"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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10 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक - 2

  


    डॉ वियोगी ने पौराणिक साहित्य से भी संदर्भ ले लिए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार मग या मद्र, भारत में शाक द्वीप यानि ईरान से आए। (नवल जी की पुस्तक में ‘शका’ छपा है। संभवतः यह शाक शब्द है।) इस द्वीप के मगों में चार जातियां थीं- मग, मगध, मानस और मंदगा अथवा मद्र यानी भारत की तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र यानी मद्र शूद्र थे। जैसा कि पहले बताया गया है मीडिया (Media region) के निवासी मीड (Mede) भारत में मद्र कहलाए। (कुछ अन्य विद्वानों ने लिप्यंतरण करते हुए Mede को ‘मेदे’ भी लिखा है)। मग या मघ एक ही जनजाति थी। पहली जनजाति में से दूसरी उभरी। हेरोडोटस (Herodotus) ने उन्हें मद्रों की एक शाखा बतलाया है, क्योंकि वे मूलरूप से अनार्य थे। भारत में मद्र शिल्पकार अथवा बुनकर के रूप में दिखते हैं, क्योंकि मगों का संबंध मद्रों से था, इसलिए वे बुनकर थे और पुजारी भी। इन्हीं परिस्थितियों में पश्चिम एशिया में मेघ जाति विकसित हुई क्योंकि उनके समाज में ऐसी ही परंपरा थी। मेघ, समाज के एक विशेष वर्ग का पुजारी है। मुख्यतया वे मातृदेवी की पूजा से जुड़े हैं जो जनजातीय परंपरा है। उनके अनेक गोत्र नाम ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं। जब कि उनसे संबंधित औडुंबरा या डूम वर्ग के लगभग सारे गोत्र ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं।

तीसरे दौर में भारत आए मेघों से संबंधित वर्ग को विदेशी और म्लेच्छ होने के कारण बहुत समय तक मान्यता नहीं मिली। दूसरी सदी में जब पार्थियन व शकों का राज्य था उन्हें द्विज की मान्यता मिली। इस सम्मानजनक स्थिति पर मज़बूत पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने ब्राह्मण व ब्राह्मणवाद की बड़ी सेवा की। जातिवाद को मज़बूत करने के लिए कड़े कानून बनाए और स्मृतियों में जोड़े। उसी का परिणाम है कि गंगा घाटी में जातिवाद अपने अत्यंत घिनौने रूप में मिलता है।

‘गोत्र’ के बारे में बताते हुए नवल जी लिखते हैं कि भारत की जलवायु आर्यों के लिए गर्म थी। इसलिए उन्होंने यहां के वनों में आश्रम बना कर रहना शुरू किया। वे चरवाहे थे और गाएं चराते थे। अनेक ऋषि अपनी गायों को विशेष पहचान देने के लिए उनके कान काटकर खास निशानी लगाते थे ताकि उनकी पहचान की जा सके। उस निशान को गोत्र कहते थे। उसी गोत्र के आधार पर आश्रम और ऋषि की पहचान होने लगी। पहले चार गोत्र थे- अंग्रिश कश्यप, अथर्वा, वशिष्ठ तथा भृगु। बाद में चार और जुड़ गए - जगदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य। उनमें अनार्य (ईरान से आए मग) वर्ग के ऋषि भी शामिल थे। जब जाति विभाजन कठोर हो गया और लोगों को यकीन हो गया कि आर्य ऋषियों के गोत्र वाले ही वास्तव में ब्राह्मण हैं और अब्राह्मण का अपना कोई गोत्र नहीं हो सकता तब इसी सिलसिले में यज्ञ करते हुए गोत्र नाम बोलने की परंपरा शुरू हुई। क्षत्रिय और वैश्य अपने पुरोहित का ही गोत्र नाम इस्तेमाल करने लगे। विभिन्न वर्णों में समान गोत्र नामों की यह वजह रही। गोत्र परंपरा से पहले पुरोहित और क्षत्रिय ख़ुद को एक ही वर्ग का नहीं मानते थे। इससे जातिवाद विकसित हुआ।

डॉ नवल के अनुसार विश्वामित्र व कण्व कश्यप अनार्य ऋषि थे। महाभारत के अनुसार कश्यप ही नागों (मग) के जनक थे। वशिष्ठ तथा विश्वामित्र का टकराव आर्य-अनार्य का ही टकराव प्रतीत होता है जो बहुत स्पष्ट भी नहीं है। बंगाल के चंदा नामक विद्वान के हवाले से वे लिखते हैं कि इस काल में ब्राह्मणों का लोभ बहुत बढ़ गया था। लोभ व हित साधना के लिए झूठी परंपराएं और निरर्थक अनुष्ठान प्रारंभ किए गए। सारी सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था जैसे उनकी मुट्ठी में आ गई। यजमानों की प्रशंसा बहुत बढ़ा-चढ़ा कर की जाती थी। उन्हें लंबी आयु और अमर पद का लालच दिखाया जाता था। अहीन यज्ञ में 1000 गायें अथवा सारी संपत्ति दान करनी होती थी। गुप्त काल में धर्म व मंदिरों की लूट यथावत जारी रही।

डॉ नवल लिखते हैं, “मद्र अथवा मेघ समाज में प्राचीन काल से ही गणसंघ, गणतंत्र व्यवस्था की परंपरा थी। उनका प्रत्येक नागरिक एक बहादुर सैनिक तथा कुशल शिल्पकार होता था। उनमें राजऋषि परंपरा थी। वह जाति-पांति विहीन समाज था। वहां हर मनुष्य जन्म से ही बराबर था। वे प्रारंभ से असीरियन धर्म के मानने वाले थे। उसका आधार सांख्य दर्शन था। उसने बौद्ध व जैन धर्म को जन्म दिया था। यानी वे बौद्ध अथवा जैन धर्म के अनुयायी थे। बौद्ध धर्मी ब्राह्मणों के सबसे बड़े शत्रु थे। जब गुप्त युग में उनका बलात हिन्दूकरण किया गया तो उन्हें उसी शत्रुता के कारण चौथे वर्ण में धकेल दिया गया। इसका अन्य कारण भी था कि वे मूलरूप में बुनकर थे। क्योंकि बौद्ध-धम्म में मांसाहार की आज्ञा थी यहां तक कि उन्हें मृत पशु का मांस खाने की आज्ञा भी थी अतः मेघों को अछूत वर्ग में धकेल दिया गया। यानी एक भाई ने अपने ही भाई की यह दुर्गति की है।” “गुप्त भले ही उसी नाग समाज के राजा थे, मगर उनका भी आर्यकरण कर दिया गया और बौद्धों पर धार्मिक अनाचार करने में उन्होंने ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ दिया।”

आधुनिक काल में जम्मू के क्षेत्र के प्राचीन निवासी मेघों की स्थिति बहुत खराब रही। वे बंधुआ मज़दूरों का जीवन जी रहे थे। काम के बदले उन्हें सूखी रोटी और उतरन मिलती। जिनके पास थोड़ी-बहुत ज़मीन थी उसे नैतिक-अनैतिक तरीकों से राजपूतों ने हड़प लिया। जम्मू व सिआलकोट के क्षेत्र में वे खेतिहार मज़दूर थे। अछूत होने के कारण वे घरों तथा मंदिरों में प्रवेश करने का साहस नहीं कर सकते थे। कुओं से पानी नहीं ले सकते थे। वे अधिकतर बुनकर, खेत मज़दूर और कारख़ानों में मज़दूर थे। लेखक काहण सिंह बिलौरिया ने लिखा है, "मेघ निचली जातियों के पुजारी हैं।" भूमि सुधारों के कारण उनमें से कुछ को ज़मीनें अलॉट हुई हैं। वे खेती करने लगे हैं।

प्रो. हरिओम शर्मा अपनी रचना 'हिस्ट्री आफ जम्मू एण्ड कश्मीर' में लिखते हैं- “उच्च शिक्षा तथा नौकरियों में आरक्षण के कारण अनेक मेघ ऊंची श्रेणी के पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस., डॉक्टर, इंजीनियर, बैंक प्रबंधक सेवाओं के पदों तक पहुंच गए हैं।"

कुछ अभिलेखों से प्रमाण मिले हैं कि अनेक मेघ ठाकुर जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के राज्यों में शासक रहे हैं। पठानकोट के पठानिया राजवंश का संबंध मद्र या मेघ समाज के साथ था। उन्हें मूल रूप से औडुंबरा पुकारा जाता था। उसी से डूम शब्द बना। मुग़लों के शासन काल में पठानिया प्रसिद्धि प्राप्त शासक थे। वे राजपूत पुकारे जाते थे। सिखों के शासन काल तक वे सत्ता में रहे। मद्र तथा मेघों की तरह यह एक बुनकर जाति थी।

मेघों के इतिहास  का यह बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। बेहतर होगा कि डॉ नवल वियोगी की मूल पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ ध्यान से पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। फिर से अनुरोध है उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिए।

पुस्तक का नाम: मद्रों और मेघों का प्राचीन व आधुनिक इतिहास

लेखक - डॉ नवल वियोगी

प्रकाशक - सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, 

नई दिल्ली-110063

खरीद के लिए संपर्क - मोबाइल - 9810249452, 9818390161



03 April 2021

From Madra to Megh - मद्र से मेघ तक -1

डॉ नवल वियोगी ने मेघों की लगभग पूरी कथा लिख डाली। यह बात समझी जा सकती है कि उनके द्वारा इकट्ठी की गई जानकारी पूरे मेघ समाज तक जल्द पहुंचने वाली नहीं है। यह चिट्ठा एक कोशिश है कि नवल जी ने जो खोजा-पाया है उसकी कहानी का सार मेघनेट के पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की जाए। यह स्कैच मात्र है। बेहतर होगा कि उनकी लिखी पुस्तक ‘मद्रों और मेघों का प्राचीन और आधुनिक इतिहास’ पूरी पढ़ी जाए और ख़रीद कर पढ़ी जाए। उनकी मेहनत की क़द्र की जानी चाहिए।

‘मेघ’ (जनजाति) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों ने कई अनुमान लगाए गए हैं। लेकिन जाति नाम के तौर पर यह शब्द कब और कैसे अस्तित्व में आया इसका कुछ उत्तर डॉ नवल की पुस्तक में मिल जाता है। इसका मद्र, मग, मागी, मीडिया (दक्षिणी ईरान का क्षेत्र) से संबंध है ऐसा इतिहासकार ने बताया है। 

मद्र नामक जनजाति ईरान के मीडिया प्रदेश में रहती थी। उनके पुजारी या पुरोहित मग कहलाते थे। उनकी भाषा अमेगीर (Emagir) थी। वे मग बेबीलोनिया और काल्डिया में भी पुजारी थे। वहीं से इनका भारत में आगमन हुआ था। नस्ली तौर पर वे द्रविड़ थे। मीडिया में गोल सिर वाले अल्पाइन अथवा कसाहट लोगों के साथ दीर्घकाल तक रहने के कारण उनमें संकरण हुआ। उनके समाज में राजऋषि परंपरा थी। शासक राजा धार्मिक मुखिया भी होता था। इसलिए मग धीरे-धीरे पुजारी बन गए।

उनका समाज गणतांत्रिक था। जहां प्रत्येक नागरिक बराबर था। उनकी सामाजिक परंपराओं के अनुसार सभी नागरिक बहादुर सैनिक होते थे और कुशल शिल्पी भी। मद्रों का संबंध जोहाक नाग राजपरिवार के साथ था। मद्र भारत में जोहाक या तक्षक नाग परिवार की एक शाखा के रूप में हैं। अर्थात मद्रों और मगों दोनों का संबंध उस जोहाक या नाग परिवार के साथ था जो गांधार और तक्षशिला के शासक थे। 2500-2100 ई.पू. जब आर्य ईरान आए तब वहां के शासक बन गए। उनमें पशु-वध से जुड़ी यज्ञ परंपरा थी। मग राजऋषि उनकी यज्ञ परंपरा से जुड़े और उनके पुजारी बने। 

मगों का भारत में पहला आगमन तब हुआ जब आर्यों ने ईरान पर आक्रमण किया। जीवन रक्षा के लिए वे कई अन्य ईरानियों के साथ भारत भू-भाग में आ गए। वे अपना असीरियन धर्म भी साथ लाए। यह सांख्य दर्शन पर आधारित था। इसी में से बौध और जैन धर्म आए। ये बराबरी और भाईचारे पर आधारित थे। आर्यों ने 1650 ई.पू. भारत पर आक्रमण किया तब मग भी उनके साथ भारत आए। मगों ने ऋग्वेद की रचना और जाति आधारित व्यवस्था निर्माण में मदद की। मग द्रविड़ थे लेकिन आर्यों के साथ रहने के कारण ख़ुद को आर्य समझने लगे थे। लेकिन आर्यों ने उन्हें आर्य नहीं माना।

मीडिया के मग पुरोहित तंत्र विकसित करने की ओर प्रवृत्त रहे। ईरान में कोई यज्ञ उनके बिना नहीं होता था। उन्होंने ज्योतिष विद्या विकसित की। वे सपनों के आधार पर भविष्य बताते थे। इन्हीं कलाओं की सहायता से वे राजाओं-महाराजाओं की निकटता प्राप्त कर पाए। अंधविश्वासी होने के साथ-साथ वे झूठा दिखावा भी करते थे। इससे उन्हें राजनीति में घुसपैठ करने और समाज में महत्व पाने का अवसर मिला। तभी एक हादसा हो गया। अख़माइन राजवंश के राजकुमार डेरियस प्रथम के सिंहासनारूढ़ होने में गोमत नामक मशहूर राजऋषि मग नेता बाधा बन गया। नतीजतन उसकी और उसके मागी साथियों की हत्या कर दी गई। उन्हें सबक सिखाने के लिए एक मेगाफ़ोनिया नाम का पर्व मनाया जाने लगा। किसी एक मग को पकड़ कर उसे 5 दिन के लिए ईरान की राजगद्दी पर बिठाया जाता। उसके बाद उसे फांसी दे दी जाती। इस दिन मगियों को कई तरह से अपमानित किया जाता। जिससे वे अपने घरों में छिप जाते। बरसों के अपमान से दुखी होकर 521 ई.पू. के आसपास वे मग बलुचिस्तान, सिंध, गुजरात व विन्ध्याचल के रास्ते मगध में चले गए। यहां भी 5-6 सौ साल तक वे हिंदू समाज का हिस्सा नहीं बन सके। उन्हें म्लेच्छ, मग, विदेशी, यवन, पारसी कहकर पुकारा गया। आखिर उन्हें दूसरी सदी में ब्राह्मण के तौर पर मान्यता मिल गई। लेकिन आर्यों ने उन्हें ख़ुद से नीचे रखा। वे मग, शांकल, कश्यप अथवा कान्यकुब्ज ब्राह्मण कहलाए। डॉ वियोगी ने बताया है कि भविष्य पुराण में उन म्लेच्छ ब्राह्मणों के 10 गोत्र बताए हैं- कश्यप, उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, पांडेय, चतुर्वेदी। आगे चल कर इन्हीं ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हिंदू धर्म के कठोर नियम बनाए और पूर्व ग्रंथों में उन्हें जोड़ा।

डॉ वियोगी ने बताया है कि प्राचीन काल में, पश्चिम एशिया से तीन प्रमुख अनार्य जनजातियां आईं- जोहाक अथवा तक्षक नाग, हाइक्सोस अथवा इक्ष्वाकु, यादव अथवा पंचजन्य। ये सभी मूल रूप से एक ही थे। तीनों ही सिंधु घाटी के बसाने वाले थे। अस्थाना शशि और हेरोडोटस के हवाले से बताया गया है कि मीडिया के मीड तथा भारत के मद्र भिन्न नहीं थे। वे मग या मागी मद्रों की ही एक शाखा थे।

उशीनर गणराज्य का एक भाग झंग मधियाना (मग से मधियाना) कहा जाता था। यह दोआब के दक्षिणी भाग में था। उशीनर जन मद्रों से संबंधित थे। यानी मद्र या मग मीडिया की तरह यहां भी एक साथ ही निवास करते थे। आगे चल कर मद्रों ने सिआलकोट (शांकल) पर दीर्घ काल तक राज किया। कौरवों-पांडवों के साथ उनके वैवाहिक संबंध होते थे। सिकंदर के आक्रमण (326 ई.पू.) के समय मद्र अथवा पौरुष उस क्षेत्र में निवासित थे। यहीं से मद्रों के पौराणिक और इतिहासिक सूत्र मिलने लगते हैं।

मगों की एक मुख्य शाखा ने आगे बढ़कर भारत के मध्य-पूर्व में शासन किया। वे चेदि पुकारे जाने लगे थे। उन्हीं की एक शाखा ने मगध पर शासन किया। जरासंध चेदि वंश का प्रसिद्ध राजा था जिसे राक्षस या असुर कहा गया है। कृष्ण और पांडवों के साथ युद्ध में वह मारा गया। चेदियों की एक शाखा ने दक्षिण कोसल व कलिंग पर अधिकार जमाया, नंदों और अशोक महान से युद्ध किया। उन्हीं की एक शाखा थी खारवेल या महामेघवाहन। उसने दक्षिण-पूर्व में बहुत ही शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया। ये लोग जैन धर्म के अनुयायी और उसके रक्षक थे। उनकी एक शाखा ने 129 ई.-217 ई. तक कोसंबी में शासन किया। वे बौद्ध धम्म के अनुयायी थे। उनमें 9 बड़े राजा और छोटे 10 राजा हुए। प्रमुख राजाओं के नाम थे- मघ, भीमसेन, मद्रमघ व प्रोष्ठाश्री, भट्टदेव, कौत्सीपुत्र, शिवमघ प्रथम, वेश्रवण, शिवमघ द्वितीय, तथा भीम वर्मन। उनके शिलालेख और मुद्राएं मिली हैं। उनके आखिरी राजा को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। मध्यकाल (Medieval period) में मेघों की एक शाखा ने मध्य भारत में शासन किया।

(ब्लॉगर का नोट: ऊपर के विवरण से जाना जा सकता है कि ‘मग’ से ‘मेघ’ शब्द की यात्रा सदियों में तय हुई है। मग से मघ बनते हुए इसे 129 ई. से 217 ई. के दौरान कोसंबी में देखा गया है। घ, ध, भ जैसी महाप्राण ध्वनियां भारतीय हैं। ग के घ हो जाने के इस परिवर्तन की भाषा वैज्ञानिक व्याख्या कहीं न कहीं मिल जाएगी। कहा जाता है कि बुद्धकाल ही भूतकाल है। यानि ब का भ और ध का त हो जाना किसी उच्चारण प्रवृत्ति की वजह से है। ‘कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी’ वाली बात है। मीड, मेदे, मेगी, मग, मद्र, मेद, मेध, मध्य, मेघ, मेंग, मींग, मेंह्ग, आदि शब्द एक ऐसी प्राचीन जनजाति की ओर इशारा करते हैं जिसकी सैंकड़ों शाखाएं, वर्ग और जातियां हैं। ये दक्षिण-पश्चिम एशिया के बहुत बड़े भू-भाग में निवासित हैं।)

28 March 2021

Thirst for history - इतिहास की प्यास -2

प्राचीन ‘इतिहास’ की एक मुख्य बात यह थी कि मंत्रोच्चार के साथ राजा का विस्तृत गुणगान करने के बाद जल्दी से यह बोल कर ‘स्वाहा...’ कह दिया जाता था कि - ‘उसके राज्य में जनता बहुत सुखी थी’. कैसे सुखी थी या कैसे सुखी नहीं थी, इसका उल्लेख कम ही मिलता है. उस समय के इतिहासकारों ने राजा से ज़मीन और उपहार लेने होते थे सो प्रजा के बारे में एक वाक्य काफ़ी था. अधिक बताने की ज़रूरत नहीं समझी गई. मेहनती देश की श्रम-संस्कृति का वर्णन जब यज्ञ-संस्कृति करती है तो बहुत कुछ अनकहा रह जाता है. हिरणों की कथा अगर शिकारी लिखे तो यही लिखेगा कि देश का राजा बहुत दयालु था (जिसने उसे बड़ी शिकारगाह दे दी थी)....और कि शिकारी की नज़र जहां तक जाती थी वहां हिरण खुशी से छलांगें मारते थे. बाकी शिकारी जाने या फिर हिरणों को पता होगा.

इंसानों के संबंध में जब इतिहासकार शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, धर्म और जनसाधारण के जीवन पर व्यापक टिप्पणियाँ दें तब वह आज के अर्थ में ‘इतिहास’ कहलाता है.

किसी मानव समूह (समाज) का इतिहास तब रूप ग्रहण करने लगता है जब अपने परिवेश से मिले संस्कार समाज के सदस्यों को ऐसा बना दें कि वे दूसरों के जीवन को सकारात्मक रूप से निखारने लगें. अपने अस्तित्व और जीवन-मूल्यों के लिए संघर्ष समाज के जीवन में दिखने लगे और उसका शैक्षिक, बौद्धिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास होने लगे. 

आधुनिक इतिहासकारों ने वह समझदारी विकसित की है जिसमें आम पब्लिक का दुख-सुख जगह पा गया. इसके अलावा प्रमुख घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में सक्रिय विचारधारा, साहित्य, भाषा आदि के महत्व को इतिहास के अन्वेषकों और टिप्पणीकारों ने समझा. इतिहास को लेकर ख़ास तरह के संदर्भ साहित्य में क्या गुण-दोष हैं, किसी विचारधारा की स्थापना किसने और किन परिस्थितियों में की यह बताया जाने लगा है. इसलिए यदि आपके समाज पर किसी दूसरे ने कमेंट्री की है तो उसका इस्तेमाल करते हुए सावधानी बरतें. किसी दूसरे ने गूढ़ भाषा में जो मंत्र लिखा उसका इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह परख लें कि कहीं वह मंत्र आपको ही बर्बाद करने के लिए तो नहीं लिखा गया.

इतिहास के उल्लेखनीय पात्रों में अपने समाज (परिवार) की परंपराओं के प्रति ‘स्वाभिमान’ जैसे प्रबल और आक्रामक गुणों का उल्लेख होता आया है जिनके बल पर किसी ने अपने समाज को उच्चतर स्थिति, उच्चतर मानकों (स्टैंडर्ड्स) पर बनाए रखने के लिए कार्य किया. कई मेघों की प्रेरक जीवनियाँ बताती हैं कि उन्होंने किस तरह अशिक्षा और कम संसाधनों के बावजूद संतानों का चारित्रिक निर्माण किया, संतानों को शिक्षा दिलाने और आगे बढ़ाने के लिए लंबा संघर्ष किया और उनमें उच्चतर जीवन-मूल्यों का बीज रोंपा. ऐसी सच्ची कथाओं वाला साहित्य समाज में जान फूंकता है. उनका योद्धाओं वाला इतिहास तो है ही.

इतिहास लेखन का छोटा-सा तजुर्बा तब हो जाता है जब हम परिवार की तरक्की के लिए अपने माता-पिता की जद्दोजहद पर निबंध लिखते हैं. माता-पिता के किन गुणों के कारण आप, मैं और गली-मोहल्ले या शहर के लोग उन्हें याद करते हैं. ‘शहर के लोग याद करते हैं’ जैसा वाक्य शहर में सस्ता नहीं मिलता. इसका मूल्य आपके पास रखे संदर्भों, दस्तावेज़ों और मीडिया की ताकत से तय होता है. समाचार पत्र की कतरनें, फोटो, वीडियो, पत्रिकाएं, फिल्में आदि समाज का इतिहास लिखने में मददगार होती हैं.

अपना इतिहास स्थापित करने के लिए बुद्धिजीवियों की मदद ज़रूरी है. उसे छापना और जन-पुस्तकालयों तक पहुंचाना चाहिए. समाज को पुस्तकें मुहैय्या कराइए. मेघ समाज तूफ़ानों का मुकाबला करते हुए वर्तमान तक पहुंचा है. ज़रूरी है कि उसकी गौरवपूर्ण कथा लिखी जाए.


20 March 2021

Thirst for history - इतिहास की प्यास -1

    कुछ दिन पहले मेघ चेतना के पूर्व मुख्य संपादक श्री एन.सी. भगत मेरे यहां पधारे थे. उन्होंने जिक्र किया कि किसी ने उन्हें फोन करके मेघों के इतिहास की जानकारी चाही है (भई यह चाहना तो हमें भी लगी है). 

    बातचीत लंबी थी. इस दौरान श्री एन.सी. भगत ने बताया कि उन्होंने फोन करने वाले को एक सुझाव दिया है कि चार-पांच लोग इकट्ठे बैठकर अपनी जानकारी के हिसाब से मेघ जाति का इतिहास लिखें.

    इस सुझाव में बहुत संभावनाएं हैं. दो या अधिक टीमें भी हो सकती हैं. ये टीमें इकट्ठे या अलग-अलग बैठ कर लिखें. उनके पास प्राधिकृत और पर्याप्त सामग्री हो तो अच्छा परिणाम निकलेगा. डॉ ध्यान सिंह, डॉ नवल वियोगी, श्री ताराराम और कुछ अन्य ने मेघों के बारे में बहुत कुछ लिखा है. इतिहासपूर्व मेघों के बारे में श्री आर.एल. गोत्रा का आलेख Meghs of India काफी कुछ कहता है. उनके आलेख के संदर्भ अन्य इतिहासकारों ने दिए हैं. इन सभी विद्वानों द्वारा एकत्रित जानकारी उपयोगी है. कोई कहना चाहे तो कह दे कि- ‘Blogging is not writing’, लेकिन MEGHnet ब्लॉग पर मेघों के बारे में बहुत-सी सकारात्मक जानकारियां मिल जाएंगी जो अन्यत्र नहीं मिलेंगी. नए प्रयास करने वालों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.

    इतिहास लेखन के गुणों के बारे में विद्वानों ने हमारे लिए बहुत कुछ लिख छोड़ा है. उसका एक सार यह है:-

    ‘अपने लेखन को पूरी तरह केंद्रित, सीमित रखें. स्पष्ट तर्क दें, अपने मूल विचार शामिल करें, अपनी भावना को अच्छी कहानी की तरह कहें, साथ में सबूत देते चलें, अपने स्रोतों के दस्तावेज़ बनाते चलें, निष्पक्षता से लिखें, पहला और आखिरी पैराग्राफ एक दूसरे का दर्पण हो, आपका लेखन भाषा की प्रचलित रीति में हो और आप जिसे कुछ कहना चाहते हैं उससे बात करता हो.’ (Richard Marius and Melvin E. Page की A Short Guide to Writing About History के साभार)

    इतिहास लेखन प्रोजेक्ट की तरह होता है: 

   अपनी परियोजना की योजना बनाएं. उसका प्रकाशन, उसका बजट प्रबंधन, किसी अन्य लेखक की सहायता कैसे और किन नियमों और शर्तों के तहत ली जाएगी, पुस्तक प्रकाशन की अन्य व्यवस्थाएँ, संपादन, डिज़ाइन और पुस्तक का समग्र रूप, ISBN संख्या और तैयार पुस्तक को बेचना. उसके बाद समय-समय पर अपडेशन या नए संशोधित संस्करण. कुल मिला कर यह एक भरी-पूरी कला है.  

    यदि मैं सिर्फ़ अपना मूल या अपने वंशकर्ता के बारे में जानकारी चाहता हूं, तो मुझे साइंस से इतना सबक़ ले लेना चाहिए कि धरती पर जीवन सूर्य से है और सभी मानव सूर्यवंशी हैं. 'मेघ-माला' पुस्तक यही कहती है. प्रथम मेघ-नारी या मेघ-पुरुष की तलाश है? तो बेहिसाब मग़ज़ फोड़ी कर के आख़िर कहना होगा कि जिस इंसान ने पहली बार धरती पर चैतन्य आंखें खोलीं वही हमारा वंश कर्ता था. वह मानवीय गुणों वाला प्राकृतिक मानव था. उसका नाम कहीं दर्ज नहीं है. 


18 February 2021

Ladder of Caste - जाति की सीढ़ी

पिछले तीन वर्ष से मेरे एक परिचित हैं, श्री जतिंदर सिंह, हरियाणा से हैं. उनके नज़रिए से (मेरे भी) एक महत्वपूर्ण विषय को लेकर वे तीन बार चर्चा के लिए मेरे यहां आए हैं. वे जानना चाहते हैं कि क्या मेघ जाति को ओबीसी की सूची में रखने के लिए कुछ किया जा सकता है. विषय मेरी पसंद का है इस लिए चर्चा भी ख़ूब हुई.

उन्होंने मुझे इस बारे में ब्लॉग लिखने और कुछ लोगों से संपर्क करने के लिए कहा. मैंने किया ताकि इस विषय में कोई रास्ता दिखे. मैंने कुछ जानकारों से बात की. लोगों से शेयर किया, फ़ोन किए. अब इस विषय पर अपनी लगभग आखिरी बात रिकॉर्ड कर रहा हूं. 

आज किसी जाति को एक सूची से निकाल कर दूसरी में डलवाना आसान प्रक्रिया नहीं है. ओबीसी जातियों की पहचान का कार्य राज्य सरकारें करती हैं और अनुसूचित जातियों की पहचान का कार्य केंद्र सरकार का है. केंद्र में इनसे संबंधित विभिन्न आयोग भी बने हुए हैं. यदि कोई जाति समाज में बनी जातियों की सीढ़ी पर चढ़ना या उतरना चाहती है तो इस बाबत संसद में सवाल उठते हैं. श्री जतिंदर सिंह अक्सर यह पूछते हैं कि क्या हमारे आईएएस अधिकारी इस बारे में सहायता कर सकते हैं? शायद कुछ मदद कर सकें. लेकिन निर्णय राजनीतिक स्तर पर होता है.

विशेषकर उत्तरी पंजाब में बसी मेघ जाति के पास राजनीतिक प्रतिनिधित्व लगभग है ही नहीं. राजनीति में उनके कुछ सितारे लगता है जल्दी उभरेंगे. इसलिए वर्तमान सामाजिक स्थिति में फिलहाल रहना होगा. आगे क्या होगा वह राजनीति तय करेगी. बाकी सब अनुमान या हमारे परेशान मन के विषय हैं. व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर मेघ समुदाय उच्चतर सामाजिक स्टेटस का हक़दार है.

सॉरी जितेंद्र सिंह जी, राजनीति में मैं कमज़ोर बच्चा हूँ.


25 January 2021

Bhakt and Bhagat - भक्त और भगत

    ऐतिहासिक (historical) सूचनाओं से स्पष्ट है कि पूरा भारत कभी बौद्धमय था. इस ऐतिहासिक प्रभाव से भारत का कोई धरा-खंड या समाज-खंड इससे अप्रभावित रहा होगा ऐसा सोचना कठिन हो जाता है. मेघ समाज भी इसके प्रभाव में रहा होगा इस बात को सहज ही समझा जा सकता है।

     समाज में यह विचार अक्सर चर्चा का विषय रहा है कि मेघ समाज को भगत कब से कहा जाने लगा. कुछ ने इसे भगत कबीर के साथ जोड़ा और किसी ने इसे 'भक्त' शब्द से बिगड़ कर बना मान लिया. किसी ने इसे आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण और लाला गंगाराम से जोड़ा. लेकिन क्योंकि यह विषय इतिहास और भाषा का है इसलिए भाषा विज्ञानियों की बात सुनना बेहतर होगा.

     प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जो इतिहास के भी अन्वेषक हैं, उन्होंने बताया है कि कबीर जब अपनी वाणी में 'साधो' कह कर संबोधित करते हैं तो उसका सीधा अर्थ होता है कि वे श्रमण परंपरा के साधु को संबोधित कर रहे हैं. जैसा कि पहले भी मैंने एक ब्लॉग में लिखा था कि कबीर बौध परंपरा के हैं. उसी बात में यह एक और प्रमाण जुड़ जाता है कि कबीर श्रमण परंपरा के ही हैं. साधु का अर्थ होता है 'जो सील संपन्न' हो. डॉ सिंह ने एक बात और कही है जो रुचिकर है. वे लिखते हैं कि कबीर 'भक्त' नहीं थे और कि 'भगत' शब्द श्रमण परंपरा का शब्द है जो 'भगवत' शब्द का संक्षिप्त रूप है. इसलिए कबीर निर्गुण परंपरा के नहीं बल्कि श्रमण परंपरा के 'भगत' हैं इसीलिए वे 'साधु' को संबोधित करते हैं.

     ज्ञान का कोई अंत नहीं जितना ले लिया जाए उतना कम प्रतीत होता है.

 


10 August 2019

Megh, Meghs and Many Meghs - मेघ, मेघ और मेघम्मेघ

मेघ रेस के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ी उसे इस ब्लॉग पर एकत्रित किया जाता रहा, जैसे कि जम्मू से लेकर कर्नाटक तक मेघ रेस के लोग बसे हुए हैं. मेघवारों के इतिहास से पता चला कि मेघ रेस के लोग बिहार में भी रह रहे हैं. कर्नल कन्निंघम से पता चला कि मेघ नॉर्थ-ईस्ट में भी हैं. जानकारी इकट्ठा करके ब्लॉग लिखता हूं क्योंकि जिज्ञासु शायद उन्हें पढ़ने आ जाते हैं.

दूसरी ओर यह भी दिखता है कि सोशल मीडिया पर लोग इस चीज को लेकर बहस करते हैं कि क्या वाकई ‘मेघ’ एक रेस है? क्या अन्य प्रदेशों में बसे हुए मेघ, मेघवाल और मेघवार लोग एक ही रेस के हैं? बहस करने वालों को इस बात की भी तकलीफ़ होती है कि जो लोग राजस्थान से पंजाब में आकर बसे हैं और जिन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र मिलता है क्या वे भी मेघ हैं या कोई और हैं? कई बार सोशल मीडिया पर उनकी बहस बेस्वादी हो जाती है. वे मामले को कोर्ट तक ले जाने की बातें करने लगते हैं. उनकी मर्ज़ी. इस बहस के पीछे विषय की जानकारी का अभाव हो सकता है. उस अभाव की पृष्ठभूमि में गरीबी (poverty), भौगोलिक दूरी (distance), अनपढ़ता (illiteracy) और गतिहीनता (immobility) दिख सकती है.

पिछले दिनों रतन लाल गोत्रा जी से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने लगभग 20 साल पुरानी एक बात सुनाई. उनका छोटा भाई अपने बिज़नेस के सिलसिले में कश्मीर में अनंतनाग जाया करता था जहाँ से वो क्रिकेट बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली विल्लो लकड़ी मँगवाता था. लकड़ी बेचने वालों का एक बड़ा बुज़ुर्ग वहाँ बैठा रहता था. उसने बताया था कि ‘हमारे बुज़ुर्ग जुलाहे थे और हमारे गोत्र आपके (मेघों के) गोत्रों जैसे हैं. हम यहाँ कसबी कहलाते हैं. मुसलमान बनने के बाद हमें यहाँ की मुस्लिम परंपरा के अनुसार कसबी कहा जाने लगा. आप हमारे अपने ही बंदे हो’. उस बुज़ुर्ग का अपना गोत ‘गोत्रा’ था. जम्मू के श्री दौलतराम (कुमार ए. भारती के पिता जी जो भारत विभाजन के बाद दिल्ली में रिसेटलमेंट अधिकारी के तौर पर कार्य कर चुके थे) ने रतन लाल गोत्रा जी को बताया था कि ज़िला मीरपुर (जो अब पाकिस्तान में है और मुज़फ्फ़राबाद के पास है) के इलाके के कसबी हमारे ही लोग हैं. (कसबी फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ हैः- कारीगर artisan, शिल्पी  artificer, व्यापारी trader). कहने का भाव यह कि धर्म परिवर्तन के कारण नामऔर सरनेम बदल सकते हैं लेकिन पुरखों की परंपरा एक ही रही हो सकती है. हाँ, नाम बदल जाने से पहचान कुछ कठिन हो जाएगी. शब्दों का खेल बहुत टेढ़ा है. नाम या उसकी भाव पर आधारित ध्वनि बदलने से, शब्दों के अनुवाद या अनुसृजन से, क्षेत्र बदलने से, बस्ती, खेत, मैदान, पहाड़, नदी, जंगल, व्यवसाय आदि बदलने से पहचान बदल सकती है. मनुस्मृति ने व्यवसाय बदलने की गुंजाइश पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए व्यवसाय आधारित जाति की वही पहचान चलती रही जब तक कि जातियों के खंड करके (उनके भीतर विभाजन करके) उनके खंडों को अलग-अलग नाम नहीं दे दिए गए. इसलिए अपने मूल की पहचान को समझते हुए चलना एक ज़रूरत हो सकती है. 


इस बारे में मैंने जो पहले लिखा है उसे दोहरा रहा हूं कि राजस्थान की ओर से आए हुए जो मेघ रेस के लोग अबोहर-फाजिल्का के इलाके में बसे हुए हैं वो हजारों की तादाद में हैं. उनका जाति संबंधी फैसला राजनीतिक निर्णय के तहत पहले से हो चुका है और उन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र कई दशाब्दियों से दिया जा रहा है. मेरा विचार है कि यह बात बहुत स्पष्ट है और विधि सम्मत भी.

ये कुछ शब्द शायद कुछ मदद कर सकें: 

(सहयोग करें, सेवा करें, भाग लें, विविधता लाएं, एकजुट हों, संश्लेषित करें, साझा करें, एक साथ आएं, सहन करें, संवाद करें, पारस्परिकता बढ़ाएँ, गठबंधन करें, समझें, शामिल करें, विलय करें, परस्पर संबंध बढ़ाएं, सम्मान करें, सहयोग करें, पुन: व्यवस्थित करें, स्वागत करें, समायोजित करें, धन्यवाद दें, एकीकृत करें, समर्थन दें, सराहना करें, दूरियाँ समाप्त करें, सम्मिलित हों, सहायता करें, स्वीकार करें, विस्तार करें, आउटरीच बढ़ाएँ, शेयर करें.

cooperate, serve, take part, diversify, unite, synthesize, share, come together, tolerate, communicate, mutuality, combine, interweave, understand, include, merge, interrelate, respect, collaborate, recombine, welcome, accommodate, thank, integrate, support, appreciate, bridge, join, assist, accept, expand, outreach, share)


02 August 2019

Megh Organisations, Siwan (Kaithal) - मेघ संगठन, सीवन (कैथल)

पिछले दिनों सुनने में आया था कि भगत महासभा नामक संगठन ने पेहोवा, हरियाणा में समुदाय का सम्मेलन किया था. संगठन के तौर पर भगत महासभा का हरियाणा में यह पहला सम्मेलन था. उसी कार्यक्रम में फैसला किया गया कि अगला कार्यक्रम मेघ जन की बड़ी आबादी वाले शहर सीवन में 28-7-2019 को किया जाएगा.

समझ नहीं आता कि इसे इत्तेफाक कहा जाए या पहचानने की चूक कि 28 जुलाई 2019 को सीवन के जिस सम्मेलन में हम पहुंचे वह 'भगत महासभा' का था जिसमें इस सभा के ऑल इंडिया प्रेसिडेंट राजकुमार प्रोफेसर खुद मुख्य अतिथि थे. बैनर पर उस दिन की तारीख के साथ "आर्य (मेघ) सभा सीवन और मेघ महासम्मेलन" लिखा था. भगत महासभा की इकाई यहां सक्रिय थी जिसने यह कार्यक्रम आयोजित किया था. जो मेहरबान मुझे चंडीगढ़ से सीवन ले गए थे उनके साथ मैं सबसे अगली पंक्ति के कोने में बैठ गया. वहाँ से बिना रुकावट बने फोटो लिए जा सकते थे. थोड़ी देर के बाद भगत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार अपनी टीम के साथ आए जिसमें जम्मू, पंजाब, हरियाणा से कई और 1-2 राजस्थान से आए हुए सज्जन थे. उनके गले में हार थे और उन्होंने अगली कतार में बैठे हम सभी से प्रेम पूर्वक हाथ मिलाया. फिर उसके बाद हमें डिस्टर्ब किए बिना उनकी टीम के लिए सबसे आगे कुर्सियों की कतार लगाई गई. एक गणमान्य सज्जन ने मुझे भी आगे की कतार में आने के लिए कहा. मैंने मना किया. ('वहां गले में हार पड़ने का खतरा है,'' यह बात मैंने धीरे से अपने प्रिय मित्र ओमप्रकाश गडगाला जी के कान में कही थी. तब तक हमारे लिए "जाते थे जापान पहुँच गए चीन" जैसी स्थिति थी. 

कार्यक्रम शुरू होने पर अतिथियों का परिचय दिया गया तब स्पष्ट हो गया कि कार्यक्रम का आयोजन भगत महासभा की पेहोवा-सीवन की स्थानीय इकाई ने किया था. चंडीगढ़ से चल कर सीवन के ओम पैलेस में जा बैठने तक मुझे जिस आयोजक संस्था के आयोजन स्थल के पते के बारे में जो पता था उसका पता भी यही था (वेरी सॉरी कह रहा हूँ). यहां ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के कार्यकर्ता मौजूद थे. सब को एक साथ देख कर मुझे अच्छा ही लगा.

एक बात शुरू में कहता चलूं कि हॉल पूरा भरा हुआ था (लगभग तीन-चार सौ की केपेसिटी रही होगी). महिला सहभागियों का काफी संख्या में आना उत्साहवर्धक था. महिलाओं की सहभागिता और ज़्यादा होनी चाहिए. मंच पर केवल डायस और माइक था और मंच संचालक की कुर्सी थी. वक्ता लोग श्रोताओं के साथ या आगे की कतार में बैठे थे. नाश्ते और भोजन का भी अच्छा प्रबंध था.

भगत महासभा जम्मू में सक्रिय सामाजिक संगठन है. पंजाब में इसकी गतिविधियां समय-समय पर देखी गई हैं. वक्ताओं ने इस अवसर पर जो कहा उसका सार नीचे दिया गया है :-

मेघ समाज के लोग एक मज़बूत और निरंतर आगे बढ़ने वाले (डायनेमिक) संगठन और सक्रिय, गतिशील तथा परिणाम उन्मुख नेतृत्व की जरूरत महसूस करते हैं जो सारे मेघ समाज को (इस संदर्भ में जम्मू, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़) में वैचारिक और संगठनात्मक नेतृत्व दे सके. मेघ समाज विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों में बंटा हुआ है. जैसे मेघ, भगत, आर्य मेघ, आर्य भगत, कबीरपंथी, जुलाहा आदि. धर्म के नजरिए से मेघ आर्यसमाजी, कबीरपंथी, सिख, राधास्वामी, निरंकारी, सनातनी, डेरे, गद्दियां आदि में बँटे हुए दिखते हैं. वक्ताओं ने अपने समुदाय में शिक्षा के प्रसार के लिए और अधिक जोर देने के साथ-साथ धार्मिक नजरिए से बंटे-बिखरे दिख रहे समाज को सामाजिक संगठनों के माध्यम से इस प्रकार जोड़े रखने की जरूरत पर बल दिया कि समाज अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के लिए हर हाल में इकट्ठा रहे. धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराएं जो समाज की एकता को खंडित करती हैं उसके बारे में समुदाय को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए ताकि अपेक्षित सियासी लाभ मिल सके. इस संदर्भ में एक वक्ता ने 'मेघ-धर्म' का भी उल्लेख किया जिसकी अवधारणा (कन्सेप्ट) की व्याख्या ज़रूरी है (इस बारे में सोशल मीडिया पर काफी बहस हो चुकी है.)

जो मेघ छात्र शहरों में पढ़ने जाते हैं उनके रहने की व्यवस्था के लिए धर्मशालाएं बनाने की बात उठी. लुधियाना में उपलब्ध ऐसी धर्मशाला का उदाहरण दिया गया. सीवन में किए जा रहे ऐसे प्रयास की जानकारी दी गई जिसका मामला काफी आगे तक पहुँचा हुआ है.

कुछ वक्ताओं ने बताया कि समाज के लोग अक्सर पूछते हैं कि 'मेघ कौन होते हैं'. कई वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से इसका उत्तर दिया. एक वक्ता ने कहा कि 3000 साल पहले हमारे मकान पक्के होते थे, आज बहुत से मकान कच्चे हैं. ऐसा क्यों और कैसे हुआ इसकी संक्षेप में जानकारी दी गई.

पूर्व एमएलए श्री बूटा सिंह ने कहा कि लगभग सभी सामाजिक संगठनों के संविधान में लिखा रहता है कि यह संगठन गैर-राजनीतिक है जबकि सच्चाई यह है कि बिना राजनीतिक (सरकारी) सहायता के समाज का विकास बेहतर तरीके से नहीं हो पाता. राजनीतिक पार्टियों के नाम पर समाज बंट जाता है. दरअसल किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट प्राप्त उम्मीदवार को सामाजिक संगठनों के समर्थन की जरूरत होती है और सामाजिक संगठनों की इसमें समुचित सहभागिता होनी चाहिए. (उनका इशारा इस ओर था कि सामाजिक संगठन अपने संविधान का उल्लंघन किए बिना भी सियासी माहौल बनाने और वोट मोबिलाइज़ करने का कार्य कर सकते हैं और प्रेशर ग्रुप (दबाव समूह) बन सकते हैं.)

जम्मू से आए एक प्रतिनिधि ने कहा कि संगठनों को अपने कार्य और कार्य प्रणाली में इतना मजबूत होना चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व को उनकी जरूरत महसूस हो. एक सुझाव यह था कि मेघ समाज के जम्मू, पंजाब और हरियाणा में बने सामाजिक संगठनों की एक कन्फेडरेशन बनाई जाए तो लाभ होगा.

भगत महासभा के अध्यक्ष श्री राजकुमार और ऑल इंडिया मेघ सभा के अध्यक्ष डॉ. सुरिंदर पाल, ऑल इंडिया मेघ सभा की सीवन शाखा के अध्यक्ष राजिंदर सिंह तहसीलदार ने अपने-अपने संगठनों के बारे में विस्तृत जानकारी दी और मेघ समाज के लिए निरंतर कार्य करते रहने का संकल्प दोहराया.

प्रमुख प्रतिनिधियों की सूची इस प्रकार है :-
(सर्वश्री) बोध राज भगत (राष्ट्रीय उपाधयक्ष, भगत महासभा  जम्मू कश्मीर) पवन भगत (चेयरमैन), मोहिंदर भगत (प्रदेश अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर), तरसेम भगत (सहअध्यक्ष), सीता राम भगत, जय भगत, नरेश भगत, सुशील भगत, भगत महासभा पंजाब के प्रदेश अधयक्ष, राजेश भगत (राजू), प्रो रंजीत भगत, रमेश परम्मानन्द, मोहन लाल हैप्पी, सत पाल भगत, विनय भगत, कुलदीप भगत, दर्शन डोगरा, संतोख भगत, डॉ ध्यान सिंह भगत और भक्ष्य नंद भारती (राजस्थान). अंत में अलग-अलग राज्यों से आए मेघ समाज के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया और स्मृतिचिह्न भेंट किए गए. (इस अवसर पर कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई थी तथापि यह नामों की ऊपर दी गई सूची जम्मू से प्रकाशित न्यूज़ पोर्टल  www.earlyindianews.com से ली गई है जिसका लिंक यहाँ है.)












31 July 2019

A matter for consideration - मुद्दा तवज्जो के लिए

ख्यालों के जंगली घोड़ों को बाँधना नहीं चाहता. मुद्दा बार-बार किसी बहाने से सामने आ जाता है इस लिए यह नोट तैयार करके कुछ लोगों को विचारार्थ दिया है. बाकी समय बताएगा.

जब हमारे मेघ समाज के सबसे पहले शिक्षित हुए दो-एक लोगों मे से एक एडवोकेट हंसराज भगत और अन्य प्रबुद्ध जनों ने मेघ समुदाय को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न किए थे तब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से इस मायने में अलग थीं कि उस समय ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ की सूचियाँ बनाने की कोई बात नहीं हो रही थी. अपने समाज के लिए कुछ राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएँ  जुटाने के लिए हंसराज भगत के प्रयासों के बाद सर छोटूराम की सरकार का लिया गया फैसला उचित ही था कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन और सामाजिक व्यवस्था द्वारा सीमाओं में बाँधे गए मेघों को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा गया. भूलना नहीं चाहिए कि मेघों के अत्यंत खराब आर्थिक और सामाजिक हालात का मुख्य कारण जम्मू में फैली प्लेग की महामारी और अकाल की स्थितियाँ भी रहीं. अंग्रेज़ों के शासन के दौरान औद्योगीकरण ने मेघों को भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर दिया. मेघ कृषक, कृषि श्रमिक और बुनकर रहे हैं.

मेघ कब से बुनकरी का कार्य कर रहे हैं इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती. लेकिन इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि यह समाज कभी क्षत्रिय रहा है. ये प्रमाण पौराणिक कहानियों और इतिहास दोनों में मिल जाते हैं.

आज की स्थिति यह है कि मेघ कबीरपंथी भी हैं जो एक सामाजिक आंदोलन का प्रभाव है. हथकरघा (खड्डियों) का व्यवसाय बर्बाद हो जाने के बाद वे कई अन्य व्यवसायों में भी गए. मेघ कबीर की वाणी से जुड़े रहे हैं क्योंकि अपने व्यवसाय की झलक उन्हें कबीर की वाणी में मिलती थी. कई मेघ पंजाब के सेंसस रिकॉर्ड में कबीरपंथी के तौर पर दर्ज हैं.

यह सवाल मेघ (भगत, कबीरपंथी) समुदाय के लोगों के ज़ेहन में उठता रहा है कि क्या वे ओबीसी के लिए क्वालीफाई करते हैं विशेषकर कबीरपंथी नाम के तहत? कई शिक्षित मेघजनों यह मानते हैं कि यदि अनुसूचित जातियों की सूचियाँ बनाते समय ओबीसी के वर्गीकरण का विकल्प उपलब्ध रहा होता तो एडवोकेट हंसराज भगत पंजाब की मेघ जाति को उसी में शामिल करने की सिफ़ारिश करते. लेकिन उन्होंने मेघों के अत्यधिक आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण उस समय अनुसूचित जातियों में उन्हें रखे जाने का विकल्प चुना जिसमें कुछ आर्थिक सुविधाएँ संभावित थीं.

उसके बाद के समय में मेघों को सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिला है और उनमें एक मध्यम वर्ग उभरा है. यह वर्ग अनुसूचित जाति का कहलाने से बहुत सकुचाता है लेकिन नौकरी या कोई अन्य लाभ पाने के लिए वो जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करता है. वो यह चाहता है कि किसी तरह ‘अनुसूचित जाति’ नाम की पहचान से पीछा छूटे. इस समान्यतः शिक्षित वर्ग में सामाजिक और राजनीतिक जागृति आई है. उनके परिवारों से अन्य जातियों में शादियाँ होती हैं. इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन जो इनके स्तर तक नहीं पहुँचे और जिनकी संख्या काफी अधिक है, उनका क्या? 

जो मेघ गाँवों में रह रहे हैं उनकी संख्या बड़ी है. उन्हें जाति का डंक अधिक झेलना पड़ता है. वे पर्याप्त रूप से जागरूक, शिक्षित और संगठित नहीं हैं. उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मज़बूत बुद्धिजीवी वर्ग नहीं मिलता. लेकिन कई शहरों में मेघों के छोटे-छोटे सामाजिक संगठन हैं जिन्हें उनकी बात करनी चाहिए. सोचा जाना चाहिए कि क्या वो अति पिछड़े हुए मेघ समाज के लोग आरक्षण का लाभ उठाने की हालत में हैं? ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक तरफ उनका शिक्षा का स्तर बहुत कम है और दूसरी तरफ़ सरकारी नौकरियाँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं. जो बचा-खुचा आरक्षण है उसके प्रावधानों को अदालतों के फैसलों ने इतना कमज़ोर कर दिया है कि वे कारगर नहीं रहे. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की बात अभी दूर की कौड़ी है.

तुलना करें तो पंजाब में अनुसूचित जातियों के लिए जो आरक्षण के प्रावधान हैं उनके तहत कुछ विशेष जातियों में एक विशेष अनुपात में वो आरक्षण बाँट दिया गया है. ओबीसी को प्रोमोशन में आरक्षण नहीं मिलता. दूसरी तरफ पिछले कई दशकों से कई हथकंडे अपना कर अनुसूचित जातियों के लिए प्रोमोशन के रास्ते बंद ही किए गए हैं. प्रोमोशन में आरक्षण से संबंधित उच्चतम न्यायालय के आदेशों को लागू न होने देने के पीछे प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

भारत के कई राज्यों के बुनकर और कृषि श्रमिक समुदाय ओबीसी में शामिल हैं. (उनकी सूचियाँ एकत्रित की जा सकती हैं). यह एक आधार है जिस पर मेघ समुदाय को ओबीसी में शामिल करने के लिए आवेदन किया जा सकता है. इससे पैदा होने वाले हालात में आरक्षण को लेकर कितना नफा-नुकसान होगा उसका सही आकलन तो नहीं किया सकता लेकिन सामाजिक स्टेटस में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझा जा सकता है. जाति व्यवस्था में जिस स्थान को मेघ अपना समझते रहे हैं और जो उन्हें नहीं मिल पाया उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है? मेघ जाति क्या है यह बात देश के भीतरी भागों (गाँवों) के लोग नहीं जानते लेकिन यदि उन्हें बताया जाए कि मेघ अनुसूचित जाति में आते हैं तो मेघों को उन जातियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है जिनका हिस्सा वो हैं नहीं. गाँवों की यह स्थिति उनके मन में हीनता की भावना पैदा करती है. यदि मेघ जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो कई दुराग्रहपूर्ण स्थितियों से निजात मिल सकेगी.

एक बात और भी. हम अपनी मौजूदा हालत में अक़सर संतुष्ट हो चुके होते हैं. उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आहट से हम आशंकित हो उठते हैं. लेकिन जहाँ हम हैं वहाँ तो हैं ही, बस, उससे थोड़ा बेहतर हो जाए तो वो ज़रूर बेहतर ही होगा उसके लिए कोशिश होनी चाहिए.

कबीर के संदर्भ

पढ़ी-लिखी जमात में कबीर एक समाज सुधारक के रूप में अधिक जाने गए जिनका मुख्य कार्य हिंदू धर्म में फैले जातिवाद का विरोध था. जातिवाद को चुनौती देने वाले कई संतजन जान पर खेल गए. 

लगभग सभी ओबीसी जातियां कबीर को अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानती हैं. विद्वानों ने विश्लेषण करते हुए पाया है कि कबीर जिन जातियों के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (imagery) या शब्दों का प्रयोग अपनी कविताई में करते हैं वे मुख्यतः ओबीसी के व्यवसायों से संबंधित हैं, जिनमें जुलाहे, कुम्हार, लोहार, तेली, दर्जी, रंगरेज़, माली आदि. इसी आधार पर कबीर का महिमा मंडल 'दलित साहित्य' की सीमाएँ तोड़ कर 'ओबीसी साहित्य' तक पहुँचा है. यानी कबीर को अब ओबीसी का प्रतिनिधि साहित्यकार कहा जाता है.

मेघ सदियों से कपड़ा बुनने का कार्य करते आ रहे हैं. वे कबीर की वाणी से इस आधार पर भी प्रभावित रहे हैं कि कबीर ने जो अध्यात्म की शिक्षा दी वो कपड़ा बनाने के व्यवसाय से संबंधित बिंबों (शब्दों) के साथ भी थी.



विशेष नोट
मेघ समाज के लोग चाहे किसी भी नाम से अपनी पहचान रखते हों (जैसे मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा, आर्य, पंजाबी जाट आदि) लेकिन वे अनुसूचित जाति के तौर पर अपनी जातीय पहचान से हर तरह से असंतुष्ट हैं. वे ओबीसी के तौर पर अपनी पहचान को बेहतर पाएँगे ऐसा कई मेघजनों का मानना है. यह नोट कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद बनाया गया है जो समझते हैं कि मेघ समाज को ओबीसी में शामिल करने के लिए कोशिश अवश्य की जानी चाहिए. यह नोट केवल मेघ समाज के भीतर विचार-विमर्श के लिए तैयार किया गया है. - भारत भूषण, चंडीगढ़)


10 May 2019

Unity of Meghs - मेघों की एकता - 2

तो भाई साहब, 'मेघों में एकता क्यों नहीं होती' वाला सवाल सदियों पुराना है लेकिन इस सवाल की अहमियत आजकल चुनावों के दौरान कुछ ज़्यादा है. अब टिकट न मिलने के कारण कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा है और वे इस मुद्दे को यह कह कर समाज पर डाल रहे हैं कि 'समाज में एकता नहीं होती'.
मेघ समाज में एकता न होने का कारण ढूंढने निकलो तो बताते हैं कि एकता कैसे हो जब मेघ समाज के नाम ही चार हों. मेघ, भगत, कबीरपंथी, जुलाहा (हाल ही में ‘आर्यसमाजी’ नाम भी बताया गया है लेकिन इसमें अपेक्षानुसार गंभीरता नहीं थी). मतलब यह कि चार नामों में बँट चुके समाज में एकता कैसी? रूप-रंग की बात यदि छोड़ दी गई है तो यह नाम का सवाल भी कम महत्व का नहीं है.

राजनीतिक नज़रिए से धर्म बांट देने वाला तत्त्व है. उधर राजनीति और धर्म के बाज़ार में एकता नहीं बेची जाती, एकता का नारा ज़रूर बेचा जाता है, यह दुनियावी सच्चाई है. राजनीतिक दलों के बंधुआ लोग आमतौर पर दूसरों से एका करते नहीं दिखते चाहे राजनीतिक दलों के टॉप के नेता शाम को एक टेबल पर बैठकर व्हिस्की लेते हों और मुर्गे-शुर्गे खाते हों. उनमें एक ख़ास तरह की एकता होती है वहाँ धर्म-शर्म किसी कोने में रखे रहते हैं और राजनीति में यह सही होता होगा. एडवर्ड गिब्बन ने कहा है, "आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार उसे झूठ मानते हैं और शासक उसे उपयोगी मानते हैं." 

एकता के सिद्धांत
एकता के कुछ सिद्धांत ढूंढे गए हैं. पहला सिद्धांत यह है कि उन समूहों में एकता होती है जो दिखने में समरूप (similar) हों यानी शारीरिक रूप से उनमें कुछ समानताएं ज़रूर हों. साथ ही इनमें आर्थिक समरूपता (similarity), भावनात्मक समरूपता, पहचान की समरूपता, सांस्कृतिक (सभ्याचारक) समरूपता होती है जिसमें आप उनके विचारों, पसंद, नापसंद, नायकों, कहानियों, परंपराओं, पहनावे, खान-पान, इतिहास, संगीत, सिद्धांतों, कार्य करने के तरीकों, विश्वासों आदि को जोड़ सकते हैं. जोड़ लिया? तो अब आप उनकी शिक्षा के स्तर के हिसाब से उनकी समरूपता को परख लें. इस सूची को अधिक न फैलाया जाए. इतने मानकों पर ध्यान देना पर्याप्त है.

इन मानकों के आधार पर व्यक्तियों में जितनी अधिक समानता होगी उनमें एकता की गुंजाइश उतनी ही अधिक होगी. वे बेहतर तरीके से एक दूसरे को 'अपने आदमी' के तौर पर पहचानेंगे और मानेंगे. उनका आपसी बंधन जितना प्रगाढ़ होगा वे एक दूसरे के उतना ही करीब होंगे. जितनी अधिक निकटता उतनी अधिक सामाजिक एकता. एकता जितनी अधिक होगी उनका परस्पर संघर्ष उतना ही कम होगा और वे संयुक्त रूप से बेहतर काम कर सकेंगे. समाज के दूसरे सदस्यों के भले के लिए उनके दिल में फ़िक़्र की मात्रा ज़्यादा होगी. ऐसे सभी लोग सारे समाज के लिए फ़िक़्रमंद होंते हैं. वे अपेक्षाकृत रूप से अधिक खुश होते हैं ऐसा देखा गया है.

तो कहा जा सकता है कि जहाँ कहीं सामाजिक ईकाई (व्यक्ति) के दिल में ख़ुशी है वहाँ सामाजिक एकता का तत्त्व ज़रूर ही अधिक पाया जाता है.

अन्य लिंक:-

Unity of Meghs - मेघों की एकता-1

Unity of Meghs and Khaps - मेघों की खापें और एकता

Why there is no unity in Megh community-1

Why Megh community does not unite-2 - मेघ समुदाय में एकता क्यों नहीं होती-2



16 April 2019

Meghvahana and Megh - मेघवाहन और मेघ


राजतरंगिणी और मेघ लिखते समय और ‘इतिहास का दर्शन’ समझते हुए कल्हण की राजतरंगिणी के बारे में कुछ समझा भी और कुछ सवाल भी मन में उठे थे. ख़ैर !

जो मेघजन ‘मेघवाहन’ का नाम सुन कर ‘राजतरंगिणी’ में अपने इतिहास की प्यास बुझाने आते रहे थे वे ख़ुद को रेगिस्तान में महसूस करते थे. वही अनुभव मेरा भी है. इस पुस्तक में ‘मेघवाहन’ के बारे में जो लिखा गया है उसका सार यह है कि मेघवाहन का पिता उसी युधिष्ठिर का पड़पोता (great grandson) था जिसे गांधार के राजा गोपादित्य ने शरण दी थी. वो सन 25 ईस्वी में उठान पर था और उसने 34 वर्ष तक राज किया. (यह इस शर्त पर यहाँ लिख दिया है कि कोई मुझ से युधिष्ठिर की जन्म-मरण तिथि न पूछे) उसका विवाह असम की एक वैष्णव राजकुमारी अमृतप्रभा से हुआ था, जब कश्मीर का राजा संधिमति अनिच्छुक (unwilling king) साबित हुआ तो उसके कश्मीरी मंत्री (कश्मीरी ब्राह्मण) मेघवाहन को (संभवतः अफ़गानिस्तान से) कश्मीर ले आए थे. मेघवाहन ने पशुवध पर प्रतिबंध लगा दिया, उसने बौद्ध मठ (मोनेस्ट्री) की स्थापना की, उसकी रानियों ने बौद्ध विहार और मठ बनवाए, जिससे उसके बौध राजा होने का संकेत मिलता है. मेघवाहन श्रेष्ठ राजा था, उसने ब्राह्मणों को संरक्षण दिया था.

मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि राजतरंगिणी के मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. वैसे भी मेघवाहन को पौराणिक कथाओं के साथ हैशटैग किया गया है जो सोद्देश्य किया गया है, ज़ाहिरा तौर पर यह इतिहास में बहुत कन्फ्यूज़न पैदा करता है. इस बारे में विकिपीडिया पर भरोसा करना अपनी ईमानदारी पर शक करने से भी बुरा है.

बेहतर है कि राजतरंगिणी के 'मेघवाहन' को समय की धारा में बह जाने दीजिए. वैसे आपकी कोशिशों को रोकने की मेरी मंशा नहीं है.


27 March 2019

Some References from Ad-Dharmi Movement - आदधर्मी आंदोलन के कुछ संदर्भ

मार्क योरगन्समायर (Mark Juergensmeyer) एक अमेरिकी स्कालर हैं जो भारत में एक  अध्ययनात्मक दौरे पर आए थे और बाद में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी - Religious Rebels in the Punjab - The Social Vision of Untouchables. हालांकि पंजाब में 'मेघ' एक छोटा समुदाय है लेकिन इस पुस्तक में उनका उल्लेख पर्याप्त रूप से किया गया है. इस पुस्तक को अजंता प्रकाशन, दिल्ली ने 1988 में छापा था. योरगन्समायर Theology (धर्मशास्त्र, ईश्वर मीमांसा) के विशेष जानकार हैं.

उक्त पुस्तक के पृष्ठ 27 पर इस बात का उल्लेख किया गया है कि शुद्धिकरण (जो एक विकसित और कार्यकुशल प्रक्रिया थी) के ज़रिए इस्लाम और ईसाइयत के दायरे में चले गए निम्न जातियों के लोगों को हिंदू स्वीकार्यता में लौटाना था. यह कार्य 1919 में किया गया था. वर्ष 1910 तक सियालकोट क्षेत्र के 36000 से अधिक लोग, जो अनुसूचित जातियों में तुलनात्मक नज़रिए से ऊंचा स्टेटस रखते थे, वे आर्यसमाजी हो गए थे. जाहिर है कि उस समय के युवा मेघ आर्यसमाज और उससे संबंधित संस्थाओं के संपर्क में आए और उनसे जुड़ गए. उन संस्थाओं में आर्यसमाज स्कूल और डीएवी कॉलेज शामिल थे. इस व्यवस्था ने शिक्षित अनुसूचित जातियों के युवाओं को एक नया रूप-रंग दिया. इसके पीछे यह भी मंशा रही कि वे आर्य समाज के  हक में खड़े रहेंगे. यह प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं थी क्योंकि जब शुद्धीकरण के नाम पर कुछ निम्न जाति के सिखों के केश सार्वजनिक रूप से काटे गए तो सिखों में ऐसे शुद्धीकरण के प्रति वितृष्णा जाग गई. 

पृष्ठ 214 पर उल्लेख है कि महाशों को भी वे आर्य समाज में लाने में सफल हुए. उन महाशों में से कईयों ने दावा किया कि वे इससे पहले मेघ ही थे जो अछूत जातियों में चमारों और अन्य के मुकाबले कुछ ऊंचा स्टेटस रखते थे.

इस पुस्तक के पृष्ठ 225 पर 1947 के भारत विभाजन के बारे में मार्क ने बहुत ही बढ़िया और सटीक टिप्पणी दी है जिसमें वे लिखते हैं - “चमार समुदाय के अतिरिक्त स्टेटस में तनिक ऊंची कुछ अन्य जातियों को भी अपने घर-बार छोड़कर खींची गई सीमारेखा के पूर्व में आना ज़रूरी लगा. जो कोई पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके में रहते थे उनकी पहचान हिंदुइज्म या सिखइज़्म के साथ इस तरह जुड़ी थी कि उन्हें भी पूर्व में आना पड़ा और इसके उलट जुलाहों और मोचियों को भारतीय पंजाब से उल्टी दिशा (पाकिस्तान) में जाना पड़ा.  उदाहरण के लिए अल्लाहपिंड गांव जोकि विभाजन रेखा के ज़रा पूर्व में था वहां कोई मुस्लिम नहीं रहता है. हालांकि सच्चाई यह है कि उनके पास ज़मीन थी और गांव का नाम ही 'अल्लाहपिंड' यानी 'अल्लाह का गांव' था. उनकी जगह पश्चिमी पंजाब के जाट सिख और निम्न जातियों के मेघ आ गए जो हिंदुओं में ‘कन्वर्ट’ बन गए थे.” 

(इस पैराग्राफ में हिंदू होने, हिंदू ना होने या हिंदू शब्द की अबूझ व्याख्या के साथ-साथ उसके संदर्भगत अर्थ से निकली बेघर होने की मर्मांतक पीड़ा छुपी हुई है. शुद्धिकृत लोगों के लिए ‘कन्वर्ट’ शब्द का प्रयोग एक अलग तरह का दर्द देता है.)

पृष्ठ 266 पर ‘दलित संघर्ष समिति’ की पृष्ठभूमि के साथ मार्क ने समिति के अधिकारियों और प्रायोजकों की लंबी सूची में जालंधर की उन तीन जातियों (मेघ, चमार, चुहड़ा) का मुख्य रूप से उल्लेख किया है जो इस समिति में थे. इसी संदर्भ में उन्होंने कुछ व्यक्तियों के नाम भी प्रधानता के साथ लिखे हैं जिनमें श्री सतपाल महे जिनका आदधर्म के साथ पारिवारिक संबंध रहा. उनके संबंधियों में श्री सुंदर दास रहे. उनके एक कज़िन मनोहर लाल महे का भी नाम विशेष रूप से लिया गया है जो बूटा मंडी के रहने वाले थे. (मेघ समुदाय के कौन-कौन से प्रतिष्ठित व्यक्ति इस समिति में रहे उनके नामों की जानकारी की दरकार है. क्या यह समिति आज भी सक्रिय है. उनके सक्रिय समुदायों में कौन-कौन से समुदाय हैं?)

पृष्ठ 225 पर उठाए गए महीन सवाल का जवाब पृष्ठ 298 पर खुलकर सामने आ गया है. वहां लिखा गया है कि आर्यसमाज ने कई संगठन स्थापित किए जो उपदेशात्मक कार्य करते थे और उन्होंने कई समितियां बनाईं और रीकन्वर्शन (शुद्धि) का सारा आंदोलन शुरू किया. उन्होंने अछूतों का अभिलोपन (obliterate) करने के लिए सब कुछ किया. उन्होंने यह कहकर कि छुआछूत समाप्त हो चुकी है और कोई भेदभाव नहीं है, हजारों अछूतों को लुभा कर शुद्धीकरण के जाल में फंसा लिया. बेचारा अछूत फिर से हिंदू आर्यों के द्वारा फांस लिया गया जैसे कोई हाथी के दांतों में उलझ जाता है. वास्तविकता यही थी कि हिंदू आर्य अभी भी मनु के अनुयाई थे जिसमें बहुत भेदभाव था. अछूत जान गए थे कि हिंदू आर्यों ने उन्हें अपने जाल में फंसा लिया है इसलिए वो अब अपने संगठन बनाना चाहते थे. उन्होंने खुद अपने कल्याण के लिए रुचि लेना शुरू किया. वे ऊंची जाति के हिंदुओं का विश्वास नहीं करते थे. संगठन खड़े किए गए, समितियां बनाई गई और उन्होंने अपने गुरुओं का चुनाव भी कर लिया.

सन 1925 के शुरू में एक समिति बनाई गई थी जिसका नाम रखा गया था ‘आदधर्म’. ऋषि वाल्मीकि, रविदास, कबीर और नामदेव के नामों के तहत इसकी स्थापना की गई. पहली बैठक मंगू राम मुग्गोवालिया की अध्यक्षता में 11 से 12 जून 1926 को गांव मुग्गोवाल, थाना माहलपुर, तहसील गढ़शंकर, जिला होशियारपुर में की गई. इसमें सभी अछूत जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया चुहड़ा, चमार, रविदासी, सांसी, जुलाहा, मेघ, कबीरपंथी, महाशा और कई अन्य जातियों के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया. अछूतों के अलावा इसमें अन्य सम्मानित लोगों ने भी हिस्सा लिया उनमें ईसाई, सिख, मुस्लिम, आर्यसमाजी और सनातनी भी थे. इस समिति का विरोध भी हुआ. लेकिन समिति को चलाए  रखने के पक्ष में ज़रदस्त समर्थन मिला और वो सशक्त होती चली गई. इसका मुख्यालय जालंधर में बनाया गया और इसका पूरा नाम रखा गया ‘आदधर्म मंडल ऑफ पंजाब, जालंधर सिटी’. (इस आदधर्म आंदोलन के साथ एडवोकेट हंसराज भगत जुड़े थे इसका उल्लेख हमें मिल जाता है. उनके अतिरिक्त और भी मेघ यदि इससे जुड़े थे तो उसकी जानकारी इकट्ठी की जानी चाहिए.)

‘दलित संघर्ष समिति’ के संदर्भ में कुछ बातें कहने लायक हैं. उक्त समिति का मुख्यालय जालंधर में ही रहा है जहां मेघों की बहुत बड़ी न सही लेकिन काफी संख्या है. अब यह बात देखने लायक है कि इस बीच मेघों और अन्य स्थानीय अनुसूचित जातियों जैसे रविदासी, रामदासी समाज में परस्पर संबंध बढ़े हैं यानि उनमें शादियाँ होती हैं. लेकिन मेघ समुदाय के कुछ लोग जब अपनी श्रेष्ठता की हाँकते हैं तो उसे अन्य समुदायों के साथ राजनीतिक संबंध न जोड़ने तक खींच कर ले जाते हैं.  यह घातक है क्योंकि पंजाब में मेघों की अपनी जनसंख्या बहुत कम है. वे अन्य समुदायों के साथ मिलकर ही अपनी राजनीतिक शक्ति का गठन कर सकते हैं. जालंधर में देखा गया है कि मेघ समुदाय के कुछ लोग कांग्रेस से जुड़े हैं और वे रविदासी या रामदासी समुदाय के नेताओं के साथ सहयोग करते हैं. मेरा मानना है कि यह सही रास्ता है और आगे चलकर इसी से सकारात्मक नतीजे निकलेंगे. जरूरी नहीं कि राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ही रहे. पार्टी बदल भी जाए तब भी ऐसे साथ को और गठबंधन को निभाना हितकारी है.

अंत में एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं कि मुझे 'रिलिजियस रिबेल्स Religious Rebels'  या 'धार्मिक विद्रोही' शब्द सही नहीं लगता. एक समय था जब राजाओं, महाराजाओं या सामंतों की व्यवस्था के प्रति विरोध करने वाले को विद्रोही या द्रोही कह दिया जाता था. अब वो समय नहीं है. अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां बहुमत ही व्यवस्था का नियामक होता है. व्यवहारिक रूप से भले ही आज अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी उस व्यवस्था का नियमन (रेग्युलेशन) ना कर पाते हों लेकिन बँटे होने के बावजूद उनकी सभ्यातामूलक जीवन शैली एक है और अनेक अवसरों पर वे आपस में जुड़ा महसूस करते हैं. उक्त जीवन शैली वाले लोग जब बहुसंख्यक हैं और धर्म के प्रति उनकी अवधारणाएँ लगभग एक समान हैं तो उन्हें किसी अन्य धर्म के प्रति 'विद्रोही' कैसे कहा जा सकता है.

कुछ हिंदी साहित्यकारों ने कबीर को विद्रोही व्यक्तित्व कहा था. उनकी ही विचारधारा के लोग कबीर को छिपा हुआ बौध भी कह गए क्योंकि कबीर का संबंध सिद्ध और नाथपंथी साधुओं से रहा जो बौधमत की परंपरा से ही निकली धाराएँ थीं. कबीर को ध्यान से पढ़ें तो वे तर्कवादी (Rationalist) ठहरते हैं. तर्क करने वाले को ढीली भाषा में नास्तिक कह दिया जाता है. अब 'तर्क' करने का अर्थ 'विद्रोह' भी किया जाए तो उसे स्वीकार कैसे किया जा सकता है? आदधर्म कोई विद्रोह नहीं है बल्कि यह बहुजनों का अपने मूल के प्रति अपनी व्यापक आस्था को बेहतर तरीके से संगठित करने का प्रयास था. विद्रोही तो वो समूह थे जो आदधर्म आंदोलन का विरोध कर रहे थे.