मेघवंश
:
इतिहास
और संस्कृति -
लेखक
:
ताराराम
पुस्तक
समीक्षा
जितना
आपका अधिकार अपने जीवन इतिहास
पर है उतना ही मेरा भी अपने
इतिहास पर है.
लेकिन
धन्य हैं वे इतिहासकार जो अपना
और दूसरों का इतिहास ढूँढते
हैं,
जानते
हैं और लिखते हैं.
पढ़ाए
जा रहे इतिहास को एक विश्वसनीय
दस्तावेज़ होना चाहिए.
लेकिन
भारत में सदियों से यह दस्तावेज़ीकरण
बेइमानी का भी शिकार हुआ.
अब
आकर स्वतंत्र भारत के लोगों
को लगने लगा है कि इतिहास का
'निर्ब्राह्मणीकरण
(debrahmanisation)'
करने
की आवश्यकता है.
इतिहास
से गुम मेघवंशी लोग पिछले लगभग
150-200
वर्ष
से अपने इतिहास के बारे में
अत्यधिक जिज्ञासु हुए हैं
जिसका कारण उनमें शिक्षा का
प्रचार-प्रसार
है.
इसका
श्रेय निस्संदेह लॉर्ड मैकाले
और उसके साथी अंग्रेज़ों को
जाता है जिसने वंचितों के लिए
शिक्षा का मार्ग खोला.
दूसरी
ओर अभी तक इतिहास में वर्णित
अंधकारकाल (Darkages)
में
कई इतिहासकारों की रुचि जगी
है.
इससे
भी मेघों के इतिहास की गवेषणा
को गति मिली है.
इसका
श्रेय लॉर्ड कन्निंघम जैसे
पुरातत्त्ववेत्ताओं को जाता
है जिन्होंने सिंधुघाटी सभ्यता
को खोज निकाला और कई तथ्य उजागर
किए.
उनके
ही वैज्ञानिक कार्य के कारण
नागवंशियों और मेघवंशियों
ने अपनी सभ्यता के दर्पण को
पहचानना शुरू किया है जिस पर
पौराणिक कथाओं की सांस्कृतिक
धूल जमी थी.
भारत
में इतिहास लेखन की शास्त्रीय
परंपरा की जड़ें अपने आश्रयदाता
के गुणगान में हैं जो अंततः
पौराणिक कथा या दरबारी काव्य
से अधिक महत्व की नहीं रह जातीं.
ऐसी
रचनाएँ लोक को पर्याप्त
प्रतिनिधित्व नहीं देतीं.
यह
काफी सुखद है कि कई आधुनिक
इतिहासकार नए दृष्टिकोण के
साथ आए हैं जिन्होंने परंपरागत
इतिहास की प्रचलित मान्यताओं
को चुनौती दी है.
सदियों
से पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जा
रहे इतिहास ने भारत की अधिकांश
जनसंख्या को ठगा है.
यह
एक ऐसा विषय है जिसमें व्यक्ति
अपनी पहचान पा कर गौरव महसूस
करने का अवसर पाता है.
शेष
को हैरानगी होती है कि क्या
उसके समुदाय/समूह
में किसी ने भी स्मरण रखने
योग्य कोई कार्य नहीं किया?
एक
पक्षीय इतिहास जनमानस को
समुचित उत्साह से नहीं भरता
बल्कि कड़ुवाहट देता है.
यही
कारण है कि ज्यों-ज्यों
भारत में शिक्षा का प्रसार
हो रहा है त्यों-त्यों
यह विचार प्रबल हो रहा है कि
भारत के वास्तविक इतिहास को
वैज्ञानिक आधार पर और संतुलित
तरीके से पुनः लिखने की आवश्यकता
है.
आजकल
पाठ्यक्रमों में शामिल ज्योतिराव
फुले आदि से संबंधित जानकारी
इसी बात को प्रमाणित करती है.
जहाँ
तक मेघों के इतिहास का प्रश्न
है इसके लेखन के कुछ प्रयास
पहले भी हुए हैं.
यह
लेखन मेघवंशियों ने ही किया.
इधर
एक मेघवंशी श्री ताराराम
द्वारा लिखित "मेघवंश
: इतिहास
और संस्कृति भाग-1"
पढ़ा
था.
इस
पुस्तक में मेघवंश के प्राचीन
इतिहास और मेघवंशी राजाओं के
अस्तित्व की ऐतिहासिक साक्ष्यों
के साथ खोजबीन की गई थी.
इसके
सौजन्य से मेघवंश के लगभग गुम
इतिहास का एक चमकदार हिस्सा
प्रकट हुआ.
इसी
सिरीज़ के "मेघवंश
:
इतिहास
और संस्कृति भाग-2”
में
अब 'मेघ
संस्कृति'
पर
विस्तार से प्रकाश डाला गया
है.
लेखक
ने जिस भाषा में इसे लिखा है
वह विषय के अनुरूप है और उसमें
राजस्थानी छुअन है.
यह
काफी वस्तुपरक दृष्टिकोण से
लिखा गया है.
तथ्यों,
संदर्भों,
अनुमान,
प्रमाण
और लोक-संस्कृति
से प्राप्त जानकारियों का
भरपूर प्रयोग इसमें हुआ है.
यह
पहली बार है कि किसी पुस्तक
ने इस बात को स्थापित किया हो
कि भारत के कई राज्यों में
मेघवंशी लोग मेघ,
मेघवाल,
मेघवार,
मेंघवाल,
मेघवल,
कबीरपंथी,
आदि
नामों से न केवल अधिसूचित हैं
बल्कि भारत के लगभग सभी राज्यों
में विभिन्न नामों से बसे हैं.
यह
सारे भारत में निवास करने वाला
एक विशिष्ट प्राचीन समाज है.
विषय
के ताने-बाने
को देखें तो इस पुस्तक के
अध्याय-1
में
हिंदूधर्म में मेघवंश की हीन
दशा का चित्रण है और व्याख्या
भी.
ये
वाक्य अपने आप में काफी कुछ
समेटे हुए हैं-
"अपने
आप में एक पृथक समूह होने व
विशिष्ट मान्यताओं को अपनाने
के कारण ही यह एक अलग जाति बनीं.
......तत्कालीन
समाज व्यवस्था में ऐसे ध्वजाहत
दासों की निम्नतर स्थिति बनाने
में 'स्मृति
युग'
ने
आग में घी डालने का काम किया.
.......मेघवंश
के पतन के बाद पराजित मेघ राजाओं
और उनकी प्रजा के सामने भी ऐसे
ही विकल्प थे.
इतिहास
साक्षी है कि ‘मेघवंश‘ ने अपनी
संस्कृति की अक्षुण्णता बनाए
रखने हेतु अमानवीय शर्तों के
अधीन भी रहना स्वीकार किया."
सर्वदा
अध्यात्म सुखभोगी मेघों के
दुखते मर्म पर यह सबसे सशक्त
टिप्पणी है.
राजस्थान
में सामन्तों,
जागीरदारों,
महाजनों,
दलालों,
बिचौलिओं
और अंग्रेज़ों की मिली भगत
ने कतारिए मेघवालों के लिए
ऐसी दर्दनाक स्थिति पैदा कर
दी थी कि उसे इस अध्याय में
लेखक काफी जगह देने के लिए
बाध्य हुआ है.
लेखक
ने स्पष्ट किया है कि मेघों
को कोई राजनीतिक संरक्षण
प्राप्त नहीं था.
दूसरे
अध्याय में मेघों के धार्मिक
रीति-रिवाजों
का वर्णन है.
यहाँ
लेखक ने देवरे का ज़िक्र किया
है (जिसे
जम्मू-कश्मीर
में देहुरी या डेरी कहा जाता
है).
बताया
गया है कि इस समाज ने अपने
‘आराध्य-स्थल‘
को कभी भी मंदिर,
मस्जिद
या मठ के अर्थ में नहीं माना.
इनके
संत पुरुषों या सिद्धों के
ध्यान-विपश्यना
स्थल को ये 'धूणी'
कहते
हैं और ऐसे पुरुषों की यादगार
में बनाए जाने वाले पूजा स्थल
(मंदिरनुमा
या मठनुमा आकृतियों)
को
‘देवरा‘ कहते आए हैं.
प्रत्येक
मेघवाल कुनबे की अलग-अलग
'कुल
देवी'
होती
हैं.
अपने
मंगल कार्यों के लिए देवी को
ये लोग ‘जोत‘ करते हैं,
चढ़ावा
चढ़ाते हैं और बकरे की बलि भी
देते हैं.
कुछ
खापें (गोत्र)
अपनी
कुलदेवी को 'चूरमा'
(मीठा)
प्रसाद
चढ़ाती हैं.
इस
वर्णन से भी स्पष्ट हो जाता
है कि यह पूजा पद्धति देश भर
के मेघवंशियों में है और इसका
स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों
के अनुरूप मामूली अंतर के साथ
वही है.
तीसरे
अध्याय में सांस्कृतिक मूल्यों
का विवरण दिया गया है.
इसमें
मेघवंशियों के खानपान,
भोजन
के नियम,
व्रत-उपवास,
वेशभूषा,
उजोवणा-निमंत्रण,
साख्या
या साकिया,
मरणासन्न
मान्यताओं,
अंतराभव,
शंखोद्धार
या संकोढ़ाल,
वैशाख
स्नान और सांस्कृतिक मूल्यों
(खानपान,
भोजन-नियम,
पगड़ी
धारण,
आभूषण,
गृहनिर्माण
परंपरा,
वाद्य
यंत्र,
रोशनी,
सफाई-पानी
की व्यवस्था,
पीळा
औढ़ना आदि का वर्णन किया गया
है.
मेरे
विचार से इस प्रकार का इतना
विस्तृत विवरण प्रकाशित रूप
में पहली बार देखने में आया
है.
चौथे
अध्याय में बताया गया है कि
मेघवाल समाज को कई जगह बांभी
कहा जाता है.
इसमें
उनकी जीवन शैली का चित्रण है
जो पढ़ने योग्य है.
इसमें
उत्तर भी हैं और सवाल भी.
यह
पुस्तक इस बात को रेखांकित
करती है कि मेघ जाति से संबंधित
सभी परंपराएँ मेघ नामक पुरुष/ऋषि
के वंशधरों की विरासत से आई
हैं.
इन
परंपराओं को बढ़ाने वाले ये
लोग एक ही वंश से हैं.
लेखक
ने इतिहासकारों जैसे डॉ.
नवल
वियोगी,
के.
पी.
जायसवाल
आदि के हवाले से सिद्ध किया
है कि मेघवंश का उत्थान कोसल,
कन्नौज
के राजा विमलचन्द्रपाल के
पोते मेघचन्द,
गंधार-कश्मीर
से और राजस्थान के प्राचीन
भू-भाग
से हुआ है.
लेखक
का मत है कि ऐतिहासिक रूप से
कोसल-बघेलखंड
इस जाति के उत्थान का सुस्पष्ट
उद्गम स्थान है जबकि गंधार-कश्मीर
में 6ठी
शताब्दी के बाद के प्रमाण
मिलते हैं.
एक
निष्कर्ष के तौर पर लेखक इस
बात को मानता है कि तथ्यों के
आधार पर मेघवंश का उद्गम कोसल
से है,
जो
उस समय सिंधुघाटी सभ्यता का
ही एक प्रमुख भू-भाग
था.
मेघ
लोग वहीं से भारत के विभिन्न
भू-भागों
में आए-गए
और वहीं के निवासी बन गए.
लेखक
ने बताया है कि मेघवंश एक
प्राचीन क्षत्रिय वंश था.
यह
क्षत्रियों से उत्पन्न हिंदू
धर्म की कोई जाति नहीं थी.
उनकी
जाति आधारित हीनता का कारण
उनके हिंदू धर्म में शामिल
होने की प्रक्रिया में है.
मेघवंशी
अपनी मान्यताओं और विश्वासों
पर डटे रहे और कालांतर में
राजनीतिक लड़ाइयाँ हारने के
कारण हिंदू धर्म की हीन जातियों
में शामिल हो गए और दासत्व को
प्राप्त हुए.
अधिकांश
मेघों ने कपड़े बुनने के कार्य
में ही अपने को लगाया और यह
उनका पुश्तैनी धंधा बनकर उभरा.
आज़ादी
के बाद पैदा हुए अधिकतर मेघ
युवा इस तथ्य को सहज स्वीकार
नहीं कर पाते कि अतीत में उनके
पराजित समाज के पास जीवित रहने
के लिए दासत्व स्वीकारने के
अलावा कोई और विकल्प नहीं था.
बड़े-बूढ़े
मेघ आज भी उलझन में हैं कि -
"हम
कौन हैं......कहाँ
से आए हैं....."
और
अंततः इस दार्शनिक प्रश्न पर
अटक जाते हैं कि -
"......हम
कहाँ जाएँगे?".
इसका
मुख्य कारण यह है कि सदियों
तक मेघों का इतिहास न लिखा
गया,
न
पढ़ाया गया,
न
ही उनकी कोई कहानी थी जो उनके
जीवित भर रहने के संघर्ष से
अलग होती.
यदि
कोई गौरवपूर्ण इतिहास था तो
वह अंधकारकाल के पृष्ठों में
दफ़्न था.
इस
पुस्तक का कथ्य आधुनिक मेघ
समाज को अहसास करा जाता है कि
मेघवंशियों ने वैदिक कर्म-कांडों
और ब्राह्मणी-वितंडावाद
से हमेशा दूरी बनाए रखी.
यह
पुस्तक मेघों की गोत्र प्रणाली
और धार्मिक रीति रिवाज़ों पर
भी प्रकाश डालती है और उनकी
'कुलदेवी
पूजा'
सहित
कई मान्यताओं का मूल बौध धर्म
और सिद्ध परंपरा में देखती
है.
सामाजिक
परंपराओं और रीतियों में खाप
(गोत्र)
का
महत्व और स्वरूप इसमें बख़ूबी
उभर कर आया है.
इससे
पूर्व इने-गिने
मेघवंशियों ने 'मेघवंश/मेघों
का इतिहास'
लिखने
का प्रयास किया.
जो
पुस्तकें उन्होंने लिखीं
उनमें दी गई जानकारी और लेखकीय
क्षमता कई कारणों से एक सीमा
में बँधी थी.
ताराराम
की उक्त पुस्तक ने मेघ इतिहास
की कमी को कुछ हद तक दूर किया
है.
इस
क्षेत्र में अभी बहुत कार्य
होना है ऐसे संकेत
इस पुस्तक में ही मिल जाते
हैं.
आने
वाले समय में यह पुस्तक
इतिहासकारों का ध्यान खींचेगी
और संदर्भ प्रदान करेगी इसमें
संदेह नहीं.
यह
पुस्तक निश्चय ही मेघों के
गौरवशाली अतीत का स्वर्णिम
इतिहास और सांस्कृतिक इतिवृत्त
है.
निम्नलिखित सूचना श्री ताराराम जी ने ईमेल के ज़रिए 11-08-2014 को भेजी है. इसमें उक्त पुस्तक के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार श्री नवल वियोगी द्वारा व्यक्त विचार दिए गए हैं-
इन विद्वानों ने इस पुस्तक के बारे में कहा है-
(1)
मेघवंश
इतिहास और संस्कृति :
अँधेरे
को उजाले में बदल देगा -
डा.
नवल
वियोगी
 |
| Naval Viyogi |
लुधियाना;
22 जुलाई,
2013. श्री
तारा रामजी द्वारा रचित ग्रन्थ
"मेघवंश
इतिहास और संस्कृति"
भाग-2
का
आदि से अंत तक अध्ययन कर मुझे
अति हर्ष हुआ है। भारत के मूल
निवासियों को,
जिन्होंने
सिन्धु घाटी की महान सभ्यता
को जन्म दिया,
इतिहास
के अनेक मानक स्थापित किये,
उच्च
गरिमावाले राजवंश पैदा किये,
मनु
आदिक ब्राह्मण ऋषियों ने कठोर
कानून बना कर विद्या अध्ययन
पर रोक लगा दी और उन्हें अज्ञान
के गहन अँधेरे में धकेल दिया।
परिणाम स्वरुप उनमें अपने
अतीत के गौरव को अंकित करने
की परंपरा नहीं पनप सकी। यही
उनकी सबसे बड़ी समस्या है। मगर
यह बहुत ही प्रसन्नता की बात
है कि उक्त ग्रन्थ (मेघवंश
: इतिहास
और संस्कृति)
की
रचना कर तारारामजी ने उस परंपरा
को डंके की चोट पर तोडा है।
मुझे पूरा विश्वास है कि इसका
अध्ययन उनके गौरवशाली अतीत
के अँधेरे को उजाले में बदल
देगा और उनका सिर गौरव से उन्नत
हो जायेगा।
उक्त
रचना में विद्वान् साथी ने
मात्र मेघवंश की संस्कृति और
परम्पराओं को ही अंकित नहीं
किया है बल्कि उसमें अन्य अनेक
आदिवासी जातियों को भी शामिल
कर ज्ञान के घड़े को भरा है।
मैं
विद्वान् लेखक तारारामजी को
उनके इस सफल प्रयास पर बधाई
प्रेषित करता हूँ। इस रचना
की प्रशंसा मात्र विद्वान ही
नहीं,
विषय
से सम्बंधित हर व्यक्ति करेगा।
डॉ
नवल वियोगी,
निदेशक;
भारतीय
राष्ट्रीय ऐतिहासिक अनुसन्धान
समिति;
लुधियाना(पंजाब)
 |
दिल्ली में एक सम्मान समारोह के दौरान श्री नवल वियोगी (एकदम बाएँ) पधारे और उन्होंने श्री ताराराम (दाएँ से दूसरे) को बधाई दी. |
(2)
श्री माना राम बालोच, आई.एफ.एस.
(3)
श्री
हेमेंद्र चंदालिया के ब्लॉग
पर इस पुस्तक को इस प्रकार
वर्णित किया गया है-
"The
History of Meghvansh has been recorded in a number of writings by
prominent Dalit writers. 'Meghvansh : Itihas Aur Sanskriti' written
by Tararam is a set of two volumes. The author traces the history of
Meghwals to a ruling clan called Meghvansh which existed somewhere
around 220 – 320 AD.
Prof. Angane Lal, in his preface
to the book states that “Koshambi” has been the centre of the
Meghvansh’s territory. The relics discovered from the nearby
archaeological sites suggest that the Meghvanshis were followers of
Buddhism. The Meghvansh declined with the rise of Gupta dynasty. The
author describes in details various symbols, icons, coins associated
with the Megh dynasty during their rise as a power in some parts of
the country. Tara Ram writes in this book, “After the Nirvaan of
Buddha, he has been represented by the symbols of a tree, foot marks
and the religious Wheel (Dharmcakra). We find these symbols
in Amraavati during
the regime of Meghwan dynasty. Similar symbols are found in Koshambi,
Bandhogarh and Bheeta. Thus, it is clear that Meghwan dynasty and
Megh dynasty were the same; they had the same origin and the same
religious beliefs.
Most of
the Historians consider them Brahmin – born followers of Buddha.
But a historical analysis proves it wrong because the Varna system
which is so emphasized upon in the Vedic period gets slackened in the
Upanishad Era and in the Mauryan period which follow it. In the
Smriti Age the existence of all the Varna’s is seen. In the
meanwhile, it was assumed that the king will be either a Kshatriya or
a Brahmin. As a consequence even the Buddhist rulers were dubbed as
Kshatriya or Brahmin. In reality they were followers of Buddhism,
opponents of the Varna system and the supporters and propagators of
Pali tradition. Thus it is clear that the rule of Meghvansh continued
for a long time but due to their faith in the idea of a society
without the hierarchical division of the Varnas, their dynasty could
not be sustained for long. (Tararam 62-63)"
प्रकाशक:
सम्यक
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32/3,
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नई
दिल्ली-110063
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