"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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20 November 2018

The System of Gotra in Meghs - मेघों में गोत्र की व्यवस्था

सदियों की अनपढ़ता झेल चुकी जातियों की बौद्धिक कठिनाइयां जल्दी दूर नहीं होतीं. इसका एक उदाहरण हाल ही में इक्का-दुक्का सक्रिय सीनियर्स के मन में उभरा और व्यक्त हुआ यह विचार है कि मेघ समाज में जो गोत्र प्रथा है वह ऋषि गोत्र के बिना या तो अधूरी है या सिरे से गलत है. वे मानते हैं कि मेघ बिरादरी के गोत्र वास्तव में ऋषि गोत्र ही हैं या फिर मेघ भगतों का वास्तविक गोत्र केवल ‘भारद्वाज’ है. 

डॉ. ध्यान सिंह को जहां तक जानकारी मिली उन्होंने बिरादरी के बहुत सारे गोत्रों की एक सूची अपने शोधग्रंथ में शामिल की. हरेक गोत्र के अपने दायरे में आने वाले लड़के-लड़कियों की आपस में शादियाँ नहीं होतीं. यह कमोबेश जाटों की खाप प्रणाली जैसा है. डॉ. ध्यान सिंह द्वारा दी गई सूची में भारद्वाज, अत्री, कौशल या  कश्यप गोत्र शामिल नहीं किए हैं (हालाँकि ये ऋषि गोत्र मेघों में देखे गए हैं, शायद कुछ और भी हों). भारद्वाज गोत्र बहुतायत से देखा गया है. लेकिन इस इंप्रेशन से बचना भी बहुत ज़रूरी है कि सारे मेघ समाज का ऋषि गोत्र केवल ‘भरद्वाज’ या ‘भारद्वाज’ ही है. अन्य ऋषि गोत्र भी इस समाज में हैं.

क्या ऋषि गोत्र स्पिंडा रिलेशनशिप को कवर करने की क्षमता रखते हैं? यह एक ज़रूरी सवाल है.

कई जातियों में पाए जाने वाले ऋषियों और ऋषि गोत्रों में समानता है और यह समानता जाति छिपाने में सहायक हो सकती है. शायद इसी लिए ऋषि गोत्र के प्रति आकर्षण रहा है. हिंदू परंपराओं में हो सकता है कि किसी के 'नाम' की 'हिस्ट्री' इस प्रकार हो :- “नाम : हरे सिंह गोयल. गोत्र : भारद्वाज. वर्ण : क्षत्रिय. जाति : जाट”. उससे आगे जाटों के गोत्रों या खापों की कहानी और भी बड़ी मिलेगी. मेघों में भी यह प्रवृत्ति मिल सकती है.

जो सीनियर मेघ भगत आजकल ऋषि गोत्र पर विशेष ध्यान दे रहे हैं उनसे विनती है कि वे अपनी पसंद के ऋषियों से संबंधित वैदिक और पौराणिक कहानियों को विस्तार से पढ़ें और फिर अपना मन बनाएँ. वे मेघ ऋषि पर भी थोड़ी खोज-बीन कर लें यदि अन्यथा कोई परहेज़ न हो.

जहाँ तक डॉ. ध्यान सिंह के थीसिस में बताए गए गोत्रों की बात है तो यह समझ लेना ज़रूरी है कि उन्होंने वह उल्लेख जम्मू और अन्य जगह स्थित मेघों की देरियों के संदर्भ में किया है. सुना नहीं कि उन देरियों में ऋषियों-मुनियों की देरियां हों. मेघों में देरियों की परंपरा किस समय की है या किस सभ्यता से संबंधित है और ऋषि गोत्र की परंपरा कितनी पुरानी है, ये शोध के विषय हो सकते हैं. इस बारे में कुछ संदर्भ या संकेत कल्हण लिखित राजा मेघवाहन के आख्यान से मिल सकते हैं.

आज कई मेघों को यदि किसी कारण से अपना गोत्र याद नहीं तो वे मौखिक परंपरा में अधिक सुने गए ऋषि गोत्र का सहारा लेते हैं. शादी के उद्देश्य से वे पंडित-पुरोहित को ऋषि गोत्र बता देते हैं. यदि दोनों पार्टियों का ऋषि गोत्र एक ही निकल आए तो फिर जाति (गोत्र) पूछ ली जाती है. यानि भारद्वाज गोत्र के बाद बताना होता है कि वे लुचुंबे हैं या साकोलिया या ममुआलिया या मंगोच हैं, तभी मामला सुलटता है. शादी-ब्याह के मामले में मेघों की सभ्याचारक (cultural) परंपरा वही गोत्र प्रणाली है जो ऋषि गोत्र से मुक्त है.

यह आलेख भी ज़रूर देख लीजिए. → गोत्र प्रथा. दो लिंक और देख लीजिए पहला और दूसरा.



06 August 2018

Waiting for Mega Transformation - मेघ-परिवर्तन की प्रतीक्षा में

वैसे तो समाज जैसे-जैसे फैलता है वैसे-वैसे वो कई आधारों पर बँटता भी जाता है जैसे कि नाम, रूप, रंग, एरिया, धर्म-डेरे, राजनीतिक पार्टी वगैरा के आधार पर.

मेघ समाज भी इस फैलाव और बिखराव की प्रक्रिया से गुजरा है. मेघ, भगत और कबीरपंथी तीन नाम दिमाग़ को झल्लाने के लिए काफी हैं. एक समय था जब मेघों की इस बदलाव की प्रक्रिया के सारे स्विच आर्यसमाज के हाथों में थे जिसने इनकी मौजूदा बनावट में अहम रोल निभाया. फिर भी, यह देख कर हैरानी होती है कि मेघों की बहुत बड़ी, कहते हैं कि, लगभग 70% आबादी राधास्वामी मत में दाखिल हो गई. आर्यसमाज से अलग होकर उन्हें क्या मिला इस पर जितनी चाहे माथापच्ची की जा सकती है लेकिन इसे तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक विभिन्न धार्मिक पंथों के जात-पात विरोधी स्टैंड की भाषा को अच्छे से पढ़ नहीं लिया जाता. कुछ भवानात्मक पहलू भी हो सकते हैं उनका अध्ययन किया जाना चाहिए. बहरहाल राधास्वामी मत का 'नो-जातपात' का बैनर बहुत बड़ा था.

आर्यसमाज ने अपने धार्मिक-सामाजिक रूप-रंग के सहारे राजनीति में पैठ बनाई लेकिन सामाजिक आंदोलन के क्षेत्र में वह पिछड़ता रहा. यह बात मेघ समाज के संदर्भ में कही जा रही है. दूसरी ओर कबीरपंथ नामक सामाजिक आंदोलन इस समाज में पहुंचा और काफी तेजी से फैला. राधास्वामी मतावलंबियों की भी इसमें भूमिका रही क्योंकि राधास्वामी मत को संतमत की शाखा माना जाता है. 'मेघ भगत' नामकरण की वजह से मेघों को कबीरपंथ आंदोलन में संतमत की पहचान स्थापित नज़र आई. कबीर की छवि को अपनाने में न उन्हें दिक्कत हुई और न मशक्कत करनी पड़ी. वैसे भी शुरुआत से ही कबीर एक फैलता हुआ फिनॉमिना (असाधारण घटना) है. यही कारण है कि जालंधर के भार्गो कैंप में स्थित कबीर मुख्य मंदिर पर विभिन्न सियासी दलों की नज़र जमी रहती है. 

मेघों की सियासी समझ पहले के मुकाबले बहुत बढ़ी है लेकिन उसे परिपक्व कहा जा सकता है या नहीं मैं नहीं जानता. उन्होंने अपना कोई आज़ाद उम्मीदवार जिताने के लिए कभी कोशिश नहीं की जिससे इनके वोटों की शक्ति का परिचय मिलता जाता. पार्टियों वाली राजनीति के कई आयाम है. पहली बात यह कि उसके लिए बहुत-सा धन और अन्य संसाधन चाहिएँ. मेघों के पास जो है वो नाकाफी है. लेकिन जिन लोगों के पास कुछ संसाधन हैं उन्हें सियासी दल अपनी दावत में शामिल कर लेते हैं विशेषकर तब जब वे सियासी समझ ना रखते हों लेकिन दावत में कंट्रीब्यूट कर सकते हों. उसे पार्टी फंड कहते हैं. पार्टियों ने शिक्षित, राजनीति में प्रशिक्षित और तेज़-तर्रार मेघों पर कभी ध्यान दिया हो ऐसा दिखा नहीं.

हमारे समाज के पढे-लिखे लोग भी राजनीति और समाज सेवा में लगे हैं लेकिन उनके पास संसाधनों की कमी है. बेहतर होता कि समाज के धन्नासेठ उनकी ग्रूमिंग का प्रबंध करते. कभी लगता है कि ऐसा कुछ कार्य शुरू तो हुआ है. मेघों की सियासत की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उनके पास संख्या बल नहीं है कम-से-कम राजनीतिक पार्टियाँ ऐसा ही मानती हैं. पंजाब में वे कुछ लाख हैं. इस स्थिति को देखते हुए यह जागृति बहुत पहले आ जानी चाहिए थी कि उनके नेता अन्य समुदायों के साथ कारगर राजनीतिक संबंध बनाते. सामाजिक संबंधों की शुरुआत तो हो ही चुकी है.

इस बात को समझ लेना चाहिए कि जब तक हम दो-चार राजनीतिक विचार बटोरते हैं तब तक पॉलिटिकल पार्टियां बहुत-सी नई जानकारियाँ और आँकड़े इकट्ठा कर चुकी होती हैं. इसलिए इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि अपने माज़ी (अतीत) से सीखिए. इतिहास ख़ुद को तब तक दोहराता रहता है जब तक आप सीख लेकर अपना वर्तमान और भविष्य बेहतर ना बना लें. लेकिन समय को देखते हुए सीखने की गति तेज़ होनी चाहिए. 


23 September 2017

Megh Matrimonial - मेघ मैट्रिमोनियल

जब से मेघ समाज में शिक्षा का लेवल बढ़ा है तब से शादियों के लिए रिश्ते ढूंढने में लोगों को कठिनाई महसूस होने लगी है.  यह कठिनाई तब से और बढ़ी है जब से सरकारी नौकरियां कम हो गई हैं.
इस समस्या को कम करने के लिए लोग अपने-अपने तरीके से जुगत करने की सोचते हैं. कई वर्ष पहले ‘मेघ चेतना’ पत्रिका ने मैट्रिमोनियल सेवा देने का कार्य शुरू किया था. इससे काफ़ी लोगों को लाभ हुआ. आगे चलकर कुछ उत्साही लोगों ने इंटरनेट पर ब्लॉग, फ़ेसबुक आदि के माध्यम से मैट्रिमोनियल सेवा दी. इससे भी लोगों को फ़ायदा हुआ. पिछले डेढ़ साल के दौरान WhatsApp पर मैट्रिमोनियल ग्रुपों को लेकर काफी खींचतान देखने में आई थी. कई लोग 'एडमिन-एडमिन' खेल में कूद पड़े. पूरे के पूरे ग्रुप हाइजैक हो गए या फिर किडनैप कर लिए गए. उनमें जो हुआ अच्छा-बुरा, खट्टा-मीठा उसमें मैं नहीं पड़ता. उसे सेवा करने का अति उत्साह मानता हूँ. एक अच्छा परिणाम यह सामने आया कि बाबू भगत गोपीचंद जी की दोह्ती (दुहिता) और दिल्ली में एडवोकेट सुनीता भगत ने एक भरी-पूरी वेबसाइट बनाई जो काफ़ी यूज़र फ्रेंडली है. एडवोकेट सुनीता भगत की वेबसाइट का लिंक ऊपर पेजेस में Megh Matrimonial नाम से लगा दिया है. यदि और भी ऐसी कोई यूज़र फ्रेंडली वेबसाइट मिली तो उसे भी लिंक किया जा सकता है.
रिश्ते न मिलने की कठिनाइयों के कई कारण हैं जिनमें से एक यह भी है कि सरकारी नीतियों के कारण रोज़गार पैदा होने की जो उम्मीदें हैं उनके पूरा होने में समय लग रहा है. आगे चल कर क्या होगा पता नहीं, लेकिन नौजवानों में बेचैनी और गुस्सा बढ़ा है. कई युवाओं की शादी इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि वे ऐसी प्राइवेट नौकरियों या कंट्रेक्ट बेसिस वाली नौकरियों में हैं जहाँ नाममात्र का मानदेय दिया जाता है. हमारे कुछ उद्यमियों ने व्यापार में कदम रखा है और सफल रहे हैं. भविष्य में प्राइवेट नौकरियों और अपने कारोबार की राह युवाओं को पकड़नी होगी.
पूरे भारतीय समाज में आर्थिक असुरक्षा का वातावरण बना है. रोज़गार की निरंतरता की कोई गारंटी नहीं. जीवनसाथी मिलने के बाद साथी और बच्चों का क्या होगा इसका ख़्याल पढ़े-लिखे समाज को आएगा ही. युवा तबका शादियों का विचार टालने लगा है. जब उनके हारमोंस सिर को चढ़ेंगे तो वे कहाँ-कहाँ तोड़-फोड़ मचाएँगे पता नहीं. यह माहौल भविष्य में हमारे सामाजिक मूल्यों को पूरी तरह बदल डालने की ताक़त रखता है. बेहतर है कि रिश्ते ढूँढते समय नए हालात को स्वीकार करते हुए आगे चलें. यह कठिनाई सब की है.

09 July 2017

History - Investigation and Notes / इतिहास - पड़ताल और नोट्स

Sh. R.L. Gottra
मैंने श्री आर.एल. गोत्रा जी को पहले पहल सोशल मीडिया से जाना फिर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला. वे सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और तीन चार साल बिजनेस में रहे. फिर बिजनेस छोड़ कर धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. वेद पढ़े, मनुस्मृति और गुरुइज़्म से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम, इसाईयत, सिखिज़्म और अन्य धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे कि धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. मत-मतांतरों की पृष्ठभूमि में क्या कुछ जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और उनकी सूचना के स्रोत और आधार क्या थे. उनकी मानसिकता क्या थी, उनका व्यक्तित्व कैसा था, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे.

धार्मिक पुस्तकों की राह से ग़ुज़र कर वे जहाँ पहुँचे वह तर्क का मुकाम था. यानि आंखें बंद करके कुछ भी मत मानो. देखो, जानो, पहचानों, पड़ताल करो, जाँचो फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की तैयारी करो ताकि आपको खुद की समझ से संतुष्टि रहे और आगे चल कर अपनी न्याय बुद्धि पर पछतावा न हो. सब से बढ़ कर यह कि इतनी सावधानी ज़रूर बरती जाए कि किसी पुस्तक या धार्मिक विचारधारा की मानसिक गुलामी को ख़ुद ही अपने कंधों पर न डाल लिया जाए.

देश में शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी को उन्होंने रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की टेक्नोलॉजी के संदर्भ में परखा है और भविष्य में बेरोज़गारी को लेकर जो कार्यनीति अपनाई जा सकती है उसके बारे में अपने विचार दिए हैं. राजनीतिक पार्टियों ने जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में गंदगी फैलाई है उसके तीन वाहकों का वे उल्लेख करते हैं - धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. उनका मानना है कि पार्टियों ने जानबूझ कर चुनावी प्रक्रिया में ये ख़ामियाँ पैदा की हैं.

इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है. उनके साथ हुई बात का विस्तृत ब्यौरा हिंदी में यहाँ उपलब्ध है जो स्वतंत्र अनुवाद है.

12 July 2016

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

पंजाब में चुनाव आने वाले होते हैं तो मेघ भगतों में एक बेचैनी बढ़ने लगती है कि चुनाव के समय उनके समुदाय में एकता क्यों नहीं होती. उनका वोट एक साथ एक तरफ़ क्यों नहीं जाता. समेकीकरण या ध्रुवीकरण (consolidation or polarisation) क्यों नहीं होता. इस पर पहले भी मैंने पहले दो-एक ब्लॉग लिखे थे. इस ब्लॉग की प्रेरणा फेसबुक से मिली है. 

फेसबुक पर एक सज्जन भगत पवन कौशल मेरे मित्र हैं. उन्होंने उल्लेख किया था कि कोई भी सियासी पार्टी 'मेघों पर ध्यान नहीं देती' (अधिक स्पष्टता से कहें तो 'घास नहीं डालती'). उनकी पोस्ट के उत्तर में मैंने उन्हें सुझाव दिया कि मेघों की जो अपनी खापें (गोत्र) हैं उनका मंच निर्णय लेने में सहायक और कारगर हो सकता है. लेकिन समस्या यह है कि मेघों के टूट चुके पंचायती सिस्टम को फिर से खड़ा करने का कार्य कौन करे.

इतिहासकार बताते हैं कि मुग़लों के आने से पहले भी हमारे यहाँ के मेघवंशियों का अपना लोकतांत्रिक सिस्टम और न्याय प्रणाली थी जिसमें पंचायतों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी. मेघों ने अपने जातीय समूहों में अनुशासन और न्याय स्थापित रखने के लिए उक्त प्रणाली का सदा सम्मान किया जो उनके सामूहिक और राजनीतिक विवेक की निशानी थी. चूँकि मेघों और जाटों का मूल एक समान दिखता है इस लिए जाटों की खापों का उदाहरण देना ठीक होगा. जाटों की खापें आज भी मज़बूत हैं और कारगर हैं. जाटों ने अपनी खापों का रचनात्मक और राजनीतिक इस्तेमाल अच्छे तरीके से किया है जिसका असर राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब और पाकिस्तान तक में दिखता है.

ये खापें सामाजिक क्षेत्र में इस बात का ध्यान रखती हैं कि एक ही गोत्र के लड़के-लड़कियों में शादियाँ न हों या समाज के अंदरूनी झगड़ों का आपसी बातचीत से हल निकाला जा. इस परंपरा के अनुभव अच्छे रहे हैं. खापों के नियम अनजाने में टूटे ना हों ऐसा भी नहीं है. लेकिन याद रखना चाहिए कि जाटों ने अपनी खापों का सर्वाधिक और बढ़िया प्रयोग अपनी शैक्षणिक संस्थाओं के विकास और अपने समुदाय के विकास के लिए किया है. उनकी खापों की महापंचायतें आयोजित होती है. एक दबाव समूह (Pressure Group) के तौर पर वे पूरे राज्य की राजनीति को प्रभावित करते हैं. उनकी बात सुनने के लिए राजनीतिक दल और उनकी अड़ियल सरकारें मजबूर होत हैं.

पंजाब में मेघों की संख्या जाटों जितनी नहीं है. फिर भी मेघों कइस दिशा में कार्य करना व्यर्थ नहीं जाएगा. वर्ष में दो बार गोत्रों का जम्मू में देरियों पर मिलन (मेल) होता है जो पूर्वजों की याद में और धार्मिक भावना से होता है - लेकिन वो बिना किसी बड़े सामाजिक उद्देश्य के होता है. मेघों में राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए इन मौकों का इस्तेमाल सियासतदानों और समाज सेवियों को करना चाहिए. इसमें बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी.

गोत्र के फैसलों का असर जादुई होता है, यह मानवजाति का आज़माया हुआ तरीका है. जब कोई एक गोत्र पहलकदमी करके सफल होता है तो अन्य गोत्र भी पीछे चलने लगते हैं......और जब सभी गोत्रों क ट्ठी ताकत एक तरफ़ लगने लगत है तो नामुमकिन लगने वाले काम होने लगते हैं. धरती का जीवन बदलने लगता है.

अन्य लिंक-
मेघवंश समुदायों में एकता क्यों नहीं होती