"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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12 February 2021

Purification - Another Narration - शुद्धिकरण - एक और कथा

जाटों और मेघों का सह-अस्तित्व रहा है. दोनों का सांस्कृतिक संघर्ष और धार्मिक नज़रिया भी लगभग एक जैसा है. आर्य समाज द्वारा शुद्धीकरण के बाद दोनों के अनुभव भी लगभग एक जैसे रहे. जनेऊ पहनने के बाद जिन मेघों ने अपने आसपास की उँची जाति वालों को ‘गरीब नवाज़’ कहना छोड़ कर अभिवादन में ‘नमस्ते’ कहना शुरू किया तो उन्हें मारा-पीटा गया.

शुद्धीकरण के बाद मेघों में यह भावना पैदा हो गई थी कि समाज में उनके स्तर को ऊंचा उठा दिया गया है जिसे समाज सहज स्वीकार करेगा. लेकिन ज़ाहिर है कि आगे चल कर उन्हें कड़ुवे अनुभवों से भी गुज़रना पड़ा. मेघों को सामूहिक तौर पर शक्ति प्रदर्शन करने वाली जाति के तौर पर कम ही देखा गया है. इसके उलट जाट (जट्ट) समुदाय अपने जुझारूपन के लिए मशहूर है. वे संघर्ष करते हैं और अड़चनों को अपने शरीर पर सहने की ग़ज़ब की कूव्वत उनमें है.

मेरे एक जाट मित्र राकेश सांगवान जी ने इतिहास के पन्नों से एक घटना जाट और जनेऊ’ नामक आलेख से साझा की है जिसका सार नीचे दे रहा हूं. इससे आप शुद्धीकरण के सामाजिक, धार्मिक और सियासी अर्थों को अलग-अलग करके देख पाएंगे. राकेश जी लिखते हैं -

मेरी जानकारी अनुसार जाट के गले में यह जनेऊ आर्य समाज आने के बाद ही आया. हालाँकि, हर जाट जनेऊ नहीं धारण करता पर जिन्होंने भी धारण किया उन्होंने बहस और बग़ावत में धारण किया था….1883 के आसपास की बात है, चौधरी मातू राम हुड्डा (पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के दादा) ने जनेऊ धारण किया और अन्य जाट-भाइयों को भी ऐसा ही करने के लिए कहा….इससे काफ़ी हलचल मच गई. काशी से एक ब्राह्मण बुलाया गया. उसने आते ही खडवाली गाँव में इस 'धर्म मर्यादा के विरुद्ध कार्य' के ख़िलाफ़ पंचायत बैठा दी. उसने कहा, "जाट शूद्र होते हैं, जनेऊ धारण करने का अधिकार नहीं है. भगवान इस बात से नाराज़ हो जाएँगे और आसपास के इलाक़े पर मुसीबत आ जाएगी. इसका जनेऊ उतरवा दो"....जब चौधरी मातूराम से यह सब कहा गया तो उन्होंने उत्तर दिया, "जनेऊ किसी कीकर पर तो टंगा नहीं है जो कोई भी उतार ले. मेरी गर्दन पर है. भाइयों के सामने गर्दन हाज़िर है. इसे काट दो, जनेऊ अपने आप उतर जाएगा". पंडित ने दूसरा विकल्प सुझाया, "इनको जाति से बाहर कर के हुक्का-पानी बंद कर दो. चौधरी मातूराम ने कहा, "मैं तो किसी के घर बिना बुलाए जाता ही नहीं. उन्हीं के घर जाता हूँ जो इज़्ज़त से बुलाते हैं. उन्हीं के घर हुक्का-पानी पीता हूँ जो घोड़ी की लगाम पकड़ कर घोड़ी से उतरने के लिए कहते हैं और स्वागत करते हैं."....सब तरफ़ सन्नाटा छा गया. खडवाली के कुछ लोग खड़े हो गए और कहने लगे, "ज़ैलदार साहब, हमारे घर चलो और हुक्का-पानी पियो और जिसका जी चाहे सो कर ले." बस फिर क्या था, चारों तरफ़ शोर मच गया, पंचायत बिखर गई. बहुत से लोगों ने जनेऊ धारण कर लिया….उस ज़माने में यह धर्म का भ्रम देहात में कम था. देहात वालों को इससे कुछ लेना-देना नहीं था. उनकी अपनी मान्यताएं थी. अपनी आस्था थी जैसे कि-- भैया/दादा खेडा/जठेरा या फिर किसी साधू-पीर-फ़कीर का समाधी स्थल. इन्हीं के नाम पर मेले लगते थे जोकि आजतक लगते आ रहें हैं.’

मैंने राकेश सांगवान जी द्वारा बताए गए इस प्रकरण को इसलिए यहां रख लिया है ताकि इसे पढ़ने वाले सचेत रहें कि यदि धर्म आपके भीतर या बाहर संघर्ष पैदा करता है तो धर्म को संशय की दृष्टि से देखने की ज़रूरत होती है.


10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.
मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही चार हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया गया है लेकिन इसमें अपेक्षानुसार गंभीरता नहीं थी). मतलब यह कि चार नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात यदि छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल भी कम महत्व का नहीं है.

राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है. उधर राजनीति और धर्म के बाज़ार में एकता नहीं बेची जाती, एकता का नारा ज़रूर बेचा जाता है, यह दुनियावी सच्चाई है. राजनीतिक दलों के बंधुआ लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है वहाँ धर्म-शर्म किसी कोने में रखे रहते हैं और राजनीति में यह सही होता होगा. एडवर्ड गिब्बन ने कहा है, "आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार उसे झूठ मानते हैं और शासक उसे उपयोगी मानते हैं." 

एकता के सिद्धांत
एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इनमें आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता होती है जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज के दूसरे सदस्यों के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग सारे समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. वे अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

तो कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर ही अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



24 April 2018

The Illusion of Purification - शुद्धिकरण का छलावा

‘शुद्धिकरण’ शब्द सुनने में कितना ही पवित्र शब्द क्यों न लगे लेकिन जब-जब यह किसी पिछड़े समुदाय के संदर्भ में प्रयोग हुआ है, तब-तब अपमानजनक और शरारतपूर्ण सिद्ध हुआ है. किन्हीं धार्मिक संस्थाओं के हाथों में इसे राजनीतिक औज़ार के रूप में देखा गया है.

मेघ समुदाय के संदर्भ में इसका प्रयोग बीसवीं शताब्दी के शुरू में आर्यसमाज ने अपने ‘शुद्धीकरण’ नामक आंदोलन के दौरान किया था. इसमें आर्यसमाज ने मेघों, डूमों, महाशयों आदि का शुद्धिकरण करने का दावा किया था. शुद्धिकरण का मूल प्रयोजन था मूलनिवासी कबीलों के लोगों को इस्लाम या ईसाईयत की ओर झुकने से रोकना या उनसे बचाते हुए मनुवादी सिस्टम में लाना.

डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ में आर्यसमाजी तथा अन्य विद्वानों की लिखी किताबों के हवाले से लिखा है कि हज़ारों (तीस हज़ार से छत्तीस हज़ार तक उनकी गिनती बताई जाती है) मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें मनुवादी हिंदू दायरे में लाया गया था. वहां इस्तेमाल किए गए ‘हिंदू’ शब्द के व्यापक अर्थ में स्थिति को तौला जाए तो मेघ पहले भी हिंदू ही थे और कई अन्य हिंदू कबीलों की तरह एक कबीलाई जीवन जी रहे थे. यहाँ "पहले भी हिंदू ही थे" से तात्पर्य यह है कि मुग़लों के समय में सप्तसिंधु क्षेत्र के लोगों को हिंदू कहा गया था. यदि ‘हिंदू’ शब्द को किसी ‘धर्म’ से जोड़ने की बात है तो ‘हिंदू’ शब्द की जगह उसे मनुस्मृति वाला ‘मानव-धर्म’ कहना बेहतर होगा उसे ‘मनुवाद’ के नाम से बेहतर तरीके से व्यक्त किया जाता है.

मेघों के शुद्धिकरण को लेकर एक 80 वर्षीय मेघ प्रो. के.एल. सोत्रा जी से कई बार फोन पर बातचीत हुई. एक आर्यसमाजी की लिखी पुस्तक में छपे फोटोज़ के आधार पर वे कहते हैं कि मेघों के शुद्धिकरण की सच्चाई दरअसल दूसरी है. उनके अनुसार कुल सात-एक परिवारों का शुद्धिकरण किया गया था जो इस्लाम क़बूल कर चुके थे. वे बताते हैं कि मेघों की शिक्षा का प्रबंध आर्यसमाज ने बड़े स्तर पर करने का बीड़ा उठाया था जिससे मेघ समुदाय के सामाजिक जीवन को एक गति मिली. प्रो. सोत्रा के कुछ परिजन आज भी पाकिस्तान में रहते हैं. सोत्रा जी बताते हैं कि उनके परिजनों ने आज तक इस्लाम नहीं अपनाया. वे अपनी जीवन शैली के साथ पाकिस्तान में जी रहे हैं. सोत्रा जी बताते हैं कि मेघ कभी भी बड़े पैमाने पर इस्लाम या ईसाइयत में नहीं गए. 1947 में स्यालकोट से लगभग सभी मेघ परिवार भारत आ गए. गिनती के मेघ ही स्यालकोट में रह गए थे. वे सब हिंदू थे. पब्लिक मेमोरी (लोक स्मृति) में दूर-दूर तक कहीं नहीं है कि मेघों ने कभी बड़े पैमाने पर इस्लाम ग्रहण किया हो. तो आर्यसमाज से जुड़े लेखकों के प्रकाशित साहित्य में क्यों लिखा गया कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में मेघों का शुद्धिकरण किया गया था?

पहली नज़र में यह आर्यसमाज के प्रचारात्मक कार्य का हिस्सा लगता है. उसके पीछे राजनीतिक कारण भी रहे हो सकते हैं जैसा कि डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ में उल्लेख किया है कि शुद्धिकरण से स्यालकोट के क्षेत्र में हिंदू-मुसलमान जनसंख्या का अनुपात बदल गया. वे यह भी बताते हैं कि जम्मू के क्षेत्र में मेघ कबीलाई जीवन जी रहे थे. उनके शुद्धिकरण का एक ही अर्थ था कि उन्हें शुद्धिकरण की प्रक्रिया से 'हिंदू (मनुवादी) घेरे' में लाया जाए. संभव है उनमें कुछ इने-गिने ऐसे मेघ भी रहे हों जिन्होंने इस्लाम अपना लिया हो. वैसे शुद्धिकरण को लेकर आज भी कई पढ़े-लिखे मेघ कड़ुवाहट के साथ पूछते हैं कि ‘क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे कि हमारा शुद्धिकरण किया गया था?’ वे जानते हैं कि उन्होंने या उनके पूर्वजों ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिसकी वजह से अन्यथा उनका शुद्धिकरण किया जाता. वैसे मनुवादी जाति व्यवस्था ऐसी है कि उसमें मंत्रोच्चार के साथ सिर मुंडवा कर नहा लेने से किसी की जाति या वंश नहीं बदलता. अलबत्ता शिक्षित करके स्वीकार्यता दे कर और धन प्रवाह को उनकी तरफ मोड़ कर उनकी जीवन-शैली में परिवर्तन किया जा सकता है. शिक्षित होने के बाद मेघों को प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का अधिकार संविधान के तहत मिला भी जो आज नाममात्र को बचा है.



बात शुद्धिकरण की हो रही है. शुद्धिकरण क्यों किया जाता है इसकी जानकारी एक जाट नेता श्री राकेश सांगवान से मिली. उन्होंने सितंबर 2017 में बताया कि रोहतक में खाप पंचायत नाम से पंचायत का एक फ़रमान जारी गया था और पंचायत का विषय था 'मूला जाटों का शुद्धीकरण और जाट - मूला जाटों के बीच आपसी रिश्ते शुरू करवाना'. इस पर श्री राकेश सांगवान की निम्नलिखित टिप्पणी शुद्धिकरण के राजनीतिक पक्ष को प्रभावी तरीके से रेखांकित करती है.

“पहली बात तो ये जो शुद्धीकरण शब्द ही बड़ा अटपटा सा है। जाट चाहे किसी भी धर्म सम्प्रदाय में गया या उसने जो भी अपनाया, उसने अपनी जाति कभी नहीं छोड़ी, जहाँ भी गया जाति साथ ही ले गया, और सिर्फ़ जाट ही नहीं इस देश में जिस भी जाति के व्यक्ति ने जो भी धर्म अपनाया वह अपनी जाति उस धर्म में साथ ही ले गया। अब समझ नहीं आता कि कौन किसका किस आधार पर शुद्धीकरण चाहता है? यदि इनका आधार सिर्फ़ धर्म को लेकर ही शुद्धीकरण है तो फिर इस खाप पंचायत के नाम पर सिर्फ़ जाट को ही क्यों टार्गट किया गया? खाप पंचायत सभी जातियों की होती हैं और सभी धर्मों में सभी जातियाँ हैं, फिर इस पंचायत में सिर्फ़ जाट और मूला ही टार्गट क्यों? और जाट-मूला जाट के नाम पर पंचायत में विश्व हिंदू परिषद, बंसल, परमार, शर्मा आदि का क्या काम? और यदि तुम्हारा इस शुद्धीकरण का आधार धर्म ही है तो फिर तुम्हारे इस शुद्धीकरण के टार्गट पर मूला जाट यानी मुस्लिम जाट ही क्यों, तुम्हारी ख़ुद की जातियाँ क्यों नहीं? और क्या सिर्फ़ हिंदू होना ही शुद्धता है? ये सर्टिफ़िकेट किस लैबॉरेटरी (laboratory) से जारी हुआ?

शुद्धीकरण और आपसी रिश्तेदारी, दोनों में बहुत फ़र्क़ है इसलिए जाट चाहे किसी धर्म मज़हब पंथ से ताल्लुक़ रखता हो उसे ऐसे विवादित विषयों से परहेज़ ही रखना चाहिए। ऐसे मुद्दों से तो हमारे रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम भी दूरी रखते थे, जब भी धर्म का मुद्दा उठता तो उनका एक ही जवाब होता कि धर्म निजी मामला है इसे दूसरे पर मत थोपो। जो भी ठेकेदार इस शुद्धीकरण की बात करे उसे कह दो कि शुद्धीकरण और धर्म के बोझ से हम जाटों को माफ़ी दे दो, हम जाटों को तुम अपनी साज़िशों का मोहरा ना बनाओ। जो करना है पहले तुम अपने से शुरू करो, पहले अपनी जातियों का शुद्धीकरण कर लो, और जहाँ तक जाट-मूला जाटों की आपसी रिश्तेदारी का मामला है वह हमारा आंतरिक मामला है उसे हम जाट ख़ुद देख लेंगे।”

मेघ भी स्यालकोट के क्षेत्र में शुद्धिकरण से बावस्ता हुए थे. वहाँ तब अंग्रेजों का शासन था. अंग्रेजों की उदारवादी नीतियों के तहत समाज की निम्न जातियों को प्रतिनिधित्व देने पर विचार किया जा रहा था (शायद आपको साइमन कमिशन याद हो) और उसके तहत एक योग्यता यह भी रखी गई थी कि प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों को दिया जाएगा जो पढ़े-लिखे हों. इस दौरान मिशनरी स्कूल पिछड़ी और निम्न जातियों को शिक्षित करने का कार्य शुरू कर चुके थे. आर्यसमाज ने भी फैसला किया कि ग़ैर-हिंदुओं को जितना जल्दी हो सके ‘हिंदू’ दायरे में लाया जाए और हिंदू जातियों में उनका स्थान भी परंपरा के अनुसार निर्धारित कर दिया जाए ताकि आने वाले समय में वे हिंदू के नाम पर सवर्णों के अधीन खड़े दिखें. तब शिक्षा से वंचित मेघ इस व्यवस्था को कितना जानते-समझते थे पता नहीं लेकिन उस समय के साहित्य से जानकारी मिलती है कि मेघों ने शुद्धिकरण की वास्तविकता को पहचान लिया था. वे महसूस कर रहे थे कि शुद्धिकरण ने सामाजिक व्यवस्था में उनकी प्लेसिंग नहीं बदली. यह तर्कशीलता मेघों की शक्ति के रूप में देखी जा सकती है. लेकिन क्या शुद्धिकृत मेघ 'आर्य-भक्त' और 'द्विज' का अर्थ भली भाँति जानते थे? यह सवाल बहुत महत्पूर्ण है.

1947 में पाकिस्तान बनने के बाद स्यालकोट से अधिकांश मेघ भारत आ गए. इसके साथ ही मेघों के बारे में आर्यसमाज का शुद्धिकरण का एजेंडा पृष्ठभूमि में चला गया. (ऊपर मूला जाटों के शुद्धिकरण को लेकर हुई हलचल में उसे फिर से ज़िंदा होते देखा जा सकता है). 

आज़ादी से पहले के समय में 'शुद्धिकृत' तबकों को स्वभाविक ही कांग्रेसी वोटर की पहचान मिली. (कांग्रेस उस समय नज़र आने वाली एक ही बड़ी राजनीतिक पार्टी थी). ये वोटर मूलतः श्रमिक तबकों के थे. कांग्रेस का उनके प्रतिनिधित्व (आरक्षण) को लेकर जो नज़रिया था उससे श्रमिक वर्गों और कांग्रेस दोनों को फ़ायदा हुआ. आज़ादी के बाद वाले ‘हिंदुस्तान’ में शुद्धिकरण आंदोलन की पहले जैसी जरूरत नहीं थी और न ही निम्न जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में शासन-प्रशासन में नुमाइंदगी (प्रतिनिधित्व, representation) देने की ज़रूरत महसूस की गई. इस्लाम अपना चुकी श्रमिक जातियों की बड़ी जनसंख्या वाला बड़ा भू-भाग (आज का बंगला देश और पाकिस्तान) पहले ही अलग किया जा चुका था. मुख्यधारा में शामिल होने के भ्रम के साथ वे शुद्धिकृत जनसमूह अपने परंपरागत निम्न सामाजिक स्तर पर बने रहे. मेघों को महज़ म्युनिसिपल कमेटियों और म्युनिसिपल कार्पोरेशंस में कुछ प्रतिनिधित्व मिला.

'शुद्धिकरण' निश्चित रूप से राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व (hegemony) के लिए हो रहे संघर्ष का हिस्सा रहा है जिसकी पहचान जातिवादी धार्मिक-राजनीतिक एजेंडा के औज़ार के रूप में होती है. इस नज़रिए से शुद्धिकरण का लक्ष्य शुद्धिकृत लोगों के सामाजिक स्तर में बढ़ौतरी तो नहीं ही हो सकता. 'शुद्धिकृत' लोगों की आर्थिक और राजनीतिक अपेक्षाएँ असंतुष्ट हैं. प्रतिनिधित्व के नाम पर मिलने वाले आरक्षण जैसे प्रावधान को न्यायालयों और सरकारों तक ने निष्फल (irrelevant) कर दिया है. फिर भी शुद्धिकृत होकर कोई धन्य-धन्य हो रहा है तो वो धन्य है.

07 May 2017

Megh and Aryasamaj - मेघ और आर्यसमाज

मेघ होने के नाते ख़ुद को सियालकोट और आर्यसमाज के नाम से प्रभावित महसूस करता रहा हूँ. पिता जी ने मुझे मेघों के उत्थान में आर्यसमाज की भूमिका के बारे में बताया था. तब पिता जी से अधिक सवाल करने की आदत नहीं थी. आज वे होते तो उन्हें कुछ सवालों का जवाब देना पड़ता.

कई मेघों को कहते सुना है कि मेघ मूलतः ब्राह्मण हैं. उनके रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं. वो कैसे मिलते-जुलते हैं मुझे पता नहीं. आर्यसमाज में प्रवेश मिलने से पहले उनके कौन से रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों जैसे थे यह बात बहस का विषय हो सकती है. यहाँ एक मुख्य उदाहरण मेघों की देरियों का दे सकता हूँ जो मेघ-सभ्यता का रेखांकित उदाहरण है और उनके ब्राह्मणीकल मूल को झुठलाता जाता है.

लेकिन तर्क के तौर पर यदि श्री भीमसेन विद्यालंकार द्वारा लिखित “आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास” नामक पुस्तक से संदर्भ लिया जाए तो एक बात-जैसी-बात निकलती दिखती है. उसमें उल्लेख है कि आर्यसमाज ने "मेघ और उनकी शुद्धि " नामक पुस्तक सन् 1936 में प्रकाशित की थी जिसमें मेघों को ब्राह्मण घोषित किया गया था. इस पुस्तक में उल्लेख है कि भक्त पूर्ण के सुपुत्र श्री रामचंद्र मेघ जाति से प्रथम स्नातक (ग्रेजुएट) हुए. उन्हें सियालकोट आर्यसमाज ने गुरुकुल में शिक्षा दिलाई. पुस्तक के पृष्ठ 172 पर दर्ज किया गया है कि सन् '1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया. उस समय इन मेघों का ‘हिंदुओं के साथ’ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था.' ज़ाहिर है कि आर्यसमाज का ‘समाज’ ने विरोध किया. यह समझने की ज़रूरत है कि आर्यसमाज का किस समाज ने विरोध किया लेकिन आर्यसमाज ने मेघों को ‘शुद्ध’ करने का विचार किया यह बड़ी बात है. सन् 1903 में आर्यसमाज के वार्षिक उत्सव पर 'मेघ बिरादरी के चौधरियों को एकत्रित करके' उनका शुद्धिकरण किया गया.

उन्हीं दिनों या उसके आसपास - “लाला गणेशदास ने ‘मेघ और उनकी शुद्धि’ नाम का ट्रैकट (ट्रैक्ट के हिंदी/अंग्रेज़ी पर्यायवाची शब्द हैं - निबंध, Dissertation, treatise, thesis, tractate, system, method, mode, channel, manner.) प्रकाशित किया और मेघ जाति को ब्राह्मण जाहिर करके उनके पतन के कारण लिखे और उनकी शुद्धि शास्त्रोक्त करार दी.” - यह बात ध्यान खींचती है. यह आलेख सुरक्षित रखा गया है तो मुझे हैरानगी होगी और यदि वह उपलब्ध हो तो वह संदर्भ देने योग्य ज़रूर होगा क्योंकि आज भी बहुत से मेघ मानते हैं कि वे ब्राह्मण हैं या फिर ब्राह्मणों से निकले या फिर निकाले हुए हैं. वो ट्रैक्ट मेघों की स्थिति को दूर तक स्पष्ट कर देगा. वहीं एक और वाक्य लिखा है कि - “सन् 1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया.” ‘आर्य-भक्त’ शब्द कई अर्थ देता है. आर्य एक रेस (वंश) है और रेस मानव-विज्ञान का एक ऐसा घटक है जो अपरिवर्तनशील है जिसमें डीएनए स्थिर खड़ा है. आर्यों (ब्राह्मणों) का वंश कभी नहीं बदला यह सामाजिक तथ्य है. ब्राह्मणों की जाति बदली है ऐसा सुना है लेकिन जब तक वो जाति समूह ख़ुद इसे स्वीकार न करे तब तक उसे उदाहरण के रूप में नहीं रखा जा सकता.  दूसरा शब्द ‘भक्त’ है. कहा जाता है कि इसी शब्द को ‘भगत’ के रूप में मेघों ने अपनाया. लेकिन इससे भी समस्या का समाधान नहीं होता. ‘आर्य-भक्त’ शब्द को समास पद्धति से लिखा गया है जिसका एक अर्थ है ‘आर्यों का भक्त’. जैसे ‘राम-भक्त’ शब्द है. अब ‘भक्त’ शब्द की परिभाषा करें तो यह भारत की गुलामी-प्रथा तक खिंचने की क्षमता रखता है. ‘भक्त’ उसे कहा जाता रहा है जो अपने समाज से टूट कर आर्यों के पाले में चला गया जैसे विष्णु-भक्त प्रह्लाद, राम-भक्त विभीषण, भक्त हनुमान आदि. संस्कृत में ‘भक्त’ शब्द की धातु ‘भज्’ इसी ओर संकेत करती है.   

उक्त संदर्भ में आई यह बात भी ध्यान खींचती है कि - “मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था.” आखिर वो आश्चर्यजनक क्यों था? एक नज़रिए से ऐसा कहना उस पुरानी बहस की ओर इशारा करता है कि क्या मेघ हिंदू थे? कल नहीं थे तो आज कैसे? मेघ समाज में इस पर (ख़ास कर सोशल मीडिया पर) बहस होती रहती है. बहस होना एक अच्छा संकेत है.

अंत में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर का उक्त प्रकाशन के लिए आभार और ताराराम जी का आभार जिन्होंने उक्त प्रकाशन के संदर्भित पृष्ठों की फोटो भेजी है.

'भक्त' शब्द की एक व्याख्या. संदर्भ है जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'भारत की खोज' (Discovery of India) :-

15 October 2016

Megh Day, Punjab Megh Community - मेघ दिवस, पंजाब मेघ कम्युनिटी

पिछले दिनों श्री यशपाल मांडले जी की facebook वॉल पर उक्त फोटो देखा जिसमें बैनर पर लिखा था - ‘Megh Day, Punjab Megh Community’. यानि पंजाब मेघ कम्युनिटी नाम की संस्था ने 'मेघ दिवस' का आयोजन किया था. मेरी जिज्ञासा बढ़ी और मैंने उन्हें फोन करके पूछा कि उन्हें उन दिनों 'मेघ-दिवस' मनाने का आइडिया कैसे आया? उन्होंने बताया कि यह संस्था उन दिनों महसूस कर रही थी कि मेघ कौम को डॉ.आंबेडकर की विचारधारा से दूर रखा गया है. संस्था की सोच यह थी कि डॉ.अंबेडकर की कोशिशों से ही मेघ समुदाय अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल हो सका. इसलिए आभार प्रकट करने के लिए अंबेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल, 1984-85 का दिन चुना और उसी दिन को 'मेघ-दिवस' के रूप में मनाया गया. उक्त फोटो उसी का प्रमाण है.

संभव है तब मेघ समुदाय के कई दूसरे लोगों में भी डॉ. अंबेडकर और उनकी विचारधारा के प्रति रुझान और अहसानमंद होने का भाव रहा हो क्योंकि एडवोकेट हंसराज भगत ने डॉ. अंबेडकर के साथ मिल कर मेघों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने का प्रबंध किया था. डॉ. अंबेडकर के प्रति अहसान जताने की 'पंजाब मेघ कम्युनिटी' की यह कोशिश एक ऐसी पहलकदमी थी जो उन दिनों आर्यसमाजी विचारधारा वाले मेघों में एक खलबली ज़रूर पैदा करती. वजह का अंदाज़ा आराम लगाया जा सकता है. मांडले जी कहते हैं कि उनकी संस्था ने दो-तीन बार जो कार्यक्रमों किए उनका आर्यसमाजियों ने जम कर विरोध किया गया. फिर ऐसे कार्यक्रम करने की कोशिशें छोड़ दी गईं.


मांडले जी बताते हैं कि उन दिनों 'पंजाब मेघ कम्युनिटी' के प्रधान श्री चूनी लाल थे जो टेलिफोन विभाग से थे. आजकल इसके प्रधान श्री जी.के. भगत हैं जो दिल्ली में हैं. संस्था के कार्यक्रमों में चौ. चांद राम, मीरा कुमार जैसे नेता भी शामिल चुके थे. 1986 में संस्था ने राजनीतिक सक्रियता दिखाई और सियासी हलकों में अपनी माँगें उठाईं जिसे लोगों का समर्थन मिला. रणनीति के तौर पर संस्था ने अंबेडकर को राजनीतिक मार्गदर्शक और कबीर को धार्मिक गुरु के रूप में अपनाया और अपने कार्यक्रमों में दोनों के चित्र प्रयोग किए. आगे चल कर सामुदायिक कोशिशों से कबीर मंदिरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई जिसे मेघों के कबीर की ओर झुकने और उन्हें अपनाने की प्रवृत्ति के तौर पर देखा जा सकता है. 'पंजाब मेघ कम्युनिटी' संस्था को फिर से सक्रिय करने की कोशिशें की कोशिशें की जाएँगी ऐसा मांडले जी ने बताया है.


स समय संस्था के सामने अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तरक्की का लक्ष्य था लेकिन आर्यसमाज से जुड़े होने का कोई सियासी लाभ मेघ समाज को नहीं मिल पा रहा था. यह बड़ी वजह मालूम देती है कि मेघों और उनकी संस्थाओं ने कबीर को अपनाया. दस-दस घोड़ों के साथ निकलने वाली आर्यसमाजी शोभा-यात्रा अपनी चमक खोने लगी और कबीर की शोभा-यात्राओं का बोल-बाला होता गया. इस बीच मेघ समुदाय को कुछ राजनीतिक पहचान मिली है लेकिन एक पुख़्ता पहचान की अभी भी दरकार है.


ज़रूरत इस बात की है कि मेघ समुदाय में काम कर रही अन्य छोटी-बड़ी सामाजिक संस्थाओं की सामूहिक कोशिशें ज़मीन र दिखें. ऐसा तभी होगा जब वे सभी एक साथ मंच पर आएँगे और ख़ुद में सामूहिक फैसले लेने की काबलियत पैदा करेंगे.

(''हम इस बात पर सहमत हैं कि हम असहमत हैं. हम इस

 बात पर भी सहमत हैं कि हम फिर मिल कर बैठेंगे.'')


10 May 2011

Meghs of Punjab and Arya Samaj - पंजाब के मेघ भगत और आर्य समाज

स्यालकोट से विस्थापित हो कर आए मेघवंशी, जो स्वयं को भगत भी कहते हैं, आर्यसमाज द्वारा इनकी शिक्षा के लिए किए गए कार्य से अक़सर बहुत भावुक हो जाते हैं. प्रथमतः मैं उनसे सहमत हूँ. आर्यसमाज ने ही सबसे पहले इनकी शिक्षा का प्रबंध किया था. इससे कई मेघ भगतों को शिक्षित होने और प्रगति करने का मौका मिला. परंतु कुछ और तथ्य भी हैं जिनसे नज़र फेरी नहीं जा सकती.

स्वतंत्रता से पहले स्यालकोट की तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों की कुछ विशेषताएँ थीं जिन्हें जान लेना ज़रूरी है.

तब स्यालकोट के मेघवंशियों (मेघों) को इस्लाम, ईसाई धर्म और सिख पंथ अपनी खींचने में लगे थे. स्यालकोट नगर में रोज़गार के काफी अवसर थे. यहाँ के मेघों को उद्योगों में रोज़गार मिलना शुरू हो गया था और वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे थे. इनके सामाजिक संगठन तैयार हो रहे थे. उल्लेखनीय है कि ये आर्यसमाज द्वारा आयोजित शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रने से पहले मुख्यतः कबीर धर्म के अनुयायी थे. ये सिंधु घाटी सभ्यता के कई अन्य कबीलों की भाँति अपने मृत पूर्वजों की पूजा करते थे जिनसे संबंधित डेरे और डेरियाँ आज भी जम्मू में हैं. शायद कुछ पाकस्तान में भी हों. कपड़ा बुनने का व्यवसाय मेघ ऋषि और कबीर से जुड़ा है और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कोली, कोरी, मेघवाल, मेघवार आदि समुदाय भी इसी व्यवसाय से जुड़े हैं.

इन्हीं दिनों लाला गंगाराम ने मेघों के लिए स्यालकोट से दूर एक आर्यनगरकी परिकल्पना की और एक ऐसे क्षेत्र में इन्हें बसने के लिए प्रेरित किया जहाँ मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से अधिक थी. स्यालकोट, गुजरात (पाकिस्तान) और गुरदासपुर में 36000 मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू दायरे में लाया गया. सुना है कि आर्यनगर के आसपास के क्षेत्र में मेघों के आर्य भगत बन जाने से वहाँ मुसलमानों की संख्या 51 प्रतिशत से घट कर 49 प्रतिशत रह गई. वह क्षेत्र लगभग जंगल था.

खुली आँखों से देखा जाए तो धर्म के दो रूप हैं. पहला है अच्छे गुणों को धारण करना. इस धर्म को प्रत्येक व्यक्ति घर में बैठ कर किसी सुलझे हुए व्यक्ति के सान्निध्य में धारण कर सकता है. दूसरा, बाहरी और बड़ा मुख्य रूप है धर्म के नाम पर और धर्म के माध्यम से धन बटोर कर राजनीति करना. विषय को इस दृष्टि से और बेहतर तरीके से समझने के लिए कबीर के कार्य को समझना आवश्यक है.

सामाजिक और धार्मिक स्तर पर कबीर और उनके संतमत ने निराकार-भक्ति को एक आंदोलन का रूप दे दिया था जो निरंतर फैल रहा था और साथ ही पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत पर इसने कई प्रश्न लगा दिए थे. इससे ब्राह्मण चिंतित थे क्योंकि पैसा संतमत से संबंधित गुरुओं और धार्मिक स्थलों की ओर जाने लगा. आगे चल कर ब्राह्मणों ने एक ओर कबीर की वाणी में बहुत उलटफेर कर दिया, दूसरी ओर निराकारवादी आर्यसमाजी (वैदिक) विचारधारा का पुनः प्रतिपादन किया ताकि निराकार-भक्तिकी ओर जाते धन और जन के प्रवाह को रोका जा सके. उन्होंने दासता और अति ग़रीबी की हालत में रखे जा रहे मेघों को कई प्रयोजनों से लक्ष्य करके स्यालकोट में कार्य किया. आर्यसमाज ने शुद्धिकरण जैसी प्रचारात्मक प्रक्रिया अपनाई और अंग्रेज़ों के समक्ष हिंदुओं की बढ़ी हुई संख्या दर्शाने में सफलता पाई. इसका लाभ यह हुआ कि मेघों में आत्मविश्वास जागा और उनकी स्थानीय राजनीति में सक्रियता की इच्छा को बल मिला. हानि यह हुई उनकी इस राजनीतिक इच्छा को तोड़ने के लिए मेघों के मुकाबले आर्य मेघों या आर्य भगतों को अलग और ऊँची पहचान और अलग नाम दे कर उनका एक और विभाजन कर दिया गया जिसे समझने में सदियों से अशिक्षित रखे गए मेघ असफल रहे. इससे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक बिखराव बढ़ गया.

भारत विभाजन के बाद लगभग सभी मेघ भारत (पंजाब) में आ गए. यहाँ उनकी अपेक्षाएँ आर्यसमाज से बहुत अधिक थीं. लेकिन मेघों के उत्थान के मामले में आर्यसमाज ने धीरे-धीरे अपना हाथ खींच लिया. यहाँ भारत में मेघ भगतों की आवश्यकता हिंदू के रूप में कम और सस्ते मज़दूरों (Cheap labor) के तौर पर अधिक थी. दूसरी ओर भारत विभाजन के बाद भारत में आए मेघों की अपनी कोई राजनीतिक या धार्मिक पहचान नहीं थी. धर्मों या राजनीतिक पार्टियों ने इन्हें जिधर-जिधर समानता का बोर्ड दिखाया ये उधर-उधर जाने को विवश थे. धार्मिक दृष्टि से राधास्वामी मत और सिख धर्म ने भी वही कार्य किया जो ब्रहामणों ने निराकार के माध्यम से किया. राधास्वामी मत को कबीर धर्म या संतमत का ही रूप माना जाता है लेकिन यह उत्तर प्रदेश में कायस्थों के हाथों में गया और पंजाब में जाटों के हाथों में. सिखइज़्म और राधास्वामी मत के साहित्य में मानवता और समानता की बात है लेकिन जैसा कि पहले कहा गया है सस्ता श्रम कोई खोना नहीं चाहता. वैसे भी धर्म का काम ग़रीब को ग़रीबी में रहने का तरीका बताना तो हो सकता है लेकिन उसकी उन्नति और विकास का काम धर्म के कार्यक्षेत्र में नहीं आता. यह कार्य राजनीति और सत्ता करती है लेकिन आज तक मेघों की कोई सुनवाई राजनीति में नहीं है और न सत्ता में उनकी कोई भागीदारी है. तथापि मेघों ने एक सकारात्मक कार्य किया कि इन्होंने बड़ी तेज़ी से बुनकरों का पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता अन्य कार्यों में दिखाई और उसमें सफल हुए.

दूसरी ओर विभिन्न स्तरों पर मेघों के बँटने का सिलसिला रुका नहीं. ये कई धर्मों-संप्रदायों में बँटे. कई कबीर धर्म में लौट आए. कई राधास्वामी मत में चले गए. कुछ गुरु गद्दियों में बँट गए. कुछ ने सिखी और ईसाईयत में हाथ आज़माया. कुछ ने देवी-देवताओं में शरण ली. कुछ आर्यसमाज के हो गए. वैसे कुल मिला कर ये स्वयं को मेघऋषि के वंशज मानते हैं और भावनात्मक रूप से कबीर से जुड़े हैं. मेघवंशियों में गुजरात के मेघवारों ने अपने बारमतिपंथ धर्म को सुरक्षित रखा है. राजनीतिक एकता में राजस्थान के मेघवाल आगे हैं. विडंबना ही कही जाएगी कि इन मेघवंशियों की आपस में राजनीतिक पहचान नहीं बन पा रही है. हालाँकि यह चिरप्रतीक्षित है और बहुत ज़रूरी है.
(विशेष टिप्पणी- इस संबंध में कपूरथला के डॉ. ध्यान सिंह (जो स्वयं मेघ समुदाय से हैं) का शोधग्रंथ आप देख सकते हैं.)








16 November 2010

Megh Bhagat and Arya Samaj

स्यालकोट से विस्थापित हो कर आए मेघवंशी, जो स्वयं को भगत भी कहते हैं, आर्यसमाज द्वारा इनकी शिक्षा के लिए किए गए कार्य से अक़सर बहुत भावुक हो जाते हैं. प्रथमतः मैं उनसे सहमत हूँ. यह आर्यसमाज ही थी जिसने सबसे पहले इनके लिए शिक्षा का प्रबंध किया. इससे कई मेघ भगतों को पढ़ने और प्रगति करने का मौका मिला. परंतु कुछ और तथ्य भी हैं जिनसे नज़र फेरी नहीं जा सकती.

स्वतंत्रता से पहले स्यालकोट में उस समय धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों की कुछ विशेषताएँ थीं जिन्हें जान लेना ज़रूरी है.

मेघवंशियों को इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख पंथ में ले जाने के लिए संस्थाएँ सक्रिय थीं. स्यालकोट नगर में रोज़गार के अवसर काफी थे. यहाँ मेघजन उद्योगों में रोज़गार पा कर आर्थिक रूप से सक्षम बन रहे थे. इनके सामाजिक संगठन तैयार हो रहे थे. उल्लेखनीय है कि ये आर्यसमाज द्वारा आयोजित शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रने से पहले मुख्यतः कबीरमत के अनुयायी थे और मेघ ऋषि तथा कबीर से जुड़े कपड़ा बुनने के व्यवसाय में लगे थे.

इन्हीं दिनों लाला गंगाराम ने इनके लिए स्यालकोट से दूर एक आर्यनगरकी परिकल्पना की और एक ऐसे क्षेत्र में इन्हें बसने के लिए प्रेरित किया जहाँ मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से अधिक थी. स्यालकोट, गुजरात और गुरदासपुर में 36000 मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू दायरे में लाया गया. सुना है कि आर्यनगर के आसपास के क्षेत्र में मेघों को आर्य भगत बनाने से वहाँ मुसमानों की संख्या 51 प्रतिशत से घट कर 49 प्रतिशत रह गई थी. वह क्षेत्र लगभग जंगल था.

नंगी आँखों से देखा जाए तो धर्म के दो रूप हैं. पहला है अच्छे गुणों को धारण करना. इस धर्म को प्रत्येक व्यक्ति घर में बैठ कर किसी सुलझे हुए व्यक्ति के सान्निध्य में भी धारण कर सकता है. दूसरा और मुख्य रूप है धर्म के माध्यम से धन बटोर कर राजनीति करना.

सामाजिक और धार्मिक स्तर पर कबीर और उनके संतमत ने निराकार की भक्ति को एक आंदोलन का रूप दे दिया था जो निरंतर फैल रहा था. इससे परंपरावादी चिंतित थे क्योंकि पैसा संतमत से संबंधित गुरुओं और धार्मिक स्थलों की ओर जाने लगा. आगे चल कर परंपरावादियों ने निराकारवादी आर्यसमाजी (वैदिक) विचारधारा का पुनः प्रतिपादन किया ताकि निराकारकी ओर जाते धन और जन के प्रवाह को रोका जा सके. अतः उन्होंने कई प्रयोजनों से मेघवंशियों को लक्ष्य करके स्यालकोट में कार्य किया. आर्यसमाज ने शुद्धिकरण जैसी प्रचारात्मक प्रक्रिया अपनाई और अंग्रेज़ों के समक्ष हिंदुओं की बढ़ी हुई संख्या दर्शाने में सफलता पाई. इसका लाभ मेघों को आत्मविश्वास जगाने के रूप में हुआ. नुकसान यह हुआ कि मेघों के मुकाबले आर्य मेघों, जिन्हें आर्य भगत कहा गया, को अलग और ऊँची पहचान दी गई और नाम के आधार पर मेघों का एक विभाजन और हो गया. भगत अपने आप को मेघों से अलग करने लगे. सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक बिखराव बढ़ा.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मेघवंशियों के उत्थान के मामले में आर्यसमाज ने धीरे-धीरे अपना हाथ खींच लिया. यहाँ भारत में मेघ भगतों की ज़रूरत हिंदू के रूप में कम और सस्ते करिंदों/मज़दूरों के तौर पर अधिक थी. सस्ते श्रम को कौन खोना चाहेगा? मेघवंशियों की अपनी कोई धार्मिक या राजनीतिक पहचान नहीं थी. जिस धर्म या राजनीतिक पार्टी ने इन्हें समानता का सपना दिखाया ये उधर झुकने को विवश थे. राधास्वामी मत और सिख धर्म ने भी वही कार्य किया जो परंपरावादियों ने निराकार के माध्यम से किया. इनका साहित्य मानवता और समानता की बात तो कर ही लेता है. शायद इतना काफी हो.

मेघवंशी कई धर्मों-संप्रदायों में बँटे. कई कबीर धर्म की ओर लौट गए. कई राधास्वामी धर्म में आ गए. कुछ गुरु गद्दियों में बँट गए. कुछ सिखी और ईसाईयत की ओर चले गए. कुछ देवी-देवताओं को पूजने लगे. कुछ आर्यसमाज के हो गए. वैसे ये स्वयं को मेघऋषि के वंशज मानते हैं और भावनात्मक रूप से कबीर से जुड़े हैं. मेघवंशियों में गुजरात के मेघवारों ने अपने धर्म- बारमतिपंथ- को सुरक्षित रखा है. राजनीतिक एकता में राजस्थान के मेघवाल आगे हैं.

(विशेष टिप्पणी- कपूरथला के डॉ. ध्यान सिंह का शोधग्रंथ पंजाब के कबीरपंथियों पर विस्तार से रोशनी डालता है. यदि वे इसे यूनीकोड में उपलब्ध करा सकें तो लाभ होगा.) 


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