"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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25 April 2021

Caste and Political Divisions - जाति और सियासी विभाजन

 नवल वियोगी ने हाशिए की उन जातियों का इतिहास ढूँढा है जो आज अलग-अलग पहचान रखती हैं लेकिन अतीत में एक ही बड़े कबीले के रूप में दिखाई देती हैं.

    डॉ नवल वियोगी ने अपनी पुस्तक 'मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास' में महामहिम बाबू परमानंद को मेघ जाति का बताया है. कैसे बताया वही जानते होंगे लेकिन उनकी बात पर मुझे शक था. कुछ मेघ मंत्री बने हैं लेकिन कोई मेघ राज्यपाल बनाया गया हो ऐसा कभी सुना नहीं. फिर भी उस पर एक पोस्ट मैंने सोशल मीडिया पर डाल दी जिस पर बहस छिड़ गई. मेरी मंशा यह थी कि जिन समाजसेवियों ने मेघ जाति के लिए कार्य किया, चाहे वे किसी भी समाज से हों, उनकी याद कायम रखने का हीला करना चाहिए. लेकिन जैसा कि अक्सर होता है सियासी शख़्सियत पर चर्चा उनकी जाति तक आते ही राजनीति में चली जाती है. 

    सोशल मीडिया पर और बाहर भी पर्याप्त रूप से लोगों ने जानकारी दी कि बाबू परमानंद मेघ जाति से नहीं थे और यह भी कि उनके और भगत छज्जूराम (मेघ) जी के राजनीतिक हितों में टकराव था. अब नवल वियोगी जी तो दुनिया में हैं नहीं कि उनसे कुछ पूछा जा सकता. सो मैंने उस पोस्ट को डिलीट करना बेहतर समझा.

    नवल वियोगी जी की चूक भी इतिहासिक हो गई है.😊 ख़ैर! जिस इतिहासकार ने इतना बड़ा असंभव-सा लगने वाला कार्य किया उससे हुई ऐसी मामूली चूक नज़रअंदाज़ करने के काबिल है.    


10 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक - 2

  


    डॉ वियोगी ने पौराणिक साहित्य से भी संदर्भ ले लिए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार मग या मद्र, भारत में शाक द्वीप यानि ईरान से आए। (नवल जी की पुस्तक में ‘शका’ छपा है। संभवतः यह शाक शब्द है।) इस द्वीप के मगों में चार जातियां थीं- मग, मगध, मानस और मंदगा अथवा मद्र यानी भारत की तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र यानी मद्र शूद्र थे। जैसा कि पहले बताया गया है मीडिया (Media region) के निवासी मीड (Mede) भारत में मद्र कहलाए। (कुछ अन्य विद्वानों ने लिप्यंतरण करते हुए Mede को ‘मेदे’ भी लिखा है)। मग या मघ एक ही जनजाति थी। पहली जनजाति में से दूसरी उभरी। हेरोडोटस (Herodotus) ने उन्हें मद्रों की एक शाखा बतलाया है, क्योंकि वे मूलरूप से अनार्य थे। भारत में मद्र शिल्पकार अथवा बुनकर के रूप में दिखते हैं, क्योंकि मगों का संबंध मद्रों से था, इसलिए वे बुनकर थे और पुजारी भी। इन्हीं परिस्थितियों में पश्चिम एशिया में मेघ जाति विकसित हुई क्योंकि उनके समाज में ऐसी ही परंपरा थी। मेघ, समाज के एक विशेष वर्ग का पुजारी है। मुख्यतया वे मातृदेवी की पूजा से जुड़े हैं जो जनजातीय परंपरा है। उनके अनेक गोत्र नाम ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं। जब कि उनसे संबंधित औडुंबरा या डूम वर्ग के लगभग सारे गोत्र ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं।

तीसरे दौर में भारत आए मेघों से संबंधित वर्ग को विदेशी और म्लेच्छ होने के कारण बहुत समय तक मान्यता नहीं मिली। दूसरी सदी में जब पार्थियन व शकों का राज्य था उन्हें द्विज की मान्यता मिली। इस सम्मानजनक स्थिति पर मज़बूत पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने ब्राह्मण व ब्राह्मणवाद की बड़ी सेवा की। जातिवाद को मज़बूत करने के लिए कड़े कानून बनाए और स्मृतियों में जोड़े। उसी का परिणाम है कि गंगा घाटी में जातिवाद अपने अत्यंत घिनौने रूप में मिलता है।

‘गोत्र’ के बारे में बताते हुए नवल जी लिखते हैं कि भारत की जलवायु आर्यों के लिए गर्म थी। इसलिए उन्होंने यहां के वनों में आश्रम बना कर रहना शुरू किया। वे चरवाहे थे और गाएं चराते थे। अनेक ऋषि अपनी गायों को विशेष पहचान देने के लिए उनके कान काटकर खास निशानी लगाते थे ताकि उनकी पहचान की जा सके। उस निशान को गोत्र कहते थे। उसी गोत्र के आधार पर आश्रम और ऋषि की पहचान होने लगी। पहले चार गोत्र थे- अंग्रिश कश्यप, अथर्वा, वशिष्ठ तथा भृगु। बाद में चार और जुड़ गए - जगदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य। उनमें अनार्य (ईरान से आए मग) वर्ग के ऋषि भी शामिल थे। जब जाति विभाजन कठोर हो गया और लोगों को यकीन हो गया कि आर्य ऋषियों के गोत्र वाले ही वास्तव में ब्राह्मण हैं और अब्राह्मण का अपना कोई गोत्र नहीं हो सकता तब इसी सिलसिले में यज्ञ करते हुए गोत्र नाम बोलने की परंपरा शुरू हुई। क्षत्रिय और वैश्य अपने पुरोहित का ही गोत्र नाम इस्तेमाल करने लगे। विभिन्न वर्णों में समान गोत्र नामों की यह वजह रही। गोत्र परंपरा से पहले पुरोहित और क्षत्रिय ख़ुद को एक ही वर्ग का नहीं मानते थे। इससे जातिवाद विकसित हुआ।

डॉ नवल के अनुसार विश्वामित्र व कण्व कश्यप अनार्य ऋषि थे। महाभारत के अनुसार कश्यप ही नागों (मग) के जनक थे। वशिष्ठ तथा विश्वामित्र का टकराव आर्य-अनार्य का ही टकराव प्रतीत होता है जो बहुत स्पष्ट भी नहीं है। बंगाल के चंदा नामक विद्वान के हवाले से वे लिखते हैं कि इस काल में ब्राह्मणों का लोभ बहुत बढ़ गया था। लोभ व हित साधना के लिए झूठी परंपराएं और निरर्थक अनुष्ठान प्रारंभ किए गए। सारी सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था जैसे उनकी मुट्ठी में आ गई। यजमानों की प्रशंसा बहुत बढ़ा-चढ़ा कर की जाती थी। उन्हें लंबी आयु और अमर पद का लालच दिखाया जाता था। अहीन यज्ञ में 1000 गायें अथवा सारी संपत्ति दान करनी होती थी। गुप्त काल में धर्म व मंदिरों की लूट यथावत जारी रही।

डॉ नवल लिखते हैं, “मद्र अथवा मेघ समाज में प्राचीन काल से ही गणसंघ, गणतंत्र व्यवस्था की परंपरा थी। उनका प्रत्येक नागरिक एक बहादुर सैनिक तथा कुशल शिल्पकार होता था। उनमें राजऋषि परंपरा थी। वह जाति-पांति विहीन समाज था। वहां हर मनुष्य जन्म से ही बराबर था। वे प्रारंभ से असीरियन धर्म के मानने वाले थे। उसका आधार सांख्य दर्शन था। उसने बौद्ध व जैन धर्म को जन्म दिया था। यानी वे बौद्ध अथवा जैन धर्म के अनुयायी थे। बौद्ध धर्मी ब्राह्मणों के सबसे बड़े शत्रु थे। जब गुप्त युग में उनका बलात हिन्दूकरण किया गया तो उन्हें उसी शत्रुता के कारण चौथे वर्ण में धकेल दिया गया। इसका अन्य कारण भी था कि वे मूलरूप में बुनकर थे। क्योंकि बौद्ध-धम्म में मांसाहार की आज्ञा थी यहां तक कि उन्हें मृत पशु का मांस खाने की आज्ञा भी थी अतः मेघों को अछूत वर्ग में धकेल दिया गया। यानी एक भाई ने अपने ही भाई की यह दुर्गति की है।” “गुप्त भले ही उसी नाग समाज के राजा थे, मगर उनका भी आर्यकरण कर दिया गया और बौद्धों पर धार्मिक अनाचार करने में उन्होंने ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ दिया।”

आधुनिक काल में जम्मू के क्षेत्र के प्राचीन निवासी मेघों की स्थिति बहुत खराब रही। वे बंधुआ मज़दूरों का जीवन जी रहे थे। काम के बदले उन्हें सूखी रोटी और उतरन मिलती। जिनके पास थोड़ी-बहुत ज़मीन थी उसे नैतिक-अनैतिक तरीकों से राजपूतों ने हड़प लिया। जम्मू व सिआलकोट के क्षेत्र में वे खेतिहार मज़दूर थे। अछूत होने के कारण वे घरों तथा मंदिरों में प्रवेश करने का साहस नहीं कर सकते थे। कुओं से पानी नहीं ले सकते थे। वे अधिकतर बुनकर, खेत मज़दूर और कारख़ानों में मज़दूर थे। लेखक काहण सिंह बिलौरिया ने लिखा है, "मेघ निचली जातियों के पुजारी हैं।" भूमि सुधारों के कारण उनमें से कुछ को ज़मीनें अलॉट हुई हैं। वे खेती करने लगे हैं।

प्रो. हरिओम शर्मा अपनी रचना 'हिस्ट्री आफ जम्मू एण्ड कश्मीर' में लिखते हैं- “उच्च शिक्षा तथा नौकरियों में आरक्षण के कारण अनेक मेघ ऊंची श्रेणी के पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस., डॉक्टर, इंजीनियर, बैंक प्रबंधक सेवाओं के पदों तक पहुंच गए हैं।"

कुछ अभिलेखों से प्रमाण मिले हैं कि अनेक मेघ ठाकुर जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के राज्यों में शासक रहे हैं। पठानकोट के पठानिया राजवंश का संबंध मद्र या मेघ समाज के साथ था। उन्हें मूल रूप से औडुंबरा पुकारा जाता था। उसी से डूम शब्द बना। मुग़लों के शासन काल में पठानिया प्रसिद्धि प्राप्त शासक थे। वे राजपूत पुकारे जाते थे। सिखों के शासन काल तक वे सत्ता में रहे। मद्र तथा मेघों की तरह यह एक बुनकर जाति थी।

मेघों के इतिहास  का यह बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। बेहतर होगा कि डॉ नवल वियोगी की मूल पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ ध्यान से पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। फिर से अनुरोध है उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिए।

पुस्तक का नाम: मद्रों और मेघों का प्राचीन व आधुनिक इतिहास

लेखक - डॉ नवल वियोगी

प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, 

नई दिल्ली-110063

खरीद के लिए संपर्क - मोबाइल - 9810249452, 9818390161



03 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक -1

डॉ नवल वियोगी ने मेघों की लगभग पूरी कथा लिख डाली। यह बात समझी जा सकती है कि उनके द्वारा इकट्ठी की गई जानकारी पूरे मेघ समाज तक जल्द पहुंचने वाली नहीं है। यह चिट्ठा एक कोशिश है कि नवल जी ने जो खोजा-पाया है उसकी कहानी का सार मेघनेट के पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की जाए। यह स्कैच मात्र है। बेहतर होगा कि उनकी लिखी पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। उनकी मेहनत की क़द्र की जानी चाहिए।

‘मेघ’ (जनजाति) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों ने कई अनुमान लगाए गए हैं। लेकिन जाति नाम के तौर पर यह शब्द कब और कैसे अस्तित्व में आया इसका कुछ उत्तर डॉ नवल की पुस्तक में मिल जाता है। इसका मद्र, मग, मागी, मीडिया (दक्षिणी ईरान का क्षेत्र) से संबंध है ऐसा इतिहासकार ने बताया है। 

मद्र नामक जनजाति ईरान के मीडिया प्रदेश में रहती थी। उनके पुजारी या पुरोहित मग कहलाते थे। उनकी भाषा अमेगीर (Emagir) थी। वे मग बेबीलोनिया और काल्डिया में भी पुजारी थे। वहीं से इनका भारत में आगमन हुआ था। नस्ली तौर पर वे द्रविड़ थे। मीडिया में गोल सिर वाले अल्पाइन अथवा कसाहट लोगों के साथ दीर्घकाल तक रहने के कारण उनमें संकरण हुआ। उनके समाज में राजऋषि परंपरा थी। शासक राजा धार्मिक मुखिया भी होता था। इसलिए मग धीरे-धीरे पुजारी बन गए।

उनका समाज गणतांत्रिक था। जहां प्रत्येक नागरिक बराबर था। उनकी सामाजिक परंपराओं के अनुसार सभी नागरिक बहादुर सैनिक होते थे और कुशल शिल्पी भी। मद्रों का संबंध जोहाक नाग राजपरिवार के साथ था। मद्र भारत में जोहाक या तक्षक नाग परिवार की एक शाखा के रूप में हैं। अर्थात मद्रों और मगों दोनों का संबंध उस जोहाक या नाग परिवार के साथ था जो गांधार और तक्षशिला के शासक थे। 2500-2100 ई.पू. जब आर्य ईरान आए तब वहां के शासक बन गए। उनमें पशु-वध से जुड़ी यज्ञ परंपरा थी। मग राजऋषि उनकी यज्ञ परंपरा से जुड़े और उनके पुजारी बने। 

मगों का भारत में पहला आगमन तब हुआ जब आर्यों ने ईरान पर आक्रमण किया। जीवन रक्षा के लिए वे कई अन्य ईरानियों के साथ भारत भू-भाग में आ गए। वे अपना असीरियन धर्म भी साथ लाए। यह सांख्य दर्शन पर आधारित था। इसी में से बौध और जैन धर्म आए। ये बराबरी और भाईचारे पर आधारित थे। आर्यों ने 1650 ई.पू. भारत पर आक्रमण किया तब मग भी उनके साथ भारत आए। मगों ने ऋग्वेद की रचना और जाति आधारित व्यवस्था निर्माण में मदद की। मग द्रविड़ थे लेकिन आर्यों के साथ रहने के कारण ख़ुद को आर्य समझने लगे थे। लेकिन आर्यों ने उन्हें आर्य नहीं माना।

मीडिया के मग पुरोहित तंत्र विकसित करने की ओर प्रवृत्त रहे। ईरान में कोई यज्ञ उनके बिना नहीं होता था। उन्होंने ज्योतिष विद्या विकसित की। वे सपनों के आधार पर भविष्य बताते थे। इन्हीं कलाओं की सहायता से वे राजाओं-महाराजाओं की निकटता प्राप्त कर पाए। अंधविश्वासी होने के साथ-साथ वे झूठा दिखावा भी करते थे। इससे उन्हें राजनीति में घुसपैठ करने और समाज में महत्व पाने का अवसर मिला। तभी एक हादसा हो गया। अख़माइन राजवंश के राजकुमार डेरियस प्रथम के सिंहासनारूढ़ होने में गोमत नामक मशहूर राजऋषि मग नेता बाधा बन गया। नतीजतन उसकी और उसके मागी साथियों की हत्या कर दी गई। उन्हें सबक सिखाने के लिए एक मेगाफ़ोनिया नाम का पर्व मनाया जाने लगा। किसी एक मग को पकड़ कर उसे 5 दिन के लिए ईरान की राजगद्दी पर बिठाया जाता। उसके बाद उसे फांसी दे दी जाती। इस दिन मगियों को कई तरह से अपमानित किया जाता। जिससे वे अपने घरों में छिप जाते। बरसों के अपमान से दुखी होकर 521 ई.पू. के आसपास वे मग बलुचिस्तान, सिंध, गुजरात व विन्ध्याचल के रास्ते मगध में चले गए। यहां भी 5-6 सौ साल तक वे हिंदू समाज का हिस्सा नहीं बन सके। उन्हें म्लेच्छ, मग, विदेशी, यवन, पारसी कहकर पुकारा गया। आखिर उन्हें दूसरी सदी में ब्राह्मण के तौर पर मान्यता मिल गई। लेकिन आर्यों ने उन्हें ख़ुद से नीचे रखा। वे मग, शांकल, कश्यप अथवा कान्यकुब्ज ब्राह्मण कहलाए। डॉ वियोगी ने बताया है कि भविष्य पुराण में उन म्लेच्छ ब्राह्मणों के 10 गोत्र बताए हैं- कश्यप, उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, पांडेय, चतुर्वेदी। आगे चल कर इन्हीं ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हिंदू धर्म के कठोर नियम बनाए और पूर्व ग्रंथों में उन्हें जोड़ा।

डॉ वियोगी ने बताया है कि प्राचीन काल में, पश्चिम एशिया से तीन प्रमुख अनार्य जनजातियां आईं- जोहाक अथवा तक्षक नाग, हाइक्सोस अथवा इक्ष्वाकु, यादव अथवा पंचजन्य। ये सभी मूल रूप से एक ही थे। तीनों ही सिंधु घाटी के बसाने वाले थे। अस्थाना शशि और हेरोडोटस के हवाले से बताया गया है कि मीडिया के मीड तथा भारत के मद्र भिन्न नहीं थे। वे मग या मागी मद्रों की ही एक शाखा थे।

उशीनर गणराज्य का एक भाग झंग मधियाना (मग से मधियाना) कहा जाता था। यह दोआब के दक्षिणी भाग में था। उशीनर जन मद्रों से संबंधित थे। यानी मद्र या मग मीडिया की तरह यहां भी एक साथ ही निवास करते थे। आगे चल कर मद्रों ने सिआलकोट (शांकल) पर दीर्घ काल तक राज किया। कौरवों-पांडवों के साथ उनके वैवाहिक संबंध होते थे। सिकंदर के आक्रमण (326 ई.पू.) के समय मद्र अथवा पौरुष उस क्षेत्र में निवासित थे। यहीं से मद्रों के पौराणिक और इतिहासिक सूत्र मिलने लगते हैं।

मगों की एक मुख्य शाखा ने आगे बढ़कर भारत के मध्य-पूर्व में शासन किया। वे चेदि पुकारे जाने लगे थे। उन्हीं की एक शाखा ने मगध पर शासन किया। जरासंध चेदि वंश का प्रसिद्ध राजा था जिसे राक्षस या असुर कहा गया है। कृष्ण और पांडवों के साथ युद्ध में वह मारा गया। चेदियों की एक शाखा ने दक्षिण कोसल व कलिंग पर अधिकार जमाया, नंदों और अशोक महान से युद्ध किया। उन्हीं की एक शाखा थी खारवेल या महामेघवाहन। उसने दक्षिण-पूर्व में बहुत ही शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया। ये लोग जैन धर्म के अनुयायी और उसके रक्षक थे। उनकी एक शाखा ने 129 ई.-217 ई. तक कोसंबी में शासन किया। वे बौद्ध धम्म के अनुयायी थे। उनमें 9 बड़े राजा और छोटे 10 राजा हुए। प्रमुख राजाओं के नाम थे- मघ, भीमसेन, मद्रमघ व प्रोष्ठाश्री, भट्टदेव, कौत्सीपुत्र, शिवमघ प्रथम, वेश्रवण, शिवमघ द्वितीय, तथा भीम वर्मन। उनके शिलालेख और मुद्राएं मिली हैं। उनके आखिरी राजा को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। मध्यकाल (Medieval period) में मेघों की एक शाखा ने मध्य भारत में शासन किया।

(ब्लॉगर का नोट: ऊपर के विवरण से जाना जा सकता है कि ‘मग’ से ‘मेघ’ शब्द की यात्रा सदियों में तय हुई है। मग से मघ बनते हुए इसे 129 ई. से 217 ई. के दौरान कोसंबी में देखा गया है। घ, ध, भ जैसी महाप्राण ध्वनियां भारतीय हैं। ग के घ हो जाने के इस परिवर्तन की भाषा वैज्ञानिक व्याख्या कहीं न कहीं मिल जाएगी। कहा जाता है कि बुद्धकाल ही भूतकाल है। यानि ब का भ और ध का त हो जाना किसी उच्चारण प्रवृत्ति की वजह से है। ‘कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी’ वाली बात है। मीड, मेदे, मेगी, मग, मद्र, मेद, मेध, मध्य, मेघ, मेंग, मींग, मेंह्ग, आदि शब्द एक ऐसी प्राचीन जनजाति की ओर इशारा करते हैं जिसकी सैंकड़ों शाखाएं, वर्ग और जातियां हैं। ये दक्षिण-पश्चिम एशिया के बहुत बड़े भू-भाग में निवासित हैं।)

28 March 2021

Thirst for history - इतिहास की प्यास -2

प्राचीन ‘इतिहास’ की एक मुख्य बात यह थी कि मंत्रोच्चार के साथ राजा का विस्तृत गुणगान करने के बाद जल्दी से यह बोल कर ‘स्वाहा...’ कह दिया जाता था कि - ‘उसके राज्य में जनता बहुत सुखी थी’. कैसे सुखी थी या कैसे सुखी नहीं थी, इसका उल्लेख कम ही मिलता है. उस समय के इतिहासकारों ने राजा से ज़मीन और उपहार लेने होते थे सो प्रजा के बारे में एक वाक्य काफ़ी था. अधिक बताने की ज़रूरत नहीं समझी गई. मेहनती देश की श्रम-संस्कृति का वर्णन जब यज्ञ-संस्कृति करती है तो बहुत कुछ अनकहा रह जाता है. हिरणों की कथा अगर शिकारी लिखे तो यही लिखेगा कि देश का राजा बहुत दयालु था (जिसने उसे बड़ी शिकारगाह दे दी थी)....और कि शिकारी की नज़र जहां तक जाती थी वहां हिरण खुशी से छलांगें मारते थे. बाकी शिकारी जाने या फिर हिरणों को पता होगा.

इंसानों के संबंध में जब इतिहासकार शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, धर्म और जनसाधारण के जीवन पर व्यापक टिप्पणियाँ दें तब वह आज के अर्थ में ‘इतिहास’ कहलाता है.

किसी मानव समूह (समाज) का इतिहास तब रूप ग्रहण करने लगता है जब अपने परिवेश से मिले संस्कार समाज के सदस्यों को ऐसा बना दें कि वे दूसरों के जीवन को सकारात्मक रूप से निखारने लगें. अपने अस्तित्व और जीवन-मूल्यों के लिए संघर्ष समाज के जीवन में दिखने लगे और उसका शैक्षिक, बौद्धिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास होने लगे. 

आधुनिक इतिहासकारों ने वह समझदारी विकसित की है जिसमें आम पब्लिक का दुख-सुख जगह पा गया. इसके अलावा प्रमुख घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में सक्रिय विचारधारा, साहित्य, भाषा आदि के महत्व को इतिहास के अन्वेषकों और टिप्पणीकारों ने समझा. इतिहास को लेकर ख़ास तरह के संदर्भ साहित्य में क्या गुण-दोष हैं, किसी विचारधारा की स्थापना किसने और किन परिस्थितियों में की यह बताया जाने लगा है. इसलिए यदि आपके समाज पर किसी दूसरे ने कमेंट्री की है तो उसका इस्तेमाल करते हुए सावधानी बरतें. किसी दूसरे ने गूढ़ भाषा में जो मंत्र लिखा उसका इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह परख लें कि कहीं वह मंत्र आपको ही बर्बाद करने के लिए तो नहीं लिखा गया.

इतिहास के उल्लेखनीय पात्रों में अपने समाज (परिवार) की परंपराओं के प्रति ‘स्वाभिमान’ जैसे प्रबल और आक्रामक गुणों का उल्लेख होता आया है जिनके बल पर किसी ने अपने समाज को उच्चतर स्थिति, उच्चतर मानकों (स्टैंडर्ड्स) पर बनाए रखने के लिए कार्य किया. कई मेघों की प्रेरक जीवनियाँ बताती हैं कि उन्होंने किस तरह अशिक्षा और कम संसाधनों के बावजूद संतानों का चारित्रिक निर्माण किया, संतानों को शिक्षा दिलाने और आगे बढ़ाने के लिए लंबा संघर्ष किया और उनमें उच्चतर जीवन-मूल्यों का बीज रोंपा. ऐसी सच्ची कथाओं वाला साहित्य समाज में जान फूंकता है. उनका योद्धाओं वाला इतिहास तो है ही.

इतिहास लेखन का छोटा-सा तजुर्बा तब हो जाता है जब हम परिवार की तरक्की के लिए अपने माता-पिता की जद्दोजहद पर निबंध लिखते हैं. माता-पिता के किन गुणों के कारण आप, मैं और गली-मोहल्ले या शहर के लोग उन्हें याद करते हैं. ‘शहर के लोग याद करते हैं’ जैसा वाक्य शहर में सस्ता नहीं मिलता. इसका मूल्य आपके पास रखे संदर्भों, दस्तावेज़ों और मीडिया की ताकत से तय होता है. समाचार पत्र की कतरनें, फोटो, वीडियो, पत्रिकाएं, फिल्में आदि समाज का इतिहास लिखने में मददगार होती हैं.

अपना इतिहास स्थापित करने के लिए बुद्धिजीवियों की मदद ज़रूरी है. उसे छापना और जन-पुस्तकालयों तक पहुंचाना चाहिए. समाज को पुस्तकें मुहैय्या कराइए. मेघ समाज तूफ़ानों का मुकाबला करते हुए वर्तमान तक पहुंचा है. ज़रूरी है कि उसकी गौरवपूर्ण कथा लिखी जाए.


20 March 2021

Thirst for history - इतिहास की प्यास -1

    कुछ दिन पहले मेघ चेतना के पूर्व मुख्य संपादक श्री एन.सी. भगत मेरे यहां पधारे थे. उन्होंने जिक्र किया कि किसी ने उन्हें फोन करके मेघों के इतिहास की जानकारी चाही है (भई यह चाहना तो हमें भी लगी है). 

    बातचीत लंबी थी. इस दौरान श्री एन.सी. भगत ने बताया कि उन्होंने फोन करने वाले को एक सुझाव दिया है कि चार-पांच लोग इकट्ठे बैठकर अपनी जानकारी के हिसाब से मेघ जाति का इतिहास लिखें.

    इस सुझाव में बहुत संभावनाएं हैं. दो या अधिक टीमें भी हो सकती हैं. ये टीमें इकट्ठे या अलग-अलग बैठ कर लिखें. उनके पास प्राधिकृत और पर्याप्त सामग्री हो तो अच्छा परिणाम निकलेगा. डॉ ध्यान सिंह, डॉ नवल वियोगी, श्री ताराराम और कुछ अन्य ने मेघों के बारे में बहुत कुछ लिखा है. इतिहासपूर्व मेघों के बारे में श्री आर.एल. गोत्रा का आलेख Meghs of India काफी कुछ कहता है. उनके आलेख के संदर्भ अन्य इतिहासकारों ने दिए हैं. इन सभी विद्वानों द्वारा एकत्रित जानकारी उपयोगी है. कोई कहना चाहे तो कह दे कि- ‘Blogging is not writing’, लेकिन MEGHnet ब्लॉग पर मेघों के बारे में बहुत-सी सकारात्मक जानकारियां मिल जाएंगी जो अन्यत्र नहीं मिलेंगी. नए प्रयास करने वालों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.

    इतिहास लेखन के गुणों के बारे में विद्वानों ने हमारे लिए बहुत कुछ लिख छोड़ा है. उसका एक सार यह है:-

    ‘अपने लेखन को पूरी तरह केंद्रित, सीमित रखें. स्पष्ट तर्क दें, अपने मूल विचार शामिल करें, अपनी भावना को अच्छी कहानी की तरह कहें, साथ में सबूत देते चलें, अपने स्रोतों के दस्तावेज़ बनाते चलें, निष्पक्षता से लिखें, पहला और आखिरी पैराग्राफ एक दूसरे का दर्पण हो, आपका लेखन भाषा की प्रचलित रीति में हो और आप जिसे कुछ कहना चाहते हैं उससे बात करता हो.’ (Richard Marius and Melvin E. Page की A Short Guide to Writing About History के साभार)

    इतिहास लेखन प्रोजेक्ट की तरह होता है: 

   अपनी परियोजना की योजना बनाएं. उसका प्रकाशन, उसका बजट प्रबंधन, किसी अन्य लेखक की सहायता कैसे और किन नियमों और शर्तों के तहत ली जाएगी, पुस्तक प्रकाशन की अन्य व्यवस्थाएँ, संपादन, डिज़ाइन और पुस्तक का समग्र रूप, ISBN संख्या और तैयार पुस्तक को बेचना. उसके बाद समय-समय पर अपडेशन या नए संशोधित संस्करण. कुल मिला कर यह एक भरी-पूरी कला है.  

    यदि मैं सिर्फ़ अपना मूल या अपने वंशकर्ता के बारे में जानकारी चाहता हूं, तो मुझे साइंस से इतना सबक़ ले लेना चाहिए कि धरती पर जीवन सूर्य से है और सभी मानव सूर्यवंशी हैं. 'मेघ-माला' पुस्तक यही कहती है. प्रथम मेघ-नारी या मेघ-पुरुष की तलाश है? तो बेहिसाब मग़ज़ फोड़ी कर के आख़िर कहना होगा कि जिस इंसान ने पहली बार धरती पर चैतन्य आंखें खोलीं वही हमारा वंश कर्ता था. वह मानवीय गुणों वाला प्राकृतिक मानव था. उसका नाम कहीं दर्ज नहीं है. 


27 February 2021

Meng, Makhs or Maghs - मेंग, मख, मघ

    लगभग एक वर्ष पहले मैंने एक ब्लॉग लिखा था - गुंजलिका में एक कथा

    ‘मेंग’ को ढूँढने निकले मेरे ख़्यालों के जंगली घोड़े दूर-दूर तक घूम आए थे. उत्तर-पूर्व में, बल्कि उससे भी आगे. उसी ब्लॉग में लार्ड अलेग्ज़ैंडर कन्निंघम को भी उद्धृत किया था.

    अब इतिहासकार श्री ताराराम जी ने फेसबुक के एक ग्रुप ‘Megh विचार गोष्ठी’ में एक पोस्ट डाली है जिसमें उन्होंने मध्यकाल में मेघों के लिए प्रयुक्त कुछ अन्य नामों का भी उल्लेख किया है यथा- मेख, मख, मोकर या मौखरि. अपनी पोस्ट में वे लिखते हैं- “अपने मूल स्थान से विस्थापन के बाद यह जाति सिंधु से बर्मा तक फैल गयी. जहां मंगोल जाति से इसका संपर्क हुआ. अरकान का क्षेत्र इसके अधीन था. मेघों के वहां निवास के कारण ब्रह्मपुत्र नदी का नाम वहां पर मेघना हो गया. मेगाद्रू और मेघना, दोनों नामों में मूल जाति (मेग) का नाम सुरक्षित है”.

    अपनी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने CULCUTTA REVIEW, Volume LXXX, Page- 193, publication: 1885 का हवाला दिया है और उससे संबंधित स्क्रीन शॉट भी वहाँ पेस्ट कर दिए हैं.


मेघ समुदाय के महान सपूत डॉ पी जी सोलंकी


डॉ बाबा साहब अंबेडकर ने बॉम्बे में मेघ समुदाय को संबोधित किया था इसका उल्लेख मेघवंश के इतिहासकार श्री ताराराम जी कर चुके हैं. उसी की कड़ी में उन्होंने कल फोन से एक संदर्भ भेजा और फेसबुक पर एक ग्रुप 'मेघवंश का इतिहास' में एक पोस्ट लिखी थी जिसे नीचे कॉपी-पेस्ट भी कर दिया है.

"मेघ बिरादरी का महान नेता डॉ पी जी सोलंकी:
डॉ पी जी सोलंकी को वह हर एक शख्स जानता है, जिसने डॉ आंबेडकर का साहित्य पढ़ा है। हर एक वह व्यक्ति जानता है, जो आरक्षण के बारे कुछ जानकारी रखता है और जिसको पूना पैक्ट के बारे में ज्ञान है। डॉ पी जी सोलंकी गुजरात के मेघवाल थे, जो बॉम्बे में जा बसे थे। वे बॉम्बे म्युनिसिपल बोर्ड के लंबे समय तक कॉउंसीलर भी रहे। वे बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य भी रहे। संविधान सभा के भी सदस्य रहे। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में डॉ आंबेडकर के साथ भाग लिया और हमेशा डॉ आंबेडकर का समर्थन किया। सन 1912 में विभिन्न जातियों के सहभोज का आयोजन किया। उन्होंने साइमन कमीशन हो या वयस्क मताधिकार की कमेटी, उनके सामने अछूतों का पक्ष रखा। उनकी वजह से शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के प्रावधान पारित हुए। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने कई जगह यह जताया कि वे जो कुछ कर पाए है, उसमें डॉ सोलंकी का महत्वपूर्ण योगदान है। इनके विस्तृत कृतित्व को कुछ पंक्तियों में नहीं लिखा जा सकता है। इस पर फिर कभी लिखा जाएगा।
अभी यहां पर वसंत मून द्वारा लिखित पुस्तक के एक अंश का उल्लेख कर रहे है, जिसमें डॉ सोलंकी की जाति का उल्लेख है, अन्यथा अन्य ग्रंथों में उनका उल्लेख डॉ सोलंकी के रूप में ही हुआ है। डॉ सोलंकी मेघ बिरादरी के एक दूरदर्शी और अपराजित योद्धा थे। हालांकि, उन पर ईसाई धर्म अपनाने के लांछन लगे, पर वे अछूतों के हितों को सुरक्षित करवाने हेतु हमेशा कटिबद्ध रहे और डॉ बाबा साहेब अंबेडकर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर योजनाबद्ध कार्य करते रहे। गोलमेज सम्मेलन में डॉ आंबेडकर के व्यस्त रहने पर उन्होंने हर तरह से डॉ बाबा साहेब अंबेडकर के करवां को गतिमान बनाये रखा। इसलिए उन्हें डॉ आंबेडकर का एक मजबूत बाजू भी कहा जाता था।
वसंत मून (1991) अपनी पुस्तक 'बाबा साहेब डॉ आंबेडकर' में लिखते है: "सन 1927 के प्रारम्भ काल में ही डॉ आंबेडकर को विधान मंडल का सदस्य नियुक्त किया गया। 18 फरवरी 1927 के दिन उन्होंने शपथ ग्रहण की। उनके साथ ही मेघवाल समाज के डॉ सोलंकी भी अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त हुए थे।"







29 October 2020

Madra, Megh and Jhelam - मद्र, मेघ और झेलम

 मद्रों, मेघों के संदर्भ में कई जगह ‘वितस्ता’ का उल्लेख पढ़ा है जिसे कई जगह वैदिक काल की ‘झेलम’ नदी या झेलम का वैदिक कालीन नाम बताया गया है. इस 'झेलम' शब्द की उच्चारण ध्वनि इतनी सख़्त है कि संदर्भित क्षेत्र में उसकी लोक प्रयुक्ति का काल लंबा नहीं हो सकता. इसकी उच्चारित ध्वनि लोक-भाषा में 'जेह्लम' जैसी है. वितस्ता जैसे कई नाम नकली प्रतीत होते हैं. मुझे लगता है कि इन नामों के मूल स्वरूप की खोज प्राकृत और पाली भाषाओं की मदद से की जानी चाहिए जिससे कई अन्य शब्दों (मद्र, मेदे, मीडी आदि) की यात्रा को ट्रैक करने में मदद मिलेगी. जहाँ कहीं भी लिखा हो कि यह ‘वैदिक काल’ का है तो उससे यह संकेत अवश्य लेना चाहिए कि उस शब्द का संस्कृत में परिवर्तित रूप ऐसा भी हो सकता है जिसका मूल ध्वनि से शायद कोई संबंध ही न रह जाए. 'जेह्लम' और 'वितस्ता' में उच्चारित ध्वनियों में कोई समानता कोई भाषा-विज्ञान स्थापित नहीं कर सकता जब तक कि किसी दूरस्थ क्षेत्र की ध्वनि का आक्षेप उसमें न दिख जाए.

यह भी देखेंः  मेदे, मद्र, मेग, मेघ


11 October 2020

Gotra and sub-caste puzzle - गोत्र और उप-जाति की पहेली

उप जातियों की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद नजर आते हैं.  कुछ विद्वान मानते हैं की जाति के भीतर भौगोलिक दूरी के कारण, व्यवसाय बदल जाने की वजह से, रीति-रिवाजों में कुछ अंतर आ जाने की वजह से, व्यवसाय की तकनीक में अंतर आ जाने आदि के कारण कुछ उप जातियाँ वजूद में आ जाती हैं. विशिष्ट राजनीतिक निर्णयों की वजह से भी उपजातियां बनती देखी गई हैं. अपनी जाति में तिरस्कृत होने या ख़ुद उसका तिरस्कार करने के परिणामस्वरूप भी उपजातियां पैदा हो जाती हैं. यदि  किसी जाति का एक व्यक्ति मजबूत स्थिति में आ जाता है तो वह अपने कमज़ोर भाइयों से अलग होकर अपने से अधिक मजबूत जाति समूह में जाने का प्रयास करता है. जिससे एक अलग उपजाति की उत्पत्ति हो जाती है. ऐसी बहुत सी प्रवृत्तियाँ हो सकती हैं जिनके कारण जातियों में उप-जातियाँ बनते देखी गई हैं. 

किसी जाति (वर्ण सहित) में कई प्रकार की गतिविधियों के कारण खंड या उप-खंड बनते जाते हैं. जिनके बारे में ऊपर संकेत कर दिया गया है. उसके बाद अपने सामाजिक रूप-स्वरूप को संजोए रखने के लिए वे उपजातियाँ कुछ कार्य करती हैं जैसे - शादियों को नियंत्रित करना, अपने समूह में को-ऑर्डिनेशन बनाना, सामाजिक जीवन को रेग्युलेट करना वगैरा. किसी व्यक्ति का स्टेटस निर्धारित करने, किसी के धार्मिक और सिविल अधिकारों की हदबंदी करने, व्यवसाय का निर्धारण करने का काम भी वे करती है. 

चूँकि उपजाति एक छोटा समूह होता है इसलिए वह व्यक्ति के लिए अधिक सार्थक हो जाता है. मोटे तौर पर जाति और उप-जाति में से कौन अधिक वास्तविक है इसका फैसला करना मुश्किल है. इलाके के अनुसार किसी उपजाति की भूमिका अलग हो सकती है. अन्य जातियों के साथ उसके संबंधों की ट्यूनिंग अलग हो सकती है. इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि किसी जाति का अध्ययन करने के लिए उसकी उप जातियों का भी अध्ययन किया जाए. यानि गोत-वार अध्ययन किया जाना चाहिए. 

किसी जाति की उप जातियों का उल्लेख करते हुए हम कहने लगते हैं कि वो उप-जाति नंबर वन है, वो नंबर टू है और फलानी नंबर तीन है (जैसे मेघों में दमाथिए, बजाले, साकोलिए). यह गोतों का अलग-अलग अध्ययन करने की वजह से है. बड़े सामाजिक ताने-बाने में यही प्रवृत्ति किसी जाति की उप-जातियों में से अलग जातियाँ बनाने लगती है. 

पिछले दिनों भगत महासभा नामक संस्था ने मेघों के गोत्रों की सूचियाँ फेसबुक पर शेयर की थीं जो श्री ताराराम जी ने एक पुराने सेंसस संबंधी संदर्भ के साथ उपलब्ध कराई थीं. उससे पहले डॉ ध्यान सिंह के थीसस में देरियों के संदर्भ में गोत्रों की एक सूची मिली थी. दोनों ही सूचियों के पूर्ण होने का कोई दावा नहीं किया गया लेकिन ज़ाहिर है सेंसस के आधार पर बनी सूची बड़ी तो है ही. इसी संदर्भ में श्री राजकुमारप्रोफेसरका फोन आया कि किश्तवाड़ के एक सज्जन ने बताया है कि सूची में गोत्र (गोत) और उप-जाति को लेकर वे उलझन में हैं. स्वभाविक है कि जब तीन नाम हैं जाति (caste), उप-जाति (sub-caste) और गोत / गोत्र या खाप (sub-caste?) तो कुछ फ़र्क तो होना चाहिए. 

मैंने राजकुमार जी से अनुरोध किया कि वे किश्तवाड़ वाले सज्जन से पूछें कि उनके ख़ानदान वाले किस गोत में शादी नहीं करते हैं. इससे मालूम हो जाएगा कि उनका अपना गोत क्या है. रही उप-जाति की बात, मैं समझता हूँ कि शादी के अवसर पर दोनों पक्ष एक दूसरे से जात और गोत पूछते हैं जिसका अर्थ गोत ही होता है. उप-जाति पूछने का रिवाज़ मैंने नहीं देखा. इस बात को हमारे समाज के एक वरिष्ठ सदस्य श्री प्रेमचंद सांदल  जी, रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी, पीजीआई, चंडीगढ़ और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश रानी सांदल ने टेलीफोन पर बातचीत के दौरान कन्फ़र्म किया है. 

संभव है किन्हीं इलाकों में व्यवसाय या किसी आदत के आधार पर उप-जातियाँ बना ली गई हों और गोत भी रख लिया गया हो. लेकिन वो अभी रिसर्च का विषय है. फिलहाल शादी के समय गोत ही पूछा जाता है. शादियों के समय ऋषि गोत्र का इस्तेमाल होते देखा गया है जैसे- भारद्वाज, अत्री, कश्यप आदि. लेकिन ऋषि गोत का इस्तेमाल समाज की वैवाहिक परंपरा का उल्लंघन करवा सकता है. इस लिए सावधान ! अपने जाति नाम और गोत नाम का इस्तेमाल करें.

संदर्भित आलेख :  जाति और उप-जाति में अंतर

 

25 August 2020

The History of Madra and Meghs: Dr Naval Viyogi - मद्रों और मेघों का इतिहास: डॉ नवल वियोगी

आज से लगभग 7 वर्ष पहले श्री गिरधारी लाल डोगरा (जी.एल. भगत), आईआरएस (आज सेवानिवृत्त इनकमटैक्स कमिश्नर) ने बताया था कि मेघ समुदाय पर स्वनामधन्य इतिहासकार नवल वियोगी जी ने एक पुस्तक पर कार्य किया है. तब से एक उत्सुकता बनी हुई थी. फिर 18 अक्तूबर 2019 को जब ताराराम जी चंडीगढ़ आए तब उन्होंने भी उक्त पुस्तक का उल्लेख किया. उसी दिन वियोगी जी की पत्नी श्रीमती उषा वियोगी से फोन पर जानकारी ली. उन्होंने पुष्टि की कि एक पुस्तक प्रकाशनाधीन है. 15 अगस्त 2020 को ताराराम जी ने बताया कि सम्यक प्रकाशन, दिल्ली ने वियोगी जी की पुस्तक ‘मद्र और मेघों का प्राचीन व आधुनिक इतिहास’ नामक पुस्तक का प्रकाशन कर दिया है. ऑर्डर प्लेस कर दिया. तीसरे दिन से ही दिल को इंतज़ार था कि पुस्तक कब मिलेगी. कल 24 अगस्त को पुस्तक मिल गई. दिल को ऐसे आराम मिला जैसे कोई नज़दीकी रिश्तेदार मिला हो. 

पुस्तक के तीसरे पन्ने पर पुस्तक के शीर्षक के नीचे कोष्ठकों में लिखा है: ‘(मेघ तथा ब्राह्मणों की समान उत्पत्ति का इतिहास)’. पाँचवें पन्ने पर पुस्तक के लिए ‘दो शब्द’ लिखने की परंपरा का निर्वाह श्री गिरधारी लाल डोगरा जी की कलम से ही हुआ और आगे वियोगी जी का लेखकीय प्राक्कथन है. आज इन दो पर ही अपनी बात लिख रहा हूँ. अपनी दिनांक 20 फरवरी 2013 की टिप्पणी में श्री गिरधारी लाल डोगरा ने इस बात पर मलाल व्यक्त किया है कि निम्न जातियों के इतिहास का सृजन ब्राह्मणवादी विचारधारा के इतिहासकार नहीं कर रहे हैं. (संभवतः यह जातीय श्रेष्ठता में अपना स्थान ऊपर बनाए रखने की कवायद है.) वे इतिहासकार तब चिंतित हुए जब पुरातत्वविदों ने सिंधु घाटी के शहरों का इतिहास बताया कि वो प्राचीन सभ्यता आदिवासी यानि कथित निम्न जातियों के पूर्वजों की थी. परिणामतः इतिहासकार दो भागों में बँटे दिखे लेकिन निष्पक्ष इतिहास लेखन की दिशा में प्रगति अभी भी बाकी है. (कृपया तिथि याद रखें कि यह बात 20-02-2013 को लिखी गई थी.) 

श्री डोगरा बताते हैं कि डॉ वियोगी ने निर्भीक होकर आदिवासियों के इतिहास को प्रकाश में ला खड़ा किया है. डोगरा जी इस बात को रेखांकित करते है कि ब्राह्मणों और मेघों की उत्पत्ति एक ही है और कि मेघों के पूर्वजों -- मद्र, चेदी, बृहद्रथ, खारवेल, मेघ, महामेघ -- ने उत्तर से दक्षिण भारत तक के बड़े इलाके में बहुत समय तक शासन किया. 

डॉक्टर नवल ने अपना प्राक्कथन इसी कथन के साथ शुरू किया है कि यदि ‘भारत के ब्राह्मणवादी सोच वाले इतिहासकारों को कहा जाए कि वे नए सिरे से ब्रिटेन का इतिहास लिखें, तो अवश्य ही वहाँ जातिवाद और जातियों की तलाश कर लेंगे’ क्योंकि जाति के अतिरिक्त उन्हें कुछ सूझता नहीं. प्राचीन भारत का इतिहास लिखते हुए भी उनकी यही सोच कार्य कर रही थी. जिस प्राचीन समाज में जाति को कोई जानता तक नहीं था वहां भी जातियों की तलाश की गई. इतिहासकारों को यह बताने में संकोच भी होता है कि वे स्वयं किस जाति से हैं. इस तरह उन्होंने उच्च जातियों की धार्मिक भावनाओं  को ठेस पहुंचने से बचाया है तो दूसरी ओर अन्य जातियों को दोयम दर्जे पर रखा जो उनकी एक कूटनीतिक चाल रही. वे बताते हैं कि हिंदुओं के सर्वोच्च आराध्य देव श्री राम का मूल संबंध गौतम बुद्ध के वंश यानी इक्ष्वाकु अथवा शाक्य वंश से था. उनके उत्तराधिकारी माली अथवा कुर्मी हैं. वे तक्षक नाग वंश से संबंधित थे. इसी सोच ने पठानिया तथा मेघ राजवंश की आपसी पहचान  नहीं बनने दी. इस विषय में भी चुप्पी साधी गई और राष्ट्र नहीं जान पाया कि उक्त दोनों राजवंशों का रिश्ता आज के मेघ और डूम जैसी जातियों के साथ है. इन दोनों वर्गों को चौथे वर्ग में धकेल देने का काम उन्होंने किया सिर्फ यह बता कर की ये मांस खाते थे. मांस तो अन्य जातियों के लोग भी खाते थे. 

ऐसे विकृत इतिहास का शिकार रहे मेघवंश के लोगों ने स्वयं मेघ वंश का इतिहास लिखने  का कार्य अपने हाथों में लिया. यहां नवल जी ने ताराराम जी के नाम का उल्लेख किया है जिन्होंने ‘मेघवंश: इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है. 

डॉ नवल बताते हैं कि उनकी इस प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के पीछे प्रेरणा का स्रोत श्री जी.एल. भगत (आईआर एस) रहे जो उच्च अधिकारी रहे और विद्वान लेखक भी हैं. नवल जी ने उल्लेख किया है की मग या कश्यप या कनौजिया ब्राह्मणों के साथ मेघ समाज का संबंध है और उनकी मूल उत्पत्ति अलग नहीं है. यहां उन्होंने डॉ राधा उपाध्याय का उल्लेख किया है जिन्होंने ‘विभिन्न ब्राह्मण परिवारों का संरचनात्मक और प्रसारात्मक अध्ययन’ नामक विषय पर शोध कार्य किया और पीएचडी की डिग्री हासिल की. उनके शोध कार्य को नवल जी ने इस पुस्तक के पांचवें अध्याय में उद्धृत किया है. 

नवल जी ने अपने विषय के दूसरे भाग यानी मेघों के आधुनिक इतिहास का उल्लेख करते हुए डॉ ध्यान सिंह का विशेष रूप से उल्लेख किया है जिनका प्रसिद्ध शोध ग्रंथ ‘पंजाब में कबीर पंथ का उद्भव और विकास’ विषय पर था. इस शोध कार्य का उपयोग नवल जी ने आठवें अध्याय में किया है.

पुस्तक मंगवाने के लिए कृपया सम्यक प्रकाशन से निम्नलिखित मोबाइल पर संपर्क करें-

9810249452

16 January 2020

A Story in Loop - गुंजलिका में एक कथा




इतिहास का प्रवाह और भाषा (और उसकी ध्वनियों) का प्रवाह दो ऐसी रेखाएँ हैं जो एक दूसरे से लिपट कर चलती हैं. यदि एक रेखा छिटक कर अलग दिखती है तो दूसरी उसके व्यवहार की ओर इशारा कर देती है कि- 'वो देखो मेरी बहन अलग खिचड़ी पका रही है'. ‘मेघ’ शब्द की तलाश में निकले लोग ‘म’, ‘मे’, ‘में’ जैसी ध्वनियों का पीछा करते कहाँ-कहाँ पहुँचे इसका कुछ अनुभव हुआ है. यह ठीक वैसे हुआ है जैसे एम.ए. Pol.Science में करने के बाद लोग पोल्ट्री फार्मिंग को गूगल करने लगे या एम.ए. हिंदी करने वाले हिस्ट्री को गूगल करने लगे.😄लेकिन इसे इतना सरल भी न समझें. यही देश है जहाँ मिनांडर (Menander) जैसे ऐतिहासिक पात्र को मनिंदर भी कहा गया और मिलिंद भी. यहाँ भी आप बदली हुई ध्वनियों को खोजते हुए सत्य तक पहुँचने की कोशिश करते हैं.

शब्दकोश मेंमेघशब्द ढूँढने पर उसके अर्थ की व्यापकता को हम 'जगत के जीवन' की सीमा तक बड़ा-बड़ा करके देख सकते हैं. ‘नागमेघके तो कहने ही क्या. शेषनाग के सिर पर तो धरती टिकी रही. ‘मेघशब्द धरती के किस कोने में किस-किस अर्थ में इस्तेमाल हुआ यह दूसरी खोज है. नागवंश में से मेघवंश की उत्पत्ति इतिहास की तीसरी धारा है और उनकी जनसांख्यिक (demographic) स्थिति के साथ उनका बड़े-छोटे पैमानों पर एक जगह से अन्य जगह जाना एक तीसरी तरह की कथा है जो प्रशिक्षित और अनुशासित अध्ययन की मांग करती है.

जब मैंने कहीं पढ़ा था कि ओडिशा में भी कुछ लोग मेघ ऋषि (जिसे ऋग्वेद के आधार पर वृत्रासुर, नागमेघ, असुर मेघ भी माना गया) को अपना पूर्वज मानते हैं तब संदर्भों को संभाल कर रखने की आदत नहीं थी. बस जानकारी लेकर खुश हो लेते थे. इधर देखा है कि कई लोग मेघऋषि को पहचाने से इंकार करते हैं बल्कि नकार देते हैं. कुछ का मानना है कि मेघऋषि नहीं वो कोई मेघमुनि रहा हो सकता है क्यों कि ऋषियों से पहले हमारे यहाँ मुनियों की सद्परंपरा थी. कुछ भी हो इतना आभास तो हो ही रहा था कि ओडिशा में है तो उत्तर-पूर्व में मेघवंश, नागवंश की उपस्थिति ज़रूर होगी. ‘मेघालयराज्य ध्यान खींचता रहा. लॉर्ड कन्निंघम ने भी कहा था कि चीन की ओर से मेघों का प्रवेश असम (अविभाजित असम) में हुआ होगा. यह बात भूलती नहीं थी. कैसे भूलती. हमारे पुरखों ने धरती के एक बड़े भू-भाग को तय किया है. वे कोल भी कहलाए (कोलारियन थे), कोरी, निषाद आदि के रूप में वे दक्षिण भारत के संपर्क में आए. यह बात और है कि कन्निंघम ने भारत में आकर किसकी मदद से अपनी रिपोर्टें लिखीं जो इतिहास में दर्ज हो कर इतिहास बनीं और आज उन पर सवाल उठाए जाते हैं.

अरबी, तुर्की, फारसी, फ्रेंच, अंग्रेजी आदि मेंकी ध्वनि नहीं है. तो यहमेघध्वनि शुद्ध भारतीय ध्वनि ठहरती है चाहे इसका मूल किसी अन्य भाषा में ही क्यों न हो. श्री आर.एल. गोत्रा और श्री के.एल. सोत्रा में वैचारिक भिन्नता कितनी भी क्यों न रही हो दोनों ने इस बात को कहा है कि मेघों के लिएमेंगशब्द भी इस्तेमाल हुआ है. इसकी एक वेरिएशन 'मेंह्गा' (जैसे एक नाम 'मेंह्गाराम') के रूप में मिलती है जिसका प्रयोग कबीले के रूप में किया गया प्रतीत होता है. जहाँ 'मेंग' शब्द आया वहाँ उसके पास 'मेंह्ग' शब्द भी रखा था. इस सारी प्रक्रिया में जीभ की सुस्ती और चुस्ती की वजह से हुए उच्चारण के विचलन (variation) से स्पैलिंग की भिन्नताओं को कितनी दूर तक ढूँढा जा सकता है. थोड़ा और आगे चलते हैं. सोत्रा जीमेंगशब्द को ही असली मानते हैं. तो हम आखिरकार बारस्तामेंगफिर सेमेघतक पहुँचे और फिर सेमेंगतक आते हैं. ‘मुग़ल एम्पायरनामक एक पुस्तक है जो आशीर्बादी लाल श्रीवास्तव ने लिखी है. उसके दो पृष्ठों की फोटो कापियाँ श्री ताराराम जी ने भेजी हैं. इनके संदर्भ से ज्ञात होता है कि अविभाजित बंगाल (जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल था) में एक नदी का नाममेघनाहै (आपको याद होगा सतलुज नदी का नाममेगारससथा जिसके किनारों परमेगयामेघबसे थे). मेघना नदी अब बांग्लादेश में है और भारत की दो बड़ी नदियों ब्रह्मपुत्र और गंगा का अधिकांश पानी मेघना में मिल कर ही समुद्र में जाता है. इस पुस्तक में बंगाल और बरमा (म्यांमार) के बीच एकअराकानराज्य का उल्लेख है जिसके शासकों के नामों में तीम नाम होते थे जिनमें से एक नाम मुस्लिम होता था. जैसे-

“(Meng Doulya (1481-1491)=Mathu Shah, Meng Yangu (1491-1498)=Mahamed Shah, Meng Ranoung (1493-94)=Nori Shah, Chhalunggathu (1494-1501)=Shekmodulla Shah, Meng Raja (1509-13)=Ili Shah, Meng Shou (1515)=Jal Shah, Thajat (1515-1521)=Ili Shah, Meng Beng (1581-58)=Sri Surya Chandra Dharma Raja Jogpon Shah, Meng Phaloung (Sekendar Shah 1671-1593), Meng Radzagni=Selim Shah (1598-1612), Meng Khamaung=Hussain Shah (1612-1622).)” इन नामों में लगे 'मेंग' शब्द का कुछ पीछा किया जाए.

इन शासकों के नामों से पहले लगेMeng (मेंग) शब्द का अर्थक्यूट’ (प्यारा, निपुण, प्रवीण, कुशल) जैसा मिल रहा है लेकिन पहली नज़र में लगता है कि इसे टाइटल या पहचान की तरह इस्तेमाल किया गया है जैसे कि मध्य एशिया के कुछ कबीलों के नामों में प्रयुक्त होता है. इन शासकों के बारे में इतना तो पता चलता है कि वे बौध थे हालाँकि उनके नामों में एक नाम मुस्लिम नाम भी होता था जो उनकी किसी के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक हो सकता है. यदि इसे डायनेस्टी मान कर गूगल करें तो चीन की मिंग (Ming) डायनेस्टी सामने पड़ती है लेकिन जल्दी ही वो एक अलग राजवंश होने का पता देने लगती है जिसके एक पाँव के नीचे नाग है और दूसरे पाँव के नीचे कछुआ. अब यहमिंगशब्द औरड्रैगनयानिनागशब्द भी ध्यान खींच रहे हैं. दक्षिणी चीन में ‘Snake Cults’ (जिसका अर्थनागपंथजैसा हो सकता है) का संदर्भ मिलता है. संभव है इसी का संबंध अविभाजित असम के मेघालय और नागा लोगों से रहा हो जो म्यांमार में भी रहते हैं. Nagaland (नागालैंड राज्य) औरनागाजनजातियाँ वहाँ हैं. टार्च लेकर अरुणांचल प्रदेश में भी देख लेना चाहिए.

इतना लिख कर मुझे फ़ील हो रहा है किमेंगशब्द को लेकर शायद मैं किसी फॉरबिडन एरिया (वर्जित क्षेत्र) में गया हूँ और मेरी कल्पना के जंगली घोड़े चीन की दीवार फाँदने के लिए आतुर हैं. उन्हें मैं कह रहा हूँ- 'ज़रा सब्र करो बच्चो'.

अब किसी को तो इतिहास की ऐसी पुस्तक लिखनी चाहिए जिसका टाइटल हो - ‘History of Nagas (Made Simpler)’.