"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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30 May 2015

Reservation of insult - आरक्षण अपमान का

जब किसी की पूँछ में आग लगती है तो खुशी तो होती ही है. उस आदमी का फुदकना मनोरंजन करता ही है. इसके संदर्भ पर जल्दी से आ जाना ठीक रहेगा.

SCs/STs के लिए आरक्षण का प्रावधान एक आनी-जानी चीज़ के तौर पर किया गया है. हाल ही में जाटों का आरक्षण रद्द कर दिया गया. कमज़ोर प्रावधानों ने उनकी पूँछ में आग लगाई. अब गुर्जरों को आरक्षण का वादा कर के सरकार ने मनोरंजक खेल शुरू किया है. इससे जाटों की पूँछ में आग और भड़केगी और मीणाओं की पूँछ चिंगारियों से लाल हो जाएगी.

जाट, गुर्जर, SCs और STs मिल कर आरक्षण के लिए संघर्ष करते तो भी इन्हें समय-समय पर अपनी आधी मूँछ सरकार के यहाँ गिरवी रखनी पड़ती. हाँ, यदि ये सभी आरक्षण के नियम बनवाने और प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण लागू करवाने के लिए मिल कर आगे चलते तो बार-बार की मूँछ मुंड़ाई से छुटकारा मिलता, दीर्घावधि में सत्ता पर पकड़ बनाने का मौका मिलता.

फिलहाल मैं जलती पूँछ वालों को अलग-अलग डाल पर फुदकते हुए देख रहा हूँ. एकता का तालाब सामने है लेकिन इन्हें उसमें कूदना नहीं आता. भई मनोरंजन तो होता ही है न...
MEGHnet



22 March 2015

Reservation - आरक्षण

जाट आरक्षण खत्म कर दिया गया. काफी बहस छिड़ी है. इस मुद्दे को कोई नहीं देख रहा कि आरक्षण संबंधी कमज़ोर प्रावधान करके सरकार ने दलित-पिछड़े लोगों को जम कर अपमानित किया है. कभी लाभ दिया कभी वापस ले लिया. इस बारे में कोर्ट को सरकार का ही हिस्सा मानें. आरक्षण के संबंध में नियम नहीं बनाए गए. केवल अनुदेशों से काम चलाया गया. कानूनी तौर पर यह बहुत उलझाया गया मामला है. इस मामले में सुझाव बहुत आते हैं, आते रहेंगे. आरक्षण के खिलाफ और हक में बहुत दलीलें दी जाती रहेंगी. लेकिन प्राइवेट क्षेत्र में (जहाँ सबसे अधिक रोज़गार है और आगे भी होगा) वहाँ विभिन्न वर्गों के जाति विचार से मुक्त प्रतिनिधित्व पर गंभीरता से कार्य करने की बात कोई नहीं करता.

आरक्षण ख़त्म होने में अब हरियाणा का जाट इसमें अपना छीना गया हक देखता है और हरियाणा का यादव इसी में अपनी खुशी ढूँढ रहा है. ओबीसी में यदि एकता की समझ पैदा हो गई होती तो रोना किस बात का था और यदि ओबीसी और एससी/एसटी सामाजिक न सही राजनीतिक रूप से थोड़े भी जागृत हो गए होते तो उनके लिए बेहतर वातावरण बना होता. जो लोग फूलन देवी को आज भी डाकू मानते हैं उन्हें समझना चाहिए कि ओबीसी के वोटरों की एकता और ओबीसी सरकार ने उसे सांसद बनाया और उस वीरांगना ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ओबीसी, खासकर महिलाओं, की स्थिति पर जागरूकता फैलाने वाले भाषण दिए. ज़रूरी है कि ओबीसी और वंचित जमातें आपस में एकता लाएँ ताकि सरकार से अपने हित की नीतियाँ बनवा सकें.

MEGHnet

18 August 2012

Reservation in services - नौकरियों में आरक्षण


आरक्षण के विरोध में - आरक्षण के हक़ में
एक ब्लॉगर ने सरकारी नौकरियों में पदोन्नतियों में आरक्षण पर एक पोस्ट लिखी जिसे पढ़ कर कोई भी भावुक हो सकता था. मैं भी. उनकी पोस्ट पढ़ने के बाद मैं कमेंट लिखने से स्वयं को रोक नहीं सका. मुझे लगा कि आरक्षण की समस्या का एक ऐसा पहलू भी है जिसे पाठकों तक पहुँचना चाहिए. 
सारी समस्या पर चर्चा करने के लिए यह स्थान पर्याप्त नहीं है तथापि कुछ बिंदु नीचे दिए हैं.
1. यदि भारतीय समाज दलित और सवर्ण के रूप में बँटा न होता तो आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती.
2. आरक्षण प्रावधान जानबूझ कर कमज़ोर रखे गए हैं. जो हैं उन्हें कभी तरीके से लागू नहीं किया जाता और न ही आरक्षण के नियम बनाने की संसद ने कोशिश की.
3. आज भी आरक्षित पदों के सही आँकड़े ब्यूरोक्रेसी तैयार नहीं कराती कि कहीं दलितों की प्रशासन में सहभागिता (participation) न बढ़ जाए.
4. उत्कृष्ट कार्य करने वाले दलितों की रिपोर्टें आमतौर पर मध्यम दर्जे की लिखी जाती हैं. संघर्ष करने और प्रमाण देने या वकीलों को मोटी रकम  देने के बाद अदालत के ज़रिए कठिनाई से रिपोर्टों को ठीक किया जाता है. इससे उनकी शक्ति, समय और धन तीनों बर्बाद होते हैं.
5. मैरिट में आए दलित अधिकारियों को हतोत्साहित और अप्रभावी करने के सभी हथकंडे अपनाए जाते हैं. उनके स्थांतरण से पहले ही उनकी जाति की सूचना नए सेंटर पर पहुँच जाती है. वहाँ नित नए ढंग से और बहुत ही सभ्य से तरीके से उन्हें उनकी जाति याद दिलाई जाती है.
6. दलित यदि जनरल में कंपीट करके नौकरी में आ जाए तो उसके सिर पर ‘सही सूचना छिपाने’ की तलवार लटकती रहती है. जाति पहचान छिपती नहीं.
7. दलित कर्मचारियों की पोस्टिंग के बारे में ‘सीक्रेट अनुदेश’ या ‘मौखिक आदेश’ जारी किए जाते हैं जो नियमों पर भारी पड़ते हैं.
8. जिन दलितों की पदोन्नतियाँ होने वाली होती हैं उनके विरुद्ध झूठी शिकायतें करवा दी जाती हैं.
9. आजकल नया ट्रैंड चला है कि रिटायरमेंट से एक-दो दिन पहले उनके सस्पेंशन के आदेश निकलवा कर पेंशन लाभ रुकवा दिए जाते हैं ताकि उन्हें सरकारी नौकरी करने का ‘अंतिम मज़ा’ चखाया जा सके. ये सारी बातें एससी/एसटी कमिशन की जानकारी में हैं.
10. एक ‘मैरिट’ वाले दलित और गैर-मैरिट वाले दलित में से पदोन्नति के लिए चुनाव करना हो तो कोशिश की जाती है कि गैर-मैरिट वाले को प्रोमोट किया जाए और उसे ‘आरक्षण का नमूना’ बना कर कहीं भी बैठा दिया जाए.
11. सरकारी कार्यालयों में जो होता है उसके केवल संकेत यहाँ दिए हैं. समस्या टेढ़ी है और केवल आरक्षण या पदोन्नतियों में आरक्षण का विरोध करके उसका हल नहीं निकल सकता. किसी जूनियर को पदोन्नत करके किसी वरिष्ठ के ऊपर बिठाना अन्याय है. लेकिन दलित की वरिष्ठता की रक्षा कौन करेगा, यह प्रश्न कार्यालयों में पसरे जातिवादी वातावरण में अनुत्तरित रहता है.
इस पर ब्लॉगर ने एक और टिप्पणी लिखी जिसके बाद मैंने लिखा-
मैं (दलित) अपने आपको हिंदू कहता हूँ लेकिन हिंदू दायरे में मेरी जो जगह है वह असुविधाजनक और पीड़ादायक है.
नौकरियों में आए दलित ने हिंदुओं का अधिकार नहीं मारा है बल्कि दलित अपने अधिकारों से वंचित लोग है जिन्हें आरक्षण का एक कमज़ोर सा अस्थाई सहारा दिया गया है.
दलित जानते हैं कि नौकरियों समेत इस देश के विभिन्न संसाधनों पर उनके अधिकार को सदियों पहले समाप्त कर दिया गया था. आरक्षण के विरोध का भी यही अर्थ है कि उसे मिलने वाले लाभ को रोकने का प्रयास किया जाए.
कई शूद्र और दलित स्वयं पर हिंदू होने का ठप्पा स्वीकार कर चुके हैं लेकिन निरंतर रूप से चल रहे जातिवादी व्यवहार उन्हें बार-बार निराशा की स्थिति में धकेल देता है. ऐसी हालत में वे अपना परंपरागत धर्म छोड़ कर मुस्लिम बने दलितों के दायरे में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं. ब्राह्मणों से धर्मांतरित सैयद, शेख़ और अन्य अगड़े मुस्लिम आज भी अंबेडकर को कोसते हैं कि उन्होंने बौध धर्म अपनाने जैसा निर्णय क्यों लिया और इस्लाम क्यों नहीं अपनाया.
दलितों की हालत पर कांग्रेस और बीजेपी का रवैया अलग नहीं है. आरक्षण विरोधी यह हमला करना नहीं भूलते के क्या दलित अपना या अपने परिवार का इलाज आरक्षण का लाभ उठा कर बने (घटिया) डॉक्टर से कराना चाहेंगे? 
सरकारी अस्पतालों में बहुत से दलित वर्षों से कार्यरत हैं. लोग उनसे इलाज कराते हैं. वे न जानते हैं न पूछते हैं कि डॉक्टर की जाति क्या है. इलाज करा कर घर चले जाते हैं. बहुत से दलितों के अपने क्लीनिक हैं. वे सफल प्रैक्टिस कर रहे हैं और समाज सेवा में संलग्न हैं.
काश, आरक्षण विरोधी लोग (जनरल वाले) डॉक्टरों से पूछते कि आपके नाम के साथ शर्मा लगा है, आप किसी प्रकार के आरक्षण से तो नहीं आए या फिर कम अंकों के कारण आपने डोनेशन दे कर मेडिकल की सीट तो नहीं खरीदी थी?
चिकित्सा के क्षेत्र में अकूत सरकारी और गैर-सरकारी धन आता है. आरक्षण विरोध का एक कारण वह धन भी है. यहाँ भी वही कोशिश है कि कहीं पैसे का प्रवाह दलितों की ओर न जाए. आरक्षण का लाभ उठा कर अच्छी आर्थिक हालत में आ चुके और अच्छी शिक्षा ले सकने में सक्षम दलितों से आरक्षण वापस लेने की बात इस लिए उठाई जाती है कि दलित अब मैरिट वाली सीटें लेने लगे हैं. मैरिट के ध्वजाधर सवर्णों को दलितों का यह मैरिट हज़म नहीं होता. बेहतर होगा पहले इन दलितों को 'मैरिट समूह' में स्वीकार किया जाए. ऐसा करने से देश के मानव संसाधनों के बेहतर प्रयोग का मार्ग बनेगा. वैसे मानव संसाधनों को बरबाद करने में हमारा रिकार्ड बहुत ख़तरनाक है.
सवर्ण मानसिकता वाले वकालत करते हैं कि आरक्षण का लाभ पढ़े-लिखे मैरिट वाले दलितों के लिए समाप्त करके उन दलितों को दिया जाए जो अभी ग़रीब हैं (जो अच्छी शिक्षा के मँहगा होने के कारण कंपीट करने की हालत में नहीं आए). वास्तविकता यह है कि सस्ते स्कूलों में पढ़ कर आए ग़रीबों के लिए आरक्षित सीटों को यह कह कर अनारक्षित करना बहुत आसान हो जाता है कि 'योग्य उम्मीदवार नहीं मिले'. इसका लाभ किसे होता है, विचार करें. इस मामले का रेखांकित बिंदु शिक्षा का है और दलितों तक पहुँच रही शिक्षा का हाल आप सभी जानते हैं. ग़रीबी और महँगी शिक्षा में दोस्ती कैसे हो?
यह तो सरकारी नौकरियों की बात है. इसके आगे का मुद्दा तो निजी क्षेत्र में आरक्षण का है जिसमें रोज़गार की संभावनाएँ बहुत अधिक हैं. तैयारी वहाँ की करनी चाहिए.
आरक्षण पढ़ाई-लिखाई में ध्यान न देने वाले सिर्फ-और-सिर्फ उन सवर्णों के लिए समस्या है, जो 51 परसेंट ओपन कटेगरी में कंपीट नहीं कर पाते और फेल हो जाते हैं. फेल होने का कारण वे खुद के अंदर नहीं ढूंढते और दूसरों को दोष देते हैं.
इसलिए जब आरक्षण विरोधियों से बहस हो तो सहानुभूतिपूर्वक इस बात का ध्यान रखें कि आपका सामना किसी कम पढ़े-लिखे शख्स से है. उसने संविधान नहीं पढ़ा होगा. उसे इतिहास का कोई ज्ञान नहीं होगा. उसे समाजशास्त्र के बारे में कुछ भी पता नहीं होगा. कानून के बारे में उसकी जानकारी शून्य होगी.
आप आज़माकर देख लीजिए.

दिलीप मंडल की वॉल से

मैं यह नहीं कहता कि उनमें मेरिट नहीं है. मेरे ख्याल से वे पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगाते हैं. मन लगाकर पढ़ेंगे, तो पक्का पास हो जाएंगे. फिर किसी को कोसने की जरूरत नहीं रहेगी. इसलिए जब आरक्षण विरोधियों से बहस हो तो सहानुभूतिपूर्वक इस बात का ध्यान रखें कि आपका सामना किसी कम पढ़े-लिखे शख्स से है. उसने संविधान नहीं पढ़ा होगा. उसे इतिहास का कोई ज्ञान नहीं होगा. उसे समाजशास्त्र के बारे में कुछ भी पता नहीं होगा. उसने मनुस्मृति भी नहीं पढ़ी होगी. गारंटी से बोल रहा हूं. वह पढ़ने वाला आदमी होगा ही नहीं. आरक्षण से प्रॉबलम उसे ही होगी, जिसका सलेक्शन नहीं हो पा रहा है. आरक्षण विरोधियों से बहस कीजिए. लेकिन सहानुभूतिपूर्वक. इसी लिए तो मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि आरक्षण विरोधियों को संविधान और कानून की रत्ती भर जानकारी नहीं होती है. पढ़ते ही नहीं है. जब कि मन लगाकर पढ़ना चाहिए. जो पास हो जाता है, वह रोने के लिए नहीं आता है. यह शुद्ध रूप से, फेल होने वालों की समस्या है. रिक्शा चलाने से कोई SC कैसे हो जाएगा? SC एक संवैधानिक-लीगल कटेगरी है. एक बात आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी शायद नहीं रेखांकित करते कि संविधान में शब्द 'आरक्षण (Reservation)' नहीं है बल्कि 'प्रतिनिधित्व Representation' है. लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के विरुद्ध बोलने की कोई बात ही नहीं है. प्रतिनिधित्व सब के लिए होना चाहिए, हो सके तो जनसंख्या के अनुपात में.
आरक्षण विरोधी मानसिकता के पीछे सिर्फ न पढने लिखने वाले लोगों की असफलता नहीं है, अधिक मुखर विरोधी वे लोग हैं जो पढ-लिख कर सफल हुए हैं, लेकिन वे तत्व समाजिक परिवर्तन से बौखलाए हुए हैं कि जमाना अब बहुमत वाला है, लोकतंत्र में संख्या बल का जवाब किसी सवर्णवाद के पास नही है, न ही डंडे के बल से किसी को अब हांकने की इजाजत है तो इस बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में टूटते सवर्ण वर्चस्व के मूल कारण के रूप मे वे आरक्षण को देख रहे है, इस मानसिकता के साथ अब सवर्ण वर्चस्ववाद अपने लिए नये हथियार तलाशने की कोशिश में है. समाज की पुरानी बीमारी गैरबराबरी को हालिया दौर की अंग्रेजी गुलामी की देन साबित करना एक नयी दृष्टि में सामने लाने की जद्दोजहद है. अभी यह देखना होगा कि इसके पीछे तथ्य कहाँ से लाए जाएंगे. फिर भी नयी कवायद की शुरूआत हो रही है, इसे देखना आपके लिए भी दिलचस्प हो सकता है.



यह टेबल फेस बुक से है जिसे Economic & Political Weekly से बताया गया है अतः सत्यापन करना बेहतर होगा
Development of Human Resources :((

 


एवरेस्ट पर चढ़ने वाली वाल्मीकि समाज की महिला- ममता सौदा. आईएलएलडी ने उसे सम्मान दिए जाने पर विरोध जताया था.

जाति पहचान कर किया जाता है फेल तो मैरिट वाले भी ऐसे बनाए जा सकते हैं

सीईओ, एमडी बनना है तो अपनी जाति टटोलिए

आरक्षण नहीं, जाति समस्या है

People question when Dalits get benefits 

Economic Times's story- SCs/STs in top government jobs


06-08-2020

इस पोस्ट को लिखे कई वर्ष हो चुके हैं. इस बीच सरकारें बदलीं, न्यायालय बदल गए, सभी संवैधानिक संस्थाओं का रूप-स्वरूप बदल लिया गया. कहने का तात्पर्य यह कि आरक्षण को 'इर्रेलेवेंट' बना दिया गया. 'राजनीतिक आरक्षण' बस नाम के लिए चल रहा है. राष्ट्रीय संसाधनों के उपयोग और उपभोग में सभी के व्यापक प्रतिनिधित्व की पवित्र संवैधानिक भावना समाप्त होती दिख रही है. निजीकरण के बाद अब पुराने 'आरक्षण' की बात को छोड़ लोकतंत्रिक 'प्रतिनिधित्व' के लिए उठने की ज़रूरत पड़ेगी. लेकिन ईवीएम रह गया तो उसकी भी उम्मीद छोड़ देनी होगी.   

   

26 July 2011

Aarakshan (आरक्षण) - यहाँ दो भारत बसते हैं – लोकल भारत लुट रहा है


I once heard some students discussing the medieval meaning of nationality. The conclusion was that at that time it had been limited to small states. It was not as vast as present day India.

A sentence is often heard in independent India. If a man from that state and a snake come together, kill the man first and then kill the snake. Medieval trend probably still exists.

Now, Amitabh Bachchan's film "Aarakshan (Reservation)" is getting much publicity in media. In promo Amitabh says, “There are two countries living in India. What's there in the movie, I do not know, however, what he says is no different from the truth.

A few days ago this news appeared in a newspaper:-

“In 1871 the British Parliament raised the issue of adult franchise. Alarm bells started ringing in British India. By 1918, the political ambition had emerged in intellectuals belonging to backward castes. They had started discussing entering politics. Balgangadhar Tilak was restless. He put his real heart into his speech while addressing a gathering at Athani (Maharashtra). He said, "I do not understand what the Teli, Tamboli and Khati Kunbhat (all low castes) would do in Parliament. Will Teli sell oil in Parliament? Will Tamboli stitch clothes in Parliament and Khati Kunbhat (Kurmi or Patidar) plough in the parliament?”

This narrow thinking and limited definition of Swaraj prevails even today. One of my colleagues from Andhra Pradesh had said, “Gandhi became a leader of the nation whereas Gokhale or Tilak should have been the leaders. It was bad luck of this country! " 

Such statements must have affected popularity of Tilak. Gandhi had done some work for SCs, STs and OBCs. As a result Teli-Tamboli became his followers. In 1930, freedom fighters from Koli tribe joined his Dandi Marching where they were in great numbers. 

If we take Tilak's Statement as product of medieval thinking or thinking of his own time, it can be forgiven. But it is clear from the corruption prevailing in the present day country that his words have become sign boards pointing to his type of Self Rule and independence. Today, it is dangerous for India. Scheduled Castes, Tribes and other backward castes have very little role in Self Rule or independence. In fact they are struggling for human dignity for themselves. Human rights are distant dream for them. Are not they constrained to start a freedom movement for improving their human personality and quality of life?

Budget is provided in government scheme for development of the poor. As per Rajiv Gandhi’s statement only 10% reaches (?) the masses. Will the corrupt let this money (called ‘independence’ in the holiest meaning) reach the righteous hands?

हिंदी विभाग के कुछ विद्यार्थियों को मैंने हिंदी साहित्य के इतिहास के वीरगाथा काल पर बहस करते कभी सुना था. मुद्दा था कि उस समय की राष्ट्रीयता का स्वरूप क्या था. यह प्रश्न उनके बीच बैठे एक राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी ने उठाया था. अंत में संतोषजनक जवाब भी उसी से आया कि तब की राष्ट्रीय भावना छोटे-छोटे राज्यों तक ही सीमित थी. आज जैसे विशाल भारत जैसी उदात्त नहीं थी.

स्वतंत्र भारत में कई राज्यों में कार्य करते हुए एक वाक्य कई बार सुनने में आया कि यदि फलाँ राज्य का व्यक्ति और साँप एक साथ आ जाएँ तो साँप को बाद में मारो और उस व्यक्ति को पहले. शायद वीरगाथा काल की वह पुरानी प्रवृत्ति आज भी कार्य करती है.

इन दिनों अमिताभ बच्चन की एक नई फिल्म ‘आरक्षण’ की चर्चा है. इसके प्रोमो में अमिताभ कहते हैं कि इस देश में दो भारत बसते हैं. इस बात का फिल्म में क्या अर्थ है पता नहीं, परंतु जो नज़र आता है वह सच्चाई से अलग नहीं.

कुछ दिन पूर्व एक समाचार-पत्र में यह पढ़ा है-

'सन् 1871 में ब्रिटिश संसद में प्रौढ़ मताधिकार का मामला उठा. ब्रिटिश इंडिया में खतरे की घंटी बजने लगी. सन् 1918 तक पिछड़ों के बुद्धिजीवयों में राजनैतिक महत्वाकांक्षा का प्रादुर्भाव होने लगा और उनमें राजनीति में प्रवेश की चर्चा होने लगी थी. तब बालगंगाधर तिलक से रहा नहीं गया. उन्होंने अथनी (महाराष्ट्र) की एक जनसभा को संबोधित करते हुए अपने दिल की बात कह डाली- ‘मेरी समझ में नहीं आता कि ये तेली, तंबोली और खाती कुनभट संसद में क्यों जाना चाहते हैं. तेली क्या संसद में जाकर तेल बेचेगा. तंबोली क्या संसद में जाकर कपड़ा सिलेगा और खाती कुनभट (कुर्मी या पाटीदार) क्या संसंद में जाकर हल चलाएगा.’

यह संकुचित सोच और स्वराज की सीमित परिभाषा आज भी उपलब्ध है. आंध्रप्रदेश के मेरे सहकर्मी सत्यनारायण ने एक बार कहा था, “जब गोखले या तिलक को देश का नेता होना चाहिए था तब गाँधी देश का नेता बना. यह इस देश का दुर्भाग्य है”.

मैं सोचता हूँ शायद तिलक के ऐसे वक्तव्यों का उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ा होगा. गाँधी ने बहुत तो नहीं परंतु जितना किया उसके कारण तेली-तंबोली उनके साथ हो लिए थे. 1930 के डाँडी मार्च में बहुत बड़ी संख्या जुझारू कोलियों (Koli tribals) की थी.

तिलक के वक्तव्य को यदि वीरगाथाकाल की परिस्थितियों या तिलक के अपने समय की परिस्थितियों का उत्पाद मान लिया जाए तो बात को भुलाया भी जा सकता है. परंतु देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से स्पष्ट है कि इसे तिलक के स्वराज और स्वतंत्रता के दिशापट्ट के तौर पर रख लिया गया जो आज के भारत के लिए अनिष्टकर है. ऐसी स्थिति में भारत की अनुसूचित जातियाँ, जन जातियाँ और अन्य पिछड़ी जातियाँ स्वराज्य और स्वतंत्रता में हिस्सेदार नहीं मानी जाएँगी. तब क्या उन्हें अपने मानवीय व्यक्तित्व में सुधार और गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए स्वतंत्रता आंदोलन चलाना होगा?

गरीबों के उत्थान के लिए जो सरकारी योजनाओं में पैसा दिया जाता है उसका 10 प्रतिशत ही उन तक पहुँच पाता है, ऐसा राजीव गाँधी ने माना था. क्या भ्रष्टाचारी तंत्र इतनी बड़ी राशि को (जिसे पवित्रतम रूप में स्वराज कहा जाता है) सही जगह पहुँचने देगा?



विशेष नोट : यह पोस्ट बड़ी तेज़ी से इस ब्लॉग की टॉप 5 पोस्टस (यथा 10-08-2011 को) में आ गई है. इसका एक कारण यह भी है कि 'आरक्षण' फिल्म का प्रदर्शन अभी मद्रास हाईकोर्ट ने रोका है और फिल्म के बारे में लोगों की जिज्ञासा बढ़ी है. इस बीच NDTV पर रवीश कुमार की फिल्म के निर्माता प्रकाश झा, अमिताभ बच्चन, मनोज वाजपेयी से एक बातचीत यू-ट्यूब पर उपलब्ध है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं- आरक्षण



(Key words: Koli, Kori, Kol, Khati, Kunbhat, Teli, Tamboli, Bal Gangadhar Tilak, Dandi March, Gandhi, Film Resevation, Amitabh Bachchan, Big B)


अभी हाल ही में एनडीटीवी के अनिंद्यो ने आरक्षण के मुद्दे पर एक स्टोरी की है. उसे आप देख सकते हैं.