"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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18 February 2021

Ladder of Caste - जाति की सीढ़ी

पिछले तीन वर्ष से मेरे एक परिचित हैं, श्री जतिंदर सिंह, हरियाणा से हैं. उनके नज़रिए से (मेरे भी) एक महत्वपूर्ण विषय को लेकर वे तीन बार चर्चा के लिए मेरे यहां आए हैं. वे जानना चाहते हैं कि क्या मेघ जाति को ओबीसी की सूची में रखने के लिए कुछ किया जा सकता है. विषय मेरी पसंद का है इस लिए चर्चा भी ख़ूब हुई.

उन्होंने मुझे इस बारे में ब्लॉग लिखने और कुछ लोगों से संपर्क करने के लिए कहा. मैंने किया ताकि इस विषय में कोई रास्ता दिखे. मैंने कुछ जानकारों से बात की. लोगों से शेयर किया, फ़ोन किए. अब इस विषय पर अपनी लगभग आखिरी बात रिकॉर्ड कर रहा हूं. 

आज किसी जाति को एक सूची से निकाल कर दूसरी में डलवाना आसान प्रक्रिया नहीं है. ओबीसी जातियों की पहचान का कार्य राज्य सरकारें करती हैं और अनुसूचित जातियों की पहचान का कार्य केंद्र सरकार का है. केंद्र में इनसे संबंधित विभिन्न आयोग भी बने हुए हैं. यदि कोई जाति समाज में बनी जातियों की सीढ़ी पर चढ़ना या उतरना चाहती है तो इस बाबत संसद में सवाल उठते हैं. श्री जतिंदर सिंह अक्सर यह पूछते हैं कि क्या हमारे आईएएस अधिकारी इस बारे में सहायता कर सकते हैं? शायद कुछ मदद कर सकें. लेकिन निर्णय राजनीतिक स्तर पर होता है.

विशेषकर उत्तरी पंजाब में बसी मेघ जाति के पास राजनीतिक प्रतिनिधित्व लगभग है ही नहीं. राजनीति में उनके कुछ सितारे लगता है जल्दी उभरेंगे. इसलिए वर्तमान सामाजिक स्थिति में फिलहाल रहना होगा. आगे क्या होगा वह राजनीति तय करेगी. बाकी सब अनुमान या हमारे परेशान मन के विषय हैं. व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर मेघ समुदाय उच्चतर सामाजिक स्टेटस का हक़दार है.

सॉरी जितेंद्र सिंह जी, राजनीति में मैं कमज़ोर बच्चा हूँ.


25 January 2021

Bhakt and Bhagat - भक्त और भगत

    ऐतिहासिक (historical) सूचनाओं से स्पष्ट है कि पूरा भारत कभी बौद्धमय था. इस ऐतिहासिक प्रभाव से भारत का कोई धरा-खंड या समाज-खंड इससे अप्रभावित रहा होगा ऐसा सोचना कठिन हो जाता है. मेघ समाज भी इसके प्रभाव में रहा होगा इस बात को सहज ही समझा जा सकता है।

     समाज में यह विचार अक्सर चर्चा का विषय रहा है कि मेघ समाज को भगत कब से कहा जाने लगा. कुछ ने इसे भगत कबीर के साथ जोड़ा और किसी ने इसे 'भक्त' शब्द से बिगड़ कर बना मान लिया. किसी ने इसे आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण और लाला गंगाराम से जोड़ा. लेकिन क्योंकि यह विषय इतिहास और भाषा का है इसलिए भाषा विज्ञानियों की बात सुनना बेहतर होगा.

     प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जो इतिहास के भी अन्वेषक हैं, उन्होंने बताया है कि कबीर जब अपनी वाणी में 'साधो' कह कर संबोधित करते हैं तो उसका सीधा अर्थ होता है कि वे श्रमण परंपरा के साधु को संबोधित कर रहे हैं. जैसा कि पहले भी मैंने एक ब्लॉग में लिखा था कि कबीर बौध परंपरा के हैं. उसी बात में यह एक और प्रमाण जुड़ जाता है कि कबीर श्रमण परंपरा के ही हैं. साधु का अर्थ होता है 'जो सील संपन्न' हो. डॉ सिंह ने एक बात और कही है जो रुचिकर है. वे लिखते हैं कि कबीर 'भक्त' नहीं थे और कि 'भगत' शब्द श्रमण परंपरा का शब्द है जो 'भगवत' शब्द का संक्षिप्त रूप है. इसलिए कबीर निर्गुण परंपरा के नहीं बल्कि श्रमण परंपरा के 'भगत' हैं इसीलिए वे 'साधु' को संबोधित करते हैं.

     ज्ञान का कोई अंत नहीं जितना ले लिया जाए उतना कम प्रतीत होता है.

 


02 August 2019

Megh Organisations, Siwan (Kaithal) - मेघ संगठन, सीवन (कैथल)

पिछले दिनों सुनने में आया था कि भगत महासभा नामक संगठन ने पेहोवा, हरियाणा में समुदाय का सम्मेलन किया था. संगठन के तौर पर भगत महासभा का हरियाणा में यह पहला सम्मेलन था. उसी कार्यक्रम में फैसला किया गया कि अगला कार्यक्रम मेघ जन की बड़ी आबादी वाले शहर सीवन में 28-7-2019 को किया जाएगा.

समझ नहीं आता कि इसे इत्तेफाक कहा जाए या पहचानने की चूक कि 28 जुलाई 2019 को सीवन के जिस सम्मेलन में हम पहुंचे वह 'भगत महासभा' का था जिसमें इस सभा के ऑल इंडिया प्रेसिडेंट राजकुमार प्रोफेसर खुद मुख्य अतिथि थे. बैनर पर उस दिन की तारीख के साथ "आर्य (मेघ) सभा सीवन और मेघ महासम्मेलन" लिखा था. भगत महासभा की इकाई यहां सक्रिय थी जिसने यह कार्यक्रम आयोजित किया था. जो मेहरबान मुझे चंडीगढ़ से सीवन ले गए थे उनके साथ मैं सबसे अगली पंक्ति के कोने में बैठ गया. वहाँ से बिना रुकावट बने फोटो लिए जा सकते थे. थोड़ी देर के बाद भगत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार अपनी टीम के साथ आए जिसमें जम्मू, पंजाब, हरियाणा से कई और 1-2 राजस्थान से आए हुए सज्जन थे. उनके गले में हार थे और उन्होंने अगली कतार में बैठे हम सभी से प्रेम पूर्वक हाथ मिलाया. फिर उसके बाद हमें डिस्टर्ब किए बिना उनकी टीम के लिए सबसे आगे कुर्सियों की कतार लगाई गई. एक गणमान्य सज्जन ने मुझे भी आगे की कतार में आने के लिए कहा. मैंने मना किया. ('वहां गले में हार पड़ने का खतरा है,'' यह बात मैंने धीरे से अपने प्रिय मित्र ओमप्रकाश गडगाला जी के कान में कही थी. तब तक हमारे लिए "जाते थे जापान पहुँच गए चीन" जैसी स्थिति थी. 

कार्यक्रम शुरू होने पर अतिथियों का परिचय दिया गया तब स्पष्ट हो गया कि कार्यक्रम का आयोजन भगत महासभा की पेहोवा-सीवन की स्थानीय इकाई ने किया था. चंडीगढ़ से चल कर सीवन के ओम पैलेस में जा बैठने तक मुझे जिस आयोजक संस्था के आयोजन स्थल के पते के बारे में जो पता था उसका पता भी यही था (वेरी सॉरी कह रहा हूँ). यहां ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के कार्यकर्ता मौजूद थे. सब को एक साथ देख कर मुझे अच्छा ही लगा.

एक बात शुरू में कहता चलूं कि हॉल पूरा भरा हुआ था (लगभग तीन-चार सौ की केपेसिटी रही होगी). महिला सहभागियों का काफी संख्या में आना उत्साहवर्धक था. महिलाओं की सहभागिता और ज़्यादा होनी चाहिए. मंच पर केवल डायस और माइक था और मंच संचालक की कुर्सी थी. वक्ता लोग श्रोताओं के साथ या आगे की कतार में बैठे थे. नाश्ते और भोजन का भी अच्छा प्रबंध था.

भगत महासभा जम्मू में सक्रिय सामाजिक संगठन है. पंजाब में इसकी गतिविधियां समय-समय पर देखी गई हैं. वक्ताओं ने इस अवसर पर जो कहा उसका सार नीचे दिया गया है :-

मेघ समाज के लोग एक मज़बूत और निरंतर आगे बढ़ने वाले (डायनेमिक) संगठन और सक्रिय, गतिशील तथा परिणाम उन्मुख नेतृत्व की जरूरत महसूस करते हैं जो सारे मेघ समाज को (इस संदर्भ में जम्मू, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़) में वैचारिक और संगठनात्मक नेतृत्व दे सके. मेघ समाज विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों में बंटा हुआ है. जैसे मेघ, भगत, आर्य मेघ, आर्य भगत, कबीरपंथी, जुलाहा आदि. धर्म के नजरिए से मेघ आर्यसमाजी, कबीरपंथी, सिख, राधास्वामी, निरंकारी, सनातनी, डेरे, गद्दियां आदि में बँटे हुए दिखते हैं. वक्ताओं ने अपने समुदाय में शिक्षा के प्रसार के लिए और अधिक जोर देने के साथ-साथ धार्मिक नजरिए से बंटे-बिखरे दिख रहे समाज को सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस प्रकार जोड़े रखने की जरूरत पर बल दिया कि समाज अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के लिए हर हाल में इकट्ठा रहे. धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराएं जो समाज की एकता को खंडित करती हैं उसके बारे में समुदाय को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए ताकि अपेक्षित सियासी लाभ मिल सके. इस संदर्भ में एक वक्ता ने 'मेघ-धर्म' का भी उल्लेख किया जिसकी अवधारणा (कन्सेप्ट) की व्याख्या ज़रूरी है (इस बारे में सोशल मीडिया पर काफी बहस हो चुकी है.)

जो मेघ छात्र शहरों में पढ़ने जाते हैं उनके रहने की व्यवस्था के लिए धर्मशालाएं बनाने की बात उठी. लुधियाना में उपलब्ध ऐसी धर्मशाला का उदाहरण दिया गया. सीवन में किए जा रहे ऐसे प्रयास की जानकारी दी गई जिसका मामला काफी आगे तक पहुँचा हुआ है.

कुछ वक्ताओं ने बताया कि समाज के लोग अक्सर पूछते हैं कि 'मेघ कौन होते हैं'. कई वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से इसका उत्तर दिया. एक वक्ता ने कहा कि 3000 साल पहले हमारे मकान पक्के होते थे, आज बहुत से मकान कच्चे हैं. ऐसा क्यों और कैसे हुआ इसकी संक्षेप में जानकारी दी गई.

पूर्व एमएलए श्री बूटा सिंह ने कहा कि लगभग सभी सामाजिक संगठनों के संविधान में लिखा रहता है कि यह संगठन गैर-राजनीतिक है जबकि सच्चाई यह है कि बिना राजनीतिक (सरकारी) सहायता के समाज का विकास बेहतर तरीके से नहीं हो पाता. राजनीतिक पार्टियों के नाम पर समाज बंट जाता है. दरअसल किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट प्राप्त उम्मीदवार को सामाजिक संगठनों के समर्थन की जरूरत होती है और सामाजिक संगठनों की इसमें समुचित सहभागिता होनी चाहिए. (उनका इशारा इस ओर था कि सामाजिक संगठन अपने संविधान का उल्लंघन किए बिना भी सियासी माहौल बनाने और वोट मोबिलाइज़ करने का कार्य कर सकते हैं और प्रेशर ग्रुप (दबाव समूह) बन सकते हैं.)

जम्मू से आए एक प्रतिनिधि ने कहा कि संगठनों को अपने कार्य और कार्य प्रणाली में इतना मजबूत होना चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व को उनकी जरूरत महसूस हो. एक सुझाव यह था कि मेघ समाज के जम्मू, पंजाब और हरियाणा में बने सामाजिक संगठनों की एक कन्फेडरेशन बनाई जाए तो लाभ होगा.

भगत महासभा के अध्यक्ष श्री राजकुमार और ऑल इंडिया मेघ सभा के अध्यक्ष डॉ. सुरिंदर पाल, ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के अध्यक्ष राजिंदर सिंह तहसीलदार ने अपने-अपने संगठनों के बारे में विस्तृत जानकारी दी और मेघ समाज के लिए निरंतर कार्य करते रहने का संकल्प दोहराया.

प्रमुख प्रतिनिधियों की सूची इस प्रकार है :-
(सर्वश्री) बोध राज भगत (राष्ट्रीय उपाधयक्ष, भगत महासभा  जम्मू कश्मीर) पवन भगत (चेयरमैन), मोहिंदर भगत (प्रदेश अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर), तरसेम भगत (सहअध्यक्ष), सीता राम भगत, जय भगत, नरेश भगत, सुशील भगत, भगत महासभा पंजाब के प्रदेश अधयक्ष, राजेश भगत (राजू), प्रो रंजीत भगत, रमेश परम्मानन्द, मोहन लाल हैप्पी, सत पाल भगत, विनय भगत, कुलदीप भगत, दर्शन डोगरा, संतोख भगत, डॉ ध्यान सिंह भगत और भक्ष्य नंद भारती (राजस्थान). अंत में अलग-अलग राज्यों से आए मेघ समाज के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया और स्मृतिचिह्न भेंट किए गए. (इस अवसर पर कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई थी तथापि यह नामों की ऊपर दी गई सूची जम्मू से प्रकाशित न्यूज़ पोर्टल  www.earlyindianews.com से ली गई है जिसका लिंक यहाँ है.)












31 July 2019

A matter for consideration - मुद्दा तवज्जो के लिए

ख्यालों के जंगली घोड़ों को बाँधना नहीं चाहता. मुद्दा बार-बार किसी बहाने से सामने आ जाता है इस लिए यह नोट तैयार करके कुछ लोगों को विचारार्थ दिया है. बाकी समय बताएगा.

जब हमारे मेघ समाज के सबसे पहले शिक्षित हुए दो-एक लोगों मे से एक एडवोकेट हंसराज भगत और अन्य प्रबुद्ध जनों ने मेघ समुदाय को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न किए थे तब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से इस मायने में अलग थीं कि उस समय ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ की सूचियाँ बनाने की कोई बात नहीं हो रही थी. अपने समाज के लिए कुछ राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएँ  जुटाने के लिए हंसराज भगत के प्रयासों के बाद सर छोटूराम की सरकार का लिया गया फैसला उचित ही था कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन और सामाजिक व्यवस्था द्वारा सीमाओं में बाँधे गए मेघों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया. भूलना नहीं चाहिए कि मेघों के अत्यंत खराब आर्थिक और सामाजिक हालात का मुख्य कारण जम्मू में फैली प्लेग की महामारी और अकाल की स्थितियाँ भी रहीं. अंग्रेज़ों के शासन के दौरान औद्योगीकरण ने मेघों को भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर दिया. मेघ कृषक, कृषि श्रमिक और बुनकर रहे हैं.

मेघ कब से बुनकरी का कार्य कर रहे हैं इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि यह समाज कभी क्षत्रिय रहा है. ये प्रमाण पौराणिक कहानियों और इतिहास दोनों में मिल जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि मेघ कबीरपंथी भी हैं जो एक सामाजिक आंदोलन का प्रभाव है. हथकरघा (खड्डियों) का व्यवसाय बर्बाद हो जाने के बाद वे कई अन्य व्यवसायों में भी गए. मेघ कबीर की वाणी से जुड़े रहे हैं क्योंकि अपने व्यवसाय की झलक उन्हें कबीर की वाणी में मिलती थी. कई मेघ पंजाब के सेंसस रिकॉर्ड में कबीरपंथी के तौर पर दर्ज हैं.

यह सवाल मेघ (भगत, कबीरपंथी) समुदाय के लोगों के ज़ेहन में उठता रहा है कि क्या वे ओबीसी के लिए क्वालीफाई करते हैं विशेषकर कबीरपंथी नाम के तहत? कई शिक्षित मेघजनों यह मानते हैं कि यदि अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाते समय ओबीसी के वर्गीकरण का विकल्प उपलब्ध रहा होता तो एडवोकेट हंसराज भगत पंजाब की मेघ जाति को उसी में शामिल करने की सिफ़ारिश करते. लेकिन उन्होंने मेघों के अत्यधिक आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण उस समय अनुसूचित जातियों में उन्हें रखे जाने का विकल्प चुना जिसमें कुछ आर्थिक सुविधाएँ संभावित थीं.

उसके बाद के समय में मेघों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिला है और उनमें एक मध्यम वर्ग उभरा है. यह वर्ग अनुसूचित जाति का कहलाने से बहुत सकुचाता है लेकिन नौकरी या कोई अन्य लाभ पाने के लिए वो जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करता है. वो यह चाहता है कि किसी तरह ‘अनुसूचित जाति’ नाम की पहचान से पीछा छूटे. इस समान्यतः शिक्षित वर्ग में सामाजिक और राजनीतिक जागृति आई है. उनके परिवारों से अन्य जातियों में शादियाँ होती हैं. इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन जो इनके स्तर तक नहीं पहुँचे और जिनकी संख्या काफी अधिक है, उनका क्या? 

जो मेघ गाँवों में रह रहे हैं उनकी संख्या बड़ी है. उन्हें जाति का डंक अधिक झेलना पड़ता है. वे पर्याप्त रूप से जागरूक, शिक्षित और संगठित नहीं हैं. उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मज़बूत बुद्धिजीवी वर्ग नहीं मिलता. लेकिन कई शहरों में मेघों के छोटे-छोटे सामाजिक संगठन हैं जिन्हें उनकी बात करनी चाहिए. सोचा जाना चाहिए कि क्या वो अति पिछड़े हुए मेघ समाज के लोग आरक्षण का लाभ उठाने की हालत में हैं? ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक तरफ उनका शिक्षा का स्तर बहुत कम है और दूसरी तरफ़ सरकारी नौकरियाँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं. जो बचा-खुचा आरक्षण है उसके प्रावधानों को अदालतों के फैसलों ने इतना कमज़ोर कर दिया है कि वे कारगर नहीं रहे. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की बात अभी दूर की कौड़ी है.

तुलना करें तो पंजाब में अनुसूचित जातियों के लिए जो आरक्षण के प्रावधान हैं उनके तहत कुछ विशेष जातियों में एक विशेष अनुपात में वो आरक्षण बाँट दिया गया है. ओबीसी को प्रोमोशन में आरक्षण नहीं मिलता. दूसरी तरफ पिछले कई दशकों से कई हथकंडे अपना कर अनुसूचित जातियों के लिए प्रोमोशन के रास्ते बंद ही किए गए हैं. प्रोमोशन में आरक्षण से संबंधित उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू न होने देने के पीछे प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

भारत के कई राज्यों के बुनकर और कृषि श्रमिक समुदाय ओबीसी में शामिल हैं. (उनकी सूचियाँ एकत्रित की जा सकती हैं). यह एक आधार है जिस पर मेघ समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया जा सकता है. इससे पैदा होने वाले हालात में आरक्षण को लेकर कितना नफा-नुकसान होगा उसका सही आकलन तो नहीं किया सकता लेकिन सामाजिक स्टेटस में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है. जाति व्यवस्था में जिस स्थान को मेघ अपना समझते रहे हैं और जो उन्हें नहीं मिल पाया उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है? मेघ जाति क्या है यह बात देश के भीतरी भागों (गाँवों) के लोग नहीं जानते लेकिन यदि उन्हें बताया जाए कि मेघ अनुसूचित जाति में आते हैं तो मेघों को उन जातियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है जिनका हिस्सा वो हैं नहीं. गाँवों की यह स्थिति उनके मन में हीनता की भावना पैदा करती है. यदि मेघ जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो कई दुराग्रहपूर्ण स्थितियों से निजात मिल सकेगी.

एक बात और भी. हम अपनी मौजूदा हालत में अक़सर संतुष्ट हो चुके होते हैं. उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आहट से हम आशंकित हो उठते हैं. लेकिन जहाँ हम हैं वहाँ तो हैं ही, बस, उससे थोड़ा बेहतर हो जाए तो वो ज़रूर बेहतर ही होगा उसके लिए कोशिश होनी चाहिए.

कबीर के संदर्भ

पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए जिनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. जातिवाद को चुनौती देने वाले कई संतजन जान पर खेल गए. 

लगभग सभी ओबीसी जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) या शब्दों का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें जुलाहे, कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली आदि. इसी आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है. यानी कबीर को अब ओबीसी का प्रतिनिधि साहित्यकार कहा जाता है.

मेघ सदियों से कपड़ा बुनने का कार्य करते आ रहे हैं. वे कबीर की वाणी से इस आधार पर भी प्रभावित रहे हैं कि कबीर ने जो अध्यात्म की शिक्षा दी वो कपड़ा बनाने के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (शब्दों) के साथ भी थी.



विशेष नोट
मेघ समाज के लोग चाहे किसी भी नाम से अपनी पहचान रखते हों (जैसे मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा, आर्य, पंजाबी जाट आदि) लेकिन वे अनुसूचित जाति के तौर पर अपनी जातीय पहचान से हर तरह से असंतुष्ट हैं. वे ओबीसी के तौर पर अपनी पहचान को बेहतर पाएँगे ऐसा कई मेघजनों का मानना है. यह नोट कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद बनाया गया है जो समझते हैं कि मेघ समाज को ओबीसी में शामिल करने के लिए कोशिश अवश्य की जानी चाहिए. यह नोट केवल मेघ समाज के भीतर विचार-विमर्श के लिए तैयार किया गया है. - भारत भूषण, चंडीगढ़)


08 July 2019

Your narrative and your theme - आपका कथ्य और आपकी कथा

कुछ जगह ‘मेघ-इतिहास Megh History’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है. उसका आशय ‘मेघों का इतिहास’ रहा होगा ऐसा मैं मानता हूँ. ‘मेघ-इतिहास’ का दूसरा अर्थ ‘बड़ा इतिहास’ हो सकता है. यहाँ ‘‘आर्य-भक्त’’ या ‘आर्यों का भक्त’ वाली प्रयुक्ति याद हो आती है. यह समास पद्धति का कमाल है. इन शब्दों के बारे में यह किसी वैयाकरणिक (ग्रामेरियन) का नेरेटिव है. इस बारे में आपके मन में जो चल रहा है यदि उसे आप लिख देते हैं तो वो आपका नेरेटिव होगा. शब्द का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके विभिन्न प्रयोगों की कथा में उसका अर्थ क्या-क्या रहा है. शब्द का वो यात्रा वृत्तांत या ‘कथा’ किसी भाषाविज्ञानी का ‘नेरेटिव’ है. इस बारे में हर व्यक्ति का नेरेटिव अलग हो सकता है. यह तो बात हुई दो-तीन शब्दों के ‘नेरेटिव’ की. इसके आगे अब दूसरी कथा है.

पंजाब में 'आप' पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी डॉ. शिवदयाल माली ने गढ़ा, जालंधर की आर्य-समाज में सेमिनार का आयोजन किया था जिसमें अपनी बात रखने का मुझे भी मौका मिला. मेरा विषय था- ‘मेघों का पीछोकड़ (अतीत, इतिहास)’. इस विषय पर कहने के लिए काफी कुछ था लेकिन समय की पाबंदी थी, मैंने बात को सीमित रखा. ख़ासकर आर्य-समाज के साहित्य में मेघों के उल्लेख पर मैंने अपनी बात रखी.

मेघों में कहीं-कहीं एक अवधारणा बनी हुई है कि उनके इतिहास का उदय ‘आर्य-समाज’ के शुद्धिकरण आंदोलन के साथ होता है. इसकी वजह है. मेघों की शिक्षा का पहला प्रबंध ‘आर्य-समाज’ संस्था ने किया था जिसके साथ-साथ ‘आर्य-समाज’ ने उन्हें यह भी बताया-पढ़ाया कि मेघों का उद्धार ‘आर्य-समाज’ ने कैसे किया और उसके साथ कौन-सी सामाजिक और धार्मिक कड़ियां जुड़ती थीं. राजनीतिक कड़ियां तो थी ही नहीं और अगर थीं तो वे सवर्ण समाज से जुड़ी  थीं. आशय यह कि जो इतिहास मेघों को पढ़ाया गया वो उतना ही था जितना ‘आर्य-समाज’ ने अपने मिशन को गौरवान्वित करने के लिए लिखा और बताया. लेकिन दूसरी ओर ऐसे इतिहासकार भी हो चुके थे जिन्होंने मेघ (रेस) के ऐसे संदर्भ अपनी पुस्तकों में दिए थे जिनसे मेघों की उपस्थिति दो-अढाई हज़ार वर्ष पहले के इतिहास में नज़र आती थी. मेघों के बारे में आर्य-समाजियों का नेरेटिव अधिकतर ‘शुद्धीकरण’ की संकरी गली में आता-जाता रहा. उससे बाहर के मेघों की बात नहीं हुई. ‘सिंह सभा आंदोलन’ से जुड़ कर जो मेघ सिख बने ‘आर्य-समाज’ के नेरेटिव ने उनसे दूरी बनाए रखी.

‘आर्य-समाज’ द्वारा पढ़ाए गए इतिहास की परंपरा को बढ़ाते हुए मैंने प्रो. कस्तूरी लाल सोत्रा को देखा-सुना-पढ़ा है उनके अलावा कुछ अन्य बुजुर्ग भी इसी कथा के पक्षधर होंगे. इस बारे में मेरी रुचि रहेगी कि क्या उनमें से किसी ने कुछ लिखा भी है. सोत्रा जी ने यहां-वहां कुछ लिखा है. आजकल वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं.

मेघों के लोक-गायक रांझाराम के बारे में कहा जाता है कि वे ‘मेघों की कथा’ सुनाते थे और उस कथा को सिकंदर (Alexander The Great) से जोड़ते थे. कलाकार का अपना थीम होता है जिसे वो अपनी कथा में बताता है. रांझाराम क्या कथा कहते थे उसका कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. तो इस तान को यहीं तोड़ते हैं कि संभव है रांझाराम ने सिकंदर और पोरस (पुरु) की वे कथाएं जानी-सुनी हों जो हमें अन्य स्रोतों से अब मिली हैं. यहाँ जान लेना अच्छा होगा कि पोरस का पुरु के रूप में जो महाभारतीकरण और पौराणीकरण हुआ है वो एक अलग ही कथा है. किसी के लिए वो रोचक हो सकती है.

मेघों के बारे में एक कथा श्री आर.एल. गोत्रा जी की है जिसे उन्होंने दो शीर्षकों से लिखा है ‘Meghs of India’ और ‘Pre-historic Meghs’. इनमें वैदिक और ऐतिहासिक दोनों प्रकार के संदर्भ हैं. गोत्रा जी ने कई जगह स्पष्ट कर दिया है कि इतिहासिक संदर्भ अपनी पृष्ठभूमि के साथ अधिक उपयोगी होते हैं. पौराणिक संदर्भ बात को उलझा देते हैं ('पुराण' शब्द धोखेदार है. कुछ पुराण अंग्रेज़ों के शासन काल में लिखे गए. हो सकता है कुछ पुराण आज लिखे जा रहे हों. मतलब कि ज़रूरी नहीं कि पुराण बहुत पुराने हों). यदि अपने बारे में किसी ने खुद अपनी कही हो तो उसका अलग ही महत्व होता है. आपको और आपकी पृष्ठभूमि को आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. अपने बारे में अपना इमानदार लेखन आपका इतिवृत्त (इतिहास) होता है. आपके बारे में अन्य का लेखन उनकी आपके बारे में कम जानकारी के कारण पूर्वग्रह (prejudice) और पूर्वाग्रह (bias) से ग्रस्त और अधूरी समझ वाला हो सकता है. इस सब का परिणाम आपके बारे में एक ऐसी छवि का निर्माण हो सकता है जो आपका सत्य ना हो.

पिछले दिनों कर्नल तिलकराज जी ने बताया था कि किसी ने भार्गव कैंप (जिसे मैं कभी-कभी अनधिकारिक रूप से ‘मेघनगर’ कह देता हूं) में रहने वाले लोगों के बारे में किसी ने कहा है यहाँ रहने वाले लोग बहुत ‘सहनशील’ हैं. मैंने ख़ुद कहीं लिखा है कि ‘मेघ समाज कमोबेश एक संतुष्ट समाज है’. मेरे वैसा कहने के पीछे मेघ समाज के व्यापक जीवन के कई संदर्भ समेटने की एक कोशिश थी अन्यथा पूरा समाज संतुष्ट कैसे हो सकता है. लेकिन ‘सहनशील’ शब्द से मेरा माथा ठनका. इसे ठनकने की आदत है. कोई पूरा समुदाय ‘सहनशील’ कैसे हो सकता है? यह किसकी कथा है? है तो ऐसी क्यों है? मेघ समाज क्या समाज के रूप में कभी प्रतिक्रिया नहीं करता? क्या मेघों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि उनकी सहनशीलता (बरदाश्त) की ताकत जवाब दे गई हो?

‘सहनशील’ शब्द बहुत मुलायम, नाज़ुक और सौम्य अभिव्यक्ति है जिसमें किसी की शिक्षा, ग़रीबी, मूलभूत संसाधनों की कमी आदि से उठे क्रंदन को छिपाया जा सकता है. फिर भी लिखने वाले की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए. लेकिन जो लिखा गया है उसका व्यापक अध्ययन करके अपना नेरेटिव बताया जाना चाहिए.

कबीरपंथ के बैकड्रॉप में मेघों के बारे में डॉ. ध्यान सिंह का पीएचडी की डिग्री के लिए लिखा शोध-ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण है. यह मेघों से संबंधित कई कथाओं को ख़ुद में समेटे हुए है. प्रत्यक्षतः यह सबसे पहले डॉ. सिंह का है लेकिन मुख्य रूप से डॉ. सेवा सिंह का है जो शोध के कार्य में ध्यान सिंह जी के गाईड थे. ज़रूरी नहीं कि इसमें जो जिस तरह से लिखा गया है वो डॉ. ध्यान सिंह का ही हो. इसमें सेवा सिंह जी का नेरेटिव शामिल है. ग़ौर से देखें तो शोधकर्ता और गाईड में यदि मतभेद हो तो अधिकतर मामलों में शोधकर्ता को गाईड के आगे नतमस्तक होना पड़ता है. ख़ैर. इस शोधग्रंथ में पौराणिक कथाओं, आर्य-समाज आंदोलन, सिंह सभा आंदोलन, कबीरपंथी आंदोलन आदि के नेरेटिव से काफ़ी कुछ शामिल किया गया है. शोधग्रंथ के लिए प्रयुक्त पुस्तकों की सूची अकसर बहुत लंबी होती है तो यह मान कर चलना चाहिए कि उसमें अनेक नेरेटिव शामिल किए गए हैं. लेकिन सबसे रुचिकर यह है कि मेघों पर किए गए शोध का शीर्षक ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ ही क्यों रखा गया. क्या मेघों की कथा का संबंध कबीरपंथ से है? है तो कितना है और कब से है? उसका एक स्पष्टीकरण तो इस तथ्य में मिल जाता है कि जब यह शोध हुआ (सन् 2008 में प्रस्तुत) तब तक कई जगह मेघों ने ख़ुद को जनगणना के आंकड़ों में ‘कबीरपंथी’ भी लिखवाया हुआ था. मेघ समाज के अपने कबीर मंदिर थे और कबीर साहब की पूजा का प्रचलन था. कहने का तात्पर्य यह कि ‘कबीरपंथ’ नाम का सामाजिक आंदोलन मेघ समाज में दस्तक दे चुका था. उसके रूप-स्वरूप पर अलग से बहस हो सकती है. साथ ही एक बात का नोटिस लिया जाना चाहिए कि मेघ समाज के शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की कथा को छोड़ दें तो मेघों के जीवन और व्यवसाय में हुई उन्नति और नए व्यवसायों में उनकी कुशलता और प्रोफेशनल स्किल के बारे में दर्ज की गई पहली सकारात्मक टिप्पणियाँ भी डॉ. सिंह के शोधग्रंथ में आई हैं. मेघों की लोक-परंपराओं का पहला लेखा-जोखा इसी शोधग्रंथ में मिलता है. इसके अलावा याद रहना चाहिए कि लेखक का कोई भी कार्य अंतिम नहीं होता. आशा करनी चाहिए कि आगे चल कर डॉ. ध्यान सिंह वो नरेटिव लिखेंगे जो उनका ख़ुद का होगा जिसे वो साधिकार लिखना चाहेंगे.

जागते रहिए. अपना नेरेटिव अपनी कथा ख़ुद, मतलब 'ख़ुद' लिखिए. अपना कथ्य (थीम) ख़ुद तय कीजिए और दर्ज कीजिए. भोजपुरी में जीने का आशीर्वाद यों दिया जाता है- "जिअऽजागऽ". जिओ और जागते हुए जिओ.
अपने बारे में बोलिए और लिखिए.



10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.
मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही चार हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया गया है लेकिन इसमें अपेक्षानुसार गंभीरता नहीं थी). मतलब यह कि चार नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात यदि छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल भी कम महत्व का नहीं है.

राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है. उधर राजनीति और धर्म के बाज़ार में एकता नहीं बेची जाती, एकता का नारा ज़रूर बेचा जाता है, यह दुनियावी सच्चाई है. राजनीतिक दलों के बंधुआ लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है वहाँ धर्म-शर्म किसी कोने में रखे रहते हैं और राजनीति में यह सही होता होगा. एडवर्ड गिब्बन ने कहा है, "आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार उसे झूठ मानते हैं और शासक उसे उपयोगी मानते हैं." 

एकता के सिद्धांत
एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इनमें आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता होती है जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज के दूसरे सदस्यों के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग सारे समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. वे अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

तो कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर ही अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



18 March 2018

Eternal flow of Life Style - जीवन शैली का सार्वकालिक प्रवाह

कबीर के बारे में काफ़ी कुछ लिखा गया है जो अधिकतर ब्राह्मण साहित्यकारों ने ही लिखा है. कबीर को हिंदी साहित्य में जगह मिली इसका बहुत सा श्रेय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को जाता है. जिन विद्वानों ने हिंदी साहित्य का इतिहास अपने-अपने नज़रिए से लिखा वे विद्वान भी अधिकतर ब्राह्मण हैं. वे कबीर को भक्ति काल, ज्ञानाश्रयी-निर्गुण भक्ति, रहस्यवाद के शीर्षकों के अंतर्गत रखते रहे हैं. वह सिलसिला अभी जारी है लेकिन अब उसके अलावा बहुत कुछ नई रिसर्च के ज़रिए सामने आने लगा है.
हिंदी साहित्य के इतिहास के मध्यकाल (जिसमें 14वीं-16वीं शताब्दी का समय आता है) पर अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग का एक विशिष्ट दावा है जो कबीर, रविदास जैसे संतों, महापुरुषों के उस ‘भक्ति काल’ से संबंधित है जिसे अब आधुनिक मायनों में ‘मुक्ति काल’ का नाम दिया गया है.
अधिकांश भारतीयों ने कबीर की वाणी को सुना, पढ़ा या जाना है. उनकी वाणी में जिस ‘भक्ति तत्व’ की बात हिंदी साहित्य में की जाती है वो उनकी उस वाणी से बिल्कुल मेल नहीं खाती जिसमें वे जातपात और अंधविश्वासों पर प्रहार करते हैं. उनकी तर्क आधारित दार्शनिक बातें काव्य रूप में हैं. उनमें वो ‘भक्ति तत्व’ नहीं है जो अन्यथा भक्ति-भजन कार्यक्रमों के रूप में दिखता या सुनाई देता है. उनकी उस सामाजिक चेतना की प्रखरता को भक्तिरस की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. 
इन दिनों सोशल मीडिया पर यह चर्चा हुई है कि उन्होंने कई धार्मिक विचारधाराओं के बारे में कड़ी बातें कही हैं लेकिन बौद्धमत (जिसे बौध धर्म भी कह दिया गया है) के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा.
मैंने कुछ महीने पहले फेसबुक पर किसी की वॉल पर एक टिप्पणी देखी थी जिसमें कहा गया था कि ‘कबीर छिपा हुआ (hidden) बौध’ है. एक डिबेट कार्यक्रम कभी ‘लॉर्ड बुद्धा टीवी’ ने दिखाया था जिसमें बुद्ध और कबीर की तुलना की गई थी. वो विमर्श कबीर की तर्कशील और वैज्ञानिक सोच की ओर इशारा करता है. उनकी शख़्सीयत का हवाला आज के रैशनलिस्ट आंदोलन (Rationalist Movement) में दिया जाने लगा है.
यदि कबीर और उनके समकालीन संत केवल भक्त होते तो आनंद-मंगल में रामनाम का जाप करते हुए मायारूपी जगत छोड़ ज्योतिजोत समा गए होते जैसे कई अन्य लोग समा गए और खो चुके हैं. उन्हें कोई याद नहीं करता. लेकिन कबीर आदि संतों को लोग आज भी शिद्दत से याद करते हैं. उनके बारे में प्रचलित कहानियों से स्पष्ट है कि कबीर पर चौतरफ़ा दबाव था कि वे अपनी विचारधारा छोड़ें, जातपात के ख़िलाफ़ बोलना बंद करें क्योंकि वो मनुस्मृति जैसे धार्मिक-राजनीतिक संविधान के तहत कई सदियों से प्रचलित थी और उस समय के शासन-प्रशासन के अनुकूल थी. क्या इसे उन पर भक्ति की विचारधारा छोड़ने का दबाव कहा जा सकता है? किसी के राम-राम जपने या समाधियाँ लगाने से किसी को क्या परेशानी हो सकती थी? भक्त की छवि तो दास (ग़ुलाम) की छवि जैसी होती है. दास से कैसी परेशानी? परेशानी तब होती थी जब ग़ुलाम अन्य ग़लामों को ग़ुलामी से निकलने का तरीका बताने लगता है. उनकी तर्कशीलता एक अतिरिक्त इंडिकेटर है जिससे समझा जा सकता है कि कुछ लोगों को उनसे व्यावसायिक परेशानी ज़रूर हुई होगी. वे धार्मिक आडंबरों, अंधविश्वासों पर आधारित व्यवसायों और जातिवाद के खिलाफ़ बोलते थे. वो जातिवाद के खिलाफ़ एक आंदोलन की शुरुआत थी. प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार ने हिंदी साहित्य के भक्तिकाल को ‘मुक्तिकाल’ का नाम दिया है. सुश्री  मोहिनी पांडे (दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी) की यह टिप्पणी भी इसी बात का उल्लेख है - "जहां धार्मिक काल में मोक्ष की अभिलाषा मुख्य चिंता थी तथा भगवत भक्ति को मुख्य आधार माना गया था वहीं आधुनिक काल में आधुनिक मानव सामाजिक जकड़न से समाज की कुंठित मानसिकता से मुक्ति, विवेक के आधार पर, तर्क के आधार पर अधिक न्यायोचित  मानता है.” (link retreived on 13-03-2018). उसी तर्कवाद या विवेकवादी चिंतन के साथ कबीर मुक्ति आंदोलन की शुरुआत कर चुके थे. उस आंदोलन को हिंदी साहित्य के इतिहास में सही परिप्रेक्ष्य में शामिल नहीं किया गया. लेकिन आधुनिक काल में उस पर विभिन्न विद्वानों का विमर्श उपलब्ध है जिसमें उन्होंने पिछले विद्वानों के नज़रिए पर सवाल उठाए हैं. उन सवालों की निरंतरता बहुत अहम है.
धर्म और जन्म आधारित जातिवादी व्यवस्था हमारे देश में सवर्णों का सबसे बड़ा एजेंडा है और वो व्यवस्था भारत की अर्थव्यवस्था का नियामक (regulator) है. उसके विरुद्ध बोलना उस समय कबीर का बहुत बड़ा संघर्ष था जो जान की बाज़ी लगाने जैसा रहा होगा. कमजोर सामाजिक वर्ग से उभरा वो पुरुष उन दिनों किन हालात में रहा आज उसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है. उन्होंने जिस वीरता से अपनी बात रखी उसे देखते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने एक इंटरव्यू कहा था कि कबीर ने जितना बोला है उसे इस संदर्भ में देखने की ज़रूरत है कि कबीर सवर्ण नहीं था. दूसरी ओर यह एक जाना-माना तथ्य है कि तत्कालीन कई संतों-महात्माओं की ज़िंदगी और ख़ासकर उनकी मौतें रहस्यों से ढँकी हुई हैं.   
कबीर के जीवन काल में बौधमत अपनी प्राचीन मौर्यकालीन समृद्ध हालत में नहीं था. ऐसा इतिहास से स्पष्ट है. लेकिन बौधमत की धारा गुम नहीं हुई थी. सिद्ध और नाथपंथ के रूप में वो प्रवाहित थी. उसका मुख्य स्रोत पूर्वी उत्तर प्रदेश में था. यह क्षेत्र कभी बौद्धों का गतिशील कर्मक्षेत्र था. यह समझना मुश्किल नहीं कि यदि कबीर ने बुद्ध और बौधमत को अपने पुरखों, सिद्धों और नाथपंथियों से जाना भी था तो उसका नाम लेकर कार्य करना ज़रूरी नहीं रहा होगा. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि कबीर गोरखनाथ या अन्य सिद्धों की बात न करते. उन्होंने जो भी कार्य किया उसकी पृष्ठभूमि में उस बौधमत का फ़लसफ़ा मिल जाता है जो नाथ और सिद्ध पंथों के नाम से प्रचलित था. उनके द्वारा अवतारवाद और सगुण पूजा का निषेध इसके मोटे उदाहरण हैं. गोरखनाथ के साथ उनकी गोष्ठियाँ (बातचीत) प्रसिद्ध है. लोक-भाषा में प्रकट हुए उनके ज्ञानदर्शन को निम्न जातियों ने दिल में जगह दी. नाथपंथियों ने उनकी गूढ़ वाणी को अपनी शैली में संभाल कर रखा. लेकिन वे केवल गूढ़ ज्ञान की बात नहीं करते. वे उससे आगे बढ़कर सामाजिक समता (एक नूर) और न्याय की बात जनभाषा में करते हैं. उनके काव्य में प्रयुक्त बिंब प्रमुखता से ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं. उनके काव्य की पहुँच स्वतः ही समाज के अधिसंख्य लोगों तक हो गई जिन्होंने उनकी वाणी की मौखिक परंपरा को बनाए रखा. 'मेघवंश - इतिहास और संस्कृति' के लेखक ताराराम जी का यह सुविचारित मत है कि जहाँ भी कबीर ने ‘सुनो भाई साधो’ कहा है वहाँ उन्होंने सिद्धों को संबोधित किया है. वे कहते हैं कि ‘सिद्ध’ शब्द से ‘साध’ शब्द की गढ़त हुई है.
बौधमत और कबीर के प्रभाव को आगे के इतिहास में भी देखा जा सकता है. सभी संत किसी न किसी रूप में उनसे प्रभावित थे. इस पर मतभेद भी हो सकता है लेकिन इसमें शक नहीं कि कबीर सहित लगभग सभी संतों ने जिस तर्कशीलता से काम लिया है और समतावादी समाज की कल्पना की है वो बुद्ध और कबीर के नज़रिए से मेल खाती है. यह प्रवृत्ति मध्यकालीन साहित्य से आगे भी चलती है हालाँकि वो अलग-अलग शब्दावलियों, भाषाओं और बोलियों में अभिव्यक्त हुई है. उसका धार्मिक रूप-रंग और शैली चाहे समय, स्थान के साथ बदल गई हो लेकिन उसने सनातन धार्मिक-नैतिक वैचारिकी का रास्ता यथावत कायम रखा. वो ज्योतिबा फुले, साहूजी महाराज, पेरियार और डॉ आंबेडकर तक पहुँचती और कार्य करती दिखती है.
उन्नीसवीं शताब्दी तक अंग्रेज़ भारत में शासक के रूप में स्थापित हो चुके थे. इंग्लैंड में जो मानवाधिकारों पर कार्य हुआ था और मानव-जीवन को गरिमा प्रदान करने के लिए नियम और सिद्धांत बनाए गए थे उसका प्रभाव अंग्रेज़ी शासन के दौरान भारत के पढ़े-लिखे तर्कशील समाज पर पड़ा. मानवाधिकरों की बात समतावादी दृष्टिकोण का ही हिस्सा है. बौधमत, कबीरमत, संतमत और मानवाधिकारों की स्थापना के सम्मिलित प्रभाव की परिणति हम आज भारत के संविधान में देख सकते हैं.
गोत्रा जी ने एक अन्य बात की ओर ध्यान दिलाया कि बौद्धमत तर्कशीलता की बात करता है लेकिन वह कोई ‘धर्म’ नहीं है. कबीर ने बौधमत के अनुरूप तर्कशीलता अपनाई और तर्क के औज़ारों से जातपात सहित अन्य बुराइयों पर प्रहार किया. लेकिन उन्होंने कहीं ‘बौद्ध धर्म’ का नाम नहीं लिया जबकि अन्य कुछ धार्मिक विचारधाराओं का नाम कबीर ने लिया है.
डॉ. आंबेडकर के सामने यह तथ्य मौजूद था कि जातपात ‘हिंदू’ शब्द के साथ जुड़ी हक़ीक़त है. हिंदू धर्म और हिंदुत्व की कुछ नई अवधारणाएँ उनके जीवन काल में ही अस्तित्व में आ चुकी थीं. उन्हें लगा कि जातपात से पीछा छुड़ाने के लिए ‘हिंदू’ शब्द (जो आज भी धर्म के रूप में परिभाषित नहीं है) से पीछा छुड़ाना ज़रूरी था. 'हिंदू' शब्द के अर्थ का एक खुला दायरा पहले से था जिसे हिदुत्ववादी विचारधारा ने अपना आयाम दिया और ‘हिंदू धर्म’ की अवधारणा को रूढ़ बनाया और उसे परंपरा बताने का प्रयास किया. उस वैचारिक परिधि से बाहर जाने लिए नई अवधारणा वाले नए धर्म की जरूरत थी. डॉ. आंबेडकर ने बौद्धमत में थोड़ा परिवर्तन करके उसे नया रूप दिया और ‘नवबौध’ शब्द सुनाई दिया. धर्म परिवर्तन की शैली में नवबौधवाद का उदय हुआ यानि पहले से मौजूद एक विशिष्ट जीवन शैली वाला जीवन-दर्शन अब धर्म में रूपांतरित हो गया. जातपात की बंद गली से निकल कर एक न्याय आधारित समतावादी समाज को साफ़ सुथरे मैदान तक ले जाने का रास्ता डॉ. अंबेडकर ने सुझाया. उन्हें इसमें कितनी सफलता मिली उसका मूल्यांकन आने वाला समय करेगा. उस परिवर्तन की सफलता की कहानियाँ मिलती हैं.
इस बीच कबीरपंथ एक सामाजिक आंदोलन के तौर पर स्थापित हो चुका है. हो सकता है आगे चलकर यह एक ऐसा आंदोलन बन जाए जो राजनीतिक महत्व का हो. कबीर का क्रांतिकारी कार्य आज के संदर्भ में समाजशास्त्रियों के प्रबुद्ध वर्ग के हाथों में अधिक सुरक्षित है जो समाज में समतावादी दृष्टिकोण की हिमायत करते हैं.
बीसवीं शताब्दी तक आते-आते दुनिया में मानव-धर्म, मानवतावाद और धर्मनिरपेक्षता की तुलनात्मक रूप से नई अवधारणाएं जन्म ले चुकी हैं. इनसे संबंधित विचारो के कई सूत्र बुद्धिजीवियों ने ढूंढे हैं जो कबीर से जा जुड़ते हैं. इस जुड़ाव में बड़ी बाधा कबीर का रहस्यवाद है जो भारत की आध्यात्मिक परंपरा में वर्णित आंतरिक (यौगिक) साधनों और साधकों के अनुभवों के महिमा मंडल के चलते मानवतावाद और धर्मनिरपेक्षता की समझ में बाधा उत्पन्न करता है.
कबीर की वाणी में बहुत से अंतर्विरोधों की बात होती रहती है मैं मानता हूँ कि उसका मुख्य कारण कबीर की वाणी और दूसरों के द्वारा उसमें जबरदस्ती ठूँसी गई वाणी है. यही वजह है कि कबीर जब कर्म और कर्मफल की बात करते हैं तो वह एक अलग अर्थ देता है जबकि उनके समय की मनुवादी विचारधारा में संदर्भित पुनर्जन्म और उस पर आधारित कर्मफल का सिद्धांत उससे मेल नहीं खाता. इसे इस बात के साथ जोड़ कर देखने की ज़रूरत है कि भारतीय दर्शन में इच्छा करने को कर्म कहा गया है.  इसे लेकर कबीरपंथी एकमत नहीं हैं कि कबीर का कर्मसिद्धांत किस ओर झुका हुआ है. लेकिन जब कबीर को बौधमत की समकालीन परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है तो मालूम देता है कि कबीर पुनर्जन्म आधारित कर्म सिद्धांत की बात तो नहीं ही करते हैं. जन्म-मरण से बाहर जाने की बात करने वाला कबीर जैसा विवेकी व्यक्ति पुनर्जन्म की बात कैसे कर सकता है. इसे तर्क पर तौलना ज़रूरी है. लेकिन जब कबीर कह देते हैं कि ‘पंडितवाद वदंते झूठा’ तो उससे ही स्पष्ट हो जाता है कि उनकी विचारधारा ब्राह्मणवादी विचारधारा से अलग थी. इस दिशा में सोचने वाला यह आलेख अकेला नहीं है. इस लिंक पर आपको काफी कुछ मिल जाएगा.
यह भी सच है आज की दुनिया ने कबीर और डॉ. अंबेडकर को धर्मनिर्पेक्ष मानवतावादी के रूप में जाना और माना है. इस दृष्टि से दोनों एक ही धरातल पर खड़े हैं. फ़र्क इतना है कि अंबेडकर की मूल रचनाएँ आज उपलब्ध हैं और रहेंगी. उनमें आधुनिक संदर्भ मिलते हैं. उन्हें विश्व भर के विद्वानों, बुद्धिजीवियों, विश्वविद्यालयों ने मान्यता दी है. इसलिए डॉ. अंबेडकर को पढ़ना कबीर को समझने में बहुत मददगार है. कारण है अंबेडकर की वाणी और विषयवस्तु की शुद्धता. 
बौद्धमत अपनी तर्कवादी विचारधारा के लिए दुनिया भर में जाना जाता है उसकी वो तर्कवाद (रेशनलिज़्म) की धारा अब गति पकड़ चुकी है. उसका विस्तार तेजी से हो रहा है. तर्क और विज्ञान का आधार लेकर उसने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को प्रभावित किया है. धरती पर एक बेहतर मानव-जीवन की कल्पना सुंदरतर हुई है.

श्री आर.एल. गोत्रा की टिप्पणी जिसका उपयोग किया गया है.
“Kabir was a secular humanist. Secular humanists use reason, compassion, and use logic to identify & arrive at universal truths with the object of solving ETHICAL problems, which by the religionists are otherwise left at the discretion of their RELIGIOUS institution.Thus SECULAR HUMANISTS rely mostly on naturally & universally justified ethics than on dictates of a PARTICULAR religion.
Your views on Kabir are in consonance with intellectuals of Kabir Panthis. However, these intellectuals are well divided on the issue of Kabir’s stance on ‘Karma’ theory. Some of the Kabir Panthis do believe in the “twin concept” of Karma & Re-birth, as propagated by Brahmanism, and inventors of faked verses of Kabir have successfully appeased their minds by feeding them with Brahmanic verses. Brahmanism can not survive without the said ‘twin’ concept, that was logically necessary for realising their object of ruling the minds of Non-Brahmanic races people.
However, you can not dismiss the fact that Kabir attacked the very foundation of Brahmanism when he asserted, “Panditwad Vedante Jhutha, Pande Kaun Kumati Tohi Laagi”. Though a little bit covertly, he indicated that his spiritual views belonged to a different section of society! That is why he pointed out, “Dash Avataar Niranjan Kahiye, so Apna na Koye”!
The above state of affairs has been helpful to Brahmanism to keep divided the “mentally enslaved” Kabir Panthis.
To pull them out of mental enslavement, Dr. BR Ambedkar, combined the philosophy of Kabir with thinking of Sahu & Phule, and gave birth to a new path that later appeared as neo-Buddhism & also synchronised with rationalism of Buddha. Kabir did not declare any new religion for his socially & economically deprived communities; but BR Ambedkar recognised the deep impact of religion on people’s mind, and therefore, used the word ‘Religion’ for Buddhism, instead of ‘Rationalism’.
So far as Nath Sampardaye is concerned, that proved to be a feeble attempt by Brahmanism to distract the people’s attention from ills of Brahmanism.
With adoption of various strategies, Brahmanism kept busy the working classes to keep visiting Deras of Saints, in stead of conversion to Islam. It also helped them to safeguard the so called “SANCTITY” of their ‘Hindu’ sacred places/temples that could otherwise be polluted by visits of Shudra/ATI-Shudra.Kabir was a secular humanist. Secular humanists use reason, compassion, and use logic to identify & arrive at universal truths with the object of solving ETHICAL problems, which by the religionists are otherwise left at the discretion of their RELIGIOUS institution.Thus SECULAR HUMANISTS rely mostly on naturally & universally justified ethics than on dictates of religion.
Saint Kabir & Dr. Ambedkar are both symbols of Secular Humanism. The world recognises them as such. 
It is suggested to record this recognition in your writing.
Once the Bahujans of India start understanding this fact, they may also ultimately be realising the true ideological basis of Buddhism.
With regards.
Rattan Gottra.”

22 January 2018

Kabir, Holiday and June - कबीर, छुट्टी और जून

मेघ समाज ऐसा समाज है जो जल्दी से किसी बात पर आंदोलित नहीं होता. शांत और संतुष्ट रहना इसका स्वभाव है. 
लेकिन पिछले दिनों जब पंजाब में कबीर जयंती की छुट्टी को पंजाब सरकार ने छुट्टी की जगह रिस्ट्रिक्टिड छुट्टी घोषित किया तो इस समाज ने कबीर के प्रति अपनी मज़बूत भावनाओं को जो अभिव्यक्ति दी वो उनके आंदोलित उठने की गवाही दे गई. पार्टियों की सीमाएं तोड़ कर इस आंदोलन में विभिन्न पार्टियों में बिखरे नेतागण इकट्ठे हो गए और कई जगह धरने-प्रदर्शन किए और भूख हड़ताल पर भी बैठ गए हैं. ये धरने प्रदर्शन पंजाब में एक साथ कई जगह हुए हो रहे हैं. जो सामाजिक संगठन अभी तक एक दूसरे से दूर-दूर नजर आते थे वे एक ही मंच पर साथ-साथ दिखाई दिए. कुछ अन्य कबीरपंथी और जुलाहा समाज जो पहले कभी मेघों के बीच खड़े नहीं दिखे वे भी इस मुद्दे को लेकर एकता का प्रदर्शन करने के लिए आ जुटे. सब से बढ़ कर जो बात सुनी गई है वो यह है कि कुछ सिख संगठन भी इस आंदोलन से आ जुड़े हैं. रविदास और जाट भाईचारे के लोग भी इस प्रोटेस्ट में हिस्सा ले रहे हैं. काश यह भाईचारा चुनावों में भी दिखे. वो सत्गुरु कबीर का सबसे बड़ा आशार्वाद होगा.
इस स्थिति से पैदा होती संभावनाओं का विश्लेषण करने की ज़रूरत है. जाहिर है कि बात धार्मिक भावनाओं तक पहुँच गई है और अन्य साझे हितों तक भी जाएगी.
कबीर के झंडाबरदारों से फिर आग्रह है कि कबीर जयंती को जून की जगह किसी सुहावने मौसम में शिफ़्ट कीजिए. जून में आप प्रभावशाली कार्यक्रम नहीं कर पाते.





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11 July 2017

Social Media and Bhagat Mahasabha - भगत महासभा और सोशल मीडिया

जब मेरे घर पर कंप्यूटर और इंटरनेट आया तो तुरत ‘मेघ’ और ‘भगत’ शब्दों की तलाश की. काफी ढूँढने के बाद ‘भगत महासभा’ की ब्लॉग साइट्स दिखीं जहाँ मेघ-भगत समुदाय की बात थी. इससे मुझे बहुत खुशी हुई. भगत महासभा ने एसएमएस सेवा के माध्यम से भी कार्य किया और जम्मू में बड़े पैमाने पर कबीर जयंती के कार्यक्रम भी आयोजित किए.


सोशल मीडिया पर मेघों की सबसे अधिक सक्रिय सामाजिक संस्था देखें तो भगत महासभा सबसे ऊपर दिख जाती है. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजकुमार ‘प्रोफेसर’ ने सोशल मीडिया का उपयोग करने में काफी पहलकदमियाँ की हैं. मैं उन्हें युवावस्था से जानता हूँ जब वे पंजाब यूनीवर्सिटी में पोलिटिकल सांइस में एम.ए. कर रहे थे. तब प्यार से हम उन्हें ‘प्रोफेसर’ कह देते थे जो आगे चल कर उनका निकनेम जैसा बन गया - ‘प्रोफेसर’ राजकुमार.  


पंजाब के मेघ भगतों के कई सामाजिक संगठन हैं जिनके बारे में कुछ जानता हूँ और उनके बारे में जब भी कोई जानकारी हाथ लगी उसे मेघनेट पर संजो कर रख लिया. राजकुमार जी की गतिविधियाँ अधिक देखने को मिलीं. इन्होंने अत्यधिक विरोध के बावजूद डॉ. अंबेडकर की विचारधारा पर अपना स्टैंड साफ़ और मज़बूती के साथ रखा है.

पिछली बार 02 जुलाई, 2017 को जब मैं जालंधर में था तो श्री आर.एल. गोत्रा जी के निवास पर उनसे मुलाकात हुई और उनसे हुई औपचारिक बातचीत को मैंने रिकार्ड कर लिया जिसका लिंक यहाँ है.

30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया उस पर या तो 'भक्ति साहित्य' का टैग लगा था या फिर उसके साथ एक फ़कीर टाइप समाज सुधारक की छवि नत्थी की गई थी. तथाकथित आचार्यों ने कबीर पर कमोबेश अपना ही आचार्यत्व थोपने की कोशिश की. जबकि ज़रूरत ऐसे विश्लेषण की थी जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो साहित्यिक बेइमानी और गुंडई का शिकार हुआ है और कि कबीर के नाम पर उपलब्ध कौन-कौन सा साहित्य है जो कबीर का लिखा हो नहीं सकता और संदेह के घेरे में है.


जग ज़ाहिर है कि कबीर के समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही (बाग़ी) भी बता दिया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया जिनका साहित्य में पुराना दख़ल था. दूसरी ओर पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और जिनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. कबीर का वही नज़रिया सामाजिक रूप से जागरूक वर्गों में फैला. लेकिन स्कूलों और कालेजों के पाठ्यक्रमों में कबीर को जिस तरह का बताया गया और जैसा पढ़ाया गया उसने समाज में कबीर की छवि 'भक्त' की बना दी गई. सिलेबस में की गई वो बेइमानी अब रेखांकित हो चुकी है. कबीर को भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पर्दे के पीछे धकेलने की कोशिश थी जो बीसवीं शताब्दी में आकर नाकाम होने लगी. जबकि सिलेबस बनाने वालों ने अपनी बेइमानी जारी रखी. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में 'भक्तिकाल' कहा जाता है वह वास्तव में 'मुक्तिकाल' था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संतजन जान पर खेल गए. अब तो एक चैनल 'आवाज़ इंडिया' और कई जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. ऐसा कहने वाले वही लोग हैं जिनका जातिवादी घृणा फैलाने वाला 'अदृश्य' एजेंडा है.


हालाँकि धार्मिक आइकॉन के रूप में सभी अनुसूचित जातियों के अपने-अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं. इस संकेत के आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की जातिगत सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं सदी के कबीर को बीसवीं सदी में बड़े पैमाने पर अपनाया है तो इसका यही कारण समझ में आता है कि मेघ समुदाय व्यवसाय से बुनकर रहा. कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. मेघ समुदाय ने सदियों से कबीर की वाणी में अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख महसूस किए हैं. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार आर्यसमाजी, समातनी, सिख और कुछ कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं. लेकिन कबीर का विस्तार इस समुदाय में खूब हुआ है और हो रहा है.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पा चुके हैं. कबीर को ओबीसी साहित्य में जगह दिलाने की कोशिश बहुत सशक्त है. इधर पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि मेघ क्या ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔मैं नहीं जानता.
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा


14 March 2017

Caste Identity and Unity - जाति पहचान और एकता


यह संसार 'नाम' और 'रूप' का बना है. जातियाँ नाम और रूप के आधार पर बनी है और इनकी खासियत यह है इनकी अपनी परंपराएँ और रूढ़ियाँ हैं जो इनकी पहचान है. जातियों की ख़ासियत है कि वे अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं. परिपक्व होते लोकतंत्र में यह सवाल खड़ा हुआ है कि वंचित जातियां आपस में एकता कैसे स्थापित करें ताकि वे अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था परिवर्तन कर सकें. दूसरी ओर एक राष्ट्रवाद खड़ा हो रहा है जो जातिवाद का विरोध करता तो नहीं दिखता लेकिन जातिवाद को समाप्त मान कर बात करता है.


कुछ मेघजन इस आइडिया के साथ खेलते हैं कि क्या कबीर को इष्ट मानने वाले या कबीर को बुनकरों की प्रतिनिधि विचारधारा मानने वाले समुदायों का एक सामान्य नाम ‘कबीरपंथी’ रखा जा सकता है ताकि उन जातियों में एक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक एकता स्थापित हो जाए?


हाल ही में एक उदाहरण मेरे सामने आया है. राजस्थान में एक सरकारी नोटिफिकेशन के ज़रिए बलाई आदि अनेक जातियों को अनुमति दी गई थी कि वे ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं. उसके पीछे कोई राजनीतिक एकता की मंशा रही होगी ऐसा मानना मुश्किल है लेकिन यह भावना ज़रूर थी कि चमड़े का कार्य करने वाली जातियाँ अपने व्यवसाय से जोड़े गए घृणा के भाव से मुक्ति पा जाएँ. इसके बाद वहाँ 'मेघवंश' और 'मेघवाल' शब्दों के साथ नई जागरूकता का संकेत देते हुए कम से कम एक संगठन बना जिसने बहुत से कार्यक्रम आयोजित किए. कुछ जातियों ने सरनेम के तौर पर ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. इस पर बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर क्षेत्र के मेघवालों को आपत्ति थी क्योंकि वे  व्यवसाय से चर्मकार नहीं बल्कि बुनकर थे. अनजाने में ही सही लेकिन चर्मकारों के व्यवसाय से जुड़ी घृणा उन्हें ख़ुद तक पहुँचती महसूस हुई.


जैसा कि मैंने पहले कहा है - जातियाँ अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं और हाल ही में मेरी जानकारी में आया है कि कई चर्मकार जातियों ने मेघवाल शब्द का प्रयोग करने से इंकार भी कर दिया. कहने का मतलब यह है कि कानून के द्वारा किन्हीं जातियों को एक नाम देना उनमें एकता होने की गारंटी नहीं देता. एकता को लेकर जो बेचैनी है वो राजनीतिक है और उसका समाधान राजनीति के सिद्धांतों के अंतर्गत होगा. समाज सदियों से बँटा हुआ है और वह जल्दी सुधरने वाला नहीं है. अनुसूचित जातियों का आपस में रोटी-बेटी का व्यापक और खुला दिखने वाला संबंध नहीं है और न ही वह एकदम से स्थापित हो सकता है. इसमें भौगोलिक,आर्थिक और कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हैं.

बेहतर आंदोलन यह है कि व्यक्ति अपने भीतर के आदमी को जल्दी से सुधार ले. समाज को बदलने में समय लगता है. ‘समय’ कहकर किसी को हतोत्साहित नहीं करना चाहता. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी ही होती है. अब वंचित जातियों में शिक्षा का प्रसार हो रहा है जिससे उनकी मानसिक रुकावटों के पिघलाव की गति तेज हो सकती है. इससे उम्मीद जगती है. इसे हाल ही में उभरे राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखने की ज़रूरत होगी जिस पर समाजशास्त्री प्रकाश डालेंगे.

19 November 2016

Kabir's Struggle - कबीर का संघर्ष

ताराराम जी ने जोधपुर से ई. मार्सडेन की एक पुस्तक 'भारतवर्ष का इतिहास' नामक पुस्तक का लिंक भेजा है. यह पुस्तक 1919 में छपी थी. इसमें प्रकाशित कबीर का स्कैच उनकी एक अलग छवि पेश करता है. इस पुस्तक में कबीर की आयु 40 वर्ष की बताई गई है. इस स्कैच में कोई कंठी, माला, मोरपंख, मुकुट आदि धार्मिक प्रतीक नहीं हैं. एकदम सादा शख़्सियत गढ़ी गई है. इस पुस्तक के अनुसार कबीर का जीवन 40 वर्ष रहा.

सवाल तो उठता रहेगा कि कबीर की मौत कुदरती थी या नहीं. उसकी वजह भी है. कबीर ने यदि सिर्फ़ ईश्वर, परमेश्वर, राम, अल्लाह का नाम लेकर जीवन बिताया होता तो लोगों के लिए कबीर के जीवन का आख़िर क्या महत्व हो सकता था? किसी को उसके उस भक्ति भाव से क्या चिढ़ या दुश्मनी हो सकती थी? आम आदमी आमतौर पर उस व्यक्ति को अधिक याद रखते हैं जिसने उनके लिए कोई संघर्ष किया हो. वरना ईश्वर, अल्लाह करते-करते करोड़ों-अरबों लोग मर चुके हैं. इतिहास या कथा-कहानियाँ उनका नाम तक नहीं लेतीं. फिर कबीर को ही क्यों याद किया जाता है? कबीर क्यों इतिहास की किताबों में दर्ज है?

दरअस्ल यह समझने की ज़रूरत है कि कबीर ने ऐसा क्या किया या ऐसा क्या कहा जिसके लिए उनके समकालीन कुछ लोगों ने कबीर का विरोध किया, आख़िर वे उनके विरोधी क्यों थे और कबीर इतिहासकारों की नज़रों में कैसे आ गए. इतिहासकारों के अनुसार कबीर प्रचार करते थे कि धर्म से पहले इंसानियत है. यही बात थी जो धार्मिक या मज़हबी लोगों को रास नहीं आती थी. कबीर यह भी समझाते रहे कि जात-पात और कुछ नहीं सिर्फ़ मेहनत करने वालों को अलग-थलग करने का औज़ार है और उस औज़ार को तोड़ना ज़रूरी है. कबीर व्यक्ति की आज़ादी के हिमायती थे और विवेक उनका पैमाना था. उनका यह संघर्ष मामूली संघर्ष नहीं था. वे उन ख़तरों से खेल रहे थे जो धार्मिक और जातिवादी लोग उनके लिए के पैदा कर दिए थे.

भूलना नहीं चाहिए कि दादू दयाल, रविदास, मीरा बाई जैसे कई अन्य संतों की हत्याएँ करने की बातें बताई जाती रही हैं. जाति बंधन तोड़ कर संत रविदास के दर्शन करने गई मीरा को ज़हर दिए जाने की बात दुनिया जानती है. कबीर के साथ क्या हुआ यह अभी भी खोज का विषय है. 
  

उक्त पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है. लिंक नीचे दिया है. पीडीएफ है इसलिए सारी पुस्तक खुलने में कुछ समय लगता है.
https://drive.google.com/open?id=0ByMLtxnRDG4mMmFQejltaTJmVUU