"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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07 November 2017

Myth of Sudama - सुदामा का मिथ

कृष्ण और सुदामा का प्रसंग जो भक्ति साहित्य ने दिया है वो भावुकता भरा है इसीलिए अविश्वसनीय है. एक शक्तिशाली राजा अपने पुराने सहपाठी (क्लासफैलो) की आवभगत करने के लिए भावविह्वल हो कर रोता हुआ,भागता हुआ बाहर आए और उसे अपने सिंहासन पर बिठाकर उसके पांव धोए ऐसा संबंध सहपाठियों में तो नहीं देखा जाता. कथा में कुछ लोचा है. कुछ लोचा कवि सूरदास के पदों में भी है जहाँ वे कृष्ण और सुदामा के मिलन प्रसंग का वर्णन ऐसे करते हैं :-
अब हम जानी तुमहिं वो मूरख
कहाँ रहे तुम कहाँ बसत हो
सुधरे हो या निरे भगत हो।
घरबार संगहिं तुमहिं रहत हो
करम से का तुम अभहिं बचत हो
(अर्थ - अब मैं पहचान गया हूं कि तुम वही मूर्ख हो. बताओ, अब तक तुम कहाँ रहे और अभी कहाँ रहते हो. तुम्हारे अंदर कुछ सुधार हुआ है या अब भी तुम केवल भक्त ही हो. तुम घर-परिवार के संग ही रहते हो या नहीं. और परिश्रम से क्या तुम अभी पहले की ही तरह बचते हो?)
बात समझ में आती है. सुदामा ब्राह्मण था इसलिए कई बातें संकेत रूप में समझ आ जाती हैं. लेकिन शक्तिशाली यदुवंशी राजा कृष्ण उसके पाँव आखिर क्यों धोएगा? नए संदर्भों में यादव यह सवाल पूछने लगे हैं. इसे भी टटोलने की जरूरत है कि सूरदास ने सुदामा को ‘निरे भगत’ क्यों कह दिया. अगर भक्त सूरदास का यह हाल है तो बाक़ी भक्तों का क्या होगा. कबीर को तो मैं 'भक्त' नहीं मानता बल्कि 'मुक्त' मानता हूँ. उनका समय 'मुक्तिकाल' था.
सूरदास का पद Mahendra Yadav जी ने उद्धृत किया है और यह उन्हीं की पोस्ट का पश्चप्रभाव (After effect) है.

08 March 2015

Holi, Diwali - होली, दीपावली

मित्रता और भाइचारे के नाम पर मनाया जाने वाला बत्तमीज़ियों भरा होली का त्योहार आने वाला है. होलिका दहन की कथा आजतक मुझे कभी हज़म नहीं हुई कि होलिका ने अपने भाई राजा हिरण्यकशिपु के कहने पर फायरप्रूफ सूट पहना और अपने भतीजे बालक प्रह्लाद को जलाने के लिए आग में कूद गई क्योंकि वह भक्ति करता था. पूछो तो सही कि होलिका को आग लगाने वाले कौन लोग थे, राजा हिरण्यकशिपु के सेवक थे या उसके शत्रु थे जो उसका राज्य हड़पना चाहते थे? आगे चल कर हिरण्यकशिपु की धोखे से हत्या कर दी जाती है. 

इसी सीरियल का पार्ट टू है कि पिता की हत्या के बाद प्रह्लाद राजा बनता है और काफी समय तक होलिका पर खलनायिका का लेबल लगा कर उसे जला डालने वाले लोग कहानी में दो पीढ़ी तक नज़र नहीं आते. फिर वे प्रह्लाद के पोते और न्यायप्रिय राजा महाबली (स्पैलिंग चैक कर लें - बली या बलि) के समय फिर प्रकट होते हैं और उसके ही दरबार में उसकी हत्या हो जाती है. (कोई ब्राह्मण/वामन उसका राज्य छीन कर उसे पाताल में दफ़्ना देता है). सीरियल के विज़ुअल देखें तो होलिका, हिरण्यकशिपु और राजा महाबली की हत्या धोखे से की गई है. फिर उसके बाद महाबली की महालक्ष्मी (सम्राट का खज़ाना), शिक्षा, राजपाट, धर्म आदि जैसी सारी व्यवस्थाएँ ब्राह्मणों के हाथ में चली जाती हैं. यह कथा दीपावली पर लक्ष्मी के विष्णु नामक ब्राह्मण देवता के घर आगमन के साथ समाप्त होती है.


हे मेघनेट के पाठको अगली होली और दीवाली से पहले ब्राह्मणों के लिखे इस सीरियल की कहानी को क्लीयर कर लो यारो कि यह देश आख़िर गरीबों का देश कैसे बन गया? 


19 November 2012

Ashoka the great - Ravana the great - अशोक महान - रावण महान


बचपन से एक प्रश्न मन में था कि लंका में बनी अशोक वाटिका में क्या कभी सम्राट अशोक रहते थे या यह वाटिका अशोक ने बनवाई थी? सीता-माता जिसमें रह रही थी उस वाटिका को हनुमान ने क्यों नष्ट कर दिया?

खैर ये बच्चे के मन में उठे छोटे-छोटे बेकार प्रश्न हो सकते हैं. फेसबुक पर एक प्रकरण पढ़ा जिसमें तार्किक दृष्टि से मुझे एक नई बात का पता चला. इसमें बड़ा प्रश्न निहित है कि रामायण (जिसे इतिहास से भी पहले का अतिप्राचीन ग्रंथ कहा जाता है) पहले लिखी गई या इतिहास में लिखे बुद्ध पहले हुए. इस बारे में फेसबुक पर अशोक दुसाध ने रामायण में से ही एक उद्धरण दिया है जो इस प्रकार है-

यथा हि चोरः स तथा ही बुद्ध स्तथागतं नास्तीक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तीके नाभि मुखो बुद्धः स्यातम् -अयोध्याकांड सर्ग 110 श्लोक 34

जैसे चोर दंडनीय होता है इसी प्रकार बुद्ध भी दंडनीय है तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए नास्तिक को दंड दिलाया जा सके तो उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाय. परन्तु जो वश के बाहर हो उस नास्तिक से ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे! (श्लोक 34, सर्ग 109, वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड.)”

इस श्लोक में बुद्ध-तथागत का उल्लेख होना हैरान करता है और इसके आधार पर मैं इस तर्क को अकाट्य मानता हूँ कि बुद्ध पहले हुए और रामायण की रचना बाद में की गई.  

इसी संदर्भ में फेसबुक पर क्षेत्रीय शक्यपुत्र की एक अन्य पोस्ट देखी जो इस कहानी को अन्य तरीके से कहती है. फिर भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि पुरानी कथा-कहानियाँ कई तरीके सुनी-सुनाई जाती रही हैं अतः लिखी बात का अर्थ भी हर व्यक्ति को अलग तरीके से संप्रेषित होता है. (हालाँकि शक्य पुत्र की यह पोस्ट रामायण की कथा में खोज-खुदाई करती है और अशोक के संदर्भ में कुछ समानताओं और विसंगतियों को ढूँढ लाती है, लेकिन इस पोस्ट में अपनी भी कुछ विसंगतियाँ हो सकती हैं.) ब्लॉग की दृष्टि से इसका थोड़ा सा संपादन मैंने किया है.


"1-रावण के कार्यकाल में अशोक वाटिका कहाँ से आती है? कहीं साहित्यकारों ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक को रावण के रूप में प्रदर्शित तो नहीं किया? क्योंकि, रावण की कुछ विशेषताएँ थीं जो कि सम्राट अशोक से मिलती जुलती हैं, महान विद्वान, वीर योद्धा, शूर सिपाही, बहुत बड़ा संत, अपने संबंधियों व प्रजा का दयालुता पूर्वक पालनकर्ता, शक्तिशाली पुरुष, वरदानी पुरुष,तना ही नहीं बल्कि रावण एक बौद्ध राजा था ऐसा श्रीलंका स्थित कुछ विद्वान भिख्खुओं का कहना है. आज भी रावण को श्रीलंका में पूजनीय माना जाता है. श्रीलंका में रावण के विहारों में कुछ मूर्तियाँ और कुछ शिल्पकलाएँ पाई जाती हैं जिनमें रावण धम्म का प्रचार करते हुए स्पष्ट नजर आते हैं. इतिहास को एक बार देखा जाए तो श्रीलंका में बौद्ध धम्म को फैलाने वाले और कोई नहीं वे सम्राट अशोक ही थे. रावण ऋषियों से घृणा करते थे. क्यों? क्योंकि वे यज्ञ के नाम पर छल-कपट पूर्ण स्वधर्म नियमानुसार गूँगे पशुओं को आग में बलि दे कर हृदय विदारक अपराध करते थे. तो इसी से यह साफ होता है कि रामायण एक काल्पनिक एवं बम्मनों द्वारा रची हुई नकली कथा है. अगर रावण यज्ञ में चल रहे पशुओं की बलि सह नहीं सकते थे तो क्या वे जटायु नामक पशु को मार सकते हैंरामायण में एक और कथा कही गयी है कि रावण ने सभी देवी-देवताओं को बंदी किया था. यह कथा भी सम्राट अशोक की कथा से मिलती जुलती है. क्योंकि सम्राट अशोक ने भी धम्म में घुसे हुए कुछ नकली लोगों को बंदी बनाकर उन्हें धम्म से हटा दिया था. अगर आप एक बार रामायण पढ़ें तो उसमें आपको दिखाई देगा कि इस नकली एवं काल्पनिक ग्रंथ के लेखक ने खुद रावण की प्रशंसा की है. वह लिखता है कि रावण एक सज्जन पुरुष था. वह सुंदर और उत्साही था. किंतु जब रावण ब्राह्मणों को यज्ञ करते हुए और सोमरस पीते हुए देखते थे तो उन्हें कड़ा दंड देते थे. इसलिए मुझे तो लगता है कि सम्राट अशोक का विद्रूपीकरण करके ही पाखंडियों ने रावण को ऐसा प्रदर्शित किया है. क्योंकि इतिहास तो यही कहता है कि धर्मांध लोगों द्वारा दशहरा माना जाता है. दशहरा का और दस पारमिता का कही कोई संबंध तो नहीं? क्योंकि इसी दिन सम्राट अशोक ने शस्त्र का त्याग कर बुद्ध का धम्म अपनाया था. जिसे आज हम धम्मचक्र प्रवर्तन दिन और अशोक विजयादशमी कहते हैं. आपने रामायण पढ़ी है? उसमें एक श्लोक आता है जो खुद रामायण की रचना करने वाले वाल्मीकि राम के मुख से कहलवाते हैं कि-

यथा हि चोरः स तथा ही बुद्ध स्तथागतं नास्तीक मंत्र विद्धि 
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तीके नाभि मुखो बुद्धः स्यातम् -
                                                                                       (अयोध्याकांड, सर्ग 110, श्लोक 34)


जैसे चोर दंडनीय होता है इसी प्रकार बुद्ध भी दंडनीय है तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए नास्तिक को दंड दिलाया जा सके तो उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाय. परन्तु जो वश के बाहर हो उस नास्तिक से ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे!

उपर्युक्त श्लोक अपने आप में यह सिद्ध करने में पर्याप्त है कि रामायण की रचना बुद्ध के काल के बाद की है. यही कारण है कि रामायण के रचनाकार ने बुद्ध और नास्तिकों के प्रति अपना आक्रोश प्रकट करने का अवसर भी खोना नहीं चाहा. चाहे राम और रामायण काल्पनिक हो सकते हैं पर अनजाने में लेखक ने जो बुद्ध का उल्लेख किया है उसका क्या? क्या बुद्ध काल्पनिक है? सलिए दोस्तो बम्मनों द्वारा क्या ऐसी कथाएँ सिर्फ बौद्धों के प्रति अपनी घृणा व्यक्त करने के लिए रची जाती हैं? क्योंकि संपूर्ण रामायण में रावण को नास्तिक कहा है और पाखंडियों के मतानुसार तो नास्तिक सिर्फ बौद्ध धम्मीय होते हैं. रावण को भी नास्तिक कहा है. क्या रावण बौद्ध था? क्या सम्राट अशोक को ही रावण के रूप में प्रदर्शित किया है?

2-सम्राट अशोक के पुत्र भदंत महेन्द्र की रामायण में नक़ल!! मोग्लिपुत्त तिष्य की  आज्ञा से सम्राट अशोक ने पहले अपने प्रिय पुत्र महेन्द्र को, इत्तीय, शम्बल, उक्तिय और भादशाल इन चार भिक्षुओं सहित श्रीलंका भेजा. बाद में पुत्री संघमित्रा को भी भेजा. विदिशागिरी में पहुँचने पर महेन्द्र ने अपने माता के भतीजे के पुत्र 'भंदु' को बुद्ध धम्म में दीक्षित कर भिक्षु बनाया और भंदु को साथ लेकर महेन्द्र अपने चार साथियों सहित श्रीलंका में मिस्सक (मिश्रक) पर्वत के समीप पहुँचा. इसी समय श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य अपने 40,000 अनुयायियों के साथ एक हरिण का शिकार करने में लगा था. एक हरिण भागता हुआ मिस्सक (मिश्रक) पर्वत पहुँचा जहाँ महेन्द्र अपने साथियों सहित ठहरा हुआ था. देवानुप्रिया त्तिष्य अपने 40,000 अनुयायियों के साथ हरिण के पीछे-पीछे हो लिया और हरिण महेन्द्र के पास पहुँच कर लुप्त हो गया और इस प्रकार देवानुप्रिया त्तिष्य का भदंत महेन्द्र के साथियों से परिचय हुआ और श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य महेन्द्र और उनके साथियों को लंका लेकर चला गया.

रामायण में इसकी नक़ल इस प्रकार की गई है- 

वनवास के समय, एक रावण (देवानुप्रिया त्तिष्य लंका के राजा को रावण बना दिया) ने सीता का हरण किया था (सही घटना का अर्थ "श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य महेन्द्र और उनके साथियों को लंका लेकर चला गया"). रामायण के अनुसार, सीता और लक्ष्मण कुटिया में अकेले थे तब एक हिरण की वाणी सुन कर सीता परेशान हो गयी और श्रीराम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने हरिण के पीछे-पीछे हो लिए (सही घटना का अर्थ "हरिण की आवाज सुन कर श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य हरिण के पीछे-पीछे हो लिया"). राम को बहुत दूर ले गया. मौका पा कर राम ने तीर चलाया और हिरन बने मारीच का वध कर दिया. मरते-मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता! कहा (सही घटना का अर्थ "हरिण ने राजा देवानुप्रिया त्तिष्य को मारीच (मिस्सक) पर्वत ले गया जहाँ सम्राट अशोक का बेटा भदंत महेन्द्र अपने साथियों के साथ रुके थे"). रामायण में मारीच नामक इस पर्वत को रावण का मामा 'मारीच' कह कर नाम की नक़ल की गई. वास्तव में मारीच यह पर्वत है जहाँ श्रीलंका का राजा देवानुप्रिया त्तिष्य और सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और उनके साथियों में पहली भेंट हुई थी.......देवानुप्रिया त्तिष्य का भदंत महेन्द्र के साथियों के परिचय को काल्पनिक कथा का स्वरूप देकर रामायण के पाखंडी रचनाकार ने "सीता हरण" के नाम से जनमानस के मन-मष्तिक में ठूँस दिया.

एक और कथा फेसबुक से सामने आई है. उसे भी देखते हैं. रुचिकर है-

"श्रीलंका" यह रावण की लंका नही ।-

अनेक विद्वान इतिहासकारों ने रावण की लंका नर्मदा और सोनभद्र नदि के संगम के पास अमरकंठक पर्बत के उपर होने का दावा किया है। लंका मतलब ऊँचा टीला। लंका शब्द गौंडी भाषा का शब्द है। इसीलिए गौंड (द्रविड) राजा रावण कि लंका मध्य प्रदेश के अमरकंठक पर्बत पर थी ऐसा विद्वान मानते हैं। अमरकंठक पर्बत के पास ही बडा दलदली इलाका है, जिसे पार करना असंभव है, वही वाल्मीकि का समुंद्र है।

आज भी अमरकंठक पर्बत के पास "रावण ग्राम" नामक गौंड जाती के लोगों का गांव है। वहाॅ रावण की जमीन के उपर सोती हुई पत्थर कि मूर्ती है, और वहाॅ के लोग विजया दशमी के दिन "रावण बाबा" कहकर उसकी पूजा करते हैं। रावण बाबा उन्हें सुखी रखता है, ऐसी उनकी श्रध्दा है। (ज्यादा जानकारी के लिए पढीए दिवाकर डांगे लिखित मराठी ग्रंथ "रहस्य विश्वोत्पतीचे आणि इश्वराचे।".)

ध्यान देने की बात है कि यहाँ रावण को आदिवासियों का आराध्य दिखाया गया है.

18-10-2018

आज प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी और इतिहास के अन्वेषक डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने फेसबुक पर एक नई बात बताई जिसे ज्यों का त्यों कापी पेस्ट कर रहा हूँ-

1953 की खुदाई से पता चला कि पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रासाद अग्निकांड उर्फ लंकाकांड से नष्ट हुआ था।
खुदाई में मौर्य महल में जड़ी सोने की बेलें मिली हैं।
पाटलिपुत्र में लंका की भाँति चैत्यों को नष्ट किया गया और अशोकाराम उर्फ अशोक- वाटिका उजाड़ी गई।

कवि कलाकार होता है, वह नाम, स्थान और पात्र बदलकर अपने संदेशों को कहता है जैसे कि शक्ति - पूजा के राम खुद निराला हैं।


15 January 2011

What happened to Bhakta Prahlada - प्रह्लाद भक्त का क्या हुआ


भक्त का मूल अर्थ है जो अलग हो चुका है. किससे अलग हुआ यह संदर्भ के अनुसार है. हिरण्यकश्यपु (असुर या अनार्य) के पुत्र प्रह्लाद को भक्त के तौर पर बहुत महिमा मंडित किया गया है. भारतीय पौराणिक कथाओं (Indian Mythology) में प्रह्लाद को पौराणिक पात्र बना कर और भक्तिरस में भिगो कर परोसा गया है. ज़बरदस्ती अशिक्षित रखे गए वंचितों की थाली में भी इस कथा को रखा गया. सच्चाई की कई पर्तें अब तक खुल चुकी हैं. साहित्य और संदर्भों को जानने के बाद एक जिज्ञासा रह जाती है कि सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण करके आर्यों ने यहाँ के मूलनिवासियों या मेघवंशियों (aboriginals of Indus Valley Civilization) के साथ क्या किया? हिरण्यकश्यपु को मारने के बाद प्रह्लाद का क्या हुआ? पौराणिक कथाओं पर विश्वास कर लेना कभी भी बुद्धिमत्ता की बात नहीं रही. इन कथाओं के पीछे सच्चाई को छुपाने वाली एक चालाकी रहती है जिसके बारे में लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व महात्मा ज्योतिराव फुले और फुले से पूर्व कई अन्य महात्माओं ने समझा दिया था. परंतु वंचितों में अशिक्षा के कारण उसकी पूरी रोशनी अभी तक नहीं पहुँची. एक सत्यशोधक के तौर पर ज्योतिबा ने प्रह्लाद की कथा के बारे में जो लिखा उसका सारांश नीचे दिया गया है:-

नृसिंह स्वभाव से लोभी, ढोंगी, विश्वासघाती, कपटी, घातक, निर्दय और क्रूर था. शरीर से सुदृढ़ और बलवान था. राज्य हथियाने के लिए उसने हिरण्यकश्यपु के वध की योजना बनाई. अविकसित बालमन प्रह्लाद के अध्यापक के तौर पर गुप्त रीति से एक द्विज को भेज दिया और उस पर अपने धर्म तत्त्वों का प्रभाव जमा दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रह्लाद ने अपने कुल देवता हरहर की पूजा करना बंद कर दिया. हिरण्यकश्यपु ने उसके भटके हुए मन को कुलस्वामी की पूजा की ओर लाने के लिए प्रयास किए परंतु नृसिंह भीतर ही भीतर प्रह्लाद को उकसा रहा था. बालक को इतने झूठे भुलावे दिए गए कि उसके मन में पिता की हत्या करने का विचार आने लगा परंतु साहस नहीं हुआ. अवसर पाकर नृसिंह ने शेर का स्वाँग (मेकअप) करके कलाबत्तू वाली मँहगी साढ़ी पहन ली और हिरण्यकश्यपु के महल के खंभों के बीच छिप गया. शाम को राजपाट का कार्य निपटा कर हिरण्यकश्यपु जब थका-माँदा लौटा और एकाँत में आराम करने के लिए लेटा तब नृसिंह बघनखा लेकर अचानक उसे दबा कर बैठ गया और पेट फाड़ कर उसे मार डाला और स्वयं द्विजों सहित दिन-रात भागता ही चला गया और अपने प्रदेश में पहुँच गया. उधर क्षत्रियों को पता चला कि नृसिंह ने प्रह्लाद को मूर्ख बना कर ऐसा घिनौना कर्म किया है तो उन्होंने आर्यों को द्विज कहना छोड़ दिया और उन्हें विप्रिय कहने लगे. क्षत्रियों ने नृसिंह को नारसिंह जैसा निंदनीय नाम दिया. अंत में हिरण्यकश्यपु के कई पुत्रों ने कई बार प्रयत्न किए कि नारसिंह को बंदी बना कर उसे यथायोग्य दंड दिया जाए, परंतु नारसिंह ने तो हिरण्यकश्यपु का राज्य जीतने की आशा कतई छोड़ दी थी सो वह जैसे-तैसे बचता-बचाता रहा और बाद में आगे कोई उपद्रव किए बिना मृत्यु को प्राप्त हुआ.

विप्रों ने प्रह्लाद का राज्य हथियाने के लिए चोरी-छिपे कई प्रयत्न किए, किंतु सभी यत्न व्यर्थ हुए. आगे चल कर प्रह्लाद की आँखें खुल गईं और उसने विप्रों के छल-कपट को ताड़ लिया. इस प्रकार प्रह्लाद ने विप्रगणों का थोड़ा भी भरोसा नहीं किया. सबके साथ ऊपरी स्नेह जतलाकर अपने राज्य का उसने समुचित प्रबंध किया और अंत में मृत्यु को प्राप्त हुआ. उसका पोता (विरोचन का पुत्र) बली बहुत पराक्रमी निकला.

ग़ुलामी’, पृष्ठ 56-59, लेखक महात्मा ज्योतिराव फुले (यह पुस्तक महाराष्ट्र सरकार द्वारा भी प्रकाशित की गई थी.)