"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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26 January 2018

Save the Constitution - संविधान बचाइए

31 जनवरी 2017 को मैने एक पोस्ट मेघ मानवता धर्म और संविधान धर्म पर की थी जो मेरे मित्र श्री जी.एल. भगत द्वारा लिखी गई एक पुस्तक के आधार पर थी. मेरे लिए वह एक नई अवधारणा थी जिसे समझने के लिए मुझे अपने अल्पज्ञान के साथ जूझना पड़ा. उसका एक कारण यह भी था कि जो मूल पुस्तक मुझे पढ़ने को मिली वो अंग्रेजी में थी और अंग्रेजी में मेरी अपनी सीमाएं हैं. इसका मुझे अफ़सोस रहेगा.

इन दिनों फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर करणी सेना के उत्पाती आंदोलन को सोशल मीडिया ने आड़े हाथों लिया है. इस हुड़दंगबाज़ी ने देश के उन बुद्धिजीवी नागरिकों को विचलित और उद्वेलित किया है जो संविधान में आस्था रखते हैं और संविधान की भावना को देश हित के लिए सर्वोपरि मानते हैं.

जब कभी संविधान और उसकी व्याख्या की बात आती है तो आपने भी देखा होगा कि रवीश के प्राइम टाइम में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा उपस्थित रहते हैं जो NALSAR, हैदराबाद के वाइस चांसलर हैं. धर्म और जाति के नाम पर यहाँ-वहाँ उत्पाती और हिंसक हो रहे युवाओं की बदइस्तेमाली पर भी प्राइम टाइम में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बेबाक़ राय दी है जो देखने लायक है. उनकी बातों से मुझे जी.एल. भगत की लिखी उक्त पुस्तक ‘कॉन्स्टिट्यूशनल सोशियो-कल्चर एंड इट्स कोड ऑफ ह्यूमन कंडक्ट (Constitutional Socio-Cultural and Its Code of Conduct’ की याद हो आई जिसे तब मैं सलीके से समझ नहीं पाया था.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने उन्हीं बात को हिंदी में बहुत खूबसूरत तरीके से समझाया और मैंने महसूस किया कि अब मैं पहले से अधिक जागरूक नागरिक हूँ. अब मैं सिविक रिलीजियन या संवैधानिक धर्म या संविधानवाद को समझ पा रहा हूँ. इसे देखने और समझने के लिए आप अपने जीवन के कुछ मिनट देंगे तो संविधानवाद के मायने समझ जाएँगे. बेहतर नागरिक बन जाएँगे. कार्यक्रमों का लिंक नीचे दिया है. 


31 January 2017

Megh Manavta Dharm and Constitutional Religion - मेघ मानवता धर्म और संवैधानिक धर्म

संविधान को लागू हुए 67 वर्ष हो चुके हैं लेकिन हर पढ़ा-लिखा नागरिक महसूस करता है कि भारतीय समाज संविधान की भावना के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है. जात-पात (जिसमें रंगभेद शामिल है), लिंग भेद, धर्म भेद, अवैज्ञानिक नज़रिया आदि अनेक समस्याएँ हैं जिनसे समाज पार नहीं पा रहा है. कुछ विचारधाराएँ समाज में हैं जो संविधान को ऐसे रूप में बदल लेना चाहती हैं जो साफ़ तौर पर वर्तमान संविधान के विरुद्ध दिखाई देता है.

उक्त पुस्तक ‘संविधान धर्म’ के सिद्धांत का प्रतिपादन करती प्रतीत होती है. धर्म के नाम पर लोग बहुत भावुक हो उठते हैं. जो भी उनकी धार्मिक वृत्ति या पसंद है उससे अलग कोई धर्म उनके समक्ष रखा जाए तो वे आशंकित हो उठते हैं कि कहीं उन पर कोई नया धर्म तो नहीं थोपा जा रहा या किसी नए विचार से उनका धर्म प्रदूषित तो नहीं हो जाएगा, वगैरा-वगैरा. ये ख़तरे हम तब भी महसूस करते हैं जबकि हम भारत के नागरिकों ने ख़ुद को एक बहुत बढ़िया और मज़बूत संविधान दिया हुआ है.

कुछ वर्ष पहले मेरे एक पुराने मित्र श्री जी. एल. भगत, आयकर आयुक्त (सेवानिवृत्त) ने ‘Scheduled Castes As A Separate Religion’ के नाम से एक आलेख Part-1 और Part-2 मुझे भेजा था जिसे मैंने पढ़ा तो था लेकिन उसकी अवधारणा (concept) तब मेरी समझ में नहीं आई थी. तीन दिन पहले वे खुद चंडीगढ़ आए. उन्होंने बामसेफ के कुछ पदाधिकारियों से उक्त आलेख में बताए गए ‘मेघ मानवता धर्म’ की अवधारणा पर बातचीत की. मैं भी उस बातचीत का हिस्सा बना.

पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी प्रस्तुत अवधारणा पर बहुत कार्य किया है और एक ‘कॉन्स्टिट्यूशनल सोशियो-कल्चर एंड इट्स कोड ऑफ ह्यूमन कंडक्ट (Constitutional Socio-Cultural and Its Code of Conduct’ नाम से एक पुस्तक अंग्रेज़ी में तैयार की है जिसमें ‘मेघ मानवता सोशियो कल्चरल सोसाइटी’ नामक संस्था के गठन का उल्लेख है जिसका एक संविधान बनाया है. उन्होंने बताया कि इस सोसाइटी की विचारधारा का विस्तार केरल, तमिलनाडु, गुजरात आदि राज्यों में भी किया है. सोसाइटी का रजिस्टर्ड कार्यालय मुंबई में है. इस सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी (Socio-Cultural Society) का मुख्य उद्देश्य भारत में ऐसे समाज का निर्माण करना है जो भारत के संविधान के अनुसार जन-जन में ऐसा मानवीय व्यवहार विकसित करें जो संविधान सम्मत हो और साथ ही उसकी रक्षा करने के क़ाबिल हो. ज़ाहिर है कि इस सोसाइटी का वैचारिक परिप्रेक्ष्य (Ideological Perspective) बहुत बड़ा है. इस संबंध में दो विरोधाभासी मत देखने को मिलते हैं. कोई कहता है कि जो संविधान को मानता है उसे किसी अलग धर्म की कोई जरूरत नहीं. दूसरा कह देता है कि संविधान कोई धर्म नहीं है. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विचार भी इस बारे में अंतर्विरोधों (internal contradictions) से भरे हो सकते हैं आखिर वे भी सामाजिक प्राणी हैं. परस्पर विरोधी दिखने वाले इन विचारों से एक बात स्पष्ट है कि संविधान में धर्म जैसी कोई चीज है तो ज़रूर और अगर नहीं है तो भी उसके अपने संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values) तो हैं ही जो किसी धर्म से कम नहीं हैं बशर्ते कि संविधान की भावना को धारण कर लिया जाए. क्या हमारे वर्तमान समाज में उसकी काबलियत है?

उक्त पुस्तक में ‘मेघ मानवता’ शब्द के अर्थ की पृष्ठभूमि को भी स्पष्ट किया गया है. बताया गया है कि ‘मेघ मानवता’ शब्द भारत में प्रचलित जजमानी प्रथा से पहले की सभ्यता से संदर्भित है. ‘मेघ मानवता’ बुद्ध से पहले अस्तित्व में थी. आज उसी धर्म को सत्यमत, बुद्धिज्म का नाम दिया गया है. मैगी (Magis) और शाक्य बुद्ध से पहले भी अस्तित्व में थे और बुद्ध उस धर्म के नायक हुए. पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि महावीर मेघ समुदाय से थे और नवल वियोगी ने उल्लेख किया है कि महावीर जैन की एक बहन मेघ परिवार में ब्याही गई थी.

लेखक ने बताया है कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी बुद्ध, कबीर, नानक, रविदास, घासीदास, फुले, अंबेडकर और अन्य संतों, सूफी संतों और सामाजिक क्रांतिकारियों, वीर नारायण सिंह और अन्य दबाए गए कबीलों के योद्धाओं की विचारधारा को मानती है.

पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि हिंदू धर्म विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं का जुड़ाव है इसी लिए उसे ‘जीवन-शैली (Way of Life)’ कहना पड़ता है. लेकिन यह ‘जीवन शैली’ शब्द चंद जाति समूहों के लिए सुविधाजनक है तो कुछ के लिए नहीं है. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के अधिकार पर पुस्तक काफी स्पष्ट होकर अपनी बात कहती है. इस सोसाइटी का स्वरूप धार्मिक कैसे है और ‘संवैधानिक धर्म’ शब्द इस्तेमाल क्यों किया गया है उसे स्पष्ट करने के लिए ‘थियोसोफिकल सोसायटी ऑफ वर्ल्ड’ में दी गई शर्तों की बात पुस्तक में की गई है. दावा किया गया है कि उन शर्तों की नींव पर ही ‘मेघ मानवता सामाजिक-सांस्कृतिक सोसाइटी’ का गठन हुआ है।

इसी संदर्भ में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक सिद्धांतों की तर्ज़ पर सोसाइटी के 52 संकल्पों (Resolutions) का उल्लेख है जो इस सोसाइटी को वैचारिक आधार देते हैं। अंत में हम सबका ख़ुद से यह पूछना तो बनता है कि एक सोसाइटी, जिसका आकार चाहे फिलहाल सीमित-सा हो, वह संविधान में उदित होते एक धर्म का अस्तित्व क्यों नहीं देख सकती जो पूरे भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी हो?


21 December 2015

Megh Rishi - मेघ ऋषि

बचपन से सुन रखा था कि हमारा मेघ भगत समुदाय किसी ''मेघ ऋषि'' के वंश का माना जाता है. मैंने भी अपने पिता जी से यही सुना था. मेघवंश के इतिहासकार श्री ताराराम ने लिखा है कि भारत भर के मेघवंशी अपने वंशकर्ता का नाम ''मेघ ऋषि'' बताते हैंआर.एलगोत्रा जी ने अपने अध्ययन में मेघ ऋषि या वृत्र को सप्तसिंधु का पुरोहित नरेश पाया है जिसकी प्रभुता का प्रभाव झेलम से यमुना और दक्षिण में नर्बदा तक फैला थावे लिखते हैं :-

"The Pre-Aryan people followed or supported the ‘Megh Rishi’, called as 'Vritra' in the Rig-Veda hymns. Vritra became the emperor of 'Sapta Sindhu', as the minor kings in that geographical region stretching from Kabul (Afghanistan) in the North to Narbada River in the South appeared to have accepted his suzerainty. From East to the West, this region extended mostly over the area commanded by seven rivers viz. the Sindh, Satluj, Beas, Ravi, Chenab, Jhelum, and Yamuna."


गोत्रा जी ने इस कथा के सूत्र ऋग्वेद में बताए हैं जिसके पक्ष में उन्होंने वेद मंत्रों का हवाला भी दिया हैमेघों के इतिहास का यह महत्वपूर्ण पृष्ठ बहुत देर से खाली पड़ा था जो अब धीरे-धीरे भरने लगा है.

मेघ वंश के लोगों का शिक्षा का अधिकार सदियों तक छिना रहा. उनके बारे में जो लिखा वह आर्यों (ब्राह्मणोंने लिखामेघ ऋषि या प्रथम मेघ (राजाअधिपतियानि वृत्र या (नागमेघ के बारे में जो भी लिखा वह मेघ वंश के लोगों ने नहीं बल्कि आर्य ब्राह्मणों ने लिखा और चूँकि उनकी लिखी कथा-कहानियों में मेघ ऋषि को आर्य ब्राह्मणों का शत्रु दिखाया गया है इस लिए मेघ ऋषि के बारे में जो लिखा गया उतना ही लिखा गया और वैसा ही लिखा गया जैसा आर्य ब्राह्मण अपने गौरव के हित में चाहते थेमेघ ऋषि के नाम पर मेघों के पास केवल इतनी ही पूँजी बची कि मेघ ऋषि उनके अग्रणी माने जाते थे जो युद्ध में इंद्र (आर्यों के सेना नायकसे हार गए थे.

सदियों तक शिक्षा से वंचित रहने के बाद अब शिक्षित हो रहे मेघ वंश के लोग अपने पूर्वज मेघ ऋषि की सुध लेने की हालत में आ गए हैं. वैदिक कथा के कुछ अर्थ खोद-खोद कर निकाले गए हैंनई जानकारियाँनए विचार सामने आए हैंजिस प्रकार यादवों ने अपने पूर्वज महिषासुर को पहचाना और उसकी कथा नए सिरे से लिख कर उसका सम्मान करना शुरू किया है वैसे ही कुछ मेघों ने अपने पूर्वज मेघ ऋषि को पहचान कर उसके नए बिंब (imagesखड़े किए हैं जो चमकदार हैं.

मेघ ऋषि को अपना आदि पुरुष मानने वाले मेघ उसकी कल्पना अपने-अपने तरीके से करते रहे हैंकोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं थी लेकिन कल्पना की जाती रही है कि वह कोई जटाधारीभगवा कपड़े पहने एक ऋषि रहा होगा जो पालथी लगा कर जंगल में तपस्या करता होगाहमारी इस प्रकार की कल्पना का आधार विभिन्न धार्मिक पुस्तकेंकॉमिक्सया अन्य पुस्तकेंसुनी-सुनाई बातें ही होती हैंआमतौर पर मेघ ऋषि की कल्पना 'मेघयानि बादलया किसी ऋषि के बारे में पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर की जाती है या डिक्शनरी में अर्थ देख कर उसकी कल्पना होती रहेगी क्योंकि उसे देखा तो किसी ने है नहींऐसी ही देखी-दिखाई या काल्पनिक छवियों और इमेजिज़ के आधार पर गढ़ाजालंधर में एक मेघ सज्जन श्री सुदागर मल 'कोमल' ने अपने देवी के मंदिर में मेघ ऋषि की मूर्ति स्थापित की हैउन्होंने बताया है कि उन्होंने एक पौराणिक कथा से प्रेरित हो कर और उसके आधार पर वह मूर्ति बनवा कर लगवाई हैयह मूर्ति एक सिद्ध ऋषिसिद्ध संन्यासी के रूप में है. संभव है इस कथा की जड़ें महाभारत में हों.
Megh Rishi मेघ ऋषि
जयपुरराजस्थान के गोपाल डेनवाल जी ने बिना भगवा वाली मेघ ऋषि की मूर्ति के साथ जयपुर में मेघ ऋषि मंदिर स्थापित किया है जिस पर कुछ वर्ष पूर्व तक कार्य चल रहा है. डेनवाल जी ने बताया था कि तीन-चार अन्य स्थानों पर ऐसे मंदिरों पर काम हो रहा थाहरबंस लाल लीलड़ जी ने अबोहर में एक चौक पर मेघ ऋषि की मूर्ति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जहाँ हर साल 16 दिसंबर को एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है.

यह जान लेना बेहतर होगा कि मेलुक्ख (मुअन जो दाड़ो, मोहंजो दाड़ो) सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए एक पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 .पू. (कुछ विद्वानों ने इसे 1700 वर्ष ई.पूकी बताया हैकी एक प्रतिमा जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियमकराचीमें रखी है उसकी इमेज या छवि का प्रयोग गोपाल डेनवाल ने जयपुर स्थित मेघ मंदिर में किया हैउसी इमेज में मामूली परिवर्तन करके उसे मेघसेना (जो उनका ही संगठन हैके सुप्रीम कमांडर की छवि तैयार की है. चूँकि आधुनिक इतिहासकारों ने मोहंजो दाड़ो सभ्यता और मेघवंश से संबंधित तथ्यों को स्थापित कर दिया है इसलिए मंदिर में स्थापित हो कर मेघ ऋषि की पावनऐतिहासिक और मानव सुलभ पवित्र छवि उभर कर आई है. मेघ ऋषि और मेघ भगवान की आरतियाँमेघ-चालीसामेघ-स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई गई हैं. इस बारे में अग्रणी भूमिका निभाने का श्रेय विशेष तौर पर गोपाल डेनवाल जी और आर.पी. सिंह जी को जाता है.

मेघ रिख पर शोध करके डॉक्टरेट की डिग्री पा चुके कराची के डॉमोहन देवराज थोंट्या ने अपनी खोज पर लिखते हुए इस तथ्य का ज़िक्र किया है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मध्ययुगीन इतिहास के महान मेघवार व्यक्तित्वों के वास्तविक होने पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैंसामान्यतः लोग आस्था रखते हैं कि मेघ रिख (मेघ ऋषि) सभी मेघवारों में एक पूजनीय व्यक्तित्व हैमेघवार ख़ुद को उसी महान संत/ऋषि का वंशज मानते हैंडॉथोंट्या एक आलेख में लिखते हैं:-

"Several aspects of Meghwar history and history of its literature are so shrouded into mist that we cannot differentiate the porous border of the historical events and the mythological beliefs where the Pauranic references have been diffused into the historical facts. So is the case with the great Meghwar personalities who lived historical lives in the medieval history of Indian Subcontinent. We encounter difficulties when the identity of Megh Rikh, Megh Dharu, Megh Mahya or Meghwar itself is questioned. In this article we will try to understand the historical identity of Megh Rikh and Megh Dharu. There is a common belief that Megh Rikh was the prime ancestor of Meghwar. In the Meghwar traditional literature and oral stories, he is considered as the most revered personality among all the Meghwars alike. Meghwar consider themselves as the descendants of this great saint."

हालाँकि ऐसा देखा नहीं गया कि उत्तर-पश्चिम भारत में आमतौर पर कहीं मेघ ऋषि की पूजा होती हो लेकिन गुजरात के मेघवारों के बारमतिपंथ में मेघ रिख (ऋषिएक पूजित विभूति के रूप में सदियों से मौजूद रहे हैंवहाँ की मान्यता के अनुसार मेघ रिख का अस्तित्वकाल चाहे विवादित हो लेकिन मेघ रिख उनकी पूजा पद्धतियों में है इसमें संदेह नहींबावजूद इसके परंपरा मान्य इतिहास पुरुष मेघ रिखमेघ धारु यहाँ तक कि मेघवार पर भी सवाल उठाए जाते हैं सिर्फ इसलिए कि उसके बारे में कहीं न कहीं कोई एक धुँधली (शायद शरारती-सी भी) पौराणिक कथा विद्यमान है. उस पर कुछ इतिहासकारों ने पौराणिक कथा और इतिहास का ऐसा घाल-मेल कर दिया है कि मेघ रिख की साफ़-साफ़ निशानदेही मुश्किल हो गई है. इसलिए सवाल तो रहेंगेलेकिन अपने पूर्वजों का सम्मान करने का हक सभी को हैइस बात से कौन इंकार कर सकता है.

(विशेष नोट :मेघ वंश एक व्यापक अर्थ वाला और अनेकार्थी शब्द हैमेघ वंश में कई अलग-अलग जातियाँ हैंउन जातियों में मेघ ऋषि एक लोक-स्मृति (पब्लिक मेमोरी) के रूप में विद्यमान एक साझा पूर्वज हैमेघ ऋषि की पहचान करने में डॉध्यान सिंह, श्री नवीन भोइया (गुजरात) ने सहायता कीउनका आभार.)

(इस पेज/ब्लॉग का मक़सद किसी धार्मिक विचारधारा का मंडन या खंडन करना नहीं है.)

30 June 2014

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग-2 - समीक्षा

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति - लेखक : ताराराम

पुस्तक समीक्षा

जितना आपका अधिकार अपने जीवन इतिहास पर है उतना ही मेरा भी अपने इतिहास पर है. लेकिन धन्य हैं वे इतिहासकार जो अपना और दूसरों का इतिहास ढूँढते हैं, जानते हैं और लिखते हैं.

पढ़ाए जा रहे इतिहास को एक विश्वसनीय दस्तावेज़ होना चाहिए. लेकिन भारत में सदियों से यह दस्तावेज़ीकरण बेइमानी का भी शिकार हुआ. अब आकर स्वतंत्र भारत के लोगों को लगने लगा है कि इतिहास का 'निर्ब्राह्मणीकरण (debrahmanisation)' करने की आवश्यकता है.

इतिहास से गुम मेघवंशी लोग पिछले लगभग 150-200 वर्ष से अपने इतिहास के बारे में अत्यधिक जिज्ञासु हुए हैं जिसका कारण उनमें शिक्षा का प्रचार-प्रसार है. इसका श्रेय निस्संदेह लॉर्ड मैकाले और उसके साथी अंग्रेज़ों को जाता है जिसने वंचितों के लिए शिक्षा का मार्ग खोला. दूसरी ओर अभी तक इतिहास में वर्णित अंधकारकाल (Darkages) में कई इतिहासकारों की रुचि जगी है. इससे भी मेघों के इतिहास की गवेषणा को गति मिली है. इसका श्रेय लॉर्ड कन्निंघम जैसे पुरातत्त्ववेत्ताओं को जाता है जिन्होंने सिंधुघाटी सभ्यता को खोज निकाला और कई तथ्य उजागर किए. उनके ही वैज्ञानिक कार्य के कारण नागवंशियों और मेघवंशियों ने अपनी सभ्यता के दर्पण को पहचानना शुरू किया है जिस पर पौराणिक कथाओं की सांस्कृतिक धूल जमी थी.

भारत में इतिहास लेखन की शास्त्रीय परंपरा की जड़ें अपने आश्रयदाता के गुणगान में हैं जो अंततः पौराणिक कथा या दरबारी काव्य से अधिक महत्व की नहीं रह जातीं. ऐसी रचनाएँ लोक को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देतीं. यह काफी सुखद है कि कई आधुनिक इतिहासकार नए दृष्टिकोण के साथ आए हैं जिन्होंने परंपरागत इतिहास की प्रचलित मान्यताओं को चुनौती दी है.

सदियों से पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जा रहे इतिहास ने भारत की अधिकांश जनसंख्या को ठगा है. यह एक ऐसा विषय है जिसमें व्यक्ति अपनी पहचान पा कर गौरव महसूस करने का अवसर पाता है. शेष को हैरानगी होती है कि क्या उसके समुदाय/समूह में किसी ने भी स्मरण रखने योग्य कोई कार्य नहीं किया? एक पक्षीय इतिहास जनमानस को समुचित उत्साह से नहीं भरता बल्कि कड़ुवाहट देता है. यही कारण है कि ज्यों-ज्यों भारत में शिक्षा का प्रसार हो रहा है त्यों-त्यों यह विचार प्रबल हो रहा है कि भारत के वास्तविक इतिहास को वैज्ञानिक आधार पर और संतुलित तरीके से पुनः लिखने की आवश्यकता है. आजकल पाठ्यक्रमों में शामिल ज्योतिराव फुले आदि से संबंधित जानकारी इसी बात को प्रमाणित करती है.

जहाँ तक मेघों के इतिहास का प्रश्न है इसके लेखन के कुछ प्रयास पहले भी हुए हैं. यह लेखन मेघवंशियों ने ही किया. इधर एक मेघवंशी श्री ताराराम द्वारा लिखित "मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग-1" पढ़ा था. इस पुस्तक में मेघवंश के प्राचीन इतिहास और मेघवंशी राजाओं के अस्तित्व की ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ खोजबीन की गई थी. इसके सौजन्य से मेघवंश के लगभग गुम इतिहास का एक चमकदार हिस्सा प्रकट हुआ.

इसी सिरीज़ के "मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग-2” में अब 'मेघ संस्कृति' पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है. लेखक ने जिस भाषा में इसे लिखा है वह विषय के अनुरूप है और उसमें राजस्थानी छुअन है. यह काफी वस्तुपरक दृष्टिकोण से लिखा गया है. तथ्यों, संदर्भों, अनुमान, प्रमाण और लोक-संस्कृति से प्राप्त जानकारियों का भरपूर प्रयोग इसमें हुआ है.

यह पहली बार है कि किसी पुस्तक ने इस बात को स्थापित किया हो कि भारत के कई राज्यों में मेघवंशी लोग मेघ, मेघवाल, मेघवार, मेंघवाल, मेघवल, कबीरपंथी, आदि नामों से न केवल अधिसूचित हैं बल्कि भारत के लगभग सभी राज्यों में विभिन्न नामों से बसे हैं. यह सारे भारत में निवास करने वाला एक विशिष्ट प्राचीन समाज है.

विषय के ताने-बाने को देखें तो इस पुस्तक के अध्याय-1 में हिंदूधर्म में मेघवंश की हीन दशा का चित्रण है और व्याख्या भी. ये वाक्य अपने आप में काफी कुछ समेटे हुए हैं- "अपने आप में एक पृथक समूह होने व विशिष्ट मान्यताओं को अपनाने के कारण ही यह एक अलग जाति बनीं. ......तत्कालीन समाज व्यवस्था में ऐसे ध्वजाहत दासों की निम्नतर स्थिति बनाने में 'स्मृति युग' ने आग में घी डालने का काम किया. .......मेघवंश के पतन के बाद पराजित मेघ राजाओं और उनकी प्रजा के सामने भी ऐसे ही विकल्प थे. इतिहास साक्षी है कि ‘मेघवंश‘ ने अपनी संस्कृति की अक्षुण्णता बनाए रखने हेतु अमानवीय शर्तों के अधीन भी रहना स्वीकार किया." सर्वदा अध्यात्म सुखभोगी मेघों के दुखते मर्म पर यह सबसे सशक्त टिप्पणी है. राजस्थान में सामन्तों, जागीरदारों, महाजनों, दलालों, बिचौलिओं और अंग्रेज़ों की मिली भगत ने कतारिए मेघवालों के लिए ऐसी दर्दनाक स्थिति पैदा कर दी थी कि उसे इस अध्याय में लेखक काफी जगह देने के लिए बाध्य हुआ है. लेखक ने स्पष्ट किया है कि मेघों को कोई राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नहीं था.

दूसरे अध्याय में मेघों के धार्मिक रीति-रिवाजों का वर्णन है. यहाँ लेखक ने देवरे का ज़िक्र किया है (जिसे जम्मू-कश्मीर में देहुरी या डेरी कहा जाता है). बताया गया है कि इस समाज ने अपने ‘आराध्य-स्थल‘ को कभी भी मंदिर, मस्जिद या मठ के अर्थ में नहीं माना. इनके संत पुरुषों या सिद्धों के ध्यान-विपश्यना स्थल को ये 'धूणी' कहते हैं और ऐसे पुरुषों की यादगार में बनाए जाने वाले पूजा स्थल (मंदिरनुमा या मठनुमा आकृतियों) को ‘देवरा‘ कहते आए हैं. प्रत्येक मेघवाल कुनबे की अलग-अलग 'कुल देवी' होती हैं. अपने मंगल कार्यों के लिए देवी को ये लोग ‘जोत‘ करते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं और बकरे की बलि भी देते हैं. कुछ खापें (गोत्र) अपनी कुलदेवी को 'चूरमा' (मीठा) प्रसाद चढ़ाती हैं. इस वर्णन से भी स्पष्ट हो जाता है कि यह पूजा पद्धति देश भर के मेघवंशियों में है और इसका स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप मामूली अंतर के साथ वही है.

तीसरे अध्याय में सांस्कृतिक मूल्यों का विवरण दिया गया है. इसमें मेघवंशियों के खानपान, भोजन के नियम, व्रत-उपवास, वेशभूषा, उजोवणा-निमंत्रण, साख्या या साकिया, मरणासन्न मान्यताओं, अंतराभव, शंखोद्धार या संकोढ़ाल, वैशाख स्नान और सांस्कृतिक मूल्यों (खानपान, भोजन-नियम, पगड़ी धारण, आभूषण, गृहनिर्माण परंपरा, वाद्य यंत्र, रोशनी, सफाई-पानी की व्यवस्था, पीळा औढ़ना आदि का वर्णन किया गया है. मेरे विचार से इस प्रकार का इतना विस्तृत विवरण प्रकाशित रूप में पहली बार देखने में आया है. चौथे अध्याय में बताया गया है कि मेघवाल समाज को कई जगह बांभी कहा जाता है. इसमें उनकी जीवन शैली का चित्रण है जो पढ़ने योग्य है. इसमें उत्तर भी हैं और सवाल भी.

यह पुस्तक इस बात को रेखांकित करती है कि मेघ जाति से संबंधित सभी परंपराएँ मेघ नामक पुरुष/ऋषि के वंशधरों की विरासत से आई हैं. इन परंपराओं को बढ़ाने वाले ये लोग एक ही वंश से हैं.

लेखक ने इतिहासकारों जैसे डॉ. नवल वियोगी, के. पी. जायसवाल आदि के हवाले से सिद्ध किया है कि मेघवंश का उत्थान कोसल, कन्नौज के राजा विमलचन्द्रपाल के पोते मेघचन्द, गंधार-कश्मीर से और राजस्थान के प्राचीन भू-भाग से हुआ है. लेखक का मत है कि ऐतिहासिक रूप से कोसल-बघेलखंड इस जाति के उत्थान का सुस्पष्ट उद्गम स्थान है जबकि गंधार-कश्मीर में 6ठी शताब्दी के बाद के प्रमाण मिलते हैं. एक निष्कर्ष के तौर पर लेखक इस बात को मानता है कि तथ्यों के आधार पर मेघवंश का उद्गम कोसल से है, जो उस समय सिंधुघाटी सभ्यता का ही एक प्रमुख भू-भाग था. मेघ लोग वहीं से भारत के विभिन्न भू-भागों में आए-गए और वहीं के निवासी बन गए.

लेखक ने बताया है कि मेघवंश एक प्राचीन क्षत्रिय वंश था. यह क्षत्रियों से उत्पन्न हिंदू धर्म की कोई जाति नहीं थी. उनकी जाति आधारित हीनता का कारण उनके हिंदू धर्म में शामिल होने की प्रक्रिया में है. मेघवंशी अपनी मान्यताओं और विश्वासों पर डटे रहे और कालांतर में राजनीतिक लड़ाइयाँ हारने के कारण हिंदू धर्म की हीन जातियों में शामिल हो गए और दासत्व को प्राप्त हुए. अधिकांश मेघों ने कपड़े बुनने के कार्य में ही अपने को लगाया और यह उनका पुश्तैनी धंधा बनकर उभरा.

आज़ादी के बाद पैदा हुए अधिकतर मेघ युवा इस तथ्य को सहज स्वीकार नहीं कर पाते कि अतीत में उनके पराजित समाज के पास जीवित रहने के लिए दासत्व स्वीकारने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. बड़े-बूढ़े मेघ आज भी उलझन में हैं कि - "हम कौन हैं......कहाँ से आए हैं....." और अंततः इस दार्शनिक प्रश्न पर अटक जाते हैं कि - "......हम कहाँ जाएँगे?". इसका मुख्य कारण यह है कि सदियों तक मेघों का इतिहास न लिखा गया, न पढ़ाया गया, न ही उनकी कोई कहानी थी जो उनके जीवित भर रहने के संघर्ष से अलग होती. यदि कोई गौरवपूर्ण इतिहास था तो वह अंधकारकाल के पृष्ठों में दफ़्न था. इस पुस्तक का कथ्य आधुनिक मेघ समाज को अहसास करा जाता है कि मेघवंशियों ने वैदिक कर्म-कांडों और ब्राह्मणी-वितंडावाद से हमेशा दूरी बनाए रखी.

यह पुस्तक मेघों की गोत्र प्रणाली और धार्मिक रीति रिवाज़ों पर भी प्रकाश डालती है और उनकी 'कुलदेवी पूजा' सहित कई मान्यताओं का मूल बौध धर्म और सिद्ध परंपरा में देखती है. सामाजिक परंपराओं और रीतियों में खाप (गोत्र) का महत्व और स्वरूप इसमें बख़ूबी उभर कर आया है.

इससे पूर्व इने-गिने मेघवंशियों ने 'मेघवंश/मेघों का इतिहास' लिखने का प्रयास किया. जो पुस्तकें उन्होंने लिखीं उनमें दी गई जानकारी और लेखकीय क्षमता कई कारणों से एक सीमा में बँधी थी. ताराराम की उक्त पुस्तक ने मेघ इतिहास की कमी को कुछ हद तक दूर किया है. इस क्षेत्र में अभी बहुत कार्य होना है ऐसे संकेत इस पुस्तक में ही मिल जाते हैं. आने वाले समय में यह पुस्तक इतिहासकारों का ध्यान खींचेगी और संदर्भ प्रदान करेगी इसमें संदेह नहीं.

यह पुस्तक निश्चय ही मेघों के गौरवशाली अतीत का स्वर्णिम इतिहास और सांस्कृतिक इतिवृत्त है.

निम्नलिखित सूचना श्री ताराराम जी ने ईमेल के ज़रिए 11-08-2014 को भेजी है. इसमें उक्त पुस्तक के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार श्री नवल वियोगी द्वारा व्यक्त विचार दिए गए हैं-



इन विद्वानों ने इस पुस्तक के बारे में कहा है-

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मेघवंश इतिहास और संस्कृति : अँधेरे को उजाले में बदल देगा - डा. नवल वियोगी

Naval Viyogi
लुधियाना; 22 जुलाई, 2013. श्री तारा रामजी द्वारा रचित ग्रन्थ "मेघवंश इतिहास और संस्कृति" भाग-2 का आदि से अंत तक अध्ययन कर मुझे अति हर्ष हुआ है। भारत के मूल निवासियों को, जिन्होंने सिन्धु घाटी की महान सभ्यता को जन्म दिया, इतिहास के अनेक मानक स्थापित किये, उच्च गरिमावाले राजवंश पैदा किये, मनु आदिक ब्राह्मण ऋषियों ने कठोर कानून बना कर विद्या अध्ययन पर रोक लगा दी और उन्हें अज्ञान के गहन अँधेरे में धकेल दिया। परिणाम स्वरुप उनमें अपने अतीत के गौरव को अंकित करने की परंपरा नहीं पनप सकी। यही उनकी सबसे बड़ी समस्या है। मगर यह बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि उक्त ग्रन्थ (मेघवंश : इतिहास और संस्कृति) की रचना कर तारारामजी ने उस परंपरा को डंके की चोट पर तोडा है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसका अध्ययन उनके गौरवशाली अतीत के अँधेरे को उजाले में बदल देगा और उनका सिर गौरव से उन्नत हो जायेगा।

उक्त रचना में विद्वान् साथी ने मात्र मेघवंश की संस्कृति और परम्पराओं को ही अंकित नहीं किया है बल्कि उसमें अन्य अनेक आदिवासी जातियों को भी शामिल कर ज्ञान के घड़े को भरा है।

मैं विद्वान् लेखक तारारामजी को उनके इस सफल प्रयास पर बधाई प्रेषित करता हूँ। इस रचना की प्रशंसा मात्र विद्वान ही नहीं, विषय से सम्बंधित हर व्यक्ति करेगा।

डॉ नवल वियोगी, निदेशक; भारतीय राष्ट्रीय ऐतिहासिक अनुसन्धान समिति; लुधियाना(पंजाब)
दिल्ली में एक सम्मान समारोह के दौरान श्री नवल वियोगी (एकदम बाएँ)
पधारे और उन्होंने श्री ताराराम (दाएँ से दूसरे) को बधाई दी.
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श्री माना राम बालोच, आई.एफ.एस.


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श्री हेमेंद्र चंदालिया के ब्लॉग पर इस पुस्तक को इस प्रकार वर्णित किया गया है-

"The History of Meghvansh has been recorded in a number of writings by prominent Dalit writers. 'Meghvansh : Itihas Aur Sanskriti' written by Tararam is a set of two volumes. The author traces the history of Meghwals to a ruling clan called Meghvansh which existed somewhere around 220 – 320 AD. Prof. Angane Lal, in his preface to the book states that “Koshambi” has been the centre of the Meghvansh’s territory. The relics discovered from the nearby archaeological sites suggest that the Meghvanshis were followers of Buddhism. The Meghvansh declined with the rise of Gupta dynasty. The author describes in details various symbols, icons, coins associated with the Megh dynasty during their rise as a power in some parts of the country. Tara Ram writes in this book, “After the Nirvaan of Buddha, he has been represented by the symbols of a tree, foot marks and the religious Wheel (Dharmcakra). We find these symbols in Amraavati during the regime of Meghwan dynasty. Similar symbols are found in Koshambi, Bandhogarh and Bheeta. Thus, it is clear that Meghwan dynasty and Megh dynasty were the same; they had the same origin and the same religious beliefs.

Most of the Historians consider them Brahmin – born followers of Buddha. But a historical analysis proves it wrong because the Varna system which is so emphasized upon in the Vedic period gets slackened in the Upanishad Era and in the Mauryan period which follow it. In the Smriti Age the existence of all the Varna’s is seen. In the meanwhile, it was assumed that the king will be either a Kshatriya or a Brahmin. As a consequence even the Buddhist rulers were dubbed as Kshatriya or Brahmin. In reality they were followers of Buddhism, opponents of the Varna system and the supporters and propagators of Pali tradition. Thus it is clear that the rule of Meghvansh continued for a long time but due to their faith in the idea of a society without the hierarchical division of the Varnas, their dynasty could not be sustained for long. (Tararam 62-63)"


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भारत भूषण भगत


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