"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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18 February 2021

Ladder of Caste - जाति की सीढ़ी

पिछले तीन वर्ष से मेरे एक परिचित हैं, श्री जतिंदर सिंह, हरियाणा से हैं. उनके नज़रिए से (मेरे भी) एक महत्वपूर्ण विषय को लेकर वे तीन बार चर्चा के लिए मेरे यहां आए हैं. वे जानना चाहते हैं कि क्या मेघ जाति को ओबीसी की सूची में रखने के लिए कुछ किया जा सकता है. विषय मेरी पसंद का है इस लिए चर्चा भी ख़ूब हुई.

उन्होंने मुझे इस बारे में ब्लॉग लिखने और कुछ लोगों से संपर्क करने के लिए कहा. मैंने किया ताकि इस विषय में कोई रास्ता दिखे. मैंने कुछ जानकारों से बात की. लोगों से शेयर किया, फ़ोन किए. अब इस विषय पर अपनी लगभग आखिरी बात रिकॉर्ड कर रहा हूं. 

आज किसी जाति को एक सूची से निकाल कर दूसरी में डलवाना आसान प्रक्रिया नहीं है. ओबीसी जातियों की पहचान का कार्य राज्य सरकारें करती हैं और अनुसूचित जातियों की पहचान का कार्य केंद्र सरकार का है. केंद्र में इनसे संबंधित विभिन्न आयोग भी बने हुए हैं. यदि कोई जाति समाज में बनी जातियों की सीढ़ी पर चढ़ना या उतरना चाहती है तो इस बाबत संसद में सवाल उठते हैं. श्री जतिंदर सिंह अक्सर यह पूछते हैं कि क्या हमारे आईएएस अधिकारी इस बारे में सहायता कर सकते हैं? शायद कुछ मदद कर सकें. लेकिन निर्णय राजनीतिक स्तर पर होता है.

विशेषकर उत्तरी पंजाब में बसी मेघ जाति के पास राजनीतिक प्रतिनिधित्व लगभग है ही नहीं. राजनीति में उनके कुछ सितारे लगता है जल्दी उभरेंगे. इसलिए वर्तमान सामाजिक स्थिति में फिलहाल रहना होगा. आगे क्या होगा वह राजनीति तय करेगी. बाकी सब अनुमान या हमारे परेशान मन के विषय हैं. व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर मेघ समुदाय उच्चतर सामाजिक स्टेटस का हक़दार है.

सॉरी जितेंद्र सिंह जी, राजनीति में मैं कमज़ोर बच्चा हूँ.


31 July 2019

A matter for consideration - मुद्दा तवज्जो के लिए

ख्यालों के जंगली घोड़ों को बाँधना नहीं चाहता. मुद्दा बार-बार किसी बहाने से सामने आ जाता है इस लिए यह नोट तैयार करके कुछ लोगों को विचारार्थ दिया है. बाकी समय बताएगा.

जब हमारे मेघ समाज के सबसे पहले शिक्षित हुए दो-एक लोगों मे से एक एडवोकेट हंसराज भगत और अन्य प्रबुद्ध जनों ने मेघ समुदाय को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न किए थे तब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से इस मायने में अलग थीं कि उस समय ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ की सूचियाँ बनाने की कोई बात नहीं हो रही थी. अपने समाज के लिए कुछ राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएँ  जुटाने के लिए हंसराज भगत के प्रयासों के बाद सर छोटूराम की सरकार का लिया गया फैसला उचित ही था कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन और सामाजिक व्यवस्था द्वारा सीमाओं में बाँधे गए मेघों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया. भूलना नहीं चाहिए कि मेघों के अत्यंत खराब आर्थिक और सामाजिक हालात का मुख्य कारण जम्मू में फैली प्लेग की महामारी और अकाल की स्थितियाँ भी रहीं. अंग्रेज़ों के शासन के दौरान औद्योगीकरण ने मेघों को भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर दिया. मेघ कृषक, कृषि श्रमिक और बुनकर रहे हैं.

मेघ कब से बुनकरी का कार्य कर रहे हैं इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि यह समाज कभी क्षत्रिय रहा है. ये प्रमाण पौराणिक कहानियों और इतिहास दोनों में मिल जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि मेघ कबीरपंथी भी हैं जो एक सामाजिक आंदोलन का प्रभाव है. हथकरघा (खड्डियों) का व्यवसाय बर्बाद हो जाने के बाद वे कई अन्य व्यवसायों में भी गए. मेघ कबीर की वाणी से जुड़े रहे हैं क्योंकि अपने व्यवसाय की झलक उन्हें कबीर की वाणी में मिलती थी. कई मेघ पंजाब के सेंसस रिकॉर्ड में कबीरपंथी के तौर पर दर्ज हैं.

यह सवाल मेघ (भगत, कबीरपंथी) समुदाय के लोगों के ज़ेहन में उठता रहा है कि क्या वे ओबीसी के लिए क्वालीफाई करते हैं विशेषकर कबीरपंथी नाम के तहत? कई शिक्षित मेघजनों यह मानते हैं कि यदि अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाते समय ओबीसी के वर्गीकरण का विकल्प उपलब्ध रहा होता तो एडवोकेट हंसराज भगत पंजाब की मेघ जाति को उसी में शामिल करने की सिफ़ारिश करते. लेकिन उन्होंने मेघों के अत्यधिक आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण उस समय अनुसूचित जातियों में उन्हें रखे जाने का विकल्प चुना जिसमें कुछ आर्थिक सुविधाएँ संभावित थीं.

उसके बाद के समय में मेघों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिला है और उनमें एक मध्यम वर्ग उभरा है. यह वर्ग अनुसूचित जाति का कहलाने से बहुत सकुचाता है लेकिन नौकरी या कोई अन्य लाभ पाने के लिए वो जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करता है. वो यह चाहता है कि किसी तरह ‘अनुसूचित जाति’ नाम की पहचान से पीछा छूटे. इस समान्यतः शिक्षित वर्ग में सामाजिक और राजनीतिक जागृति आई है. उनके परिवारों से अन्य जातियों में शादियाँ होती हैं. इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन जो इनके स्तर तक नहीं पहुँचे और जिनकी संख्या काफी अधिक है, उनका क्या? 

जो मेघ गाँवों में रह रहे हैं उनकी संख्या बड़ी है. उन्हें जाति का डंक अधिक झेलना पड़ता है. वे पर्याप्त रूप से जागरूक, शिक्षित और संगठित नहीं हैं. उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मज़बूत बुद्धिजीवी वर्ग नहीं मिलता. लेकिन कई शहरों में मेघों के छोटे-छोटे सामाजिक संगठन हैं जिन्हें उनकी बात करनी चाहिए. सोचा जाना चाहिए कि क्या वो अति पिछड़े हुए मेघ समाज के लोग आरक्षण का लाभ उठाने की हालत में हैं? ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक तरफ उनका शिक्षा का स्तर बहुत कम है और दूसरी तरफ़ सरकारी नौकरियाँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं. जो बचा-खुचा आरक्षण है उसके प्रावधानों को अदालतों के फैसलों ने इतना कमज़ोर कर दिया है कि वे कारगर नहीं रहे. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की बात अभी दूर की कौड़ी है.

तुलना करें तो पंजाब में अनुसूचित जातियों के लिए जो आरक्षण के प्रावधान हैं उनके तहत कुछ विशेष जातियों में एक विशेष अनुपात में वो आरक्षण बाँट दिया गया है. ओबीसी को प्रोमोशन में आरक्षण नहीं मिलता. दूसरी तरफ पिछले कई दशकों से कई हथकंडे अपना कर अनुसूचित जातियों के लिए प्रोमोशन के रास्ते बंद ही किए गए हैं. प्रोमोशन में आरक्षण से संबंधित उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू न होने देने के पीछे प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

भारत के कई राज्यों के बुनकर और कृषि श्रमिक समुदाय ओबीसी में शामिल हैं. (उनकी सूचियाँ एकत्रित की जा सकती हैं). यह एक आधार है जिस पर मेघ समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया जा सकता है. इससे पैदा होने वाले हालात में आरक्षण को लेकर कितना नफा-नुकसान होगा उसका सही आकलन तो नहीं किया सकता लेकिन सामाजिक स्टेटस में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है. जाति व्यवस्था में जिस स्थान को मेघ अपना समझते रहे हैं और जो उन्हें नहीं मिल पाया उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है? मेघ जाति क्या है यह बात देश के भीतरी भागों (गाँवों) के लोग नहीं जानते लेकिन यदि उन्हें बताया जाए कि मेघ अनुसूचित जाति में आते हैं तो मेघों को उन जातियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है जिनका हिस्सा वो हैं नहीं. गाँवों की यह स्थिति उनके मन में हीनता की भावना पैदा करती है. यदि मेघ जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो कई दुराग्रहपूर्ण स्थितियों से निजात मिल सकेगी.

एक बात और भी. हम अपनी मौजूदा हालत में अक़सर संतुष्ट हो चुके होते हैं. उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आहट से हम आशंकित हो उठते हैं. लेकिन जहाँ हम हैं वहाँ तो हैं ही, बस, उससे थोड़ा बेहतर हो जाए तो वो ज़रूर बेहतर ही होगा उसके लिए कोशिश होनी चाहिए.

कबीर के संदर्भ

पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए जिनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. जातिवाद को चुनौती देने वाले कई संतजन जान पर खेल गए. 

लगभग सभी ओबीसी जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) या शब्दों का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें जुलाहे, कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली आदि. इसी आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है. यानी कबीर को अब ओबीसी का प्रतिनिधि साहित्यकार कहा जाता है.

मेघ सदियों से कपड़ा बुनने का कार्य करते आ रहे हैं. वे कबीर की वाणी से इस आधार पर भी प्रभावित रहे हैं कि कबीर ने जो अध्यात्म की शिक्षा दी वो कपड़ा बनाने के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (शब्दों) के साथ भी थी.



विशेष नोट
मेघ समाज के लोग चाहे किसी भी नाम से अपनी पहचान रखते हों (जैसे मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा, आर्य, पंजाबी जाट आदि) लेकिन वे अनुसूचित जाति के तौर पर अपनी जातीय पहचान से हर तरह से असंतुष्ट हैं. वे ओबीसी के तौर पर अपनी पहचान को बेहतर पाएँगे ऐसा कई मेघजनों का मानना है. यह नोट कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद बनाया गया है जो समझते हैं कि मेघ समाज को ओबीसी में शामिल करने के लिए कोशिश अवश्य की जानी चाहिए. यह नोट केवल मेघ समाज के भीतर विचार-विमर्श के लिए तैयार किया गया है. - भारत भूषण, चंडीगढ़)


04 April 2018

2 April Bharat Bandh - 2 अप्रैल भारतबंद


(सब से पहले संविधान विशेषज्ञ फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का यह आलेख पढ़ लेना ज़रूरी है.  SC/ST Act: Court Ruling Will Have Chilling Effect on Reporting Crimes Against Dalits)

यह तो होना ही था. जब से भाजपाई/ संघी सरकार बनी है तब से देश के दलितों और श्रमिक वर्ग के लिए आफ़त आई है. अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर जिस तरह का कहर इस सरकार के शासनकाल के दौरान बरपा है उसकी बात मीडिया कभी-कभार ही करता है. मीडिया और सरकार औद्योगिक घरानों के रंग में रंगी है. इतना काफ़ी है सारी कहानी कहने के लिए.
यह सब चल ही रहा था कि अचानक सुप्रीम ने एससी एसटी एक्ट में इस प्रकार का परिवर्तन कर डाला कि पीड़ित दलित शिकायत करने और आरोपी की FIR के लिए ऐसी व्यवस्था पर निर्भर हो गए जिनकी न्याय बुद्धि पर वे पहले से ही विश्वास नहीं करते. देश की एक चौथाई आबादी यानी SC-ST का सुप्रीम कोर्ट में कोई जज नहीं है. अब SC, ST एक्ट की सुनवाई कौन करेगा? 
पिछले कई वर्षों के दौरान न्यायालयों में बैठे हुए न्यायमूर्तियों ने नौकरियों में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी के प्रतिनिधित्व (जिसे आरक्षण के नाम से प्रचारित किया जाता है) के बारे में ऐसे निर्णय दिए कि उनका प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त ही हो गया. संविधान अपने प्रावधानों के साथ बैठा सब कुछ ताकता रह गया. नई अर्थव्यवस्था ने सरकारी नौकरियाँ लगभग समाप्त कर दीं. बैकलॉग न भरने वाले नौकरशाह मौजमस्ती में थे और अपनी मंडली में वाहवाही बटोर रहे थे. निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व का प्रावधान तो था ही नहीं. जाहिर था कि दलितों को बेरोज़गारी की चक्की में डाल कर सरकार उन्हें भूल गई.
यह फैक्टर अलग से काम कर रहा था कि भाजपा में बैठे हुए इन वर्गों के प्रतिनिधि - पासवान, उदित राज, अर्जुन मेघवाल और अठावले जैसे प्रतिनिधियों की आवाज़ तक कहीं सुनाई नहीं दे रही थी. दलितों से संबंधित मामलों में उनकी भूमिका लगभग निल नज़र आ रही थी. इस प्रकार से देखा जाए तो अनुसूचित जातियाँ, जनजातियाँ और अति पिछड़ा वर्ग नेतृत्वहीन महसूस कर रहे थे. इन्हीं परिस्थितियों में 02 अप्रैल के आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी जिसमें हर आंदोलनकारी अपने नेतृत्व को देख रहा था. 
घटिया से घटिया प्रबंधन का भी एक मानवीय चेहरा होता है. सरकारों के बारे में भी यही सच है. लेकिन देखा गया कि आत्महत्या कर रहे किसानों के लिए कारगर कदम उठाने में सरकार असफल हुई. उनकी आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है. नेताओं के मसालेदार और ‘ताली बजाओ’ वाले नाटकीय भाषण ज़रूर सुनाई दिए.
फिर, जो हज़ारों वर्षों से नहीं हुआ था वह 2 अप्रैल 2018 को देशभर में हो गया. अनुसूचित जातियों, जनजातियों और बहुत पिछड़े वर्ग के यहां-वहां बिखरे हुए संगठनों ने सोशल मीडिया के माध्यम से आपसी संपर्क कायम किया और बहुत छोटे नोटिस पर भारत बंद की एक तारीख़ तय हो गई. सरकार जानती थी कि बंद होने जा रहा है और कि कोई जाना-माना नेता इसका नेतृत्व नहीं कर रहा. अब मीडिया कह रहा है कि सरकार ने इस बंद से निपटने के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की थी. बंद हुआ और पूरे उत्तर भारत में लोगों का प्रोटेस्ट बड़े पैमाने पर नजर आया. बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए. इसी दौरान ऐसे राजनीतिक और असामाजिक तत्त्वों को भी मौका मिल गया और उन्होंने आंदोलनकारियों में घुसकर हिंसा फैला दी. सोशल मीडिया ने हिंसा फैलाने वाले कुछ लोगों की पहचान की है. एक आदमी पिस्टल से प्रदर्शनकारियों पर फायर करता दिख रहा है और कुछ अन्य वहाँ बंदूकें ले कर खड़े थे.
 बहरहाल, चैनलों ने इस आंदोलन पर ‘हिंसक आंदोलन’ का टैग लगा दिया. इस बात का वे उल्लेख नहीं कर रहे कि दलित आंदोलनों के इतिहास में अभी तक कभी हिंसा नहीं हुई थी. हिंसा में 8 लोग मरे जो बहुत दुख की बात है. ऐसा नहीं होना चाहिए था.
सरकार के पास विकल्प था एससी एसटी एक्ट के बारे में तुरंत एक अध्यादेश लाती लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. रिव्यू पिटीशन डाल दी गई. इसे टालमटोली रवैये की तरह देखा जा रहा है. पिटीशन की सुनवाई भी शायद वही बेंच करेगा जिसने एससी एसटी एक्ट में परिवर्तन कर डाले हैं. जब तक रिव्यू होकर कोई सकारात्मक फैसला नहीं ले लिया जाता तब तक जो घटनाएं घटेंगी, लोग पीड़ित होंगे उसकी जिम्मेदारी किस पर होगी, यह सवाल बनता है और पूछा जा रहा है.
धरने-प्रदर्शन दोपहर बाद तक चलते रहे. इस प्रदर्शन में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अति पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन किया. खासकर गोरखपुर और फूलपुर की चुनावी त्रासदी के बाद यह भाजपा के लिए भारी झटका रहा. 
क्योंकि इस आंदोलन का कोई स्थापित नेतृत्व नहीं था इससे प्रत्येक पीड़ित को महसूस हुआ कि यह आंदोलन उसका अपना है. वह बहुजन है तो अब उन्हें बहुजन की तरह दिखना भी चाहिए. वे जहां भी इकट्ठे हों उन्हें बड़ी गिनती में इकट्ठे होना होगा. उनके एक नारे में ऐसा असर होगा कि उन्हें कुछ और करने की जरूरत नहीं होगी. वे जान गए हैं कि वे भारत बंद कर सकते हैं. उनके विचार शहरों के साथ-साथ कस्बों और ग्रामीण भारत तक पहुंच गए हैं. अब इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि चैनल दलित आंदोलन को हिंसक कहते हैं. वैसे भी लोगों का चैनलों पर से विश्वास उठ चुका है.
भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ा है इसीलिए शहरों में बैठे हुए SC, एसटी और OBC के लोग अब एक दूसरे को बेहतर तरीके से जानने और समझने लगे हैं. यह महत्वपूर्ण है. उन्हें यदि कोई शिकायत है तो वह सवर्णों से है. 
बहुजनों का 2 अप्रैल  2018 का बंद सफल रहा. उनका संदेश सरकार तक पहुंचा है. यह अभी शुरुआत है.



30 March 2017

Expanding Kabir - फैलता कबीर

कबीर के बारे में जितना भी लिखा गया उस पर या तो 'भक्ति साहित्य' का टैग लगा था या फिर उसके साथ एक फ़कीर टाइप समाज सुधारक की छवि नत्थी की गई थी. तथाकथित आचार्यों ने कबीर पर कमोबेश अपना ही आचार्यत्व थोपने की कोशिश की. जबकि ज़रूरत ऐसे विश्लेषण की थी जो बता सके कि कबीर की वाणी में ऐसा क्या-क्या है जो साहित्यिक बेइमानी और गुंडई का शिकार हुआ है और कि कबीर के नाम पर उपलब्ध कौन-कौन सा साहित्य है जो कबीर का लिखा हो नहीं सकता और संदेह के घेरे में है.


जग ज़ाहिर है कि कबीर के समय के लगभग सभी संत निम्न जातियों से थे. कबीर को संत कहा गया तो कहीं उसे विद्रोही (बाग़ी) भी बता दिया गया. ऐसा अधिकतर सवर्ण लेखकों ने किया जिनका साहित्य में पुराना दख़ल था. दूसरी ओर पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए और जिनका मुख्य कार्य व्यर्थ और अमानवीय धार्मिक कर्मकांडों के अलावा हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. कबीर का वही नज़रिया सामाजिक रूप से जागरूक वर्गों में फैला. लेकिन स्कूलों और कालेजों के पाठ्यक्रमों में कबीर को जिस तरह का बताया गया और जैसा पढ़ाया गया उसने समाज में कबीर की छवि 'भक्त' की बना दी गई. सिलेबस में की गई वो बेइमानी अब रेखांकित हो चुकी है. कबीर को भक्त कहा जाना उनके असली कार्य को पर्दे के पीछे धकेलने की कोशिश थी जो बीसवीं शताब्दी में आकर नाकाम होने लगी. जबकि सिलेबस बनाने वालों ने अपनी बेइमानी जारी रखी. लोग समझने लगे कि जिसे साहित्य में 'भक्तिकाल' कहा जाता है वह वास्तव में 'मुक्तिकाल' था जिसमें जातिवाद के विरोध में संघर्षरत कई संतजन जान पर खेल गए. अब तो एक चैनल 'आवाज़ इंडिया' और कई जगह तर्कवादी कबीर की तुलना बुद्ध से होने के बाद से कुछ लोग उन्हें 'अदृश्य बुद्धिस्ट' कहने लगे हैं. ऐसा कहने वाले वही लोग हैं जिनका जातिवादी घृणा फैलाने वाला 'अदृश्य' एजेंडा है.


हालाँकि धार्मिक आइकॉन के रूप में सभी अनुसूचित जातियों के अपने-अपने महापुरुष हैं लेकिन लगभग सभी अनुसूचित जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों और उनके व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली, जुलाहे, आदि हैं. इस संकेत के आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की जातिगत सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है.


अब मेघों (कबीरपंथी, मेघ और मेघ भगत) की बात करते चलते हैं जिन्होंने चौदवीं सदी के कबीर को बीसवीं सदी में बड़े पैमाने पर अपनाया है तो इसका यही कारण समझ में आता है कि मेघ समुदाय व्यवसाय से बुनकर रहा. कबीर और उनकी वाणी के प्रति इनका आकर्षण स्वाभाविक था. मेघ समुदाय ने सदियों से कबीर की वाणी में अपनी मेघपीड़ा और मेघसुख महसूस किए हैं. पंजाब में इनकी पहचान 'कबीरपंथी' और 'मेघ' नामों से होती है. शादियां और अन्य संस्कार आर्यसमाजी, समातनी, सिख और कुछ कबीरपंथी परंपराओं के अनुसार होते हैं. लेकिन कबीर का विस्तार इस समुदाय में खूब हुआ है और हो रहा है.


इन दिनों कबीर की पहचान ओबीसी के प्रतिनिधि साहित्यकार के रूप में होने लगी है और ओबीसी साहित्य में वे जगह पा चुके हैं. कबीर को ओबीसी साहित्य में जगह दिलाने की कोशिश बहुत सशक्त है. इधर पिछले दिनों संसद में नए ओबीसी आयोग के गठन की बात चली थी जिसका दायित्व होगा कि वह ओबीसी में शामिल करने योग्य कुछ नई जातियों के प्रस्तावों पर निर्णय करेगा जिसमें केंद्र सरकार की सीधी भूमिका होगी…...और इस पर मेरी कल्पना के घोड़े जंगली हो उठते हैं. दिल पूछने लगता है कि मेघ क्या ओबीसी के लिए क्वालीफाई नहीं करते? 🤔मैं नहीं जानता.
“मध्यकालीन संत कवि कबीर की हिन्दी साहित्य ने काफी दिनों तक उपेक्षा की थी. साहित्य से ज्यादा समाज में स्वीकृत और जीवित रहे कबीर को बाद में साहित्यिक आलोचकों ने उनकी जाति के सन्दर्भ में भ्रामक दावे के साथ साहित्य में जगह दी, यह दावा था उनके ब्राह्मण विधवा का बेटा होने का.  बाद के दिनों में दलित आलोचकों ने उन्हें दलित बताया.” : कमलेश वर्मा


01 November 2016

Shudra Languages - शूद्र भाषाएँ

कल मैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का एक वीडियो देख रहा था जिसमें उन्होंने व्याख्या की थी किस प्रकार पंडितों ने हिंदी व्याकरण के नियम बना कर उसके विकास को रोका है, संस्कृत के नियमों को हिंदी पर थोपा है आदि. उनके दिए हुए तर्क मुझे सही जान पड़े. मुझे अपने करियर के दौरान हिंदी के कई रूपों से बावस्ता होना पड़ा है. इस लिए भी उनकी बातें सुन कर मैं थोड़ा आज़ाद महसूस कर रहा हूँ.

फिर एकदम मुझे अपने ब्लॉग की भाषा का ख़्याल आया जो 'सरकारी हिंदी' जैसी हो गई है. उसमें स्वरों और वर्णों की संधियाँ साथ-साथ चली हैं जो हिंदी की सेहत के लिए नुकसानदेह हैं. मेरी भाषा आम आदमी की भाषा से दूर हुई है. जिन लोगों के लिए मैं लिख रहा था उनके लिए तो मेरी भाषा और भी मुश्किल हो गई. अब थोड़ा तावे का टाइम है. धीरे-धीरे अपनी लिखी हुई पिछली सारी पोस्टें जाँच कर उनके टेढ़े शब्दों की बदली करता हूँ.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद के तीखे वीडियो का लिंक नीचे दे रहा हूँ. फोटो पर क्लिक कीजिए.
Dr. Rajendra Prasad Singh - डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह


31 August 2011

Black Buddha – श्याम बुद्ध



I had a question in mind as to why one of the greatest religions i.e. Buddha Religion (also called Buddhism) was so hated in India. I got few answers which may not contain anything new but certainly impart new information.

There are statues of Black Buddha available having features of people of African origin. When we talk of black races of African origin then people of South India (Dravidians) are also included who have straight hair and comparatively thin lips. These Dravidian people have their origin in Indus Valley Civilization. They lived in a developed civilization and were forced to go into south due to food finding nomadic tribes coming from central Asia. In the process there was blood mixing in various social groups. Castes were made and many groups were enslaved and given the low work according to the proportion of black color in the skin. From this angle Indian caste system is the form of racism and apartheid and still prevalent in its dirtiest form. OBCs, SCs and STs of India are the target of this system and every effort is made to keep them away from quality life and Human Rights. A very large part of corruption in India is caste based as development is not allowed to reach interior of India where these people live.

A lecture of 2 hrs duration delivered by Dr. Velu Annamalai is given below.  Links regarding ‘Black Buddha’ are also given below.


एक प्रश्न बहुत समय से मन पर टँगा था कि जब बुद्धधर्म दुनिया भर के महानतम धर्मों में से एक है तो उसे भारत में घृणा की दृष्टि से क्यों देखा गया? कुछ उत्तर मिले हैं जिनमें चाहे नया कुछ न हो परंतु जानकारी बढ़ाने में ये मदद करते हैं. 


बुद्ध की कुछ मूर्तियाँ दुनिया में उपलब्ध हैं जिनमें बुद्ध का रूप-रंग और नैन-नक्श अफ्रीकी मूल के लोगों के से हैं. जब अफ्रीकी मूल की श्यामवर्ण या मेघश्याम (काले रंग) की प्रजातियों की बात आती है तो उनमें दक्षिण भारत के द्रविड़ियन मूल लोग भी इनमें शामिल होते हैं जिनके बाल सीधे और होंठ तुलनात्मक रूप से पतले हैं. द्रविडियन मूल के लोगों का संबंध सिंधुघाटी और हड़प्पा सभ्यता से है. एक विकसित सभ्यता में रहने वाले ये लोग मध्य एशिया की आदिम जातियों के आक्रमण के दबाव में दक्षिण की ओर चले गए थे. इसी क्रम में उस समय के सभी सामाजिक समूहों में रक्त-मिश्रण हुआ. जातियाँ बनी और कई समूहों को गुलाम बना कर उनकी चमड़ी में काले रंग की मात्रा के अनुसार निम्न प्रकृति का कार्य दिया गया. इस दृष्टि से भारतीय जाति प्रथा नस्लवाद और रंगभेद का ही रूप है जो आज भी अपने निकृष्टतम रूप में प्रचलित है. भारत की अन्य पिछड़ी जातियाँ, अनुसूचित जातियाँ और जनजातियाँ इसकी शिकार हैं और इन्हें गुणवत्तापूर्ण जीवन और मानवाधिकारों से दूर रखने की हर संभव कोशिश होती है. भारत में भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा भाग जातिप्रथा आधारित है क्योंकि विकास को उन दूर-दराज़ के इलाकों में पहुँचने ही नहीं दिया जाता जहाँ ये लोग बसते हैं.


ख़ैर, इस क्रम में डॉ. वेळु अण्णामलै का दो घंटे का एक व्याख्यान 12 भागों में मिला है जिसके लिंक नीचे दिए हैं. इसी तरह ब्लैक बुद्धा के लिंक्स यहाँ हैं.