"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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12 January 2020

Links with Greek history - ग्रीक इतिहास से रिश्ता


पुरातत्वविद एलेग्ज़ेडर कंन्निघम आदि पुरातत्व वेत्ताओं का ऐसा मत है कि प्राचीन काल के मेगरी, मेगल्लाए ही वर्तमान समय के मेग या मेघ हैं. नृविज्ञान (anthropology) और अन्य इतिहासिक कड़ियों से मेघवाल भी मेगरी और मेगल्लाए से आ जुड़ते हैं. इन सभी शब्दों के मूल में मेग और मेगल्लाए की परंपरा है. इनकी सिंध से लेकर मेगरा तक कई बस्तियां थीं और प्राचीन काल में इस क्षेत्र के विभिन्न भूभागों पर उनका राज्य था. यूनान (ग्रीस) के एगॉस्तना (Aigosthena) में मेगारी लोगों का एक प्रसिद्ध बंदरगाह भी था. वहाँ से 19 किलोमीटर दूर मेगारी नगर था जहाँ से मेगों के सिक्के मिले हैं. इसी नगर को कभी मेगरा भी कहा गया. उस नगर को आजकल पोर्टो जरमेनो कहा जाता है. एगॉस्तेना, मेगरी नगर के अलावा पगे (Pagae) नगर में भी मेग श्रृंखला के सिक्के प्राप्त हुए हैं. ये तीनों शहर मेगों के थे. ये सिक्के ईसा से तीसरी-चौथी शताब्दी पूर्व के हैं. ऊपर दी गई जानकारी ताराराम जी ने एक पोस्ट के माध्यम से दी है. उनके द्वारा संदर्भित पुस्तक और उसमें दी गई सिक्कों संबंधी जानकारी के चित्र यहाँ नीचे दिए गए हैं.

श्री आर.एल. गोत्रा और ताराराम जी समय-समय पर बताते रहे हैं कि मेघों का प्राचीन इतिहास जानना हो तो दक्षिण-पश्चिम एशिया के इतिहास को व्यापक रूप से पढ़ना होगा. अब चूँकि ताराराम जी इस पर कार्य कर रहे हैं इसलिए मुझे अधिक नहीं कहना है सिवाय इसके कि मुझे रांझाराम का ध्यान हो आया और अपने बड़े भाई का भी जिन्होंने कभी कहा था कि सिकंदर हमें ढूँढता हुआ ही इधर आया था.



28 November 2018

The Legend of Porus - पोरस की गाथा - 2

मेघों के सतलुज के किनारे बसे होने और सतलुज के प्राचीन नाम Megarsus और Megandros के बारे में कर्नल कन्निंघम ने अपनी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं कि :-

(1)  इस पहचान के अनुसार मेकी, या प्राचीन मेघ, सिकंदर के आक्रमण के समय ज़रूर सतलुज के किनारों पर बस चुके थे.
(2) दोनों नामों (Megarsus और Megandros) की आपस में तुलना करने पर, मेरे अनुसार संभव है कि मूल शब्द मेगान्ड्रोस (Megandros) हो जो संस्कृत के शब्द मेगाद्रु, या 'मेघों का दरिया', के समतुल्य होगा.

यहाँ कर्नल अलैक्ज़ांडर कन्निंघम ने सतलुज नदी का उल्लेख किया है जिसका पुराना नाम ‘मेगाद्रु’ यानि ‘मेघों की नदी’ था.

कई बार इतिहास पूरी बात नहीं बताता या इतिहासकार पूरी बात नहीं लिख पाता. वहाँ भाषाविज्ञान भी किसी बात को समझने में मदद करता है. एक अन्य जगह कर्नल कन्निंघम ने लिखा है कि पोरस (पुरु) के समय के मद्र और मेद ही 19वीं शताब्दी (जब यह रिपोर्ट लिखी गई थी) के मेघ हैं जो रियासी, जम्मू, अख़्नूर आदि क्षेत्रों में बसे हैं. इसे भाषाविज्ञान की मदद से हम समझ पाते हैं कि ‘मद्र’ शब्द का स्वरूप ‘मेगाद्रु’ शब्द से विकसित हुआ है. सवाल पूछा जा सकता है कि मेघ और मेद में जो ध्वनिभेद है उसका क्या? इसका कारण यह है कि मेघजन जब ख़ुद को मेघ कहते हैं तो ‘घ’ की ध्वनि पूरी तरह महाप्राण ध्वनि नहीं होती बल्कि वो ‘ग’ के अधिक नज़दीक पड़ती है. इससे ‘मेघ’ शब्द की वर्तनी (spelling) में अंतर हो गया. परिणामतः मेघ (Megh) शब्द की वर्तनी सुनने वालों के लिए मेग (Meg) बनी. श्री आर.एल. गोत्रा ने अपने लंबे आलेख ‘Meghs of India’ में बताया है कि वेदों में ‘मेघ’ और ‘मेद’ शब्द भी आपस में अदल-बदल कर लिखे गए हैं. इस प्रकार 'मेघ', 'मेग' और 'मेद' ये तीनों शब्द एक ही वंश (Race) की ओर इशारा करते हैं.

प्राचीन काल में मेघों की भौगोलिक स्थिति निर्विवादित रूप से सिंधुघाटी क्षेत्र में थी. झेलम और चिनाब के बीच के पौरव क्षेत्र के अलावा सतलुज और रावी के क्षेत्रों में उनकी बस्तियाँ थीं. वर्ण परंपरा के अनुसार मेघ क्षत्रिय थे ऐसा ‘मेघवंश - इतिहास और संस्कृति’ पुस्तक में सप्रमाण बताया गया है. हमारे पुरखे पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन महाराजा बली और पोरस की कथा बहुत प्रेमपूर्वक सुनाते थे. पोरस की कथा की कुछ निशानियाँ मेघों की जन-स्मृतियों में दर्ज है. स्वाभिमानी पोरस के साथ उनका अपनत्व का संबंध रहा.


महाराजा पोरस (पुरु) मद्र नरेश थे. नरेश शब्द पर ध्यान देने की ज़रूरत है. मद्र+नर+ईश (राजा). यानि मद्र लोगों का अग्रणी. इस बात को समझ लेना ज़रूरी है कि उस काल में किन्हीं नदियों और क्षेत्र में बसे लोगों के नाम पर उस नदी या क्षेत्र का नाम रखने की परंपरा थी जिसकी पुष्टि ऊपर कन्निंघम के दिए संदर्भ में हो जाती है. इस नज़रिए से पोरस के साकल/सागल (जिसे आज के सियालकोट क्षेत्र के समतुल्य माना गया है) की मेघ जाति के अग्र-पुरुष होने का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है. पोरस निस्संदेह इतिहास पुरुष है लेकिन उसके जीवन से संबंधित बहुत-सी कड़ियाँ कथा-कहानियों के सहारे खड़ी हैं. ऐसी कथा-कहानियों का अपना रुतबा होता है और वे अपने पात्रों के रुतबे को प्रभावित करती हैं.

ऐतिहासिक संदर्भ स्पष्ट बता रहे हैं कि पोरस मेघ वंश परंपरा के हैं. कर्नल कन्निंघम ने आधुनिक मेघों को मद्रों / मेदों का ही वंशधर माना है.


The Legend of Porus - पोरस की गाथा - 1

एक अन्य रुचिकर लिंक (यह पोरस के संदर्भ में नहीं है)
History of the Indo-Greek Kingdoms (Retreived as on 04-01-2019)


27 November 2018

The Legend of Porus - पोरस की गाथा - 1

ताराराम जी अकसर बहुत रुचिकर ऐतिहासिक संदर्भ शेयर करते हैं. हाल ही में उन्होंने कर्नल कन्निंघम का एक रेफरेंस भेजा. याद आया कि कभी मैंने उसका हिंदी अनुवाद किया था. Age factor you know. 🙂

इससे पहले पढ़ चुका हूँ कि प्राचीन भारत के सिंधु क्षेत्र की कई जात-बिरादरियों ने पोरस को अपनी जात-बिरादरी का बताया है. उन बिरादरियों में पढ़े-लिखे लोग थे जिन्होंने इतिहास में अपने समाज की जगह बनाने के लिए कुछ संदर्भ लिए, आलेख लिखे और उन्हें आधार बना कर मनोवांछित साहित्य की रचना की है और उसे वे इतिहास कहते हैं ठीक उसी तरह जैसे हमारे यहाँ मिथकीय कहानियों को इतिहास बताने की परंपरा रही है. ग्रीक और भारतीय इतिहासकारों द्वारा लिखे गए पोरस के इतिहास में काफी पृष्ठ  खाली पड़े थे जिन पर कब्ज़ा जमाने की होड़-सी लगी है, विशेषकर कथा-कहानियों के ज़रिए. लेकिन संदर्भों की नाजानकारी और लेखन कौशल के अभाव में मेघ समाज ने अधिकारपूर्वक उन पृष्ठों पर कोई दावा नहीं ठोका. हलाँकि उनका एक दावा बनता है.

प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता अलैग्ज़ैंडर कन्निंघम ने मेघ जाति को मद्र (मेघाद्रु- ‘मेघों की नदी’- से व्युत्पन्न शब्द) / मेद (मेघ=मेध=मेद) जाति का ही बताया है. श्री आर.एल. गोत्रा ने अपने लंबे आलेख ‘Meghs of India’ में बताया है कि वेदों में मेघ और मेद शब्द आपस में अदल-बदल कर लिखे गए हैं. महाराजा पोरस मद्र नरेश थे. (इस बात को समझ लेना ज़रूरी है कि किन्हीं नदियों के किनारे या क्षेत्रों में बसे लोगों के नाम पर उस नदी या क्षेत्र का नाम रख दिया जाता था). इस नज़रिए से पोरस के मेघ जाति के अग्र-पुरुष (ancester) होने का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है. (ताराराम जी द्वारा उपलब्ध कराया गया संदर्भ- Cunningham Reports, Vol-2, A S I reports- 1862-63.64-65. Page-2, 11 to 13)

महाराजा पोरस मेघों के अग्रणीय पुरुष थे इस जानकारी को पुख़्ता करने वाली कुछ और कड़ियों की प्रतीक्षा है. संभव है राजा पोरस मेघवंश या उसके निकट भाई नागवंश के हों. कथाओं से भरी पोरस की गाथा आज भी कितनी तरल है उसके बारे में आप इस लिंक पर जा कर जान सकते हैं. इस विषय पर एक और पोस्ट शीघ्र आएगी. बाकी काम ताराराम जी का. 🙂



19 October 2018

Megh Dynasty - A Historical Dynasty - मेघ वंश - एक ऐतिहासिक राजवंश

सदियों से गरीबी की मार झेल रही जातियां अपना अतीत ढूंढने के लिए मजबूर हैं ताकि वे अपने आपको समझ सकें. इस बारे में एक बहुत ही अद्भुत फिनॉमिना है कि वे लोक-कथाओं के ज़रिए आपस में राजा-रानी और राजकुमार-राजकुमारी की कहानियां सुनाते हैं. सुनते हुए वे खुद की और अपने माता पिता की पहचान राजा-रानी या उनकी संतानों के रूप में करते हैं. यह प्रवृत्ति सारी इंसानी ज़ात में देखी जाती है. यदि किसी को मालूम हो जाए कि उसके पुरखे कभी, किसी समय, किसी इलाक़े के शासक थे तो उसे कैसा महसूस होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. उसे थोड़ी बहुत हैरानगी और खुशी भी होगी कि उसकी जमात में बहुत क्षमताएं रही हैं. लेकिन वो जानना चाहेगा कि किस कारण से उनकी क्षमताएँ संकुचित हो गईं. हालांकि पहले भी मैंने इस ब्लॉग पर कुछ पोस्ट लिखी हैं जो बताती हैं कि मेघवंशी जातियों के पुरखे कभी शासक रहे हैं. उन पोस्टों पर यद्यपि किसी ने कमेंट नहीं किया लेकिन टेलीफोन पर कई प्रतिक्रियाएं मिलीं. उनमें से एक मज़ेदार प्रतिक्रिया यह भी थी कि कुछ बच्चे उन पोस्टों को पढ़कर बिगड़ गए और फिजूलखर्ची पर उतर आए (यानि मेरी पोस्ट को दोषी करार दिया जा रहा था :)). मैं नहीं समझता यदि बच्चों का पालन-पोषण सही तरीके से हुआ है तो वे ऐसी किसी पोस्ट को पढ़कर बिगड़ ही जाएंगे. यह सब कुछ यदि मेरे ब्लॉग पर ना भी रहता तो भी, कहीं ना कहीं, किसी न किसी जिज्ञासु बच्चे के हाथ में आ जाता. बच्चों का रास्ता उनका परिवेश तय करता है. मेघ वंश के राजाओं के बारे में हाल ही में जो विस्तृत सामग्री मिली है वो जोधपुर के श्री ताराराम (जिन्होंने मेघवंश - इतिहास और संस्कृति नाम की पुस्तक लिखी है) के ज़रिए मिली है. उन्होंने इतिहास की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. साधना मेघवाल के शोध-पत्र की फोटो प्रतियां भेजी हैं जिन्हें आप नीचे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं. यह शोध-पत्र 'राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस' (जो राजस्थान के इतिहासकारों का एक मंच है) के एक अधिवेशन में प्रस्तुत किया गया था. ध्यान रहे कि इस शोध-पत्र में दिए गए संदर्भ नामी-गिरामी इतिहासकारों की पुस्तकों से लिए गए हैं. लिंक नीचे हैं. डॉ. साधना मेघवाल को बहुत बहुत धन्यवाद.

16 August 2018

The Trails of Part Payment - टूटी रकम के निशान

श्री राजकुमार भगत
वे कभी भी हमें पाँच हज़ार रुपए इकट्ठा नहीं देते थे. उस समय उस पाँच हज़ार की बहुत कीमत होती थी. वे कभी हमें पाँच हज़ार रुपए इकट्ठे नहीं देते थे तो हम चलते कैसे? यह पहली बात. दूसरी बात यह है कि हमारी बिरादरी में हमें गाइड करने वाला या जागरूक करने वाला कोई भी नहीं था. यदि किसी आदमी के सामने कोई लक्ष्य हो तो उसे प्राप्त करे. हमारे सामने तो कोई लक्ष्य ही नहीं था. अंधेरा ही अँधेरा था. कोई बताने वाला नहीं था कि बेटा तुम यह करो, तुम इधर चलो. सबसे पहले 1-2 लोगों को इस कार्य (सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट बनाने) का तजुर्बा था मैंने भी 1970 में दसवीं पास की थी. तब हमारे पास ना तो पढ़ने के लिए पैसा था और ना ही कोई कामकाज शुरू करने के लिए. दिन में कुछ काम करके जैसे-तैसे ईवनिंग कालेज में और प्राइवेट पढ़ता रहा और बीए किया. दूसरी दिक्कत थी कि हमारे यहाँ टांग खींचने वाले लोग भी थे. फिर हम सर्जिकल में ही आए. जहां तक मुझे याद है उस समय हमारी मेघ बिरादरी में तकरीबन 35 से 40 कारखाने थे. वहां पर सर्जिकल का सामान बनता था. उन लोगों में से कुछ का काफी नाम था उनमें से एक नाम श्री रामचंद साणा (A machine used for sharpenig and polishing ) वाला था. मेरे पिता श्री चूनीलाल साणा वाला, मेलाराम साणा वाला कर्मचंद साणा वाला, रतनलाल साणा वाला, बाबा साणा वाला जैसे बहुत बढ़िया लोग थे जिन्होंने साणा का कार्य किया. ये सभी अनपढ़ थे. मेरे पिताजी भी अनपढ़ थे. जितनी उनको समझ थी उसके अनुसार उन्होंने हमें पढ़ाया-लिखाया और हम यहाँ तक पहुँच सके. आगे चलकर हमारे कामकाज की लाइन इस तरह ख़त्म हुई कि हमारा अपना कोई कामकाज नहीं था लेकिन जिन लोगों का हम जॉब वर्क करते थे वे कभी भी हमें इकट्ठी पेमेंट नहीं करते थे जो कभी 5000 रुपए भी होती थी. वे उस रकम को तोड़ कर देते थे ताकि कहीं हम बड़ी रक़म मिलने पर बेहतर कामकाज शुरू न कर लें जिससे हमारी माली हालत ऊपर न उठ जाए. आज हालत यह है कि जिस जगह पर बस्तियों में सर्जिकल का काम किया जाता था वहां जो मजदूर काम करते थे उनका काम खत्म हो चुका है. जो 2-4 बड़ी फैक्ट्रियां थीं वो भी खत्म हो चुकी हैं. क्योंकि मालिक कभी भी हमें पूरी पेमेंट इसलिए नहीं करते थे कि कहीं हमारे पास इकट्ठी रक़म ना आ जाएं और हम कहीं अपना काम धंधा शुरू ना कर लें. पहली बात तो यह. दूसरी बात है कि जैसे ही हफ़्ता ख़त्म होने पर लेबर उनसे अपनी महीने की पगार ₹400 रुपए मांगते थे तो वो 300 देते थे. दूसरे जब उन्हें पगार देते थे तो वो कहते थे कि आ जाओ, वहां से जा कर के शराब पकड़ लाओ और वह 10-15 रुपए की शराब वहां से खरीद लेते थे. मालिक लोग भी पीते थे और मजदूरों को भी पिलाते थे. अगले दिन मजदूरों को पता ही नहीं होता था कि उन्होंने कमाया क्या और खाया क्या. कहने का मतलब यह है कि मालिकों ने उन मजदूरों की आँखें कभी खुलने ही नहीं दीं. यह हाल था. सर्जिकल और स्पोर्ट्स के काम में दूसरी बिरादरियों के यहाँ काम करने वाले हमारे 90 फीसदी लोगों को ऐसे-ऐसे नशों की लत लगा दी गई थी कि वे पैसा अपने घर दे ही नहीं सकते थे जिससे उनका परिवार पलता. घर मर्द और औरत दोनों से चलता है. औरत को आप पैसे नहीं देंगे तो घर कैसे चलेगा. अब भगतों के पास स्पोर्ट्स का काम ही नहीं है. सर्जिकल के काम को आप एक परसेंट गिन सकते हैं. बाकी उनकी हालत आप समझ सकते हैं. यह भी एक कारण था कि जालंधर में सर्जिकल की इतनी मार्कीट थी जो पाकिस्तान के स्यालकोट जैसी थी लेकिन अब हमारे उन कारखानों का नामोनिशान ख़त्म हो गया है. अब दो-चार पार्टियाँ हैं जो पाकिस्तान से इम्पोर्ट कर रही हैं. वही माल बेच रही हैं. यों समझ लीजिए के डेढ़ घर भगतों का है मतलब एक कुछ अधिक मँगवाता है और दूसरा कुछ कम. बाकी नॉन-भगत हैं, वो भी 5-7 ही हैं. वो भी कुछ खास नहीं हैं. पहले यहां कोई 90 पार्टियाँ थीं जो सप्लायर थीं. सप्लायर भी दसेक रह गए हैं. लाइन ही ख़त्म हो गई. स्पोर्टस के सामान का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा. वहाँ भी भगत ही मज़दूर थे जो महाजनों के यहाँ काम करते थे. उन्होंने भी इनको कभी सीधे होने ही नहीं दिया. हमारी बाँह पकड़ने वाला कोई नहीं था. मुझे उस काम से बाहर हुए 25-26 साल हो चुके हैं. 1986 के आसपास मैंने वो लाइन छोड़ दी थी. क्योंकि उससे रोटी भी नहीं चलती थी. हर हफ्ते 5-6 (हज़ार) का माल दिल्ली में बेचने निकलते थे. उससे पूरी नहीं पड़ती थी. फिर मैंने वो लाइन छोड़ दी. लगभग 15 साल कमीशन एजेंट का काम किसी पार्टी के पास किया. वो पार्टी भगत नहीं थे. लेकिन उनके साथ अच्छे संबंध थे. पड़ोसी थे. प्रेम प्यार था. उन्हीं से उधार लेकर स्कूटर लाइन में चला गया. जहाँ मैंने 27-28 साल काम किया. तब तक मेरी उम्र भी 50 की हो गई थी. फिर सोचा कि कब तक गाड़ियों में धक्के खाएँगे. फिर कुछ प्रेरणा सी हुई और हालात ऐसे बनते चले गए कि अब मैं 1994 से लोकल जालंधर में ही कार्य कर रहा हूँ. लेकिन स्कूटरों के उस काम के तजुर्बे से ही सीख कर मैंने स्कूटर पार्ट्स का काम छोड़ दिया और पेंटिंग के काम की ओर चला गया. आजकल यही काम कर रहा हूँ और दाल-रोटी सोहणी चल रही है. यदि आप पूछें कि वो (पुरानी)लेबर अब क्या करती है? सर्जिकल और स्पोर्ट्स का काम खत्म हुए अब 35 साल के लगभग हो चुके हैं. एक जेनरेशन का गैप पड़ गया है. अब तक उनमें से कई मर चुके हैं. एकाध आदमी मैंने देखा है रेहड़ी लगाता है. जालंधर भार्गो कैंप में जो इन कामों में लगे चार-पाँच बड़े लोग थे उनमें से भी एक आध ही बचा है. बाकी खत्म हो गए. हमारे जो सियासतदाँ थे उन्होंने भी लोगों को रास्ता दिखाने के लिए कोई कोशिशें नहीं कीं. न उन्होंने कोई सेमिनार वगैरा कराए. जागरूकता लाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया. नौजवानों में जागरूकता तो आज भी नहीं है. एक दौर आया था जब भार्गों कैंप के 10वीं पास हमारे बच्चे बैंकों में भर्ती हुए. काफी एलआईसी जैसी कंपनियों में भर्ती हुए. तब आवाज़ें लगा-लगा कर उन्हें बुलाया गया था. वो एक आँधी आई थी. अब वो अब खत्म हो चुकी है. तब भर्ती हुए लोगों में से अधिकतर रिटायर हो चुके हैं. अब हरेक आदमी तो अपने बच्चों को अमेरिका नहीं भेज सकता. जहाँ तक लोगों को गाइडेंस देने के लिए सेमिनार कराने का सवाल है भार्गों कैंप में एक लड़का आया था, राजकुमार. उसे पता नहीं प्रोफेसर कहते हैं. उसने अपनी आर्गेनाइज़ेशन भगत महासभा के ज़रिए दो-चार सेमिनार कराए और काम करने की कोशिश की थी. लेकिन ऐसे कामों के लिए बहुत पैसा चाहिए होता है. अगली जेनरेशन के लिए अलग तरह के मौके होंगे. उन्हें उत्साहित करने की ज़रूरत है. लेकिन बड़े पैमाने पर उसकी तैयारी करने के लिए दस साल का समय लग सकता है. जो लीडरी करना चाहता हो वो अपनी बिरादरी को आगे नहीं ले जा सकता. जो समाज के लिए कुछ करना चाहता है उसे पहले समाज सेवक होना होगा. ऐसे समाज सेवकों की बड़ी तादाद में ज़रूरत है जो हमारे लिए काम कर सकें. हमारे बच्चे अभी इस हालत में भी नहीं हैं कि वे जानकारियों के उन सोर्सिस तक पहुँच सकें जहाँ से उन्हें सही गाइडेंस मिल सकती है. यदि हम उन्हें 25 फीसदी बता दें तो बाकी 75 फीसदी वे ढूँढ लेेगे. लेकिन अभी तक हमने उन्हें 5 फीसदी भी नहीं बताया. जो परिवार पढ़ लिख गए हैं उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों का कुछ उद्धार कर लिया है. घर का अच्छा माहौल भी इसमें बहुत पार्ट प्ले करता है. लेबर क्लास के पास तो बच्चों के लिए टाइम ही नहीं बचता. वे अच्छा पढ़ाई का माहौल भी नहीं दे पाते. एक और बात को ठीक से समझ लेना ज़रूरी है कि हम किसी से कम नहीं हैं. मेरे व्यवसाय के कारण मेरी डीलिंग करोड़ोंपति लोगों से होती है. मध्यप्रदेश में, महाराष्ट्र में. वे सभी हमेशा भगत जी कह कर बुलाते हैं. वे भगत के साथ हमेशा जी लगा कर बोलते हैं. हमें अपने समाज का सम्मान करना सीखना चाहिए. उसकी प्रशंसा करना सीखना चाहिए. हमारे समाज के लोगों ने घर से बाहर निकल कर बहुत काम किया है और बड़े ओहदों पर जा कर बहुत नाम कमाया है. वे इंजीनियर और एमडी हुए हैं.
राजकुमार भगत, विर्क एनक्लेव, जालंधर

20 March 2018

Megh: Folk Traditions and Vedic Mythology - मेघ: लोक-परंपराएं और वैदिक पुराकथा

“मेघ या मेग भारत का एक प्राचीन राजनीतिक और सांस्कृतिक जातीय समूह है,” ऐसा ताराराम जी ने हाल ही में लिखे अपने एक आलेख में कहा है. यही बात पहले के विद्वान भी कह चुके हैं. मेघों के प्राचीन इतिहास पर कई लोगों ने लिखा है लेकिन मेघ समाज के अपने सदस्यों ने इस विषय पर बहुत ही कम लिखा है और जिन्होंने लिखा मैं उनकी बात आजकल अधिक कर रहा हूं. यह पूरी नीयत से और जानबूझ कर है.

अपने नए आलेख में ताराराम जी ने ‘मेघ’ शब्द की उत्पत्ति और उसकी वैदिक प्रयुक्ति के बारे में लिखा है. विवादास्पद शब्द ‘असुर’ की उन्होंने पर्याप्त व्याख्या कर दी है. लोक-कथाओं में आने वाले वैदिक-पौराणिक पात्र मेघ, वृत्र और मेघ ऋषि और विशेषकर ‘वृत्र’ शब्द की व्याख्या पर उन्होंने विस्तार से लिखा है. अपने कथ्य की पुष्टि के लिए उन्होंने विभिन्न स्रोतों से संदर्भ जुटाए और उद्धृत किए हैं. उन्होंने कहा है कि यह अभी प्रारूप है और वे इस पर अभी कार्य कर रहे हैं. उनके उसी आलेख का लिंक नीचे दे रहा हूँ. यह आलेख हमारे कई सवालों के उत्तर और उनके प्रमाण मुहैया कराता है. 

ताराराम जी का नया आलेख

01 September 2016

A story from a folksinger - लोक गायक से एक कहानी

जो यहाँ लिखा है वह सार है. विस्तार से नीचे दिए डियो में कहा है.

बचपन में एक हम मज़ेदार कामेडी गाना सुना करते थे - सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई, जो की थी लड़ाई, तो मैं क्या करूँ! कौरव ने पांडव से की हाथापाई, जो की हाथापाई तो मैं क्या करूँ! उसमें एक उखड़े हुए स्टूडेंट की तकलीफ़ थी. उस समय की स्कूली पढ़ाई और व्यवहारिक जीवन के बीच की दूरी या गैप उसमें हँसी पैदा करता था.

भारत में जो इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें बहुत से गैप हैं. गैप को खोद-खोद कर गुम इतिहास को निकालना हमने अंग्रेज़ों से सीखा. वरना पंडित से सुनी कथा ही हमारे लिए इतिहास था. शिक्षा और विज्ञान के साथ बुद्धि बढ़ी तो विद्वानों ने कहानियों पर सवालिया निशान लगाना सीखा. उदाहरण के तौर पर अब भाषा-विज्ञानी बताते हैं कि संस्कृत में लिखी किताबें दो हज़ार साल से अधिक पुरानी नहीं है. सम्राट अशोक के समय लिखे गए शिला लेखों में संस्कृत का एक भी शब्द नहीं है. इतिहास की नई खोज ने चाणक्य के ऐतिहासिक पात्र होने पर गंभीर सवाल उठा हैं.

जब श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया कि एक लोक गायक राँझाराम मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ता था तो यह मेरे लिए एक नई बात थी. गोत्रा जी ने इसका उल्लेख एक सोशल साइट पर किया तो एक अन्य सज्जन ने उनका समर्थन किया. गोत्रा जी से एक अन्य संकेत भी मिला कि श्री राँझाराम की रिश्तेदारी श्री सुदेश कुमार, आईएएस से है जो मध्यप्रदेश काडर से सेवानिवृत्त हैं. 29-08-2016 को सुदेश भगत जी से बात हुई तो उन्होंने पुष्टि की कि श्री राँझाराम उनके पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे और वे लोक गायक थे. यहाँ बताता चलता हूँ मेघ समुदाय के अपने लोक गीत लगभग नहीं के बराबर हैं.

23-08-2016 को मैंने एक अन्य मित्र कर्नल तिलकराज भगत जी से फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि उनका बचपन स्यालकोट के पास अपने गाँव मयाणापुरा में बीता है जहाँ राँझाराम के कार्यक्रम वे देख चुके हैं. राँझाराम की कथाएँ इतिहास भले न हों लेकिन उनमें ऐतिहासिक संकेत तो हो ही सकते हैं. वैसे भी लोक गायक घटनाओं को अपने शब्दों में ढालते आए हैं. कर्नल तिलकराज ने संकेत किया है कि मेघों के कुछ गोत्रों के नाम ग्रीक शब्दों से निकले प्रतीत होते हैं. यह खोजबीन का मामला है. ज़ाहिर है राँझे जैसे अन्य कई लोक गायकों के हाथों में उन दिनों कलम-दवात या पोथियाँ तो थी नहीं लिहाज़ा पंडितों से सुनी-सुनाई बातें वे अपने गीतों में कहते रहे.

गोत्रा जी ने यह प्रश्न एक से अधिक बार पूछा है कि बाह्मन समुदाय में सिकंदर नाम रखने की एक परंपरा दिखती है, तो कहीं सिकंदर ही आर्यों का देवता आर्यवंशी इंद्र तो नहीं था? पता नहीं, मैं नहीं जानता. लेकिन पंडित जयशंकर प्रसाद का नाटक 'चंद्रगुप्त' पढ़ा है जिसमें एलेक्ज़ांडर यानि सिकंदर का नाम अलक्षेंद्र (अलक्ष+इंद्र) रखा गया है.

सिकंदर लंबा रास्ता तय करके मेदियन और पर्शियन साम्राज्य के इलाके से होता हुआ झेलम और चिनाब क्षेत्र तक आया. उस क्षेत्र में मेघों के होने का साफ़ ज़िक्र सर एलेग्ज़ैंडर कन्निंघम ने किया है जिनकी रिपोर्टें 1871 में छपी थीं यानि सिकंदर के आने के लगभग 2200 साल बाद. कन्निंघम ने जब रिपोर्ट लिखी तब मेघ उन इलाकों में काफी गिनती में बसे थे.

वक्त के साथ चलता इतिहास बदलता रहा है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सिकंदर ने पोरस को हराया और कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पोरस ने सिकंदर को हराया. एक और बात भी देखने में आती है कि इतिहासकार जिस व्यक्ति का इतिहास दफ़्न करना चाहता था वो उसका नाम ही बदल देते था और अपनी पसंद के व्यक्ति को हीरो बना देता था.

सिकंदर अपने सेनापति सेल्यूकस को यहाँ छोड़ गया जिसने अपनी बेटी चंद्रगुप्त को ब्याह दी थी. ग्रीकों की बहुत सी निशानियाँ यहाँ रह गईं होंगी. वैसे भी जिस रास्ते से सिकंदर आया उस रास्ते में बहुत गोरे और बहुत साँवले लोग भी रहते थे. यह जुगलबंदी रक्तमिश्रण (ब्लड मिक्सिंग) की कहानी कहती है.

फिलहाल राँझाराम की कथा इतना संकेत करती है कि सिकंदर की फौज के साथ हमारा कुछ न कुछ लेना-देना तो रहा है. इतिहास लिखने की अनुमान पद्धति (inference methodology) में यह माना हुआ सिद्धांत है. दूसरी ओर यह एक प्रमाण है कि मेघों के प्राचीन इतिहास का एक अंश लोक-स्मृति (Public memory) में सुरक्षित है. मेघवंश के इतिहासकार वैज्ञानिक खोज के साथ अपना अतीत खंगालते रहेंगे. उस अतीत का दीदार मेदियन साम्राज्य से लेकर ग्रीस तक के इलाके के इतिहास और वहाँ की जनसंख्या की जानकारी (Demography) के अध्ययन से हो सकता है. डीएनए की खोज क्या कहती है यह भी देखने की बात है.

प्राचीन (pre-historic) इतिहास किसी एक जगह समाप्त नहीं हो जाता क्योंकि नई खोजें होती रहती है. किसी समय पराजित हुए भारतीय समुदायों ने अब पुरातत्व (आर्कियालोजी), लोक-स्मृति (पब्लिक मेमोरी), तर्क (लॉजिक), प्रमाण (प्रूफ, एविडेंस) पर आधारित लोकतांत्रिक इतिहास बोध (Democratic Sensibility of History) के साथ अपना इतिहास खुद लिखना शुरू किया है. जाट और सैनी समुदायों सहित कई दूसरे समुदाय पोरस को 'अपना बंदा' कहते हैं. कहने का तात्पर्य है कि भारत के कई समुदाय अब अपना-अपना इतिहास खुद लिख रहे हैं. आगे चल कर उन सब के समन्वय (Coordination) की ज़रूरत होगी.

आप भी ज़रूर कुछ कहना चाहते होंगे? ज़रूर कहिए. बल्कि बेहतर है कि लिख डालिए. शुभकामनाएँ.

18 June 2016

Struggle for Emancipation from Untouchability and Meghs - अछूतपन : मुक्ति संघर्ष और मेघ

अछूतपन : मुक्ति संघर्ष और मेघ *

(यहाँ मूल आलेख का सार दिया गया है। पूरा आलेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए --> मूलआलेख)


जनसंख्या के आंकड़ों पर नजर डालने से मालूम होता है कि भारत के कुछ केंद्र शासित प्रदेशों सहित 12 राज्यों में मेघ समाज बसा है। इनमें जम्मू कश्मीर, राजस्थान और गुजरात में इनकी सर्वाधिक आबादी है। जैसलमेर और बाडमेर जिले में अनुसूचित जातियों की कुल आबादी की लगभग 85% आबादी मेघवाल है।

दो-एक शताब्दियाँ पहले हमारे पुरखों या बडेरों का जीवन गुलामों-सा था। यह तो शुक्र है कि हमारे समाज को 'गुलाम' के नाम से नहीं पुकारा गया। बाबा साहेब अांबेडकर के उदय के साथ मेघ समाज हर क्षेत्र में उठ खड़ा हुआ है। लेकिन इस बीच सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में जो कुछ घटित हुआ है वह शोचनीय है।

बहुसंख्यक हिन्दू अभी भी हमारे साथ दोयम दर्जे का बर्ताव क्यों करते हैं? हालाँकि इन वर्षों में मेघों ने ऐसे मुद्दों पर काबिले तारीफ एकता दिखाई और राष्ट्रीय स्तर पर अपना रोष दर्ज कराया।

विश्व इतिहास में गुलामों के नारकीय जीवन की पीड़ा को देखा जाय तो मेघ समाज पर लगी अछेप (अछूतपन) की छाप वाला उनका जीवन ठीक था - ऐसा कह सकते हैं. दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो यह 'अछूतपन' की छाप गुलामी से भी बदतर है। गुलाम समुदायों को अब तक नागरिक अधिकारों की प्राप्ति काफी हद तक हो चुकी है लेकिन अछूतपन के कलंक में दबे हुए लोग अभी भी संघर्षरत हैं। भारत के इतिहास में कोई अछूत से छूत हुआ हो इसका सबूत ढूँढना मुश्किल है। देश के आंतरिक भागों में उनके साथ भेदभाव अभी भी है. विवाह के अवसर पर वे घोड़ी पर नहीं बैठ सकते, मंदिरों के दरवाजे उनके लिए बंद हैं, हैंडपंप को ताले लगा दिये जाते हैं, खाने-पीने की अलग पंगत रखी जाती है। नौकरियों में आने और प्रगति करने के अवसरों पर एक से बुरे एक अड़ंगे लगाये जाते हैं. यानि अछूतपन का कलंक मिटा नहीं है। जो जन्म से अछूत है वह मरने तक अछूत है चाहे उसका पद या प्रतिष्ठा कुछ भी हो।

    हमारे लोगों पर आरोप रहा कि ये लोग गंदे काम करते हैं, छोटे काम करते हैं, बदसूरत देवी-देवताओं को पूजते हैं, मांवडियों को पूजते हैं, अलख थापते हैं आदि। हमारी आस्था, आराधना, बदहाली का क्रूर मजाक उड़ाया जाता है। फिर भी हमारा समाज विचलित नहीं हुआ। लेकिन इन आरोपों के लिए कौन जिम्मेदार है?
    हमारा मेघ समाज हिन्दू समाज है. लेकिन उन्होंने हमें सदियों शिक्षा से वंचित रखा, वेद-उपनिषद आदि पढ़ने से रोका। उनका ज्ञान उनके पास पड़ा रहा, इसमें हमारा क्या कसूर है। उनके ब्रह्म से हमारा अलख, उनके अद्वैत से हमारा अद्वय बड़ा रहा। हमने अपने ज्ञान और धर्म को बड़ा कहा, वेदों और उपनिषदों की जगह हम ने महाधर्म की महिमा गायी तो इसमें हमारा क्या दोष है. उन्होंने खुद हमारे लिए बुरे हालात पैदा किए और हमें ही नीच धर्म को मानने वाले कह दिया।

    गुलामी प्रथा में इस तरह की अछूतपन की दीवारें नहीं थीं। अभिजात्य वर्ग के गुण और धर्म गुलामों के सामने रहते थे। अनुकरण की मनाही नहीं थी. आजाद होने के बाद सभी नागरिक अधिकारों का निर्बाध उपयोग वे कर पाए। अछूतपन से ग्रसित समुदायों की स्थिति इसके विपरीत रही। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? ज़रूरी है कि गुलामी की तरह अछूतपन का कलंक भी ख़त्म हो। पर कैसे?

    संविधान के अनुच्छेद 17 ने छुआछूत ख़त्म करने की घोषणा कर दी हुई है। लेकिन वह ख़त्म नहीं हुई, क्योंकि यह हिन्दू धर्म, जिसे आजकल ब्राह्मणवादी धर्म कहा जाने लगा है, से निकली है। इनके शास्त्र छुआछूत की आज्ञा देते हैं। यह धब्बा साफ-सुथरे कपडे पहनने से, ऊँचे ओहदे पर पंहुचने, मंदिरों में जाने, ऊँची से ऊँची डिग्रियां लेने, धार्मिक अनुष्ठान करने, रीति-रिवाज़ निभाने पर भी धुलने का नाम नहीं लेता. क्यों? इस पर विचार करना चाहिए। सिंध से लेकर जम्मू-कश्मीर में रहने वाले मेघ एक ही जमात के हैं। महाराजा गुलाबसिंह का उस समय सिंध-पंजाब पर अधिकार था, जम्मू-कश्मीर भी उनके अधीन था और बीकानेर पंजाब का हिस्सा था। तक़रीबन 1879 के आस-पास एक हमारे समाज के संत पुरुष केरनवाले वाले भगता साध और महाराजा गुलाब सिंह के बीच लिखित समझौता हुआ और राज की मोहर से उसे पुख्ता किया गया और उसके अनुसार मेघों ने मरे जानवरों का मांस खाना छोड़ दिया। अन्य जगहों पर भी ऐसे ही परवाने लिखे गए। इससे भी उनका 'अछूतपन' नहीं गया। इसका मर्म समझना चाहिए।
श्री ताराराम द्वारा इस अवसर पर प्रकाशित पुस्तिका
आजादी से पहले कई लोग देश-देशांतर करते थे। इस देशांतर के पीछे कई कारण होते थे। अकाल की विभीषिका और सामंतों के जुल्म और अत्याचार प्रमुख कारण थे। जातिगत बेगारी और अन्याय-अत्याचार से पीड़ित मेघ लोग इधर से उधर भटकते रहे हैं। कई प्रोविंसेज में वे स्पृष्य हैं और कहीं अस्पृश्य। इसलिए कुछ लोग सुझाव देते हैं कि अछूतपन से छुटकारा पाने के लिए मेघ लोग देशांतर कर लें। लेकिन कई जगह इससे भी समस्या का समाधान नहीं हुआ.

    असली सवाल यह है कि पुरखों की जमीन पर रहते हुए, अपने इलाके में रहते हुए इस 'अछूतपन' के निर्मूलन का क्या कोई रास्ता हो सकता है? सभी लोग देशांतरण नहीं कर सकते। साफ-सफाई, टीका-तिलक, शास्त्र पठन, उनका बखान, हिन्दू धर्म के किसी पंथ से जुड़ना आदि-आदि सब किया। लेकिन जातिगत भेदभाव फिर भी रहा। यह समस्या सवर्णों की नहीं आपकी है.

    सैद्धांतिक दृष्टि से सब की आत्मा एक जैसी है किन्तु हिन्दू धर्म का व्यावहारिक स्वरूप न जाने किस वजह से इतना गन्दा है कि जो लोग गला फाडकर यह बताते हैं कि आत्मा सभी प्राणियों में एक सी है, वही दूसरों को अपवित्र और अछूत करार देते हैं. हैरानगी इस बात की है कि जो लोग हिन्दू धर्म में श्रृद्धा नहीं रखते, उन्हें ऊँची जाति के हिन्दू बराबरी की नजरों से देखते हैं। ईसाई लोग अपवित्र या अछूत नहीं हैं।

    हमें यह समझना चाहिए कि जिस धर्म के तत्व इतने ऊँचे हैं, व्यवहार में वो धर्म इतना नीचा हो, तो क्या उस धर्म में रहकर हमारा उत्थान होगा? क्या हमारी भावी पीढ़ियां इससे मुक्त होंगी? इस पर विचार ज़रूरी है।
    अछूतपन के लगे कलंक को पोंछने के लिए कई जातियों ने अपनी जाति का नाम बदलने का उपाय भी किया। नाम बदलना अच्छा है या बुरा? कौन सा नाम हो और कौन सा नहीं? इस पर वाद-प्रतिवाद होता रहा है। यह हकीकत है।

    जब हिन्दू पुनर्जागरण शुरू हुआ तो पूर्व में ब्रह्मोसमाज और पश्चिम में आर्य समाज का आन्दोलन हुआ। आर्य-समाज ने लाहौर, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और मारवाड़ क्षेत्र में हम जैसे कई समाजों का शुद्धिकरण के द्वारा आर्यकरण कर हिन्दूकरण किया। लाहौर और स्यालकोट में आर्य समाज का पूरा जोर मेघों के शुद्धिकरण पर था। हजारों की तादाद में मेघ शुद्धिकरण के द्वारा आर्य कहला कर हिन्दू हुए।

    अछूतों का आपस में जाति भेद भी विवादपूर्ण है और ऐसे आंदोलनों से उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन में रोटी-बेटी का व्यवहार नहीं होता है। इन भावनाओं को कैसे मिटाया जाये। इस पर विचार करना चाहिए।

जाति का अर्थ एक अलग समूह से है। यह अलगाव ही जातियों की पहचान है और यही हिन्दू धर्म के प्राण हैं। इसलिए आपस में खान-पान आदि हो जाने पर भी भावना ख़त्म नहीं होती। इसको ख़त्म करने के लिए लोग रामस्नेही, राधास्वामी बने, या अन्यान्य साधुओं-संतों के चेले बने। इससे उनकी आध्यात्मिक प्यास चाहे मिटी हो लेकिन व्यावहारिक रूप में उनकी आपसी जातीय भावना नहीं मिटी। इसलिए अछूतों को ख़ुद एक नाम के तहत आना चाहिए, इस बात का मेघवाल समाज हमेशा समर्थन करता रहा। अगर किसी एक सर्वसम्मत नाम से उनमें एकता और सद्भावना बढे तो यह उनके लिए सुखद होगी। ऐसा मैं मानता हूँ। इस पर भी विचार होना चाहिये।
बाएँ से चौथे श्री भँवर मेघवंशी, पाँचवें श्री ताराराम - दाएँ से चौथे श्री दिलीप चंद्र मंडल, दाएँ से तीसरे श्री रामचंद्र गढ़वीर
    कई जातियों ने अपनी-अपनी जाति के नाम संस्थाएं बनायीं हैं। वे उन-उन जातियों के उत्थान के लिए काम भी करती हैं। यह सिलसिला आजादी से पहले शुरू हो गया था। मेघों के नाम से भी संस्थाएं बनीं। स्यालकोट में 'मेघ उद्धार सभा' बनी। लेकिन ऐसी संस्थाएं मेघों ने नहीं बनायीं थीं, बल्कि आर्य-समाज ने बनायी थीं। मेघ ऐसी संकल्पना में नहीं बंधे और जो सभी जातियों के सामूहिक प्रतिनिधित्व की संस्थाएं थीं, जिन में जाति विहीनता का भाव उद्बोधित होता था, उन से जुड़े, गहरे रूप से जुड़े और अपनी जातीय पहचान को खोने और सामूहिक चेतना बढ़ाने के लिए काम करने लगे। लेकिन उनकी अपनी पंचायतों का जो गणतन्त्र था वह ज्यों की त्यों बना रहा। आजादी के बाद बाबा साहेब के नाम से संगठन बनाए गए। उनमें से कई विभिन्न जातियों के सामूहिक संगठन थे जैसे हरिजन सेवक संघ, दलित उद्धार सभा, डिप्रेस्ड क्लासेस लीग, शेडूल्ड कास्ट फेडेरेशन/अपलिफ्ट यूनियन आदि।

    ‘आदि धर्म’ आन्दोलन और अभी के ‘मूलनिवासीआन्दोलन में बहुत समानताएं हैं. हमें बदलाव के लिए इसके विकल्प के लिए तैयार रहना चाहिए। आने वाली पीढ़ी को इस हेतु सक्षम बनाना चाहिए।

    सत्ता प्राप्ति के बिना कई प्रकार के सामाजिक अन्याय को समाप्त करना मुश्किल है। इस पर आजादी के दौर में बहुत लम्बी-चौड़ी बहसें हुईं, आन्दोलन हुए, वाद और प्रतिवाद हुए। हमारे समाज के कई लोग राजनीति में आये और धार्मिक क्षेत्र में आये, उनका उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में मेघ समाज की गरिमा को ऊपर उठाना था। सामाजिक क्षेत्र में खिलाफत आन्दोलन की धुरी हमारा समाज ही बना रहा। उनकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता है। वे लोग प्रतिबद्ध थे। इस समाज के कई लोगों ने साधु-संन्यासी होकर, समाज-सुधारक बनकर और नेता बनकर इस समाज का मार्गदर्शन किया। ऐसे प्रत्येक शख्स में समाज को एक नयी दिशा देने का जोश था, प्रेरणा थी और परिस्थिति थी। चाहे वे साधन संपन्न थे या साधन विपन्न, वे अपने ध्येय के प्रति अटूट आस्थावान थे। शहरों में संस्थाएं आन्दोलन कर रही थीं तो गांवों में हमारी पंचायतें पूरे संकल्प और शक्ति के साथ थोपी गई निर्योग्याताओं के विरोध में हर स्तर पर आंदोलनरत थीं। स्यालकोट के गाँवों के संदर्भ में ऐसे माहौल का वर्णन श्री मुंशीराम भगत की पुस्तक ‘मेघ-मालामें और डॉ. ध्यान सिंह के शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकासमें भी मिलता है। मेघवाल समाज का सर्वाधिक संघर्ष और आन्दोलन गांवों में रहा, क्योंकि उनकी कुल जनसँख्या का 92% भाग यानि 100 में से 92 लोग गांवों में ही रहते हैं। इस समाज के सन 1879 में हुए निर्णय की पृष्ठभूमि और बाबा साहेब के 'गंदे धंधे और बेगारी छोड़ने के आह्वान' ने इस समाज को पुनः जागृत कर दिया और फिर एक बार सवर्ण समाज के सामने - धर्म के स्तर पर, राजनीती के स्तर पर और सामाजिक स्तर पर चुनौती पैदा कर दी। मेघवालों का 'खुली-बंधी' और 'बेगारी-उन्मूलन' ऐसे ही आंदोलन थे। उनका मूल्यांकन अभी नहीं हुआ है। लेकिन राजनीतिक रूप से उस समय जो मेघवालों का वजूद दिखा था, वैसा अब नहीं है।

    अंततः हमारे जो राजनीतिक प्रतिनिधि हैं, वे माला पहनने के बाद सोचते हैं कि उनका काम हो गया, उनके समाज का काम हो गया, गैर-बराबरी और भेदभाव ख़त्म हो गया, जातिगत अन्याय और अत्याचार नहीं रहे। वे अपने समाज की समस्याओं को विरोधियों के सामने या उपयुक्त आसन के सामने उठाने में कतराते हैं। वे सामाजिक आन्दोलनों से दूर भागते हैं। केवल माला पहनने के मौके ढूँढते हैं। आजादी के बाद शायद ही किसी भी नेता ने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आन्दोलन किया हो या उसका नेतृत्व किया हो। ऐसा उदाहरण मिलता होगा। यह विडम्बनापूर्ण और भयावह है।

    सामूहिक प्रयत्नों में बहुत बल होता है। भलेई हमारे पास धनबल न हो लेकिन यहाँ लाखों की संख्या में हमारे लोग रहते हैं। हर साल एक-एक रूपया भी दें तो भी हर साल लाखों में फंड इकटठा हो सकता है। इसका एक उदाहरण मेघवाल समाज शैक्षणिक और शोध संस्थान, बाड़मेर ने प्रस्तुत किया है। यह की प्रकार की समस्याओं का समाधान दे सकता है. हमें खुद के द्वारा विकसित संस्थानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ी के लिए प्रशिक्षण और ट्रेनिंग की व्यवस्था करनी होगी।

    कुल मिलाकर बात यह है कि जिस प्रकार की समाज़िक, धार्मिक और राजनीतिक स्थिति हमें चाहिए, वैसी स्थिति प्राप्त करने में हमें देर नहीं करनी चाहिए। हम लोगों की जनसंख्या अपने आप में इतनी विशाल है कि हम लोग राजनीति में या किसी धर्म में एक साथ रहते हैं तो एक सबल और उन्नत समाज का निर्माण कर लेंगे। हमारे बिना किसी की राजनीति परवान नहीं चढ़ सकती। हिन्दू धर्म का अस्तित्व भी हमारी वजह से है। अगर किसी धर्म को मानने वाले ही नहीं हों तो उस धर्म की क्या गति होगी? आप अंदाजा लगा सकते हैं।

हमारा मुक्ति-संघर्ष नया नहीं है। मुक्ति संघर्ष में बेगारी के साथ खेती की जमीनों पर जो बिचौलियों और सूदखोरों का भयावह साया था, उसके विरुद्ध भी मेघ बहुल इलाकों में एक साथ आवाज उठी। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के प्रभाव से इस में क्रन्तिकारी बदलाव आये और जब सर छोटूराम ने 'यूनियनिस्ट पार्टी' तले आन्दोलन चलाया तो हमारे समाज ने उनका भी साथ दिया। हमारे मेघ समाज के एडवोकेट हंसराज भगत को कौन भूल सकता है। वे इस आन्दोलन के अग्रणीय मेघ पुरुष थे।

ताराराम
(लेखक- मेघवंश : इतिहास और संस्कृति)



*सार प्रस्तुति: भारत भूषण