"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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02 March 2021

Dharma and Dhamma - धर्म और धम्म

    कई जगह मैंने लिखा है कि मैं नास्तिक-सा हो गया हूं. इसका अर्थ यह है कि मैं आस्तिकता और नास्तिकता के बीच झूल रहा हूं.

    झूलना अच्छी बात नहीं होती. कहते हैं कि कहीं टिक जाना अच्छा होता है. और कहा यह भी जाता है कि टिकने से कुछ नहीं होता, वहां से निकल जाना ही अल्टीमेट (परम) होता है. मेरा मानना है कि आस्तिकता और नास्तिकता दोनों रिश्तेदार हैं. ये दोनों संशय की डोरी से बँधे होते हैं. उधर हमें पढ़ाया भी गया था कि धर्म शब्द से ही धम्म शब्द बना. फिर पढ़ाया गया कि धम्म शब्द पाली का है और धर्म शब्द से पुराना है. चलो ठीक है जी. लेकिन जब दोनों शब्दों की अवधारणाएँ देखने का अवसर मिला तो पता चला कि खेल अवधारणाओं का ही है जो एक दूसरे के उत्पाद की निंदा करती दिखती हैं. यह काट-पीट और काट-छांट बौद्धिक है और राजनीतिक भी. कोई पूछ सकता है कि अब इस पोस्ट का मेघनेट पर क्या काम? अपने नास्तिक-आस्तिक होने की बात छोड़ भी दूं तो कम से कम मुझे अपनी इतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक यात्रा के आधार पर इस अवधारणा की स्पष्ट जानकारी होना बहुत ज़रूरी है. 

    "सम्राट अशोक ने धम्म का ग्रीक अनुवाद 'युसेबेइया' कराया न कि रिलीजियन. ग्रीक भाषा में रिलीजियन को 'थ्रिस्किया' कहा जाता है. 'थ्रिस्किया' में देवताओं या ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास ज़रूरी होता है. लेकिन 'युसेबेइया' में यह ज़रूरी नहीं होता."   

    मोटा-मोटी यह समझ आया कि धर्म कई तरह की पूजा पद्धतियों और नैतिक संहिताओं (Moral Codes) के समूहों का नाम है जिन्हें हर व्यक्ति अपने-अपने परिवेश में अपने-अपने तरीके से 'धारण' करता है. किस व्यक्ति ने क्या धारण किया वह दुनिया में कई नज़ारों और रंगों में दिखेगा. धर्म हर व्यक्ति का नितांत निजी पहनावा है. उसके समानांतर एक 'संगठित धर्म' की अवधारणा दिख रही है जिसे प्यार से देखता हूँ लेकिन उससे डरता हूँ. इधर धम्म ने ईश्वर जैसी अवधारणा को महत्व न देकर व्यक्ति के ऐसे नैतिक प्रशिक्षण पर ज़ोर दिया जिससे पृथ्वी पर पूरा मानव समाज लाभान्वित हो. धम्म के विश्व प्रसार के पीछे यही तत्त्व कार्य करता दिखता है.

    'नो-पोलिटिक्स ज़ोन' में खड़े हो कर कहा जा सकता है कि धम्म और धर्म की (दोनों) अवधारणाएँ एक-दूसरे के क्षेत्र में अपना-अपना दख़ल रखती हैं - कभी प्रेम से कभी मन-मुटाव से.


27 April 2020

The Story of Religion is incomplete without Asur - असुर के बिना धर्म की कथा अधूरी है


मैंने असुर शब्द की व्याख्या पर एक ब्लॉग लिखा था जिसमें स्पष्ट लिखा था कि यदि किन्हीं संदर्भों में मेघों के लिए असुर शब्द इस्तेमाल हुआ है तो उसका अर्थ शक्तिशाली और प्राणवान के अर्थ में हुआ है. प्रमाण के तौर पर डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह के संदर्भ वहाँ लगा दिए थे. लेकिन वो काफी नहीं था. इस बीच हमारे अपने समुदाय के श्री आर.एल. गोत्रा जी ने काफी छानबीन करने के बाद जोशुआ जे. मार्क के एक शोध आलेख का लिंक भेजा जिसे पढ़ कर असुर शब्द के कई आयाम खुलते नज़र आए. मालूम पड़ा कि शब्दावलियों में चाहे कितनी भी भिन्नता हो सभी धर्मों के मूल में वे तत्त्व मौजूद हैं जो असुर से संबंधित व्याख्याओं के बिना अपनी वास्तविक संपूर्णता खो बैठते हैं.   

भारतीय मानस के संदर्भ में असुर का निकटतम पर्यायवाची शब्द राक्षस है. राक्षस यानि रक्षक (रक्षस्) जो रक्षा करता है. ज़ाहिर है कि रक्षक को शक्तिशाली और प्राणवान होना ही चाहिए. इस श्रेणी में आए कई नाम आपको पौराणिक साहित्य में मिल जाएँगे जैसे वृत्र, रावण, कृष्ण, हिरण्यकश्यप, महाराजा बली, कंस, प्रह्लाद आदि. इन नामों से आप जान सकते हैं कि पुराणपंतियों ने असुर और राक्षस की एक नकारात्मक तस्वीर भी बना दी है जो उनकी कथाओं में ऐसे चरित्र (या वो टोटम भी हो सकता है) को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करती है और पुराणपंतियों के टोटमों को श्रेष्ठ सिद्ध करती है. कहानियों से लगता है कि वृत्र और इंद्र किन्हीं दो विरोधियों के अपने-अपने टोटम हैं जिनके युद्धों की कहानियाँ गढ़ी गई हैं. संभव है वो पौराणिक कहानियाँ बहुत पुरानी न भी हों जिनमें दो या अधिक समूहों के बीच संघर्ष दिखाया जाता है. वो युद्ध उनके परस्पर हितों की रक्षा के लिए सदियों लड़े गए निरंतर युद्धों जैसा है. कुछ समूह बिखरते और कुछ जुड़ते जाते हैं जिससे युद्ध का अंजाम तय होता है.

टोटम क्या है -
पीडिया में टोटम की परिभाषा इस प्रकार की गई है - “गणचिह्नवाद या टोटम प्रथा (totemism) किसी समाज के उस विश्वास को कहते हैं जिसमें मनुष्यों का किसी जानवर, वृक्ष, पौधे या अन्य आत्मा से सम्बन्ध माना जाए. 'टोटम' शब्द ओजिब्वे (Ojibwe) नामक मूल अमेरिकी आदिवासी क़बीले की भाषा के 'ओतोतेमन' (ototeman) से लिया गया है, जिसका मतलब 'अपना भाई/बहन रिश्तेदार' है”.

इस नज़रिए से देखें तो असुर एक साधारण टोटम से शुरू होता है और आगे चल कर शक्तिशाली राजसत्ता का प्रतीक बन जाता है. धर्म और राजनीति के घालमेल के मूल में यही तत्त्व और तथ्य मौजूद है.



03 November 2019

My Religious Journey - मेरी धार्मिक यात्रा



बालपन का मन-मस्तिष्क कैमरे की डिस्क जैसा होता है जिस पर ज़िंदगी के अक्स छपते जाते हैं.

अमृतसर का नवांकोट, सामने मैदान और किला और आगे शीतला मंदिर. माता-पिता कभी शीतला मंदिर और कभी स्वर्ण मंदिर ले जाते थे. ये स्थान मेरे लिए घूमने की जगह थे जहाँ रौनक रहती थी. मेरी कुंडली शीतला मंदिर के किसी ज्योतिषी ने 34 रुपए में बनाई थी. बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखी थीं. एक बार माँ के साथ स्वर्ण मंदिर से लौटते हुए देखा बाज़ार में दो जुलूस आमने-सामने आ गए. एक जुलूस (सिखों का) नारा लगा रहा था- ‘पंजाबी सूबा’ और दूसरा (हिंदुओं का) नारे का जवाब दे रहा था- ‘महापंजाब’. दोनों तरफ़ के आगू उछल-उछल कर नारे लगा रहे थे. मां ने मुझे बाजू में भर कर सड़क के किनारे खींच लिया और एक मकान के थड़े पर हम खड़े हो गए. लोगों ने दरवाज़े बंद कर लिए हुए थे. हमारे पीछे भी दरवाज़ा था जो बंद था. कुछ ही देर में दरवाज़ा खुला और सीढ़ियों से उतरी एक अमृतधारी सिख महिला ने कहा- बहन जी अंदर आ जाओ. ये लोग पता नहीं क्या करेंगे. ऊपर की मंज़िल पर उसने हमें अपने ड्राइंग रूम में बिठाया था. जब शोर थमा तो हम बाहर निकल कर घर आए. अगले दिन पिता जी अखबार पढ़ कर बता रहे थे- ‘जुलूस के दौरान सोडावाटर की बोतलें भी फेंकी गईं जिससे कई लोग घायल हो गए’. यह धार्मिक-राजनीतिक घृणा से मेरी पहली मुलाकात थी. उस अमृतधारी सिख महिला की छवि और उसकी सहज प्रेममयी आवाज़ याद है. धार्मिक-राजनीतिक घृणा के शोर में धर्म उस महिला के रूप में वहाँ मौजूद था.

रामपुरा फूल में मेरा दाख़िला सरकारी स्कूल में हुआ. वहाँ सुबह असैंबली में प्रार्थना कराई जाती थी- ‘दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना, दया करना हमारी आत्मा को शुद्धता देना’. बहुत सुरीला गीत था लेकिन न मुझे आत्मा का पता था न परमात्मा का न प्रभु का. ख़ैर! रोहतक के माडल टाऊन में जहाँ हम रहते थे उसके पीछे ही राम मंदिर था. वहाँ मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ जाता, प्रसाद लेता और जब भी कोई कथावाचन होता तो सुनने चला जाता था. एक साल यह चलता रहा. समझ में कुछ आता था ऐसा तो मैं नहीं कह सकता लेकिन निश्चल हो कर कहानी सुनने का कुछ अनुशासन आ गया. निश्चल हो कर (कुछ न करते हुए) थोड़ी देर बैठना बेहतर जीवन के लिए दिए जाने वाले प्रशिक्षण का एक अंग है.

लड़कपन से किशोरावस्था में प्रवेश करने का समय टोहाना में आया. यह वो समय था जब चीन ने आक्रमण किया था. ऑल इंडिया रेडियो और नवभारत टाइम्स (सुबह होते ही जिसकी मैं प्रतीक्षा करता था) के द्वारा हम बच्चे देशप्रेम को जान रहे थे. पिता जी ने बताया था कि देश की रक्षा पहला धर्म होता है. देशप्रेम सबसे बड़ा धर्म होता है.

बचपन का यह बहुत नाज़ुक समय रहता है. अक़्ल की नसें फूटती हैं. स्मरणशक्ति ज़बरदस्त होती है. बच्चा प्राकृतिक रूप से जिज्ञासु होता है. उसके आने वाले जीवन की दिशा इसी आयु में स्पष्ट होने लगती है.

टोहाना का वह सरकारी स्कूल इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण था कि वहाँ के हेड मास्टर श्री नागपाल स्कूल में कई प्रकार के धार्मिक कार्यक्रम कराते रहते थे. टोहाना में जैनियों की अच्छी संख्या थी. जैन साध्वियाँ वहाँ आती थीं. उनकी मीठी वाणी और शुद्ध हिंदी बहुत आकर्षित करती थी - ‘मैं विद्यार्थिनी होने के नाते यहाँ आई हूँ’. योग सिखाने वाले आते थे. कई तरह के साधु आते थे. उनमें से कइयों के मुकाबले मैं योगासन अधिक सहज तरीके से कर लेता था. एक बार काली और लंबी दाढ़ी वाला एक भगवा वेषधारी साधु आया जिसकी हमारे अंग्रेज़ी के तेज़ तर्रार मास्टर श्री चेतराम जी से अंग्रेज़ी में बहस (झड़प कहना भी ठीक होगा) हो गई. चेतराम जी बहुत फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलते थे इसलिए हम हिंदी स्कूल के बच्चे उनकी अंग्रेज़ी समझ नहीं पाए. लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज से यह समझ आ रहा था कि वे उस साधु पर बहुत आक्रामक थे और साधु के पास कोई जवाब न होने से उसके चेहरे का रंग फीका पड़ता जा रहा था. हमें लगा कि साधु में दम नहीं है. उसी दिन शाम को एक मंदिर में हरमिलापी जी महाराज का सत्संग था जहाँ मैं उत्सुकतावश अकेले ही चला गया. मैं काफी आगे जा कर बैठा. हरमिलापी जी के सत्संग के दौरान अचानक कुछ हलचल हुई, लोगों के मुँह से वाओ जैसी आवाज़ निकली और हरमिलापी जी ने प्रसन्न हो कर किसी के लिए आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया. जिधर उनका हाथ उठा था मैंने उधर पीछे मुड़ कर देखा तो महिलाओं और पुरुषों के बीच बने रास्ते में एक साधु हाथ जोड़ कर खड़ा था. वो वही साधु था जो दिन में मास्टर चेतराम जी के वचनों से हत्प्रभ हो चुका था. मेरा मन पशोपेश में पड़ गया. जो साधु हमारे टीचर का सामना नहीं कर सका था वो यहाँ सम्मानित हो रहा था. यहाँ शिक्षा के महत्व को मैं रेखांकित कर रहा हूँ. कहने का सार यह कि हरमिलापी जी महाराज और उस साधु की उपस्थिति को भव्य बनाता वातावरण वहाँ था और मेरे मन में मास्टर चेतराम जी भी उपस्थित थे.

टोहाना के उस स्कूल में पढ़ते समय एक वायलिन जैसा वाद्य यंत्र बजाने वाला कलाकार दो बार आया था. वो राष्ट्रगान को ठीक 52 सेकेंड में बजाता था. आखिर में उसका एक प्रिय भजन होता था जिसके बोल थे- ‘जब तेरी डोली निकाली जाएगी, बिन मुहूरत के उठा ली जाएगी’. उसके गाने का स्टाइल मन में वैराग्य भरता था. इन्हीं दिनों पिता जी अपने समय के महान योगी स्वामी व्यास देव उर्फ़ स्वामी योगेश्वरानंद सरस्वती 1008 जिन्हें बाद में भावसमाधि के अभ्यास के कारण परमहंस भी कहा गया था, उनकी तीन बृह्दाकार पुस्तकें लाए- ‘बहिरंग-योग’, ‘आत्म-विज्ञान’ और ‘ब्रह्म-विज्ञान’. ‘बहिरंग-योग’ में यम, नियम, आसन,  प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को जिस भाषा में उन्होंने समझाया था वह कठिन नहीं थी. ‘आत्म-विज्ञान’ और ‘ब्रह्म-विज्ञान’ समझने की कोशिश की लेकिन उनकी भाषा और उसका अर्थ मेरी पहुँच से बाहर था. लेकिन ‘बहिरंग-योग’ के प्रभावाधीन मैं योग और आंतरिक अभ्यास की ओर प्रवृत्त हुआ. तब मैं सातवीं कक्षा में था. किशोरावस्था आ चुकी थी. इस आयु में सेक्स सहित मन के विभिन्न निकायों (विचारों कह लीजिए) का विकास हो रहा होता है. समाधि में साधन के समय जिस प्रकार के हमारे विचार-वृत्तियाँ होती हैं उन्हें बल मिल जाता है. इससे मुझे आगे चल कर कुछ हानि उठानी पड़ी और फ़ायदा भी हुआ. कालेज के दिनों में एक अवसर पर चंडीगढ़ में स्वामी योगेश्वरानंद जी के शिविर में उनसे मिलने का अवसर मिला. इस शिविर का आयोजन उस समय चंडीगढ़ के एसपी रहे श्री भनोट ने किया था. योगेश्वरानंद जी ने प्राणायाम और आंतरिक साधनों के बारे में कुछ अनुदेश दिए. अगले दिन लाला लाजपतराय भवन, सैक्टर 15 में उनका व्याख्यान सुना. योगियों की दृढ़ इच्छा शक्ति के उन्होंने उदाहरण दिए. बाकी अब याद नहीं. उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था. अच्छा स्वास्थ्य धर्म का महत्वपूर्ण अंग है.

फिर से टोहाना लौटता हूँ जहाँ से एक अन्य रास्ता निकला जब पिता जी स्वामी योगेश्वरानंद जी की पुस्तकें तो लाए ही थे साथ ही उन दिनों किन्हीं साधुओं के बताने पर वे उच्च आध्यात्मिक शिक्षा के लिए होशियारपुर के बाबा फकीर चंद के संपर्क में आए या कहना चाहिए कि चले गए और उनके हो रहे. फकीर चंद जी की फोटो हमारे घर में विराजमान हो गई. 1966 में पिता जी ने मुझे चंडीगढ़ में मेरे बड़े भाई के पास छोड़ा जहाँ मेरा दाखिला डीएवी कालेज में हुआ. वहाँ धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत ‘सत्यार्थप्रकाश’ नामक पुस्तक पढ़ाई जाती थी. सत्यार्थप्रकाश में आर्यसमाज के नियम दिए गए थे. अन्य कई संस्थाएँ जो किसी धर्म का प्रचार करती हैं उनके साहित्य में संस्था या धर्म के नियम लिखे रहते हैं. नियम से तात्पर्य एक विशेष अनुशासन से होता है जो उस संस्था के संपर्क में आने वाले के लिए प्रस्तावित होता है. वो चाहे तो संस्था के साथ निबाहने के लिए उन्हें माने. मेरे सामने कई अन्य संस्थाओं के नियम आए. उनमें से कई नियम ऐसे भी होते हैं जो आपको कुछ सिखाने की बजाय आपके व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं. कुछ नियम आपको मानसिक गुलाम, यहाँ तक कि जोकर बना देने की क्षमता रखते हैं. कहते हैं कि धर्म में पैदा होना अच्छी बात है लेकिन धर्म में ही मर जाना बुरी बात. इसका अर्थ साधारणतः यह है कि वो धर्म अच्छा जो बंदे को ज़िंदगी जीने और तरक्की का रास्ता दिखाने के बाद बंदे को उसकी आज़ादी वापस कर दे ताकि वो परिवर्तनशील दुनिया के साथ चलता रह सके.

भाई साहब ने डेरा ब्यास के बाबा चरण सिंह जी से नामदान लिया हुआ था और उनके कायल थे. मैंने बाबा जी के दो-एक सत्संग सुने हुए हैं. भाई साहब समाधि भी लगाते थे. भिवानी से रिटायर होने के बाद पिता जी चंडीगढ़ में अपने घर न आ कर सीधे होशियारपुर में बाबा फकीर के आश्रम में चले गए जहाँ उन्होंने अपना एक कमरा और रसोई बनवा ली थी. बड़े भाई साहब ही मुझे पहले पहल होशियारपुर के उस आश्रम में ले गए थे और मैंने फकीर चंद जी को देखा और उनके कुछ सत्संग सुने जो आसान और बोलचाल की भाषा में थे. फकीर चंद जी उत्साह देने वाली बातें करते थे. रियारमेंट के बाद पिता जी का सादगी भरा जीवन वहाँ आश्रम में देखा. उसके बाद तो हर साल मैं गर्मियों की छुट्टियों में दो-दो महीने के लिए उस आश्रम (मानवता-मंदिर) में जाता रहा और फकीर चंद जी के काफी सत्संग बहुत चाव और लगन से सुने. फकीर चंद जी ने अपने सत्संगियों को हिदायत दी थी कि उनकी अनुपस्थिति में वे भगत मुंशी राम के साथ बैठ कर साधन-अभ्यास किया करें. ज़ाहिर है कि पिता जी आंतरिक अभ्यास के बहुत अनुभवी थे. फकीर चंद जी ने मुझे सुमिरन और ध्यान करने के निर्देश दिए. बाद में आगे चल कर पिता जी ने बहुत ऊँची समाधि की ओर न जाने के लिए कहा.

चंडीगढ़ में कालेज के दिनों में अपने जीजा जी (श्री सत्यव्रत शास्त्री) के संपर्क में भी कई साल रहा जो आर्यसमाजी थे और पुरोहिताई का कार्य भी करते थे. सैक्टर-22 की आर्यसमाज में स्वामी अग्निवेश के आठ-दस दिनों के एक शिविर में मैंने हिस्सा लिया. तब स्वामी अग्निवेश आर्यसमाज के लिए बहुत काम कर रहे थे. आज मैं स्वामी अग्निवेश को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जानता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ. वे कई नामी-गिरामी भगवाधारी लोगों के मुकाबले बेहतर कार्य कर रहे हैं. बंधुआ मज़दूरों की मुक्ति के क्षेत्र में उनका कार्य उन्हें कई भगवा धारियों से अलग और ऊँची जगह देता है. समाज-सेवा धर्म का अभिन्न अंग है.

चंडीगढ़ में रहते हुए कुछ साल मैं आर्यसमाज और बाबा फकीर चंद के बीच झूलता रहा. चूँकि पिता जी का झुकाव फकीर चंद की ओर था इसलिए मैं भी वैचारिक रूप से उधर झुकता चला गया. यहाँ फकीर चंद जी के बारे में वो विशेष बात बता देना चाहता हूँ जो उनकी अपनी ज़बान से सुन रखी है. फकीर चंद जी जाति के ब्राह्मण थे. एक दृष्य के द्वारा उनकी भेंट अपने गुरु से हुई जो जाति के कायस्थ थे और राधास्वामी संत्संग आगरा के सत्संगी रह चुके थे. फकीर चंद जी के होशियारपुर सेंटर (मानवतामंदिर) को ब्राह्मणों का केंद्र माना जाता था. यहाँ अभिवादन के तौर पर ‘राधास्वामी’ कहने की परंपरा थी. फकीर चंद जी के सत्संग इस मायने में महत्वपूर्ण थे कि उनके व्याख्यानों में एक बात बार-बार बहुत साफ़ कही जाती थी कि “जब मुझे मालूम हुआ कि मेरा रूप लोगों में प्रकट हो जाता है और वो मैं नहीं होता, इस बात ने मेरे जीवन का तख़्ता बदल दिया”. मैं अक्सर सोचा करता था कि मुहावरा तो तख़्ता पलट दिया होता है तो फकीर चंद जी तख़्ता बदल दिया क्यों कहते हैं. बाद में समझ आया कि तख़्ते से उनका तात्पर्य ‘बैनर’ से था. हज़ारों बार मेरे कानों ने वो बात सुनी और वो चित्त में बैठती चली गई. इसका अंतिम परिणाम यह निकला कि जब भी कहीं पढ़ता-सुनता कि किसी के यहाँ कोई रूप, मूर्ति या चीज़ प्रकट हुई है तो मैं समझ जाता था कि या तो कहीं मन का खेल (प्रोजेक्शन) हुआ है या फिर किसी इंसान ने ही कोई नया जाल बिछाया है.

मुंबई में नौकरी के दौरान मेरे एक मित्र अब्दुल हमीद ख़ान मुझे ब्रह्मकुमारियों के केंद्र में ले गए जहाँ मैंने कुछ दिन का एक पाठ्यक्रम (कोर्स)-सा किया. वहाँ मन (विचारों) के प्रबंधन के तौर-तरीके सिखाए गए. जिन्हें मैं उपयोगी मानता हूँ. विचार-प्रबंधन के वो तरीके दरअसल मैं कुछ मैनेजमेंट प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान जान चुका था. एक मैनेजमेंट गुरु ने कहा था कि आपकी जो भी इच्छा हो या जो भी आप करना या बनना चाहते हों उसका एक 3डी चित्र अपने मन में बना कर रखें. इसे फकीर चंद जी ऐसे समझाते थे, "जो भी तुम को माँगना हो उसकी फोटो बना कर अपनी खोपड़ी में रखो". बात एक ही थी. बहरहाल मैंने बीके (ब्रह्मकुमार) का कोर्स तो अटैंड कर ही लिया था.

ऊपर की बातों से ज़ाहिर है कि मेरे धार्मिक मन को अधिकतर बाबा फकीर पर ठहरने का मौका मिला. यह चांस की बात रही. वरना मन पर धार्मिक संस्कार तो कई प्रकार के थे. मेरा उद्देश्य यहाँ अपनी धार्मिक यात्रा को समझना है. फकीर को मैं आज भी याद करता हूँ. वे इतने खुले थे कि उनकी खूबियों और कमियों को भी गिना जा सकता है. डेविड सी. लेन के डिस्कशन ग्रुप में बहुत विस्तार से उनका उल्लेख आ चुका है. सिर्फ इतना जानना काफी है कि फकीर का बार-बार यह कहना कि ‘मैं किसी के अंतर नहीं जाता’ मेरे दिमाग़ में घर कर गया और उसने मेरे धार्मिक जीवन को रोशन और समतल कर दिया. कोई और मेरे मन के मैदान में चोरी से घुस नहीं सका. नो चांस.

फकीर चंद जी के निधन के बाद मुंशीराम जी चंडीगढ़ में अपने घर आ गए. उनके दैनिक कार्यक्रम नियमित रूप से चलते थे. लगभग आठ साल उनकी सेवा करने का अवसर मुझे मिला फिर नौकरी के सिलसिले में मुझे चंडीगढ़ से बाहर जाना पड़ा. इस दौरान उनसे बहुत कुछ जानने-सीखने को मिला. एक विशेष उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ. श्री मुंशीराम जी आंतरिक अभ्यास और समाधियों के बहुत अनुभवी थे. कई लोग उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे. एक बार मैंने उनसे पूछ लिया कि सबसे बढ़िया समाधि कैसी होती है तो उन्होंने कहा कि जब हम ऑफिस में काम करते हुए किसी समस्या को सुलझाने में लगे होते हैं और मन उसमें पूरी तरह लगा होता है तो जिस हालत में उस समस्या का समाधान मिल जाता है वही सबसे बढ़िया समाधि होती है. यह बात मैंने गाँठ बाँध ली और कभी ऊँची समाधियों के चक्कर में नहीं पड़ा. मन लगा कर कोई कार्य करने से बेहतर और कौन-सी समाधि हो सकती है.
    
अब 69 साल का होने वाला हूँ. धर्म की बातें सुन-सुन कर पक चुका हूँ. लेकिन चौकन्ना रहता हूँ. पिछले दिनों मैं एक मित्र से मिलने जालंधर गया तो वहाँ डॉ. आंबेडकर भवन में लगी बुद्ध की मूर्ति के सामने उनके साथ ग्रुप फोटो खिंचवाई और उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया. एक रिश्तेदार ने वो फोटो देखी और पूछा कि बौध हो गए हो क्या? उसकी आवाज़ में एक व्यंग था जिसे मैं जड़ तक समझता हूँ. उसी प्रसंग में कई बातें याद हो आईं. हमारे पूर्वजों को मंदिरों में घुसने की मनाही थी. पुरोहित वर्ग हमारी जातियों से दूर ही रहता था. सोचता हूँ तब हमारे पूर्वजों को धार्मिक शिक्षा कहाँ से मिलती थी? उनका सादगी और प्रेम भरा निश्छल व्यवहार किससे प्रेरित था? यम और नियमों की गढ़त से निखरा उनका सामाजिक व्यवहार किसका ऋणी था? मेरे माता-पिता, संबंधी-मित्र मुझे कई धार्मिक स्थानों पर ले कर गए लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैंने वहाँ से कुछ महत्व का सीखा. अधिकतर धार्मिक स्थान एक प्रोपेगंडा के सहारे चलते हैं. उनके साथ कुछ चमत्कारों की कहानियाँ जोड़ दी गई होती हैं. कुल मिला कर एक प्रकार का व्यवसाय उन स्थानों पर चलता है. अपने जीवन के लिए महत्व का जो सीखा वो या तो माँ ने बचपन में अपने प्यार-दुलार से सिखाया या आगे चल कर स्वामी योगेश्वरानंद के साहित्य और कुछ बाबा फकीर की संगत से सीखा. फकीर ने तो हिदायत कर दी थी कि तुम जवान हो, खूब पढ़ो और बढ़ो. उस समय की मेरी आयु और ज़रूरतों को भगती की आवश्यकता नहीं थी. मैंने जीवन में बहुत पढ़ा, बहुत सीखा. उससे लाभ मिला.

आगे के जीवन में और अधिक अध्ययन करने के बाद यह जाना कि जीवन की गढ़त करने वाले यम-नियम तो धम्मपद में उल्लिखित हैं और उनका व्यवहारिक ज्ञान बचपन में मेरी साक्षर-भर माँ मुझे पहले ही दे चुकी थी. मैं कुत्ते को मारने जाता तो वो कहती, "ना...कुत्ते को नहीं मारना". माँ धम्मपद के बारे में कुछ भी जानती थी ऐसा उसकी ममत्व भरी वाणी से कभी नहीं सुना. आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि ‘बहिरंग-योग’ (अष्टांगयोग) से माँ के दिए ज्ञान की पुष्टि मात्र हुई थी. माँ को वो सब किसने सिखाया? यह सहज सवाल है. मुझे नहीं लगता कि माँ का अपना कोई सर्कल अपने समाज से बाहर किसी अन्य धार्मिक समूह में था. मोहल्लों की कीर्तन मंडलियों की मैं बात नहीं करता जो मोहल्ला पोलिटिक्स का निर्माण करती हैं. मेरा मानना है कि माँ को वो सब उस सामाजिक-धार्मिक परंपरा से प्राप्त हुआ था जिसकी जड़ें देश की उस सभ्यता में हैं जिसे आजकल बौध-सभ्यता कहा जाता है. इंसानों और पशु-पक्षियों के प्रति करुणा और सेवा का पाठ माँ ने पढ़ाया. उधर फकीर चंद जी की संगत से मैंने जाना कि मन में किसी का रूप प्रकट होना धार्मिक लूट का मुख्य आधार है. जब इतना हो गया तो फिर मूर्ति पूजा या उससे संबंधित अन्य प्रकार के धार्मिक क्रियाकलापों से मेरा संबंध टूटना तय था. धार्मिक लूट से बचा रहा यह बड़ी बात रही. यानि प्रत्यक्ष में मेरा नास्तिक-जैसा हो जाना कुदरती था. मेरी बनावट कुछ ऐसी हो चुकी थी. फकीर चंद जी के गुरु शिवब्रतलाल जी उन्हें कहते थे कि पिछले जन्म में मैं बुद्ध था और तुम भिक्षु आनंद थे. उनकी इस बात को मैं धम्म प्रवाह की कथा के रूप में सुनता हूँ. डेविड सी. लेन ने फकीर चंद जी की रेखांकित शिक्षाओं में एक तिब्बतन भिक्षु को देख लिया था.

माँ की उँगली पकड़ कर शुरू हुई धार्मिक यात्रा का परिणाम यह रहा कि धार्मिक भटकनों से मैं बचा रहा. धार्मिक सोच मुझे फिर से माँ तक ले आती है जिसने बचपन में मुझे बाहर से थपेड़ कर भीतर से मज़बूत किया. वो कभी किसी आडंबर में नहीं पड़ी. इस प्रक्रिया में मैं अकेला नहीं था और माँ भी अकेली नहीं थी. उसके साथ उसके जैसी लाखों अनपढ़ या साक्षर-भर मेघ माताएँ और मेघ बच्चे थे और करोड़ों हो चुके हैं जिन्होंने अपनी सभ्यता को बिना किसी कर्म-कांड के प्रेमपूर्वक संजोए रखा है. मुझे कुछ अलग बनने की ज़रूरत महसूस नहीं होती. मैं एक तरह का धर्मरहित धार्मिक बंदा बन चुका हूँ जो पुनर्जन्म के विचार तक से मुक्त है.

आज इतना भर जानता हूँ कि माँ का बनाया हुआ रास्ता मुझे हर जगह उठाए फिरा, आज भी उठाए फिरता है.



24 June 2019

Jat Dharma and Megh Dharma - जाटधर्म और मेघधर्म

जाट समुदाय में सक्रिय राजनीतिक संगठन ‘यूनियनिस्ट मिशन’ के अग्रणी श्री राकेश सांगवान से कई मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है. जाट समुदाय के लोग अपने आत्मविश्वासी स्वभाव के कारण पहचाने जाते हैं. जहाँ तक शिक्षा और जानकारी का सवाल है वे कुल मिला कर अभी तीसरी पीढ़ी तक आए हैं जो शिक्षित है. जाति व्यवस्था के आखिरी पायदानों पर खड़े अन्य समुदायों की तरह वे सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों में संघर्षरत हैं. हरयाणा जैसे राज्य में वे सत्ता का स्वाद चख कर उसे खो चुके हैं इसलिए उनमें अधिक बेचैनी है. उन्होंने जो खोया है वो बेशकीमती था. ख़ैर.
Rakesh Sangwan राकेश सांगवान
राकेश सांगवान जी ने पाखंड के खिलाफ काफी मुखर हो कर लिखा है जिसका विरोध उनके ही बीरदारी भाइयों ने उन्हें नास्तिक कह कर किया. संभवतः इसी वजह से राकेश जी ने मंशा जताई कि वे आने वाले साल में धन्ना भगत की जयंती पर सिख धर्म अपना लेंगे ताकि कोई उन्हें नास्तिक न कह सके. जाटों के लिए सिखी अनजानी चीज़ नहीं है. जाटों ने सिखी का जी-जान से निर्वाह किया है और वे ख़ुद भी सिखी की जान हैं. उनकी दलील है कि सिखी मीरी-पीरी और पाखंड रहित किरत पर आधारित है जिसे अध्यात्म कहा जाता है. उनकी पोस्ट पढ़ कर मेरे मन में कई विचार कौंधने लगे जिसे कमेंट के तौर पर उन्हें भेजा है. उसी कमेंट को अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ :- “
आपकी यह पोस्ट पढ़ने के बाद कई बातें याद हो आईं. खुशवंत सिंह ने कहीं कहा है कि सिखी का मतलब जाट ही है (उनके ओरिजिनल शब्द याद नहीं लेकिन अर्थ यही था.)
आपकी पोस्टों पर कई लोग आपको नास्तिक कहते रहे हैं. नास्तिक या तर्कशील होना कोई अवगुण या गाली नहीं है. जो लोग इस शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं वास्तव में वे धर्म की अवधारणा (कंसेप्ट) को लेकर भ्रम में है. आदमी धर्म की शरण में नहीं जाता बल्कि वो धर्म यानी किसी आचार-व्यवहार, गुण और विचार को ओढ़ता है. उस ओढ़ने को धर्म कह दिया जाता है. कोई बता रहा था कि ‘धर्म’ की अवधारणा ‘धम्म’ की अवधारणा से अलग है. फिर आपकी यह बात सही है कि धर्म-धर्म खेलना है तो धर्म पकड़ना ही पड़ेगा. एक घुंडी यह है कि यदि कोई कहता है कि वो किसी खास धर्म में जा रहा है तो प्रतिक्रिया बड़ी होती है. यदि वो कहता है कि मेरी गुरु नानक या गुरु गोविंद सिंह या खालसा पंथ में आस्था है तो प्रतिक्रिया की प्रकृति (narrative कह सकते हैं) बदल जाती है. आप की पोस्ट पर कई लोगों ने कमेंट करके जाटधर्म का उल्लेख किया है. एक सज्जन ने कहा है कि जाटधर्म, बौद्धधर्म और सिखधर्म में कोई अंतर नहीं है. सिखिज़्म के लिए ‘सिखी’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जो बहुत सटीक है. जीवन शैली के संदर्भ में मुझे सिखी और जाटिज़्म को एक समझने में कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जब सरकारी फॉर्म में धर्म लिखने की बात आती है तो जाटधर्म या जाटिज़्म शब्द के सरकारी संदर्भ कहीं नहीं मिलते. जाहिर है कि जाटों के इतिहास में जाटधर्म ना तो परिभाषित है और ना स्थापित. उसे जैसे-तैसे परंपरागत हिंदू शब्द के अर्थ में फिट किया गया है. बुद्धिज्म के साथ भी यही हुआ लेकिन नवबौधों ने और सिखों ने अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाने की प्रभावी कोशिशें की हैं जो जारी हैं. क्या दलित भी जाटधर्म में आते हैं? मेरा मानना है कि आते हैं क्योंकि इन सभी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बौधमत है. एक धर्म से दूसरे धर्म में ‘भागने’ का जहां तक सवाल है यह सवाल उन लोगों की सोच से पैदा होता है जिनके दिल में धर्म नाम की चीज का डर इतना बैठा दिया गया है कि ‘धर्म बदलने’ के नाम से ही उनकी धमनियों का चलता रक्त रुकने लगता है. बिना जाने कि धर्म डरने की नहीं बल्कि धारण करने की चीज है. यदि हम धर्म को प्रेत बना लेंगे तो वह पक्का पीछे पड़ेगा वरना धर्म का काम नहीं कि वो इंसान के पीछे पड़े बल्कि यह इंसान का काम है कि वो किसी इंसानी गुण का पीछा करे और उस धर्म को धारण कर ले. सिखी की विशेषता यह है कि वो स्थापित है - समाज में भी, धार्मिक क्षेत्र में भी और राजनीति में भी.” यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मैंने इस मुद्दे को महत्व क्यों दिया है. पहली बात यह कि कुछ मेघ सिखी में हैं. दूसरे, धर्म को लेकर मेघों की नई पीढ़ी में बेचैनी और उलझन है. तीसरे, पढ़ी-लिखी पीढ़ी परंपरागत धर्म पर कड़े सवाल ज़ोर से उठाने लगी है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर और अन्यथा भी ‘मेघ धर्म’ और ‘मेघ मानवता धर्म’ पर चर्चाएँ होती रही हैं. हो सकता है अन्य जातियों में भी अपने धर्म की पहचान करने की प्रवृत्ति हो. इन जानकारियों का मुझ पर असर हुआ है. इसलिए यह सब लिख डाला.

26 January 2018

Save the Constitution - संविधान बचाइए

31 जनवरी 2017 को मैने एक पोस्ट मेघ मानवता धर्म और संविधान धर्म पर की थी जो मेरे मित्र श्री जी.एल. भगत द्वारा लिखी गई एक पुस्तक के आधार पर थी. मेरे लिए वह एक नई अवधारणा थी जिसे समझने के लिए मुझे अपने अल्पज्ञान के साथ जूझना पड़ा. उसका एक कारण यह भी था कि जो मूल पुस्तक मुझे पढ़ने को मिली वो अंग्रेजी में थी और अंग्रेजी में मेरी अपनी सीमाएं हैं. इसका मुझे अफ़सोस रहेगा.

इन दिनों फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर करणी सेना के उत्पाती आंदोलन को सोशल मीडिया ने आड़े हाथों लिया है. इस हुड़दंगबाज़ी ने देश के उन बुद्धिजीवी नागरिकों को विचलित और उद्वेलित किया है जो संविधान में आस्था रखते हैं और संविधान की भावना को देश हित के लिए सर्वोपरि मानते हैं.

जब कभी संविधान और उसकी व्याख्या की बात आती है तो आपने भी देखा होगा कि रवीश के प्राइम टाइम में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा उपस्थित रहते हैं जो NALSAR, हैदराबाद के वाइस चांसलर हैं. धर्म और जाति के नाम पर यहाँ-वहाँ उत्पाती और हिंसक हो रहे युवाओं की बदइस्तेमाली पर भी प्राइम टाइम में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बेबाक़ राय दी है जो देखने लायक है. उनकी बातों से मुझे जी.एल. भगत की लिखी उक्त पुस्तक ‘कॉन्स्टिट्यूशनल सोशियो-कल्चर एंड इट्स कोड ऑफ ह्यूमन कंडक्ट (Constitutional Socio-Cultural and Its Code of Conduct’ की याद हो आई जिसे तब मैं सलीके से समझ नहीं पाया था.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने उन्हीं बात को हिंदी में बहुत खूबसूरत तरीके से समझाया और मैंने महसूस किया कि अब मैं पहले से अधिक जागरूक नागरिक हूँ. अब मैं सिविक रिलीजियन या संवैधानिक धर्म या संविधानवाद को समझ पा रहा हूँ. इसे देखने और समझने के लिए आप अपने जीवन के कुछ मिनट देंगे तो संविधानवाद के मायने समझ जाएँगे. बेहतर नागरिक बन जाएँगे. कार्यक्रमों का लिंक नीचे दिया है. 


08 October 2017

Were the Meghs Asuras? - क्या मेघ असुर थे?


अरे नहीं भाई, नहीं थे. वे हमारे आपके जैसे ही इंसान थे. वे वैसे बिलकुल नहीं थे जैसा आपने असुरों के बारे में कथा-कहानियों में पढ़ा-सुना है, या किताबों और कॉमिक्स में छपी तस्वीरों में देखा है. मेघ प्राणवान और शक्तिशाली थे इसमें कोई शक नहीं.
जब मैं छठी क्लास में गया तब 'दैनिक हिंदुस्तान' अखबार पढ़ने की आदत पड़ी. मेरे लिए 'दैनिक हिंदुस्तान' का अर्थ दुनिया से जुड़ाव, दुनिया को देखने की एक बड़ी खिड़की और एक भरी-पूरी संस्कृति था. साथ ही स्कूली सिलेबस, अन्य पुस्तकों और कॉमिक्स (पराग और चंदामामा) आदि के ज़रिए रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं की एक बाढ़ आई जिसका मेरे मन पर प्रभाव पड़ा. उनमें से सागर-मंथन की कहानी इतनी प्रभावशाली थी कि मैं मानने लगा कि मैं जो दुनिया में टिका हुआ हूं इसलिए टिका हुआ हूं क्योंकि मैं सुर या देवता था. अज्ञानता और मूढ़ता कुछ समय के लिए वरदान हो सकती है.
बड़ा होने पर पता चला कि मैं अनुसूचित जाति से हूं और कि मेरे पुरखों से छुआछूत होती रही थी. अब खटका सा होने लगा कि कुछ तो गड़बड़ है. मेरा सामाजिक स्टेटस वैसा नहीं है जैसा समझा था. स्कूल, कॉलेज पूरा हुआ और यूनिवर्सिटी का समय भी अज्ञानता और मूढ़ता में कट गया. नौकरी में आने के बाद एक प्रकार का कन्फ्यूज़न छा गया जब देखा कि दफ्तर में काम करने वाले अन्य लोगों का मेरे साथ व्यवहार ठीक-ठाक है लेकिन आरक्षण की बात उठते ही उनकी नजरों में अचानक कड़ुवाहट उभर आती है. उन दिनों ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं था लेकिन उन जातियों के लोगों के प्रति कइयों का व्यवहार आमतौर पर उतना सम्मानजनक नहीं था. सब से बुरी ख़बर तब मिली जब वर्ष 2010 और 2011 के दौरान मैंने कहीं पहली बार पढ़ा कि आज की अनुसूचित जातियों के लोगों को ही पौराणिक कथाओं में असुर या राक्षस कहा गया है. मेरे लिए यह एक तरह का झटका था जिसने मुझे सोच के एक अलग धरातल पर ला खड़ा किया. जब तक यह जानकारी लिखित और बड़े रूप में मुझ तक पहुँची तब तक मेरे जीवन के 60 साल निकल चुके थे और मैं एक पिछड़ा हुआ बच्चा था. ख़ैर, इस बीच यह भी पता चला कि भारत में एक आदिवासी (मूलनिवासी) असुर जाति है जो बंगाल, झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश में मिलती है.
हालाँकि कबीर, रविदास आदि संतों, ज्योतिबा फुले, पेरियार, अंबेडकर आदि बहुतों को पौराणिक हेराफेरी (फ़्रॉड) की जानकारी थी लेकिन मेरे परिवार और पुरखों को नहीं थी. न ही वैसी कोई जानकारी उनके ज़रिए मुझे मिल पाई. हमारा मेघ भगत परिवार था जो निपट भगत था. मूलनिवासी होने वाली बात बहुत देरी से पता चली. लेकिन उसकी डिटेल स्पष्ट नहीं थी. अपनी अधूरी जानकारी का प्रयोग मैंने कुछ जगह किया लेकिन उसके साथ यह उल्लेख ज़रूर किया कि पुराणों में असुरों और राक्षसों का वो चित्रण भारत के मूलनिवासियों का है जो जातिवादी घृणा से प्रेरित है. इधर सोशल मीडिया से पता चला कि मेरे समुदाय के कुछ लोगों ने यह बात फैला दी कि मैंने मेघों को असुर या राक्षस बताया है. यह सच नहीं था. अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी की भद्दी छवि बनाने का काम तो पौराणिकों और वैसी कहानियाँ लिखने वालों का था. सच यह भी है कि मुझे असुर शब्द की कम जानकारी थी. अन्य की तरह मैं मानता था कि जो 'सुर' (देवता) नहीं है वह 'असुर' है, उसके दांत बाहर को निकले हुए लंबे-लंबे होते हैं, उसके सिर पर सींग होते हैं, उसके नाखून बड़े-बड़े और उसकी नाक मोटी होती है, वो काला और मोटा होता है, उसके पैर की हड्डियाँ बेढब होती हैं, वो मनुष्यों को खा जाता है, भयानक दिखता है वगैरा. वैसे पढ़े-लिखे लोग जानते हैं कि पुराणों में किए गए ऐसे चित्रण के पीछे स्वार्थ भरी घृणा है.
वो 'असुर' वाला विषय मेरी पिछली पोस्ट ‘मुअन जो दाड़ो से मेलुख्ख तक’ के सिलसिले में फिर से उभरा जब एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में कहा कि - "Sir according respected RIGVEDA Vritra Was a asura ab iska matlab ki hum sab megh asur hain reply if possible" ('सर, सम्मानित वेदों के अनुसार वृत्र असुर था अब इसका मतलब कि हम मेघ असुर हैं. मुमकिन हो तो जवाब दें'). किस्मत अच्छी थी कि अभी हाल ही में 'असुर' शब्द के बारे में नई जानकारी मुझे मिली थी जिसके आधार पर उस पाठक को उत्तर दिया. लेकिन महसूस किया कि वो जानकारी मेघनेट पढ़ने वालों को एक ही बार में बेहतर तरीके से दे दी जाए.
कई मेघ किसी 'वृत्र', 'वृत्रासुर' (वृत्र+असुर), जिसे ऋग्वेद में 'प्रथम मेघ' (या मेघऋषि) भी कहा गया है, उसके होने या उसका वंशज होने में विश्वास नहीं रखते. वेरिगुड. उनको 'असुर' शब्द से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. जिनके लिए समस्या है वे इसे आगे पढ़ते रहें.
असुर का पुराना और सही अर्थ राक्षस जैसी छवि का नहीं है. वैदिक कोश में लिखा है कि असुर वो है जो असु (प्राण, जीवन) दे, जो प्राणवान हो. संस्कृत के विद्वान और डिक्शनरी लिखने वाले वी.एस. आप्टे ने 'असु' का अर्थ 'प्राण' किया है. वेद में इंद्र देवता को 'असुर' कहा गया है. कृष्ण को भी असुर कहा गया है. असुर में "अ" को उपसर्ग समझ लेने की वजह से एक ग़लतफ़हमी में 'सुर' शब्द पैदा हुआ है. हाँ, असु+र होगा. अ+सुर नहीं होगा. 'सुर' शब्द का कोई अपना अलग अस्तित्व नहीं था। (असली शब्द असु+र है न कि अ+सुर. ऐसा प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का कहना है.) असुर शब्द की भद्दी व्याख्याएँ वेदों की रचना के बाद लिखी गई हैं. वैसे यह कहना भी मुश्किल है कि पिछले 2000 या 1600 साल में वेदों में कितनी बार और कितने परिवर्तन किए गए हैं.
इस लिए इसे साफ़ तौर पर समझ लेना चाहिए कि अगर किसी भी अर्थ या संदर्भ में मेघों या किसी अन्य (असुर जनजाति सहित) के साथ 'असुर' शब्द आ जुड़ता है या जुड़ता हुआ प्रतीत होता है तो उसका अर्थ प्राणवान या शक्तिमान के अर्थ में लिया जाना चाहिए. 'बादल' के अर्थ में 'मेघ' शब्द का अर्थ धरती में जान-प्राण डालने वाला और 'जगत का प्राण' भी होता है. असुर शब्द के अर्थ से संबंधित प्रमाण नीचे दे दिए गए हैं.



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09 July 2017

History - Investigation and Notes / इतिहास - पड़ताल और नोट्स

Sh. R.L. Gottra
मैंने श्री आर.एल. गोत्रा जी को पहले पहल सोशल मीडिया से जाना फिर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला. वे सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और तीन चार साल बिजनेस में रहे. फिर बिजनेस छोड़ कर धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. वेद पढ़े, मनुस्मृति और गुरुइज़्म से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम, इसाईयत, सिखिज़्म और अन्य धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे कि धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. मत-मतांतरों की पृष्ठभूमि में क्या कुछ जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और उनकी सूचना के स्रोत और आधार क्या थे. उनकी मानसिकता क्या थी, उनका व्यक्तित्व कैसा था, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे.

धार्मिक पुस्तकों की राह से ग़ुज़र कर वे जहाँ पहुँचे वह तर्क का मुकाम था. यानि आंखें बंद करके कुछ भी मत मानो. देखो, जानो, पहचानों, पड़ताल करो, जाँचो फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की तैयारी करो ताकि आपको खुद की समझ से संतुष्टि रहे और आगे चल कर अपनी न्याय बुद्धि पर पछतावा न हो. सब से बढ़ कर यह कि इतनी सावधानी ज़रूर बरती जाए कि किसी पुस्तक या धार्मिक विचारधारा की मानसिक गुलामी को ख़ुद ही अपने कंधों पर न डाल लिया जाए.

देश में शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी को उन्होंने रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की टेक्नोलॉजी के संदर्भ में परखा है और भविष्य में बेरोज़गारी को लेकर जो कार्यनीति अपनाई जा सकती है उसके बारे में अपने विचार दिए हैं. राजनीतिक पार्टियों ने जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में गंदगी फैलाई है उसके तीन वाहकों का वे उल्लेख करते हैं - धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. उनका मानना है कि पार्टियों ने जानबूझ कर चुनावी प्रक्रिया में ये ख़ामियाँ पैदा की हैं.

इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है. उनके साथ हुई बात का विस्तृत ब्यौरा हिंदी में यहाँ उपलब्ध है जो स्वतंत्र अनुवाद है.

19 June 2017

The Profession and Religion - व्यवसाय और धर्म


इस पोस्ट का पॉडकास्ट यहाँ है.

किसी व्यक्ति की पहचान उसके पेशे से भी होती है. उसका पेशा बदल जाए तो भी कई बार उसकी पेशे पर आधारित पहचान नहीं बदलती. ऐसा इसलिए है कि हमारे समाज में पेशे को धर्म की तरह माना जाता है और धर्म नहीं बदलता (?). क्या वाक़ई?

कुछ भी कहिए अब यह विचार एक गलतफ़हमी का रूप लेने लगा है. संविधान बदला है, सरकारी नीतियाँ बदली हैं. लोगों के पेशे और धर्म भी बदले हैं. फिर इन दिनों एक बात लोगों में पहुँच गई है कि यदि पेशा एक धर्म है तो धर्म भी एक पेशा है. इससे सामाजिक सोच बदलती नज़र आ रही है.

भाईजान, पेशा खतरे में हो तो इंसान का वजूद तक ख़तरे में पड़ जाता है. लेकिन जब सरकारी नीतियाँ समाज के करोड़ों की जनसंख्या वाले वर्ग के पेशे को ख़तरे में डाल दें तो समाज में एक बैचैनी तो पनपेगी. पहले जुलाहों के पेशे को अंग्रेज़ सरकार की आर्थिक नीतियों ने तबाह किया जिसका मार्मिक वर्णन शशि थरूर ने अपनी पुस्तक ‘An Era of Darkness’ के संदर्भ में यह खुल कर किया है. थरूर ने बताया है कि किस तरह बुनकरों के अंगूठे ही काट डाले गए ताकि वे अपने पेशे में वापस न जा सकें. स्वतंत्र भारत में अंग्रेज़ों की औद्योगिक नीति जारी रही. नतीजा यह हुआ कि बुनकर जातियाँ के उत्पाद कारख़ानों में बने उत्पादों से होड़ नहीं कर सके. ग्रामीण जुलाहे टेरीलीन के रेशे की माँग करते रहे जो पूरी नहीं हुई. आज की स्थिति नहीं मालूम.

इधर मेघ भगतों की खड्डियाँ पूरी तरह तो नहीं रुकीं लेकिन डूबते हुए पेशे का दबाव उनकी ज़िंदगी के रेशे-रेशे पर भारी पड़ा. वैसे तो श्रमिक जातियाँ स्वभाविक ही एक जगह से उखड़ जाती हैं तो तुरत दूसरा पेशा अपना लेती हैं. जुलाहों ने जुलाहागीरी छोड़ी तो खेत मज़दूर बन गए, खेती का मौसम न हुआ तो ईंटें ढोने लगे, थोड़ा बहुत प्रशिक्षण लिया है तो कारख़ानों में कारीगर बन गए या वहीं सामान ढोने लगे. दुनिया भर का लेबर क्लास यही करती है.

मेघों ने जब-जब ‘मेघ-धर्म’ यानि पेशा बदला तब उन्होंने तरक्की के नए रास्ते ढूँढने में तत्परता दिखाई है. जम्मू से स्यालकोट आए तो उन्होंने कारख़ानों में कारीगरों के रूप में अपनी पहचान बनाई. नियमित आय आनी शुरू हुई तो तुरत अपने बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने ध्यान दिया. भारत विभाजन के बाद मेघों ने अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, मेरठ जैसे शहरों में पेशेवर कुशलता के साथ सर्जीकल और स्पोर्ट्स उद्योग में अपनी जगह बनाई. शिक्षित मेघ युवा अच्छी संख्या में बैंक, बीमा, चिकित्सा, प्रशासनिक सेवाओं में गए और अपनी प्रोफेशनल श्रेष्ठता साबित की. पिछले कई वर्षों से वे व्यापार के क्षेत्र में आ रहे हैं. उन्होंने अपने नए पेशे को धर्म की तरह अपनाया है. उनका व्यापार के क्षेत्र में आना महत्वपूर्ण है.


नई अर्थव्यवस्था की बेवकूफियों और सरकारी नीतियों के कारण लोगों को बच्चों की शिक्षा पर अब बहुत ज़्यादा ख़र्चा करना पड़ेगा. ग़रीब समुदायों के लिए यह और भारी होगा. वैश्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन) और शिक्षा के निजीकरण को आप ‘दो नागों’ का दोहरा हमला कह सकते हैं. अर्थव्यवस्था का तकाज़ा है कि उद्योग के लिए सस्ते मज़दूर चाहिएँ और सरकारी नीतियों की ड्यूटी है कि उस माँग को पूरा करें. अच्छे जीवन स्तर के लिए सस्ते मज़दूरों को शिक्षित-प्रशिक्षित और महँगे मज़दूरों से मुकाबला करना ही होगा. जो जीतेगा वही धरती पर जीवन का सुख भोगेगा.