"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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12 October 2018

Social Work v/s Politics - सामाज सेवा बनाम सियासत

राजनीति दुनिया के चार बड़े धंधों में से एक है. राजनीतिज्ञ (politician) किसी विचारधारा पर चलता है लेकिन समझौते भी करता चलता है, वह विचारधारा से हट भी जाता है ताकि सत्ता में बना रहे. उसके वादे कोई गारंटी नहीं देते. उसके अस्तित्व की सार्थकता सत्ता में या सत्ता के पास रहने में है. वह मुद्दों की छीना-झपटी करता है और मुद्दों का उत्पादन करता है. वह कसम तो संविधान की खाता है लेकिन कार्य पार्टी के एजेंडा पर करता है, जैसे - युद्ध, दंगे, गाय, हिंदुत्व, धर्म आदि. उसका कार्यकर्ता (political worker, activist) उसके एनेक्सचर-सा होता है, स्थान दोयम दर्जे का और कुल मिला कर इस्तेमाल करके फेंक देने वाली चीज़. राजनीतिज्ञ की पहचान उसकी राजनीतिक समझ है और राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी सामाजिक सक्रियता और सामाजिक कार्य से सम्मान पाता है. अपने नेता की गलती का परिणाम जनता के साथ-साथ कार्यकर्ता को भी भुगतना पड़ता है. जब कोई कार्यकर्ता ख़ुद राजनीतिज्ञ बन जाता है तो समाज को सीधे तौर पर नुकसान होता है. राजनीतिज्ञ और उसके कार्यकर्ताओं के मुकाबले सामाजिक कार्यकर्ता अधिक सम्मान का हक़दार है.


09 July 2017

History - Investigation and Notes / इतिहास - पड़ताल और नोट्स

Sh. R.L. Gottra
मैंने श्री आर.एल. गोत्रा जी को पहले पहल सोशल मीडिया से जाना फिर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला. वे सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और तीन चार साल बिजनेस में रहे. फिर बिजनेस छोड़ कर धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. वेद पढ़े, मनुस्मृति और गुरुइज़्म से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम, इसाईयत, सिखिज़्म और अन्य धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे कि धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. मत-मतांतरों की पृष्ठभूमि में क्या कुछ जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और उनकी सूचना के स्रोत और आधार क्या थे. उनकी मानसिकता क्या थी, उनका व्यक्तित्व कैसा था, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे.

धार्मिक पुस्तकों की राह से ग़ुज़र कर वे जहाँ पहुँचे वह तर्क का मुकाम था. यानि आंखें बंद करके कुछ भी मत मानो. देखो, जानो, पहचानों, पड़ताल करो, जाँचो फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की तैयारी करो ताकि आपको खुद की समझ से संतुष्टि रहे और आगे चल कर अपनी न्याय बुद्धि पर पछतावा न हो. सब से बढ़ कर यह कि इतनी सावधानी ज़रूर बरती जाए कि किसी पुस्तक या धार्मिक विचारधारा की मानसिक गुलामी को ख़ुद ही अपने कंधों पर न डाल लिया जाए.

देश में शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी को उन्होंने रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की टेक्नोलॉजी के संदर्भ में परखा है और भविष्य में बेरोज़गारी को लेकर जो कार्यनीति अपनाई जा सकती है उसके बारे में अपने विचार दिए हैं. राजनीतिक पार्टियों ने जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में गंदगी फैलाई है उसके तीन वाहकों का वे उल्लेख करते हैं - धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. उनका मानना है कि पार्टियों ने जानबूझ कर चुनावी प्रक्रिया में ये ख़ामियाँ पैदा की हैं.

इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है. उनके साथ हुई बात का विस्तृत ब्यौरा हिंदी में यहाँ उपलब्ध है जो स्वतंत्र अनुवाद है.

23 April 2017

Your vote determines your fate - आपका वोट आपके नसीब को तय करता है

2014 का चुनाव भारत की राजनीति के इतिहास में एक दुर्घटना के तौर पर भी जाना जाएगा जिसमें विपक्ष अपंग हो गया. उसके बाद की स्थितियां ऐसी हैं कि हिंदू-मुसलमान, गौमाता, लव-जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जोर पकड़ते नजर आए जिसे आम नागरिक गौर से देख रहा है. जाहिर है हिंसक ब्यानबाज़ी इसलिए की जाती है ताकि आम पब्लिक की नसें सर्द पड़ जाएँ. जिस जातपात के अंधेरे ने देश की बहुसंख्य आबादी को आज़ादी की रोशनी से दूर रखा है उसे हटाने की बात कोई नहीं करता. इन हालात में भी कुछ अनुभवी आवाजें और ख़्याल बुलंद होते रहते हैं.

105 लाख करोड़ रुपया कितना होता है मैं नहीं जानता. राजनीति के प्रखर दार्शनिक और राजनीतिज्ञ शरद यादव ने कहा है कि हर वोट की कीमत 105 लाख करोड़ रुपए होती है. हर वोट सरकार को इतना पैसा खर्च करने की शक्तियाँ प्रदान करता है.

देश में अनपढ़ता और गरीबी इतनी है कि चुनाव में लोग सौ रुपए, पाँच सौ रुपए में या दारू की बोतल के बदले अपना वोट बेचते हैं और फिर उन्हें शिकायत भी रहती है कि उनके जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ. होता कैसे? वे अपना वोट ऐसे व्यक्ति को नहीं देते जो उनके सामाजिक हालात सुधारने और देश के आर्थिक स्रोतों में उनके हिस्से को सुनिश्चित करने के लिए काम करे. प्रत्यक्षतः इसमें बड़ी बाधा जातपात है और नेता जातपात के चलते रहने में अपनी भलाई देखते हैं. इस लिए अपना वोट दान में या उपहार में न दें. इसे अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी और व्यवस्था परिवर्तन के औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करें.

इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि भारत में गरीबी का इंडेक्स जाति के इंडेक्स के समरूप है. नीचे की सभी (श्रमिक) जातियां गरीब हैं क्योंकि वे मात्र श्रमजीवी हैं और ऊपर की जातियां अमीर क्योंकि देश के सभी स्रोतों का प्रबंधन उनके हाथ में है. तिस पर भ्रष्टाचार गरीबों को अधिक गरीब बनाए रखने का एक ज़रिया बन गया है. 'गरीबी हटाओ' का नारा लगा कर इंदिरा गांधी ने चुनाव जीता. हाल ही में गरीबों का नाम लेकर केंद्र में नई सरकार बनी. लेकिन गरीबों को अपने जीवन स्तर में कोई सुधार होता नजर नहीं आता. ज़ाहिरा तौर पर इसकी बड़ी वजह जातपात है. जातिवाद सुनिश्चित करता है कि सस्ते मज़दूरों की सप्लाई न रुके और निशाने पर श्रमिक जातियाँ यानि निम्न जातियाँ होती है. महँगी शिक्षा और महँगी चिकित्सा ग़रीबी को और भी बढ़ा देती है.

(“याद रखना कि जातिव्यवस्था के कूड़े पर....कचरे पर हर तरह का कीड़ा पलता है -करप्शन का....भ्रष्टाचार का....अन्याय का....सब तरह का. जात है तो न्याय नहीं मिल सकता. इंसाफ धरती पर सब जगह आ जाएगा लेकिन हिंदुस्तान में नहीं आ सकता. -शरद यादव”)

19 March 2017

Casteism - Expectations of worker castes - जातिवाद - कमेरी जातियों की उम्मीदें

यह जानकर खुशी होती है कि हमारे मेघ समुदाय के लोग अन्य जातियों के साथ बेहतर आपसी व्यवहार स्थापित कर रहे हैं. यह भी देखा गया है कि उनमें रोटी-बेटी का संबंध बना है चाहे अभी वो व्यापक स्तर पर नहीं है. (ऑफ कोर्स मैं इंटरकास्ट मैरिजिज़ की बात कर रहा हूँ). निश्चित रूप से भारतीय समाज में एक परिवर्तन देखने को मिला है जो स्वागत योग्य है.


अब सीधे आरएसएस की विचारधारा पर आते हैं. आरएसएस का दीर्घाकालिक लक्ष्य सत्ता रहा जिसका रास्ता हिंदुत्व से हो कर गुज़रता है. हिंदुत्व का आधार एक संदेहास्पद अवधारणा पर आधारित है. जब स्वामी दयानंद द्वारा प्रयुक्त ‘आर्य’ शब्द अधिक नहीं चल सका तो उसके बाद हेडगेवार, सावरकर जैसे चिंतकों ने हिंदुत्व का नाम और एजेंडा प्रस्तावित किया जिस पर आरएसएस चल निकला. हिंदुत्व का अर्थ क्या होगा जब हम उसे ‘हिंदू धर्म’ शब्द के साथ जोड़कर देखेंगे. संभव है कि आरएसएस के एजेंडा में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू धर्म’ में अंतर हो लेकिन आम आदमी के लिए हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक ही बात है. हिंदू धर्म की कई विशेषताएं हैं जिसमें समाज का जातिगत ढांचा एक प्रमुख लक्षण है जिसे जातपात कहा जाता है. इसमें कमेरी और श्रमिक जातियां सबसे नीचे आती हैं और अन्य जातियां सवर्ण कहलाती हैं. नोट करें कि सवर्ण जातियां खुद को जातिगत ढांचे के अंतर्गत नहीं मानतीं.


अब रहा हिंदू धर्म. इसका आधार ऐसे ग्रंथ माने जाते हैं जो मुख्यतः वैदिक ब्राह्मणों ने लिखे हैं. इन ग्रंथों ने जातिवाद और अस्पृश्यता जैसी  बुराइयों  का आधार तैयार किया, उसे निरंतरता दी. ये आज भी उस नफ़रत पैदा करने वाली मानव व्यवस्था को मान्यता देते हैं. हिंदुत्व के ध्वजाधरों ने कभी भी इन ग्रंथों के बारे में खुल कर नहीं बोला कि ऐसे ग्रंथ जो जातिगत घृणा फैलाते हैं वो उन्हें मान्य नहीं हैं या वे उन ग्रंथों का खंडन करते हैं, कम से कम जातिवाद के संदर्भ में.


हिंदूधर्म की कोई स्पष्ट परिभाषा अभी तय नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट ने उसे जीवनशैली कहकर कहीं रख दिया हुआ है. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता. हिंदुत्ववादी संगठन मनुस्मृति आदि धर्म ग्रंथों की भावना को कभी मरने नहीं देते. वे उसे धार्मिक सत्संगों, सम्मेलनों तक में घसीट कर ले आते हैं और लोगों के मन पर जातिवाद की जो तस्वीरें बनी हुई हैं उन्हें धुंधला नहीं होने देते.


संघी विचारधारा से प्रभावित कुछ मेघ कहते दिखे हैं कि हम अन्य जातियों की जातपात संबंधी समस्या को अपना ढोल समझ कर बजाते हैं तो यह हमारी ग़लती है. यह बात हज़म नहीं होती क्योंकि यह समस्या सभी कमेरी और श्रमिक जातियों की है. इन दिनों उन जातियों में जो एकता का भाव पैदा हुआ है उससे संघ जैसे संगठनों में बेचैनी हुई है लेकिन अधिक नहीं क्योंकि वे अभी तक सत्ता में हैं. सवर्ण व्यवस्था ने इस देश की बहुसंख्यक आबादी को मनुस्मृति के संविधान के तहत सदियों तक अशिक्षित रखा इसलिए वे किसी न किसी प्रकार से सत्ता में आने का जुगाड़ कर लेती हैं. पहले यह कार्य कांग्रेस के माध्यम से हुआ अब भाजपा ने उसकी जगह ले ली है.

सिर्फ़ यह कहने से काम नहीं चलेगा कि जातपात मर चुकी है. कमेरी और श्रमिक जातियाँ संघ जैसे संगठनों से यह उम्मीद क्यों न करें कि वे जातिवाद को स्थापित करने वाले उन धार्मिक ग्रंथों के अर्थ तय करें और उनमें भरे जातिवाद को अपने स्तर से अमान्य कहने की स्वस्थ परंपरा डालें. शायद इससे देश में व्याप्त जातिवादी नज़रिया बदल जाए. धर्मग्रंथों के अलावा शब्दकोशों, मुहावरा कोशों आदि को अलग से देखा जा सकता है. राजनीतिक पार्टियाँ भी जातिवाद को अपनी तरह से ज़िंदा रखती हैं. वे भी 'टिकाऊ विकास के लिए टिकाऊ समाज ज़रूरी' वाले सिद्धांत पर कार्य करती नहीं दिखतीं.

11 March 2017

The icon of my political expectations - Sharad Yadav - मेरी राजनीतिक अपेक्षाओं का आइकॉन:शरद यादव


माननीय शरद यादव जी को कई बार संसद में बोलते सुना है और हर बार लगा है कि वे भारत के जन-जन की आवाज़ और आकांक्षाओं को वो अभिव्यक्ति दे रहे हैं जिसकी वे हकदार हैं लेकिन जिनका हक़ हर बार मारा गया है. सत्ता ने भारत की जनता के लिए कितना किया है और कितना नहीं किया गया या करना ही नहीं चाहती वो सब उनके शब्दों और स्वर की खनखनाहट में स्पष्ट झलकता है. एक राजनीतिक विचारक के रूप मेरी नज़र में वे बेजोड़ हैं. उनका हाल ही का एक वीडियो लोकसभा टीवी पर रखा गया है जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ. मेघनेट के पाठकों से इस अनुरोध के साथ कि आप इसे देखें. इससे आपको भारत के उस पक्ष को समझने में मदद मिलेगी जो अकसर हमारी पकड़ से बाहर होता है.


23 December 2016

Research v/s bickering - शोध बनाम कलह

राजनीति को लेकर सभी समुदायों में झिकझिक होती है. मेरे मेघ भगत समुदाय में भी होती है. पिछले दिनों एक सज्जन ने सोशल मीडिया पर मेघ समुदाय को किसी पार्टी का टिकट न मिलने की वजह डॉ. ध्यान सिंह के शोधग्रंथ को बताया. हँसी भी आई और हैरानगी भी हुई. बस एक विवाद पैदा किया जा रहा था. 

असल में उक्त शोधग्रंथ (थीसिस) मेघ भगत समुदाय के पिछले 200 वर्ष के इतिहास और मेघ जाति (जो कबीरपंथी के नाम से भी जानी जाती है) के उद्भव (मूल) की खोजबीन करता है. 

राजनीतिक दलों की नीति है कि वे टिकटों का आबंटन जाति के आधार पर करते हैं. उसकी वजह से किसी जाति या समुदाय को टिकट नहीं मिलता है तो उसका समाधान राजनीतिक स्तर पर होना चाहिए. यदि किसी राज्य में मेघवंश से निकली कई जातियाँ बसी हैं और राजनीतिक पार्टी सभी को एक ही जाति मान कर एक ही टिकट देती है तो दोष उसका दोष किसी शोधग्रंथ को कैसे कैसे दिया जा सकता है, ख़ास कर तब जब उस शोधग्रंथ में उन अलग-अलग जातियों को कहीं भी 'एक जाति' न बताया गया हो.

इस सच्चाई को खास तौर पर देखना ज़रूरी है कि उक्त शोधग्रंथ पर डॉक्टरेट की डिग्री सन् 2008 में दी गई थी. अब देखना यह चाहिए कि 2008 से पहले जालंधर के आसपास बसी मेघ भगत जाति के प्रति राजनीतिक दलों का रवैया क्या था? देखना यह भी चाहिए कि मेघ भगत जाति का क्या अपना कोई कद्दावर नेता है जो समुदाय की जातिगत स्थिति और उनकी विभिन्न लोकल समस्याओं को असरदार तरीके से ऊपर तक पहुँचा सके, समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक लड़ाई लड़ सके? यदि पूरा समुदाय एक मज़बूत राजनीतिक वोट बैंक है तो कमज़ोरी कहाँ है? मेघ भगत समुदाय की असल समस्या है कि उसके पास बढ़िया क्वालिटी के सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं की कमी है. आज के समय में यह कमी मामूली नहीं है.  


11 October 2016

Politician and Political worker - राजनीतिज्ञ और राजनीतिक कार्यकर्ता

राजनीति दुनिया के चार बड़े धंधों में से एक है. राजनीतिज्ञ (politician) किसी विचारधारा पर चलता है लेकिन समझौते भी करता चलता है, वह विचारधारा से हट भी जाता है ताकि सत्ता में बना रहे. उसके वादे कोई गारंटी नहीं देते. उसके अस्तित्व की सार्थकता सत्ता में या सत्ता के पास रहने में है. वह मुद्दों की छीना-झपटी करता है और मुद्दों का उत्पादन करता है. वह कसम तो संविधान की खाता है लेकिन कार्य पार्टी के एजेंडा पर करता है, जैसे - युद्ध, दंगे, गाय, हिंदुत्व, धर्म आदि. उसका कार्यकर्ता (political worker, activist) उसके एनेक्सचर-सा होता है, स्थान दोयम दर्जे का और कुल मिला कर इस्तेमाल करने योग्य. राजनीतिज्ञ की पहचान उसकी राजनीतिक समझ है और राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी सामाजिक सक्रियता और सामाजिक कार्य से सम्मान पाता है. अपने नेता की गलती का परिणाम जनता के साथ-साथ कार्यकर्ता भी भुगतता है. जब कोई कार्यकर्ता ख़ुद राजनीतिज्ञ बन जाता है तो समाज को सीधे तौर पर नुकसान होता है.
 

02 August 2016

Deers of Chinua Achebe - चिनुआ अचीबी के हिरण


चिनुआ अचीबी ने कहा है - ''जब तक हिरन अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की बहादुरी के किस्से गाए जाते रहेंगे''. : चिनुआ अचीबी (Chinua Achebe)

भारत में अभी तक पढ़ाया जा रहा इतिहास वही कड़ुवा सच है जिसकी बात चिनुआ अचीबी ने की है. कुछ देवताओं के नामों का गुनगान, कुछ पुराने ज़माने में हुए-अनहुए राजाओं की तारीफ़ या फिर उनकी लुभाने वाली और दिलचस्प बातों से इतिहास तो भरा हुआ है ही साथ ही साथ साहित्य में भी वो कहानियाँ-किस्से भर दिए गए हैं. इतिहास बताए जाने वाले उन पुराणों में जो लोग हारते हुए, मरते हुए या नरक जाते हुए दिखाए गए हैं वो वही लोग हैं जिनके वंश के लोग आज हिस्ट्री की क्लासों में बैठे हुए महसूस करते हैं कि उन्हें पढ़ाए जा रहे इतिहास में उनके पुरखों के बारे में तो कुछ है ही नहीं.

आज भारत का पढ़ा-लिखा लेकिन बिखरा हुआ वो वंचित समाज इस ओर ध्यान दे रहा है कि इतिहास कहे जाने वाले उन पुराने किस्सों और इतिहास में आम लोगों की बात तो है ही नहीं. हाथ से काम करने वाले मेहनतकश लोगों, मेहनती किसान-कमेरों और महिलाओं के सामाजिक हालात का बयान भी उसमें नहीं मिलता. ब्राह्मणों को खूब दान देने वाले राजाओँ-महाराजाओं की कहानियों में इतना ज़रूर कहा जाता है कि 'उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी'. ग़ैर-ब्राह्मण प्रजा की माली हालत कैसी थी उसकी किसी प्रकार की डिटेल अकसर वहाँ नहीं मिलती. 

चलिए सबसे पहले इतिहासकारों की प्यारी जगह मुअनजोदाड़ो की बात करते चलते हैं. मुअनजोदाड़ो की खुदाई में तलवारें, भाले या लड़ाई में काम आने वाले हथियार नहीं मिले हैं. ज़ाहिर है वहाँ के रहने वाले अमनपसंद थे. काफी कुछ हिरनों जैसे. बाहर से आए हथियारबंद हमलावरों यानि आर्यों के मुकाबले उनकी हालत बेबस लोगों जैसी थी जो आर्यों के हथियारों का मुकाबला करना नहीं जानते थे. जीतने के बाद उन हमलावरों ने लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया. गुलामों के साथ जो हिंसा और अत्याचार हुआ उसके बारे में शिकारी क्यों कुछ कहने लगे? शिकारियों ने अपनी बहादुरी के किस्से बनाए, अपने नियम-कायदे लागू किए, धर्म और नीति पर ग्रंथ लिखे और लिखवाए, 'सुर-असुर संग्राम' को मशहूर किया, धर्म-अधर्म और नीति-अनीति की अपनी बातों को मनवाया. जो वो ख़ुद करते थे उस पर अच्छाई का ठप्पा लगाया और जो उस सभ्यता के लोग करते थे उस पर बुराई का लेबल चिपका दिया. गुलाम बनाए गए लोगों पर किए गए ज़ुल्मों को उनके धार्मिक ग्रंथ अभी तक न्याय कहते हैं. धार्मिक किताबें लिखने वाला वो पुरोहित वर्ग उन लगभग निहत्थे हिरनों की बात नहीं करता जो गुलामों के रूप में उनके खूँखार हाथों में आ गया था. आज तक भारत की अधिकतर राजनीति और बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ उसी धार्मिक या कह लीजिए कि धार्मिक-राजनीतिक समझ को ले कर चल रही दिखती हैं. ये उस इतिहास की वही अक्ल है जो महिलाओं और मेहनतकशों की हालत सुधारने की बात आज भी नहीं करती. उसे तो बस धर्म और धर्म से जोड़ी गई चीज़ों के सहारे राजनीति करनी है. धर्म से उपजाया गया जातिवाद उसका बहुत बड़ा हथकंडा है.

उनके हथकंडों की झलक आपने पिछले दिनों सोशल और अन्य मीडिया पर देखी होगी. आपने देखा होगा कि जब आप अपना जीवन स्तर को सुधारने की बात करेंगे तो वो आपको सरहद पर खड़े आपके भाइयों की राष्ट्रभक्ति का आदर्श दिखाएगी और आपको चुनौती देगी कि बताओ - "असली राष्ट्रभक्त कौन है, वो फौजी, या आप?" आप बैंको से अपना पैसा निकलवाने के लिए लाइन में न लग कर, सारे सिविल कार्य छोड़ कर फौज में भर्ती होने के लिए लाइन में खड़े हो जाइए. चलेगा क्या? यदि आप उनके जुमलों की वजह से अपना आर्थिक-सामाजिक एजेंडा भूल जाएँगे तो यह आपकी कमज़ोरी है. आप अपना एजेंडा छोड़ने लगेंगे और अनजाने में उनकी गुलामी करने लगेंगे यानि उनके भक्त हो जाएँगे. इसके बाद आपको धर्म के नाम पर डराने का सिलसिला शुरू होगा. वे कहेंगे कि वो देखो आपको मुसलमानों और ईसाइयों से ख़तरा है. इसके बाद वो जातिवाद का हथकंडा अपनाएँगे. आपको बताने लगेंगे कि छुआछूत के लिए हिंदुत्व ज़िम्मेदार नहीं बल्कि इस्लाम ज़िम्मेदार है. लेकिन वो इस बात का जवाब नहीं दे पाते कि यदि जातपात मुग़लों ने फैलाई थी तो 'मनुस्मृति' क्या हज़रत मोहम्मद या हज़रत ईसा ने ने लिखी थी?

कुल मिला कर कह सकते हैं कि शिकारी अपने धर्म का एजेंडा कई प्रकार से आप पर थोपता है. आपको एक ऐसा हिरन बना कर रखना चाहता है जो शिकार के लायक हो. आपको अपना कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाने देता. आपको धर्म, जाति और दंगों में उलझाए रखता है. अब आप देखिए कि आपका एजेंडा क्या होना चाहिए, आपके परिवार के लिए रोज़गार, सेहत और चिकित्सा या कुछ और, ISIS या लग़ातार घटती आपकी ख़रीदने की ताक़त, गौ-माता है या महँगी होती शिक्षा या फिर हिंदुत्व या महँगी होती दवाइयाँ और डॉक्टर? जब आप उनके उनके बनाए हुए एजेंडा को अपना मानने लगेंगे तो आप अपना एजेंडा कैसे तय करेंगे?

हज़ार बातें छोड़ दीजिए, इस ज़ाहिर सच्चाई को समझ लीजिए कि आपकी माली (आर्थिक) हालत का भविष्य राजनीति और सत्ता में बैठे लोग लिखते हैं. डॉ. अंबेडकर का लिखा इतिहास जानिए. ख़ूब पढ़िए और ख़ुद भी लिखिए. इतना तो जान कर और मान कर चलिए कि हिरन वो होते हैं जिनका अपना कोई एजेंडा का हथियार नहीं होता. जो अपना एजेंडा ले कर चल पड़ते हैं वो हिरन नहीं रह जाते.



24 February 2014

BJP and Meghs-2 - भाजपा और मेघ-2

बीजेपी का दलित दाँव

आज सभी समाचारिया चैनल उदित राज (बुद्धिस्ट) और रामविलास पासवान (दुसाध) और रामदास अठावले (बुद्धिस्ट), अध्यक्ष, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के बीजेपी में जाने की खबरों से अटे पड़े हैं.

पासवान कभी पायदार सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं. केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं. उनकी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी है. आजकल उनकी छवि मौकापरस्त राजनेता की है. उदितराज का नाम पहले रामराज था. संभवतः अंबेडकरवाद से प्रभावित हो कर उन्होंने अपना नाम उदितराज कर लिया. दिल्ली में काफी सक्रिय रहे हैं. उनकी 'इंडियन जस्टिस पार्टी' नाम से एक राजनीतिक पार्टी भी है. दक्षिण भारत की कुछ दलित संस्थाओं में उनकी अच्छी घुसपैठ है. एक बार उनसे फोन पर बात करने का सुअवसर प्राप्त हुआ था. काफी खनखनाती आवाज़ में टू द प्वाइंट बोलते हैं.

बीजेपी ने काफी समय से ओबीसी को जाने-अनजाने में अपने पसंदीदा टारगेट पर रखा है. उमा भारती, (शायद) गोविंदाचार्य (भी), नरेंद्र मोदी नामक ओबीसी पत्ते उसके पास रहे हैं. पंजाब में एक वर्तमान मंत्री श्री चूनी लाल भगत को कुछ प्रोमोट किया है. इसी प्रकार राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के मेघों में भी बीजेपी की बिजली चमकी है. राजस्थान में कैलाश मेघवाल विधानसभा के अध्यक्ष हैं केंद्र में एनडीए की पिछली सरकार में अर्जुन मेघवाल एक महत्वपूर्ण चेहरा बने हैं.

मेघवंशियों और बीजेपी पर मैंने मेघनेट पर एक पोस्ट लिखी थी. नीचे दिए उसके लिंक पर आप कुछ जानकारी ले सकते हैं. मैं अपनी खोपड़ी के खाँचे के अनुसार पासवान और उदितराज को मेघवंशी मानता हूँ.


ख़ैर! हर पार्टी दलित कार्ड खेलती है और हर दलित नेता के हाथ में 4-5 पार्टियों के पत्ते होते हैं. देखा यह है कि दलितों का थर्मामीटर राजनीतिक समझदारी का तापमान कम और आपसी अनेकता का तापमान अधिक दिखाता है. दाँव पर ख़ुद जनता होती है.


30 December 2013

The reality of riots - दंगों का सच

दंगों का कारण कभी भी केवल धार्मिक और आर्थिक नहीं रहा. इनका संबंध सत्ता से रहा है और अब लोकतंत्र में सीधे तौर पर वोटों की गिनती के साथ है. कोशिश होती है कि दंगे कर के दलितों और दलितों से धर्मांतरित हुए मुस्लिमों को पहले के मुकाबले अधिक गरीब कर दिया जाए और बाद में पुनर्वास के नाम पर उन्हें उनके वोट क्षेत्र से दूर ले जाकर बसाया जाए ताकि उनके वोटों की ताकत बिखर जाए.


05 October 2012

Political ambitions of Meghs - मेघों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा



पंजाब में विधान सभा के चुनाव फरवरी 2012 में होने जा रहे हैं. सुना है कि इस बार कम-से-कम 10 मेघ भगत किसी पार्टी की ओर से या स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में खड़े हो सकते हैं. देखना है कि हमारी तैयारी कितनी है.


शुद्धीकरण की प्रक्रिया से गुजरने के बाद सन् 1910 तक मेघों में जैसे ही अत्मविश्वास जगा तुरत ही उनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो गई.  इसे लेकर अन्य समुदाय चौकन्ने हो गए. अपने हाथ में आई सत्ता को कोई किसी दूसरे को थाली में नहीं परोसता कि 'आइये हुजूर मंत्रालय हाज़िर है'. तब से लेकर आज तक  वह महत्वाकांक्षा ज्यों की त्यों है लेकिन समुदाय में राजनीतिक एकता का कहीं अता-पता नहीं. 

भारत विभाजन के बाद मेघ भगतों का  कांग्रेस की झोली में गिरना स्वाभाविक था. अन्य कोई पार्टी थी ही नहीं. फिर आपातकाल के बाद जनता पार्टी का बोलबाला हुआ. जालन्धर से श्री रोशन लाल को जनता पार्टी का टिकट मिला. पूरे देश में जनता पार्टी को अभूतपूर्व जीत मिली. लेकिन भार्गव नगर से जनता पार्टी हार गई. देसराज की 75 वर्षीय माँ ने हलधर पर मोहर लगाई, विजय के 80 वर्षीय पिता ने हलधर पर ठप्पा लगाया. ये दोनों छोटे दूकानदार थे. लेकिन इस चुनाव क्षेत्र से दर्शन सिंह के.पी. (के.पी. = (शायद) कबीर पंथी) चुनाव जीत गया. राजनीतिक शिक्षा के अभाव में मेघ भगतों के वोट बँट गए.
फिर भगत चूनी लाल (वर्तमान में पंजाब विधान सभा के डिप्टी स्पीकर) यहाँ से दो बार बीजेपी के टिकट से जीते. लेकिन समुदाय के लोगों को हमेशा शिकायत रही कि इन्होंने बिरादरी के लिए उतना कार्य नहीं किया जितना ये कर सकते थे. कहते हैं कि नेता आसानी से समुदाय से ऊपर उठ जाते हैं और फिर 'अपनों' की ओर मुड़ कर नहीं देखते. यहाँ एक विशेष टिप्पणी आवश्यक है कि यदि कोई नेता विधान सभा का सदस्य बन जाता है तो वह किसी समुदाय/बिरादरी विशेष का नहीं रह जाता. वह सारे चुनाव क्षेत्र का होता है. दूसरी वस्तुस्थिति यह है कि हमारे नेताओं की बात संबंधित पार्टी की हाई कमान अधिक सुनती नहीं है. मेघ भगत ज़रा सोचें कि वे कितनी बार अपने नेताओं के साथ सड़कों पर उतरे हैं, कितनी बार उन्होंने अपनी माँगों की लड़ाई लड़ते हुए हाईवे को जाम किया है या अपने नेता के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन किया है. इसके उत्तर से ही उनके नेता और उसके समर्थकों की शक्ति का अनुमान लगाया जाएगा.

सी.पी.आई. के टिकट से जीते एक मेघ (मेघवाल) चौधरी नत्थूराम मलौट से पंजाब विधान सभा में दो बार चुन कर आए. इन्हीं के पिता श्री दाना राम तीन बार सीपीआई की टिकट से जीत कर विधानसभा में आए हैं. पता नहीं उनके बारे में लोग कितना जानते हैं.

सत्ता में भागीदारी का सपना 1910 में हमारे पुरखों ने देखा था. वे मज़बूत थे. इस बीच क्या हमें अधिक मज़बूत नहीं होना चाहिए था? सोचें. 'एकता ही शक्ति है' की समझ जितनी जल्दी आ जाए उतना अच्छा. एकता की कमी और राजनीतिक पिछड़ेपन का परस्पर संबंध है.

राजनीतिक पार्टी कोई भी हो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. सब का चेहरा एक जैसा होता है. महत्वपूर्ण है कि मेघवंश समाज आपस में जुड़ने की आदत डाले. आपस में जुड़ गए तो जीत की उम्मीद बढ़ जाती है. अपने स्वतंत्र उम्मीदवार को भी जिता सकते हैं और यही बात है जो बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ नहीं चाहेंगी. इस हालत में आपको क्या करना चाहिए?