"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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27 February 2021

मेघ समुदाय के महान सपूत डॉ पी जी सोलंकी


डॉ बाबा साहब अंबेडकर ने बॉम्बे में मेघ समुदाय को संबोधित किया था इसका उल्लेख मेघवंश के इतिहासकार श्री ताराराम जी कर चुके हैं. उसी की कड़ी में उन्होंने कल फोन से एक संदर्भ भेजा और फेसबुक पर एक ग्रुप 'मेघवंश का इतिहास' में एक पोस्ट लिखी थी जिसे नीचे कॉपी-पेस्ट भी कर दिया है.

"मेघ बिरादरी का महान नेता डॉ पी जी सोलंकी:
डॉ पी जी सोलंकी को वह हर एक शख्स जानता है, जिसने डॉ आंबेडकर का साहित्य पढ़ा है। हर एक वह व्यक्ति जानता है, जो आरक्षण के बारे कुछ जानकारी रखता है और जिसको पूना पैक्ट के बारे में ज्ञान है। डॉ पी जी सोलंकी गुजरात के मेघवाल थे, जो बॉम्बे में जा बसे थे। वे बॉम्बे म्युनिसिपल बोर्ड के लंबे समय तक कॉउंसीलर भी रहे। वे बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य भी रहे। संविधान सभा के भी सदस्य रहे। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में डॉ आंबेडकर के साथ भाग लिया और हमेशा डॉ आंबेडकर का समर्थन किया। सन 1912 में विभिन्न जातियों के सहभोज का आयोजन किया। उन्होंने साइमन कमीशन हो या वयस्क मताधिकार की कमेटी, उनके सामने अछूतों का पक्ष रखा। उनकी वजह से शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के प्रावधान पारित हुए। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने कई जगह यह जताया कि वे जो कुछ कर पाए है, उसमें डॉ सोलंकी का महत्वपूर्ण योगदान है। इनके विस्तृत कृतित्व को कुछ पंक्तियों में नहीं लिखा जा सकता है। इस पर फिर कभी लिखा जाएगा।
अभी यहां पर वसंत मून द्वारा लिखित पुस्तक के एक अंश का उल्लेख कर रहे है, जिसमें डॉ सोलंकी की जाति का उल्लेख है, अन्यथा अन्य ग्रंथों में उनका उल्लेख डॉ सोलंकी के रूप में ही हुआ है। डॉ सोलंकी मेघ बिरादरी के एक दूरदर्शी और अपराजित योद्धा थे। हालांकि, उन पर ईसाई धर्म अपनाने के लांछन लगे, पर वे अछूतों के हितों को सुरक्षित करवाने हेतु हमेशा कटिबद्ध रहे और डॉ बाबा साहेब अंबेडकर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर योजनाबद्ध कार्य करते रहे। गोलमेज सम्मेलन में डॉ आंबेडकर के व्यस्त रहने पर उन्होंने हर तरह से डॉ बाबा साहेब अंबेडकर के करवां को गतिमान बनाये रखा। इसलिए उन्हें डॉ आंबेडकर का एक मजबूत बाजू भी कहा जाता था।
वसंत मून (1991) अपनी पुस्तक 'बाबा साहेब डॉ आंबेडकर' में लिखते है: "सन 1927 के प्रारम्भ काल में ही डॉ आंबेडकर को विधान मंडल का सदस्य नियुक्त किया गया। 18 फरवरी 1927 के दिन उन्होंने शपथ ग्रहण की। उनके साथ ही मेघवाल समाज के डॉ सोलंकी भी अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त हुए थे।"







14 September 2019

King Meghvahana - राजा मेघवाहन

आगे बढ़ने से पहले कृपया नोट कर लें कि मैं इतिहासकार नहीं हूं. मैं अपनी जाति का इतिहास ढूंढता रहा हूं. इस सिलसिले में जो मिला, अच्छा-बुरा, सही-गलत वो सब यहां इकट्ठा हुआ. इसलिए यदि मैं किसी इतिहास संबंधी अवधारणा को गलत मान बैठा हूं या उसे गलत साबित करने की कोशिश की है तो उसका कारण मेरे पढ़े हुए इतिहास के उलट किसी इतिहास का मौजूद होना है.  अब आगे चलें.

जम्मू-कश्मीर के निवासी मेघ और अन्य बहुत से मेघ अपने इतिहास को ‘राजतरंगिणी’ के राजा मेघवाहन में देखते हैं. पता नहीं उनमें से कितने लोगों ने राजतरंगिणी का मूल पाठ (संस्कृत में) पढ़ा. संस्कृत में लिखी राजतरंगिणी मैंने नहीं पढ़ी लेकिन अंग्रेज़ी और हिंदी में अनूदित अंश (तृतीय तरंग के) पढ़े जो मेघवाहन से संबंधित हैं और मैं मानता हूं कि उसमें राजा मेघवाहन का जितना उल्लेख किया गया है वह राजा और उसकी शासन प्रणाली के वर्णन के  लिहाज़ से अपर्याप्त है. राजतरंगिणी के लेखक पं.कल्हण आज के अर्थ में इतिहासकार नहीं थे. लेकिन बहुत से ऐतिहासिक संदर्भों को उन्होंने अपने नज़रिए से रिकार्ड किया. 12वीं शताब्दी में इतिहास लेखन की कोई परंपरा नहीं थी उस काल में कल्हण का कार्य महत्वपूर्ण रहा होगा. आज के इतिहास लेखन से जैसी अपेक्षा हो सकती है वैसी कल्हण से नहीं होनी चाहिए. राजतरंगिणी की लेखन शैली पौराणिक कथा शैली से प्रभावित है.

श्री जोगेश चंदर दत्त ने ‘राजतरंगिणी’ का जो अंग्रेज़ी अनुवाद किया है उसी की पीडीएफ फाइल मेरी नज़र में पहले आई. उसमें बहुत स्पष्ट लिखा था कि राजा मेघवाहन जिस कालखंड में थे उसमें बौधमत का बहुत प्रभाव था. राजा के अलावा उसकी रानियों ने भी बौद्ध मठों का निर्माण करवाया था. उस नेरेशन से तब के जम्मू-कश्मीर में बौद्धमत की व्यापकता का उल्लेख मिलता है. जीवों के प्रति करुणा का भाव फैलाने में मेघवाहन की भूमिका को राजतरंगिणी में सराहा गया है. 

हफ्ता-भर पहले ‘मेघ-चेतना’ के लगभग दस साल तक संपादक रहे श्री एन.सी. भगत ने ‘मेघ-चेतना’ के किसी पुराने अंक में से 4 पृष्ठों की फोटो कॉपी मुझे दी. उसमें प्रकाशित एक आलेख मेघवाहन के बारे में था. उस आलेख के शुरू में ही छपा था “मूल पाठों का सारांश, पंडित कल्हण लिखित कश्मीर के राजाओं का इतिहास, राजतरंगिणी की तृतीय तरंग के आरंभ में ही साक्षात जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन का प्रसंग शुरू होता है.यह रुचिकर था. इसे “आचार्य जैन मुनि श्री विमल मुनि जी महाराज श्री दर्शन मुनि जी महाराज” के सौजन्य से छापा गया था. उक्त आलेख दोनों मुनिजनों ने मिल कर लिखा या पहले वाले मुनि जी महाराज ने लिखा यह स्पष्ट नहीं है. श्री दर्शन मुनि जी महाराज का नाम (संभवतः दर्शन भगत था) लेकिन यह मानने का मेरे पास पर्याप्त कारण है कि जैन दायरे में उनका नाम सुदर्शन मुनि रहा होगा जिनसे मैं कालेज के दिनों में जैन धर्मशाला, सैक्टर-18, चंडीगढ़ में श्री सत्यव्रत शास्त्री जी के साथ मिलने गया था. उक्त आलेख के स्कैन इस ब्लॉग के अंत में दिए गए हैं. श्री सुदर्शन मुनि ऊधमपुर, जम्मू के रहने वाले थे.

मेघ-चेतना’ पत्रिका में छपा उक्त आलेख किसी पौराणिक कथा से कम नहीं. आलेख के शीर्षक में लिखा है - “साक्षात् जिनेंद्र भगवान के तुल्य प्रभु मेघवाहन”. आगे पहले पैराग्राफ में ही लिखा गया है कि “प्राणी मात्र पर दया करने वाले बोधिसत्वों की महिमा को भी उस उत्तम विचार संपन्न राजा ने अपने गंभीर तथा उदात्त चरित्र से परास्त कर दिया.” ऐसा कह कर मेघवाहन को जैनमत का गौरव कहा गया है ऐसा प्रतीत होता है. जोगेश चंदर दत्त के 'राजतरंगिणी' के अंग्रेजी अनुवाद में लिखा है कि महामेघवाहन बौधमत के अनुयाई थे और उनकी रानियों ने बौद्ध विहार बनवाए थे. यानि दोनों संदर्भों के नेरेशन में तनिक भिन्नता है. 

मेघवाहन को प्रभु जिनेंद्र तुल्य मानना एक सद्भावनापूर्ण सोच है पर ज़रा संभल कर. ओडिशा (जिसे पहले उड़ीसा, Odissa कहा जाता था) में एक महामेघवाहन राजवंश रहा है जिसकी परंपरा में खारवेल जैसे सम्राट जैनमत के अनुयायी थे. अभी तक मेरी नज़र में ऐसा कुछ भी नहीं आया जो कश्मीर के मेघवाहन और ओडिशा के महामेघवाहन बीच कोई तर्कपूर्ण संबंध बिठाता हो. अलबत्ता एक आलेख (यथा 13-09-2019 को देखा गया) ऐसा है जो दोनों को एक साथ रखता है. वहां मेघवाहन और महामेघवाहन को लेकर स्पष्टता की ज़रूरत है.  

अब सवाल रह जाता है कि क्या राजा मेघवाहन ‘मेघ’ नस्ल के थे. राजतरंगिणी में इस बारे में स्पष्ट तो कुछ लिखा नहीं है लेकिन यह ज़रूर लिखा है, “We are ashamed to relate the history of this good king to vulgar men, but those who write according to the Rishis do not care for the taste of their hearers.” इसे अब कोई दिल पर ले ले या नकार दे यह आज उसकी मर्ज़ी पर है.

धार्मिक, इतिहासिक, सामाजिक विषयों पर लिखे ग्रंथों को जब पढ़ना हो तो उनके लेखकों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को जानना-समझना बहुत ज़रूरी है. उसके बिना आप उनकी रचनाओं के गूढ़ कथ्य को सही सदर्भों में नहीं जान सकते. कल्हण कश्मीरी ब्राह्मण/पंडित थे और रामायण तथा महाभारत के जानकार थे. विकिपीडिया पर कल्हण के बारे में काफी कुछ कहा गया साथ ही यह जानना ज़रूरी है कि इतिहास के बारे में विकिपीडिया बहुत विश्वसनीय स्रोत नहीं है, तथापि कल्हण को इस लिंक से थोड़ा जान लीजिए (यह लिंक 13-09-2019 को देखा गया है).

कल्हण अपनी ‘राजतरंगिणी’ में संकलित ऐतिहासिक संदर्भों को पौराणिक शैली से मुक्त नहीं रख पाए. इसका एक उदारण मेघवाहन के संदर्भ में उनकी निम्नलिखित टिप्पणी से मिल जाता है, “From that time none violated the king's order against the destruction of animals, neither in water, nor in the skies, nor in forests did animals kill one another.” “...nor in forests did animals kill one another” जैसी बात कहना एक बहुत ही काल्पनिक स्थिति की बात है जिसमें अतिश्योक्ति है और अतिरंजना भी वरना प्रकृति में एक जीव भोजन है दूसरे जीव का.

जहाँ तक करुणा (tenderness) और अहिंसा (non-violence) की बात है करुणा बौधमार्ग की महत्वपूर्ण जीवन शैली है और अहिंसा जैनमार्ग की. बौधमत राज्य की रक्षा और आत्मरक्षा के लिए हिंसा के प्रयोग की अनुमति देता है.

अंत में मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि 'राजतरंगिणी' के राजा मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. यदि किसी को नज़र आ जाए तो उसे लिखना चाहिए.

ये लिंक भी देखे जा सकते हैं


Rajtarangini (PDF) (Page 36-37)

नरेंदर सहगल की पुस्तक व्यथित जम्मू-कश्मीर के पृष्ठ 25 पर प्रतिभाशाली मेघवाहन का उल्लेख हुआ है.






10 August 2019

Megh, Meghs and Many Meghs - मेघ, मेघ और मेघम्मेघ

मेघ रेस के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ी उसे इस ब्लॉग पर एकत्रित किया जाता रहा, जैसे कि जम्मू से लेकर कर्नाटक तक मेघ रेस के लोग बसे हुए हैं. मेघवारों के इतिहास से पता चला कि मेघ रेस के लोग बिहार में भी रह रहे हैं. कर्नल कन्निंघम से पता चला कि मेघ नॉर्थ-ईस्ट में भी हैं. जानकारी इकट्ठा करके ब्लॉग लिखता हूं क्योंकि जिज्ञासु शायद उन्हें पढ़ने आ जाते हैं.

दूसरी ओर यह भी दिखता है कि सोशल मीडिया पर लोग इस चीज को लेकर बहस करते हैं कि क्या वाकई ‘मेघ’ एक रेस है? क्या अन्य प्रदेशों में बसे हुए मेघ, मेघवाल और मेघवार लोग एक ही रेस के हैं? बहस करने वालों को इस बात की भी तकलीफ़ होती है कि जो लोग राजस्थान से पंजाब में आकर बसे हैं और जिन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र मिलता है क्या वे भी मेघ हैं या कोई और हैं? कई बार सोशल मीडिया पर उनकी बहस बेस्वादी हो जाती है. वे मामले को कोर्ट तक ले जाने की बातें करने लगते हैं. उनकी मर्ज़ी. इस बहस के पीछे विषय की जानकारी का अभाव हो सकता है. उस अभाव की पृष्ठभूमि में गरीबी (poverty), भौगोलिक दूरी (distance), अनपढ़ता (illiteracy) और गतिहीनता (immobility) दिख सकती है.

पिछले दिनों रतन लाल गोत्रा जी से बातचीत हो रही थी तो उन्होंने लगभग 20 साल पुरानी एक बात सुनाई. उनका छोटा भाई अपने बिज़नेस के सिलसिले में कश्मीर में अनंतनाग जाया करता था जहाँ से वो क्रिकेट बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली विल्लो लकड़ी मँगवाता था. लकड़ी बेचने वालों का एक बड़ा बुज़ुर्ग वहाँ बैठा रहता था. उसने बताया था कि ‘हमारे बुज़ुर्ग जुलाहे थे और हमारे गोत्र आपके (मेघों के) गोत्रों जैसे हैं. हम यहाँ कसबी कहलाते हैं. मुसलमान बनने के बाद हमें यहाँ की मुस्लिम परंपरा के अनुसार कसबी कहा जाने लगा. आप हमारे अपने ही बंदे हो’. उस बुज़ुर्ग का अपना गोत ‘गोत्रा’ था. जम्मू के श्री दौलतराम (कुमार ए. भारती के पिता जी जो भारत विभाजन के बाद दिल्ली में रिसेटलमेंट अधिकारी के तौर पर कार्य कर चुके थे) ने रतन लाल गोत्रा जी को बताया था कि ज़िला मीरपुर (जो अब पाकिस्तान में है और मुज़फ्फ़राबाद के पास है) के इलाके के कसबी हमारे ही लोग हैं. (कसबी फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ हैः- कारीगर artisan, शिल्पी  artificer, व्यापारी trader). कहने का भाव यह कि धर्म परिवर्तन के कारण नामऔर सरनेम बदल सकते हैं लेकिन पुरखों की परंपरा एक ही रही हो सकती है. हाँ, नाम बदल जाने से पहचान कुछ कठिन हो जाएगी. शब्दों का खेल बहुत टेढ़ा है. नाम या उसकी भाव पर आधारित ध्वनि बदलने से, शब्दों के अनुवाद या अनुसृजन से, क्षेत्र बदलने से, बस्ती, खेत, मैदान, पहाड़, नदी, जंगल, व्यवसाय आदि बदलने से पहचान बदल सकती है. मनुस्मृति ने व्यवसाय बदलने की गुंजाइश पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए व्यवसाय आधारित जाति की वही पहचान चलती रही जब तक कि जातियों के खंड करके (उनके भीतर विभाजन करके) उनके खंडों को अलग-अलग नाम नहीं दे दिए गए. इसलिए अपने मूल की पहचान को समझते हुए चलना एक ज़रूरत हो सकती है. 


इस बारे में मैंने जो पहले लिखा है उसे दोहरा रहा हूं कि राजस्थान की ओर से आए हुए जो मेघ रेस के लोग अबोहर-फाजिल्का के इलाके में बसे हुए हैं वो हजारों की तादाद में हैं. उनका जाति संबंधी फैसला राजनीतिक निर्णय के तहत पहले से हो चुका है और उन्हें मेघ जाति का प्रमाण-पत्र कई दशाब्दियों से दिया जा रहा है. मेरा विचार है कि यह बात बहुत स्पष्ट है और विधि सम्मत भी.

ये कुछ शब्द शायद कुछ मदद कर सकें: 

(सहयोग करें, सेवा करें, भाग लें, विविधता लाएं, एकजुट हों, संश्लेषित करें, साझा करें, एक साथ आएं, सहन करें, संवाद करें, पारस्परिकता बढ़ाएँ, गठबंधन करें, समझें, शामिल करें, विलय करें, परस्पर संबंध बढ़ाएं, सम्मान करें, सहयोग करें, पुन: व्यवस्थित करें, स्वागत करें, समायोजित करें, धन्यवाद दें, एकीकृत करें, समर्थन दें, सराहना करें, दूरियाँ समाप्त करें, सम्मिलित हों, सहायता करें, स्वीकार करें, विस्तार करें, आउटरीच बढ़ाएँ, शेयर करें.

cooperate, serve, take part, diversify, unite, synthesize, share, come together, tolerate, communicate, mutuality, combine, interweave, understand, include, merge, interrelate, respect, collaborate, recombine, welcome, accommodate, thank, integrate, support, appreciate, bridge, join, assist, accept, expand, outreach, share)


16 April 2019

Meghvahana and Megh - मेघवाहन और मेघ


राजतरंगिणी और मेघ लिखते समय और इतिहास का दर्शन समझते हुए कल्हण की राजतरंगिणी के बारे में कुछ समझा भी और कुछ सवाल भी मन में उठे थे. ख़ैर !

जो मेघजनमेघवाहनका नाम सुन करराजतरंगिणीमें अपने इतिहास की प्यास बुझाने आते रहे थे वे ख़ुद को रेगिस्तान में महसूस करते थे. वही अनुभव मेरा भी है. इस पुस्तक मेंमेघवाहनके बारे में जो लिखा गया है उसका सार यह है कि मेघवाहन का पिता उसी युधिष्ठिर का पड़पोता (great grandson) था जिसे गांधार के राजा गोपादित्य ने शरण दी थी. वो सन 25 ईस्वी में उठान पर था और उसने 34 वर्ष तक राज किया. (यह इस शर्त पर यहाँ लिख दिया है कि कोई मुझ से युधिष्ठिर की जन्म-मरण तिथि न पूछे) उसका विवाह असम की एक वैष्णव राजकुमारी अमृतप्रभा से हुआ था, जब कश्मीर का राजा संधिमति अनिच्छुक (unwilling king) साबित हुआ तो उसके कश्मीरी मंत्री (कश्मीरी ब्राह्मण) मेघवाहन को (संभवतः अफ़गानिस्तान से) कश्मीर ले आए थे. मेघवाहन ने पशुवध पर प्रतिबंध लगा दिया, उसने बौद्ध मठ (मोनेस्ट्री) की स्थापना की, उसकी रानियों ने बौद्ध विहार और मठ बनवाए, जिससे उसके बौध राजा होने का संकेत मिलता है. मेघवाहन श्रेष्ठ राजा था, उसने ब्राह्मणों को संरक्षण दिया था.

मेघों का इतिहास जानने के इच्छुक मेघजनों को कह सकता हूँ कि राजतरंगिणी के मेघवाहन की कहानी में मेघों के इतिहास का कोई सिरा नज़र नहीं आता. वैसे भी मेघवाहन को पौराणिक कथाओं के साथ हैशटैग किया गया है जो सोद्देश्य किया गया है, ज़ाहिरा तौर पर यह इतिहास में बहुत कन्फ्यूज़न पैदा करता है. इस बारे में विकिपीडिया पर भरोसा करना अपनी ईमानदारी पर शक करने से भी बुरा है.

बेहतर है कि राजतरंगिणी के 'मेघवाहन' को समय की धारा में बह जाने दीजिए. वैसे आपकी कोशिशों को रोकने की मेरी मंशा नहीं है.


25 February 2019

Meghwal Pargana in Jalandhar - जालंधर में मेघवाल परगना


ताराराम जी ने 'प्रोसीडिंग्ज़ ऑफ़ द इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस' पुस्तक के पृष्ठ सं 1180 की फोटो भेजी है जिसके नीचे के पैरा में जालंधर ज़िले के अंतर्गत एक 'मेघवाल' परगना (अनेक गांव वाला क्षेत्र) का उल्लेख है. पंजाब/सिख इतिहास का कोई जानकार बता सकता है कि आज यह क्षेत्र किस नाम से जाना जाता है? 


22 December 2018

मेदे (Mede), मद्र (Madra), मेग (Meg), मेघ (Megh)


मेघ जाति, मेघ रेस या अपने मूल को जानने के इच्छुक मेघों को - मेदे (Mede), मद्र (Madra), मेग (Meg), मेघ (Megh) - ये शब्द हमेशा आकर्षित और कुछ परेशान करते रहे हैं. वे सोचते रहे हैं कि क्या ये शब्द वास्तव में एक ही रेस, जाति समूह, जाति की ओर इशारा करते हैं? यहाँ स्पष्ट करना बेहतर होगा कि Ethnology जिसे हिंदी में 'मानव जाति विज्ञान' कहा जाता है उसी के आधार पर कई जातियों को 'जाति' शब्द के तहत कवर कर लिया जाता है. लेकिन वह 'जाति समूह' को प्रकट करता है. यह इसलिए यहाँ प्रासंगिक है क्योंकि एथनेलॉजी को इस प्रकार से परिभाषित किया जाता है- ‘विभिन्न लोगों की विशेषताओं और उनके बीच के अंतर और संबंधों का अध्ययन.’ इस दृष्टि से यहाँ हिंदी के 'जाति' शब्द का अर्थ 'जाति समूह' या भारतीय संदर्भ में 'रेस' से भी लेना चाहिए जिसके भीतर कई-कई जातियाँ बना ली गई हैं.
मेदे, मेदी, मेग, मेघ आदि शब्दों के बारे में श्री आर. एल. गोत्रा, डॉक्टर ध्यान सिंह और श्री ताराराम जी से कई बार बातचीत हुई. यहां-वहां से जो पढ़ा-जाना उसमें एक ही स्रोत पर कोई आलेख नहीं मिला था जो इस पहेली का समाधान करता हो. सारा पढ़ने का तो कोई दावा भी नहीं है. हालांकि यह महसूस होता रहा कि इन शब्दों के मौलिक अर्थ और सभी अर्थ छटाएँ इतिहास की पुस्तकों में नहीं हैं और उन्हें शास्त्रीय साहित्य जैसे- रामायण, महाभारत, पौराणिक कहानियों आदि के साथ मिलान करके देखना होगा. इस बारे में कर्नल तिलकराज जी से महत्वपूर्ण संकेत मिले कि इसे भाषा-विज्ञान की दृष्टि से भी परखना पड़ेगा ताकि इन शब्दों की यात्राओं को भली प्रकार से जाना जा सके. यह इतना सरल भी नहीं है कि जहाँ कहीं किसी जाति या जाति समूह के नाम में ‘ या M’ देखा तो उस पर टूट पड़े. इस प्रवृत्ति पर अंकुश के साथ एक गंभीर शोध सहित प्रामाणिक संदर्भों की ज़रूरत होती है. इतिहासकार की नज़र का होना तो ज़रूरी है ही.
तारा राम जी ने अभी हाल ही में लिखे अपने एक शोध-पत्र (Research Paper) की पीडीएफ भेजी है. यह आलेख इस बात की गवाही दे रहा है कि ये सभी शब्द (मेदे, मद्र , मेग , मेघ) मेघ प्रजाति (रेस) की ओर इंगित कर रहे हैं जो भारत के अलग-अलग भू-भागों में बसी हुई है. यह रेस कई जातियों में बँटी हुई है और ये जातियाँ एक दूसरे को पहचानती भी नहीं हैं. वे एक दूसरे को ज़रूर ही पहचाने, यह जरूरी नहीं क्योंकि भौगोलिक कारण अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं. लेकिन ज्यों-ज्यों दुनिया सिमट रही है त्यों-त्यों आपसी पहचान बढ़ेगी, ऐसा लगता है. अस्तु, ताराराम जी ने जो अपना शोध-पत्र भेजा है उसमें विभिन्न इतिहासकारों और विद्वानों को संदर्भित किया है जो आलेख को विश्वसनीयता प्रदान करता है.
(इस आलेख में मेघों के राजनीतिक-सांस्कृतिक तंत्र पर चाणक्य (कौटिल्य) की टिप्पणी का उल्लेख है. इन दिनों इतिहास के जानकारों ने कौटिल्य यानि चाणक्य के ऐतिहासिक पात्र होने पर सवालिया निशान लगाए हैं. उसे ध्यान में रखते हुए यह कहना कठिन है कि चाणक्य की वो टिप्पणी कब की है).
ताराराम जी के आलेख का सार यहाँ है. मूल शोध-पत्र का पीडीएफ़ आप यहाँ इस लिंक मेद, मद्र, मेग, मेघ - पर पढ़ सकते हैं.


विकिपीडिया के ये दो आलेख भी देखने चाहिएँ-

Medes (इसे 06-09-2019 को देखा गया)

Medes (यह लिंक 16-09-2019 को देखा गया)

14 March 2017

Caste Identity and Unity - जाति पहचान और एकता


यह संसार 'नाम' और 'रूप' का बना है. जातियाँ नाम और रूप के आधार पर बनी है और इनकी खासियत यह है इनकी अपनी परंपराएँ और रूढ़ियाँ हैं जो इनकी पहचान है. जातियों की ख़ासियत है कि वे अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं. परिपक्व होते लोकतंत्र में यह सवाल खड़ा हुआ है कि वंचित जातियां आपस में एकता कैसे स्थापित करें ताकि वे अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था परिवर्तन कर सकें. दूसरी ओर एक राष्ट्रवाद खड़ा हो रहा है जो जातिवाद का विरोध करता तो नहीं दिखता लेकिन जातिवाद को समाप्त मान कर बात करता है.


कुछ मेघजन इस आइडिया के साथ खेलते हैं कि क्या कबीर को इष्ट मानने वाले या कबीर को बुनकरों की प्रतिनिधि विचारधारा मानने वाले समुदायों का एक सामान्य नाम ‘कबीरपंथी’ रखा जा सकता है ताकि उन जातियों में एक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक एकता स्थापित हो जाए?


हाल ही में एक उदाहरण मेरे सामने आया है. राजस्थान में एक सरकारी नोटिफिकेशन के ज़रिए बलाई आदि अनेक जातियों को अनुमति दी गई थी कि वे ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं. उसके पीछे कोई राजनीतिक एकता की मंशा रही होगी ऐसा मानना मुश्किल है लेकिन यह भावना ज़रूर थी कि चमड़े का कार्य करने वाली जातियाँ अपने व्यवसाय से जोड़े गए घृणा के भाव से मुक्ति पा जाएँ. इसके बाद वहाँ 'मेघवंश' और 'मेघवाल' शब्दों के साथ नई जागरूकता का संकेत देते हुए कम से कम एक संगठन बना जिसने बहुत से कार्यक्रम आयोजित किए. कुछ जातियों ने सरनेम के तौर पर ‘मेघवाल’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. इस पर बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर क्षेत्र के मेघवालों को आपत्ति थी क्योंकि वे  व्यवसाय से चर्मकार नहीं बल्कि बुनकर थे. अनजाने में ही सही लेकिन चर्मकारों के व्यवसाय से जुड़ी घृणा उन्हें ख़ुद तक पहुँचती महसूस हुई.


जैसा कि मैंने पहले कहा है - जातियाँ अपनी पहचान खोना नहीं चाहतीं और हाल ही में मेरी जानकारी में आया है कि कई चर्मकार जातियों ने मेघवाल शब्द का प्रयोग करने से इंकार भी कर दिया. कहने का मतलब यह है कि कानून के द्वारा किन्हीं जातियों को एक नाम देना उनमें एकता होने की गारंटी नहीं देता. एकता को लेकर जो बेचैनी है वो राजनीतिक है और उसका समाधान राजनीति के सिद्धांतों के अंतर्गत होगा. समाज सदियों से बँटा हुआ है और वह जल्दी सुधरने वाला नहीं है. अनुसूचित जातियों का आपस में रोटी-बेटी का व्यापक और खुला दिखने वाला संबंध नहीं है और न ही वह एकदम से स्थापित हो सकता है. इसमें भौगोलिक,आर्थिक और कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हैं.

बेहतर आंदोलन यह है कि व्यक्ति अपने भीतर के आदमी को जल्दी से सुधार ले. समाज को बदलने में समय लगता है. ‘समय’ कहकर किसी को हतोत्साहित नहीं करना चाहता. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी ही होती है. अब वंचित जातियों में शिक्षा का प्रसार हो रहा है जिससे उनकी मानसिक रुकावटों के पिघलाव की गति तेज हो सकती है. इससे उम्मीद जगती है. इसे हाल ही में उभरे राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखने की ज़रूरत होगी जिस पर समाजशास्त्री प्रकाश डालेंगे.

26 January 2017

Meghs as per anthropology - मानवशास्त्र के अनुसार मेघ

इंसान जब अपने मूल को ढूँढने निकलता है तो उसे सृष्टि के प्रारंभिक प्राणियों जैसे अमीबा, Comb Jelly, मछली और फिर बंदर में अपना अतीत जल्दी से न दिखता है न हज़म होता है. फिर वो पूछता है कि भाई हम किस मानव स्वरूप पुरुष की संतान हैं जिसे हम अपना पहला पुरुष कह सकें. यही 'पहला' सबसे बड़ी मुसीबत है उनके लिए जो सवाल पूछते हैं. फिर भी वैज्ञानिकों ने और अन्य जानकार लोगों ने मानवशास्त्र-विज्ञान (anthropology), भाषा-विज्ञान (philology) आदि के आधार पर बहुत सी जानकारी दी है. 'पहला' तो नहीं मिलता लेकिन उसकी संतानों के कदमों के निशान पाए जाते हैं कि वे कहाँ से चले होंगे और कहाँ-कहाँ गए और इस समय कहाँ-कहाँ हैं. तो हे मेघजन! आपके लिए कुछ संदर्भ हाज़िर हैं इससे आपको कुछ तसल्ली मिलेगी.

मेघवंश के इतिहासकार ताराराम जी ने हाल ही में श्री मारवाड़ मेघवाल सेवा संस्थान, शाखा - देसूरी के घानेराव में दिनांक 03 जनवरी 2017 को एक उद्बोधन दिया था जिसकी एक प्रति उन्होंने अग्रिम रूप से मुझे भेजने की कृपा की थी. उस भाषण का एक अंश आपके मतलब का हो सकता है यदि आप अपनी मानवशास्त्र सम्मत (एंथ्रोपोलोजिकल) पहचान में रुचि रखते हैं.

"किसी समय मारवाड़ और महाराष्ट्र एक ही हुआ करता था और यह ध्यान देने वाली बात है कि इस क्षेत्र का नाम ‘मारवाड़’ और इससे इतर प्रदेश का नाम 'महाराष्ट्र' इन जगहों पर निवास करने वाले एक ही तरह के ‘म्हार’ वा ‘मेग’ लोगों के कारण पड़ा था. कोल-द्रविड़ मूल के ‘मेग’ शब्द के अर्थ जूना, पुरानाप्राचीनफैलना या पसारना, बादलमुख्य या प्रमुख आदि कई होते है. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ‘महार’ और ‘मेग’ शब्द की व्युत्पत्ति धातु भी एक ही है. म्हारवाड से मारवाड़ और महार-रटठ से महाराष्ट्र शब्द बना. वाड का अर्थ जगहघेरा या वाड़ से है और रटठ का अर्थ राष्ट्र से है. स्पष्ट यह है कि यह भूमि मेघों और महारों की भूमि रही हैऐसा इसके प्राचीन इतिहास से ज्ञात होता है. इनसे जुडा हुआ मालवा और मालानी भी ‘मल्ल’ लोगों का निवास होने के कारण मालवा और मालानी कहलाया. ये सब तथ्य आज जिस संगठन के बैनर-तले यह कार्यक्रम हो रहा हैउसके लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैक्योंकि मारवाड़ की ‘मेघ’ जाति की उत्पत्ति’ और महाराष्ट्र की ‘म्हार’ नामधारी जाति की उत्त्पति एक ही प्रजाति से हुई है. मल्लमेगम्हार आदि भारत के प्राचीन और मूल वाशिंदे है. इसमें अब कोई संशय नहीं रह गया है और वे कोल-द्रविड़ मूल के है. सिन्धु-घाटी की प्राचीन सभ्यता के सृजनहारों में कई इतिहासकारों ने ‘मेगों’ का उल्लेख किया है और हमारा जो यह प्रदेश हैवह किसी समय सिंध का ही एक हिस्सा था. इसलिए यहाँ निवास करने वाले आज के ‘मेग’ और प्राचीन काल के ‘मेग’ एक ही परंपरा और एक ही प्रजाति के हैइसमें भी कोई संदेह नहीं रह जाता है. सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के आस-पास बसने वाले मेगों का उल्लेख महाभारत आदि ग्रंथों में मद्र और मल्ल के रूप में और कहीं-कहीं बाह्लिक के रूप में हुआ है. विश्व-इतिहास में इन्हें ‘मेडिटेरेनियन’ के रूप में भी रखा है और आस्ट्रिक प्रजाति के साथ वर्णन किया गया है. आज तक की उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट हुआ है कि ये प्रजातिगत रूप से कोल-द्रविड़ मूल के मंगोलियन प्रजाति से निकली हुई जातियां हैजो भारत में वैदिक आर्यों के आक्रमण से पहले यहाँ बस चुकी थीं. वैदिक आर्यों के और यहाँ की मेघ आदि जातियों के बीच 500 वर्ष तक लम्बा संघर्ष चला. समय बीतते-बीतते वैदिक-आर्य सरस्वती नदी के आस-पास बस गए और उस भू-भाग पर कब्ज़ा कर लियाजिसे उन्होनें आर्यावर्त कहा. मेघ लोग सतलजजिसका पुराना नाम ‘मेगाद्रु’ था उसके आस-पास व चेनाब या चंद्रभागा और सिन्धु की अन्य सहायक नदियों के आस-पास बस गए. आर्यों के बाद तूरानी, अरबमंगोलशकहुण और सिदियन आदि लोगों और प्रजातियों के आक्रमण भी हुए. आर्य लोग सरस्वती से विन्ध्य पर्वत तक विस्तृत हुएजिसे उन्होंने ब्रह्मवृत्त नाम दिया. उसके आगे वे नहीं जा सके और गंगा नदी व गांगेय-तटों को अपनी आवास भूमि बनाया. मेग आदि कोल-द्रविड़ मूल की जातियां हिमालय के तलहटी-मैदानों की ओर विस्तृत होती गयी और सिन्धु से लेकर मेघना व ब्रह्मपुत्र नदी तक निवासित हुईं.

अजमेरपालीनागौरजोधपुर और बाड़मेर होते हुए कच्छ में जाकर अरब सागर में मिलने वाली लूनी नदी सिन्धु नदी की सहायक नदी थी. मेग लोग प्राचीन काल में इन क्षेत्रों में भी आकर बस गए."

ताराराम जी की इन कुछ पंक्तियों की पृष्ठभूमि में कई संदर्भ होंगे. दो नीचे दे रहा हूँ ताकि समझने में आसानी रहे. इन पर क्लिक करके आप पढ़ सकते हैं.



21 December 2015

Megh Rishi - मेघ ऋषि

बचपन से सुन रखा था कि हमारा मेघ भगत समुदाय किसी ''मेघ ऋषि'' के वंश का माना जाता है. मैंने भी अपने पिता जी से यही सुना था. मेघवंश के इतिहासकार श्री ताराराम ने लिखा है कि भारत भर के मेघवंशी अपने वंशकर्ता का नाम ''मेघ ऋषि'' बताते हैंआर.एलगोत्रा जी ने अपने अध्ययन में मेघ ऋषि या वृत्र को सप्तसिंधु का पुरोहित नरेश पाया है जिसकी प्रभुता का प्रभाव झेलम से यमुना और दक्षिण में नर्बदा तक फैला थावे लिखते हैं :-

"The Pre-Aryan people followed or supported the ‘Megh Rishi’, called as 'Vritra' in the Rig-Veda hymns. Vritra became the emperor of 'Sapta Sindhu', as the minor kings in that geographical region stretching from Kabul (Afghanistan) in the North to Narbada River in the South appeared to have accepted his suzerainty. From East to the West, this region extended mostly over the area commanded by seven rivers viz. the Sindh, Satluj, Beas, Ravi, Chenab, Jhelum, and Yamuna."


गोत्रा जी ने इस कथा के सूत्र ऋग्वेद में बताए हैं जिसके पक्ष में उन्होंने वेद मंत्रों का हवाला भी दिया हैमेघों के इतिहास का यह महत्वपूर्ण पृष्ठ बहुत देर से खाली पड़ा था जो अब धीरे-धीरे भरने लगा है.

मेघ वंश के लोगों का शिक्षा का अधिकार सदियों तक छिना रहा. उनके बारे में जो लिखा वह आर्यों (ब्राह्मणोंने लिखामेघ ऋषि या प्रथम मेघ (राजाअधिपतियानि वृत्र या (नागमेघ के बारे में जो भी लिखा वह मेघ वंश के लोगों ने नहीं बल्कि आर्य ब्राह्मणों ने लिखा और चूँकि उनकी लिखी कथा-कहानियों में मेघ ऋषि को आर्य ब्राह्मणों का शत्रु दिखाया गया है इस लिए मेघ ऋषि के बारे में जो लिखा गया उतना ही लिखा गया और वैसा ही लिखा गया जैसा आर्य ब्राह्मण अपने गौरव के हित में चाहते थेमेघ ऋषि के नाम पर मेघों के पास केवल इतनी ही पूँजी बची कि मेघ ऋषि उनके अग्रणी माने जाते थे जो युद्ध में इंद्र (आर्यों के सेना नायकसे हार गए थे.

सदियों तक शिक्षा से वंचित रहने के बाद अब शिक्षित हो रहे मेघ वंश के लोग अपने पूर्वज मेघ ऋषि की सुध लेने की हालत में आ गए हैं. वैदिक कथा के कुछ अर्थ खोद-खोद कर निकाले गए हैंनई जानकारियाँनए विचार सामने आए हैंजिस प्रकार यादवों ने अपने पूर्वज महिषासुर को पहचाना और उसकी कथा नए सिरे से लिख कर उसका सम्मान करना शुरू किया है वैसे ही कुछ मेघों ने अपने पूर्वज मेघ ऋषि को पहचान कर उसके नए बिंब (imagesखड़े किए हैं जो चमकदार हैं.

मेघ ऋषि को अपना आदि पुरुष मानने वाले मेघ उसकी कल्पना अपने-अपने तरीके से करते रहे हैंकोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं थी लेकिन कल्पना की जाती रही है कि वह कोई जटाधारीभगवा कपड़े पहने एक ऋषि रहा होगा जो पालथी लगा कर जंगल में तपस्या करता होगाहमारी इस प्रकार की कल्पना का आधार विभिन्न धार्मिक पुस्तकेंकॉमिक्सया अन्य पुस्तकेंसुनी-सुनाई बातें ही होती हैंआमतौर पर मेघ ऋषि की कल्पना 'मेघयानि बादलया किसी ऋषि के बारे में पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर की जाती है या डिक्शनरी में अर्थ देख कर उसकी कल्पना होती रहेगी क्योंकि उसे देखा तो किसी ने है नहींऐसी ही देखी-दिखाई या काल्पनिक छवियों और इमेजिज़ के आधार पर गढ़ाजालंधर में एक मेघ सज्जन श्री सुदागर मल 'कोमल' ने अपने देवी के मंदिर में मेघ ऋषि की मूर्ति स्थापित की हैउन्होंने बताया है कि उन्होंने एक पौराणिक कथा से प्रेरित हो कर और उसके आधार पर वह मूर्ति बनवा कर लगवाई हैयह मूर्ति एक सिद्ध ऋषिसिद्ध संन्यासी के रूप में है. संभव है इस कथा की जड़ें महाभारत में हों.
Megh Rishi मेघ ऋषि
जयपुरराजस्थान के गोपाल डेनवाल जी ने बिना भगवा वाली मेघ ऋषि की मूर्ति के साथ जयपुर में मेघ ऋषि मंदिर स्थापित किया है जिस पर कुछ वर्ष पूर्व तक कार्य चल रहा है. डेनवाल जी ने बताया था कि तीन-चार अन्य स्थानों पर ऐसे मंदिरों पर काम हो रहा थाहरबंस लाल लीलड़ जी ने अबोहर में एक चौक पर मेघ ऋषि की मूर्ति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जहाँ हर साल 16 दिसंबर को एक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है.

यह जान लेना बेहतर होगा कि मेलुक्ख (मुअन जो दाड़ो, मोहंजो दाड़ो) सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए एक पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 .पू. (कुछ विद्वानों ने इसे 1700 वर्ष ई.पूकी बताया हैकी एक प्रतिमा जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियमकराचीमें रखी है उसकी इमेज या छवि का प्रयोग गोपाल डेनवाल ने जयपुर स्थित मेघ मंदिर में किया हैउसी इमेज में मामूली परिवर्तन करके उसे मेघसेना (जो उनका ही संगठन हैके सुप्रीम कमांडर की छवि तैयार की है. चूँकि आधुनिक इतिहासकारों ने मोहंजो दाड़ो सभ्यता और मेघवंश से संबंधित तथ्यों को स्थापित कर दिया है इसलिए मंदिर में स्थापित हो कर मेघ ऋषि की पावनऐतिहासिक और मानव सुलभ पवित्र छवि उभर कर आई है. मेघ ऋषि और मेघ भगवान की आरतियाँमेघ-चालीसामेघ-स्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई गई हैं. इस बारे में अग्रणी भूमिका निभाने का श्रेय विशेष तौर पर गोपाल डेनवाल जी और आर.पी. सिंह जी को जाता है.

मेघ रिख पर शोध करके डॉक्टरेट की डिग्री पा चुके कराची के डॉमोहन देवराज थोंट्या ने अपनी खोज पर लिखते हुए इस तथ्य का ज़िक्र किया है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मध्ययुगीन इतिहास के महान मेघवार व्यक्तित्वों के वास्तविक होने पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैंसामान्यतः लोग आस्था रखते हैं कि मेघ रिख (मेघ ऋषि) सभी मेघवारों में एक पूजनीय व्यक्तित्व हैमेघवार ख़ुद को उसी महान संत/ऋषि का वंशज मानते हैंडॉथोंट्या एक आलेख में लिखते हैं:-

"Several aspects of Meghwar history and history of its literature are so shrouded into mist that we cannot differentiate the porous border of the historical events and the mythological beliefs where the Pauranic references have been diffused into the historical facts. So is the case with the great Meghwar personalities who lived historical lives in the medieval history of Indian Subcontinent. We encounter difficulties when the identity of Megh Rikh, Megh Dharu, Megh Mahya or Meghwar itself is questioned. In this article we will try to understand the historical identity of Megh Rikh and Megh Dharu. There is a common belief that Megh Rikh was the prime ancestor of Meghwar. In the Meghwar traditional literature and oral stories, he is considered as the most revered personality among all the Meghwars alike. Meghwar consider themselves as the descendants of this great saint."

हालाँकि ऐसा देखा नहीं गया कि उत्तर-पश्चिम भारत में आमतौर पर कहीं मेघ ऋषि की पूजा होती हो लेकिन गुजरात के मेघवारों के बारमतिपंथ में मेघ रिख (ऋषिएक पूजित विभूति के रूप में सदियों से मौजूद रहे हैंवहाँ की मान्यता के अनुसार मेघ रिख का अस्तित्वकाल चाहे विवादित हो लेकिन मेघ रिख उनकी पूजा पद्धतियों में है इसमें संदेह नहींबावजूद इसके परंपरा मान्य इतिहास पुरुष मेघ रिखमेघ धारु यहाँ तक कि मेघवार पर भी सवाल उठाए जाते हैं सिर्फ इसलिए कि उसके बारे में कहीं न कहीं कोई एक धुँधली (शायद शरारती-सी भी) पौराणिक कथा विद्यमान है. उस पर कुछ इतिहासकारों ने पौराणिक कथा और इतिहास का ऐसा घाल-मेल कर दिया है कि मेघ रिख की साफ़-साफ़ निशानदेही मुश्किल हो गई है. इसलिए सवाल तो रहेंगेलेकिन अपने पूर्वजों का सम्मान करने का हक सभी को हैइस बात से कौन इंकार कर सकता है.

(विशेष नोट :मेघ वंश एक व्यापक अर्थ वाला और अनेकार्थी शब्द हैमेघ वंश में कई अलग-अलग जातियाँ हैंउन जातियों में मेघ ऋषि एक लोक-स्मृति (पब्लिक मेमोरी) के रूप में विद्यमान एक साझा पूर्वज हैमेघ ऋषि की पहचान करने में डॉध्यान सिंह, श्री नवीन भोइया (गुजरात) ने सहायता कीउनका आभार.)

(इस पेज/ब्लॉग का मक़सद किसी धार्मिक विचारधारा का मंडन या खंडन करना नहीं है.)