठानी पड़ी. पिता के मार्गदर्शन के कारण कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ. निजी अनुभव बता देना मैंने ज़रूरी समझा. बेहतर होता है कि इस आयु में बच्चों को पूजा-पाठ, समाधि की ओर न लगा कर उनके चरित्र निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाए. वैसे आजकल बच्चों को इन यौगिक विषयों की ओर देखने का अवसर ही नहीं मिलता और परिणामतः वे कई मायनों में योगियों-साधकों आदि से बेहतर जीवन जी जाते हैं. मैंने कहीं पढ़ा है कि यदि युवा बच्चे अधिक धार्मिकता प्रदर्शित करने लगें तो माता-पिता को होशियार हो जाना चाहिए कि कहीं बच्चा मानसिक ब्रह्मचर्य की समस्या में तो नहीं है.

कुछ विषयांतर हो गया. ख़ैर, मैंने उस पुस्तक का डूब कर अध्ययन किया. अनजाने में पुस्तक के लेखक ब्रह्मचारी स्वामी व्यास देव की छवि भी मन में उतरती गई. यही स्वामी व्यास देव आगे चल कर श्री 1008 स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती के नाम से जाने गए. पिछले दिनों नेट पर सर्च के दौरान देखा कि उनका नाम स्वामी योगेश्वरानंद परमहंस भी दर्ज हुआ है. समझते देर नहीं लगी कि भाव समाधि की उनकी साधना के कारण उन्हें यह नाम दिया गया.


समाधि के क्षेत्र में उनकी एक नई खोज का उल्लेख भगत मुंशीराम जी ने अपनी एक पुस्तक में किया है. इसमें साधक अपने मन में किसी एक वस्तु यथा- पृथ्वी- का रूप बना लेता है और उससे संबंधित एक-एक वस्तु को देखता जाता है और एक बार देखी वस्तु को दोबारा स्मरण नहीं करता. यह करते हुए वह एक ऐसी अवस्था में चला जाता है जिसे शून्य समाधि कहा जाता है. योग के क्षेत्र में यह नई पद्धति थी.


स्वामी योगेश्वरानंद जी की पुस्तक से प्राप्त संस्कार मेरे मानस पर गहरे हैं. मैं उनसे मिलना चाहता था. सुयोग से मेरे कॉलेज के दिनों में वे चंडीगढ़ के एस.पी. श्री भनोट के घर पधारे. उनका एक प्रवचन लाला लाजपतराय भवन में सुना तथा श्री भनोट जी के निवास पर योग प्रशिक्षण के दौरान उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ. योगी कैसे मन को प्रभावित करते हैं और चमत्कार दिखाते हैं इसका अनुभव वहीं हुआ. हवा के झोंकों को महसूस करना, उनकी अंगुली से निकलती विद्युत तरंगों को देखना, अपने भीतर त्रिकुटी के स्थान पर गुफा द्वार से आते तीव्र प्रकाश में प्रवेश करना एक नया अनुभव था. (क्षमा करें, मैं यहाँ चमत्कारों की स्थापना नहीं कर रहा. ऐसे अनुभव साधक को सुझाव (impressions and suggestions) दे कर कराए जाते हैं. साधक वही महसूस करता है जो उसे अनुदेशक (instructor) या गुरु बताता है.


यह पोस्ट अपने समय के महानतम योगी स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती परमहंस को कृतज्ञता पूर्वक सप्रेम समर्पित है जिनकी कही बातों ने मेरे जीवन को अच्छी दिशा दी.


Other links:
 
Yoga Niketan Ashram
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22 June 2011

Gotras of Megh Bhagats - मेघ भगतों के गोत्र

डॉ. ध्यान सिंह, पीएचडी

डॉ. ध्यान सिंह का शोधग्रंथ कई मायनों में उपयोगी है. इसमें मेघ भगतों के गोत्रों को भी समेकित किया गया है. इस विषय में मुझे कुछ जानकारी तो थी लेकिन डॉ. सिंह द्वारा तैयार गोत्रों की सूची से बहुत कुछ नया भी मिला. गोत्रों की सूची इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे संकेत मिलते हैं कि हम कौन हैं, कहाँ से आए थे और हमारे पूर्वज क्या करते थे. इस सूची में दिए नाम सिद्ध करते हैं कि हमारे कुछ पूर्वज अस्सीरिया से संबंधित थे. इस दृष्टि से अस्सरिया और एरियन शब्द अपनी कहानी कहते हैं. इसी प्रकार इस सूची में केशप (कश्यप) और प्राशर (पराशर) ऋषियों के नाम से गोत्र होना और विवाहों आदि में हमारा ऋषि गोत्र के रूप में भारद्वाज, अत्रि आदि ऋषियों का नाम बताना एक शोध का विषय हो सकता है क्योंकि कुछ अन्य ऋषियों के नाम हमारे समुदाय से जुड़े नहीं हैं.

सूची से स्पष्ट है कि गोत्रों का नामकरण कई प्रकार से हुआ है. गोत्र के मूल में गाँव, रेस, ऋषि, व्यवसाय, किसी नई जाति विशेष से संपर्क में आने के बाद नया नाम, रंग और छवि, विशेष आदत, गुण विशेष, क्षेत्र विशेष, पशु-पक्षी (व्यवसाय के रूप में भी), इष्ट, शारीरिक बनावट, महँगे पत्थरों आदि के नाम हैं. बहुत से गोत्रों के नाम ऐसे हैं जो संभवतः कभी शुद्ध रूप में तत्सम् (संस्कृत स्पैलिंग के अनुसार) रहे हैं और बाद में अन्य जातियों ने उनका रूप ज़बरदस्ती बिगाड़ दिया है या वे घिसते हुए इस तद्भव रूप को प्राप्त हुए हैं.

अंत में एक बात जोड़ना चाहूँगा कि गोत्रों की सूची को मैंने शब्दकोश विज्ञान (Lexicography) के नियम के अनुसार वर्णक्रम में लगा दिया है. आने वाले समय में शोधकर्ता इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रयोग कर सकेंगे.

भारत भूषण, चंडीगढ़
ईमेल- bhagat.bb@gmail.com


मेघ भगतों के गोत्रों की सूची
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अगर, अस्सरिया,
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एरियन,
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कंगोत्रा, ककड़, कतियाल, कड़थोल, कपाहे, कम्होत्रे, कलसोंत्रा, कलमुंडा, करालियाँ, कांचरे, कांडल, काटिल, काले, किलकमार, कूदे, केशप, कैले, कोकड़िया, कोण,
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खंगोतरे, खंडोत्रे, खड़िया, खढ़ने, खबरटाँगिया, खरखड़े, खलड़े, खलोत्रा, खोखर, खोरड़िये,
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गंगोत्रा, गाँधी, गुटकर, गड़गाला, गड़वाले, गिद्धड़, गोत्रा, गौरिये,
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घई, घराई, घराटिया, घराल, घुम्मन,
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चखाड़िये, चगोत्रा, चगैथिया, चबांते, चलगौर, चलोआनियाँ, चितरे, चोकड़े, चोपड़ा, चोहड़े, चोहाड़िए, चौदेचुहान, चौहान,
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छापड़िया, छोंके,
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जजूआं, जल्लन, जल्लू,
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टंभ, टनीना, टुंडर, टुस्स, टेकर, टोंडल,
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डंडिये, डंबडकाले, डग्गर, डांडिये, डोगरा, डोगे,
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ढम, ढींगरिये,
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तरपाथी, तराहल, तरियल, तित्तर,
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थंदीरा, थिंदीआलिया, थापर,
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दत्त, दमाथियां, दलवैड, दरापते,
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धूरबारे,
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नजोआरे, नजोंतरे, नमोत्रा,
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पंजगोत्रे, पंजवाथिए, पंजाथिया, पकाहे, पटोआथ, पडेयर, पराने, परालिये, पलाथियाँ, पवार, पहाड़ियाँ, पाड़हा, पानोत्रा, पाहवा, पूंबें, पौनगोत्रा, प्राशर (पराशर),
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बकरवाल, बजगोत्रे, बजाले, बदोरू, बक्शी, बग्गन, बाखड़ू, बादल, बटैहड़े, बरेह, बिल्ले, बैहलमें,
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भगोत्रा, भलथिये, भसूले, भिंडर, भिड्डू,
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मंगलीक, मंगोच, मंगोतरा, मंजोतरे, मड़ोच, मनवार, मन्हास, ममोआलिया, मल्लाके, मांडे, मुसले, मैतले,
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रतन, रत्ते, रमोत्रा, रूज़म,
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लंगोतरा, लंबदार, लालोतरा, लचाला, लचुंबे, लसकोतरा, लातोतरा, लासोतरा, लीखी, लुड्डन, लेखी, लोंचारे,
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शौंके,
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संगलिया, संगवाल, संगोत्रे, सकोलिया, सपोलिया, समोत्रा, सलगोत्रे, सलगोत्रा, सलहान, सलैड, सांगड़ा, साठी, सिरहान, सीकल, सीहाला, सोहला, सुंबरिये, सेह्,
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हरबैठा, हितैषी.
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(गोत्रों की यह सूची डॉ. ध्यान सिंह के पीएचडी के लिए स्वीकृत शोधग्रंथ पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकाससे ली गई है.)