"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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11 October 2020

Gotra and sub-caste puzzle - गोत्र और उप-जाति की पहेली

उप जातियों की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद नजर आते हैं.  कुछ विद्वान मानते हैं की जाति के भीतर भौगोलिक दूरी के कारण, व्यवसाय बदल जाने की वजह से, रीति-रिवाजों में कुछ अंतर आ जाने की वजह से, व्यवसाय की तकनीक में अंतर आ जाने आदि के कारण कुछ उप जातियाँ वजूद में आ जाती हैं. विशिष्ट राजनीतिक निर्णयों की वजह से भी उपजातियां बनती देखी गई हैं. अपनी जाति में तिरस्कृत होने या ख़ुद उसका तिरस्कार करने के परिणामस्वरूप भी उपजातियां पैदा हो जाती हैं. यदि  किसी जाति का एक व्यक्ति मजबूत स्थिति में आ जाता है तो वह अपने कमज़ोर भाइयों से अलग होकर अपने से अधिक मजबूत जाति समूह में जाने का प्रयास करता है. जिससे एक अलग उपजाति की उत्पत्ति हो जाती है. ऐसी बहुत सी प्रवृत्तियाँ हो सकती हैं जिनके कारण जातियों में उप-जातियाँ बनते देखी गई हैं. 

किसी जाति (वर्ण सहित) में कई प्रकार की गतिविधियों के कारण खंड या उप-खंड बनते जाते हैं. जिनके बारे में ऊपर संकेत कर दिया गया है. उसके बाद अपने सामाजिक रूप-स्वरूप को संजोए रखने के लिए वे उपजातियाँ कुछ कार्य करती हैं जैसे - शादियों को नियंत्रित करना, अपने समूह में को-ऑर्डिनेशन बनाना, सामाजिक जीवन को रेग्युलेट करना वगैरा. किसी व्यक्ति का स्टेटस निर्धारित करने, किसी के धार्मिक और सिविल अधिकारों की हदबंदी करने, व्यवसाय का निर्धारण करने का काम भी वे करती है. 

चूँकि उपजाति एक छोटा समूह होता है इसलिए वह व्यक्ति के लिए अधिक सार्थक हो जाता है. मोटे तौर पर जाति और उप-जाति में से कौन अधिक वास्तविक है इसका फैसला करना मुश्किल है. इलाके के अनुसार किसी उपजाति की भूमिका अलग हो सकती है. अन्य जातियों के साथ उसके संबंधों की ट्यूनिंग अलग हो सकती है. इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि किसी जाति का अध्ययन करने के लिए उसकी उप जातियों का भी अध्ययन किया जाए. यानि गोत-वार अध्ययन किया जाना चाहिए. 

किसी जाति की उप जातियों का उल्लेख करते हुए हम कहने लगते हैं कि वो उप-जाति नंबर वन है, वो नंबर टू है और फलानी नंबर तीन है (जैसे मेघों में दमाथिए, बजाले, साकोलिए). यह गोतों का अलग-अलग अध्ययन करने की वजह से है. बड़े सामाजिक ताने-बाने में यही प्रवृत्ति किसी जाति की उप-जातियों में से अलग जातियाँ बनाने लगती है. 

पिछले दिनों भगत महासभा नामक संस्था ने मेघों के गोत्रों की सूचियाँ फेसबुक पर शेयर की थीं जो श्री ताराराम जी ने एक पुराने सेंसस संबंधी संदर्भ के साथ उपलब्ध कराई थीं. उससे पहले डॉ ध्यान सिंह के थीसस में देरियों के संदर्भ में गोत्रों की एक सूची मिली थी. दोनों ही सूचियों के पूर्ण होने का कोई दावा नहीं किया गया लेकिन ज़ाहिर है सेंसस के आधार पर बनी सूची बड़ी तो है ही. इसी संदर्भ में श्री राजकुमारप्रोफेसरका फोन आया कि किश्तवाड़ के एक सज्जन ने बताया है कि सूची में गोत्र (गोत) और उप-जाति को लेकर वे उलझन में हैं. स्वभाविक है कि जब तीन नाम हैं जाति (caste), उप-जाति (sub-caste) और गोत / गोत्र या खाप (sub-caste?) तो कुछ फ़र्क तो होना चाहिए. 

मैंने राजकुमार जी से अनुरोध किया कि वे किश्तवाड़ वाले सज्जन से पूछें कि उनके ख़ानदान वाले किस गोत में शादी नहीं करते हैं. इससे मालूम हो जाएगा कि उनका अपना गोत क्या है. रही उप-जाति की बात, मैं समझता हूँ कि शादी के अवसर पर दोनों पक्ष एक दूसरे से जात और गोत पूछते हैं जिसका अर्थ गोत ही होता है. उप-जाति पूछने का रिवाज़ मैंने नहीं देखा. इस बात को हमारे समाज के एक वरिष्ठ सदस्य श्री प्रेमचंद सांदल  जी, रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी, पीजीआई, चंडीगढ़ और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश रानी सांदल ने टेलीफोन पर बातचीत के दौरान कन्फ़र्म किया है. 

संभव है किन्हीं इलाकों में व्यवसाय या किसी आदत के आधार पर उप-जातियाँ बना ली गई हों और गोत भी रख लिया गया हो. लेकिन वो अभी रिसर्च का विषय है. फिलहाल शादी के समय गोत ही पूछा जाता है. शादियों के समय ऋषि गोत्र का इस्तेमाल होते देखा गया है जैसे- भारद्वाज, अत्री, कश्यप आदि. लेकिन ऋषि गोत का इस्तेमाल समाज की वैवाहिक परंपरा का उल्लंघन करवा सकता है. इस लिए सावधान ! अपने जाति नाम और गोत नाम का इस्तेमाल करें.

संदर्भित आलेख :  जाति और उप-जाति में अंतर

 

20 November 2018

The System of Gotra in Meghs - मेघों में गोत्र की व्यवस्था

सदियों की अनपढ़ता झेल चुकी जातियों की बौद्धिक कठिनाइयां जल्दी दूर नहीं होतीं. इसका एक उदाहरण हाल ही में इक्का-दुक्का सक्रिय सीनियर्स के मन में उभरा और व्यक्त हुआ यह विचार है कि मेघ समाज में जो गोत्र प्रथा है वह ऋषि गोत्र के बिना या तो अधूरी है या सिरे से गलत है. वे मानते हैं कि मेघ बिरादरी के गोत्र वास्तव में ऋषि गोत्र ही हैं या फिर मेघ भगतों का वास्तविक गोत्र केवल ‘भारद्वाज’ है. 

डॉ. ध्यान सिंह को जहां तक जानकारी मिली उन्होंने बिरादरी के बहुत सारे गोत्रों की एक सूची अपने शोधग्रंथ में शामिल की. हरेक गोत्र के अपने दायरे में आने वाले लड़के-लड़कियों की आपस में शादियाँ नहीं होतीं. यह कमोबेश जाटों की खाप प्रणाली जैसा है. डॉ. ध्यान सिंह द्वारा दी गई सूची में भारद्वाज, अत्री, कौशल या  कश्यप गोत्र शामिल नहीं किए हैं (हालाँकि ये ऋषि गोत्र मेघों में देखे गए हैं, शायद कुछ और भी हों). भारद्वाज गोत्र बहुतायत से देखा गया है. लेकिन इस इंप्रेशन से बचना भी बहुत ज़रूरी है कि सारे मेघ समाज का ऋषि गोत्र केवल ‘भरद्वाज’ या ‘भारद्वाज’ ही है. अन्य ऋषि गोत्र भी इस समाज में हैं.

क्या ऋषि गोत्र स्पिंडा रिलेशनशिप को कवर करने की क्षमता रखते हैं? यह एक ज़रूरी सवाल है.

कई जातियों में पाए जाने वाले ऋषियों और ऋषि गोत्रों में समानता है और यह समानता जाति छिपाने में सहायक हो सकती है. शायद इसी लिए ऋषि गोत्र के प्रति आकर्षण रहा है. हिंदू परंपराओं में हो सकता है कि किसी के 'नाम' की 'हिस्ट्री' इस प्रकार हो :- “नाम : हरे सिंह गोयल. गोत्र : भारद्वाज. वर्ण : क्षत्रिय. जाति : जाट”. उससे आगे जाटों के गोत्रों या खापों की कहानी और भी बड़ी मिलेगी. मेघों में भी यह प्रवृत्ति मिल सकती है.

जो सीनियर मेघ भगत आजकल ऋषि गोत्र पर विशेष ध्यान दे रहे हैं उनसे विनती है कि वे अपनी पसंद के ऋषियों से संबंधित वैदिक और पौराणिक कहानियों को विस्तार से पढ़ें और फिर अपना मन बनाएँ. वे मेघ ऋषि पर भी थोड़ी खोज-बीन कर लें यदि अन्यथा कोई परहेज़ न हो.

जहाँ तक डॉ. ध्यान सिंह के थीसिस में बताए गए गोत्रों की बात है तो यह समझ लेना ज़रूरी है कि उन्होंने वह उल्लेख जम्मू और अन्य जगह स्थित मेघों की देरियों के संदर्भ में किया है. सुना नहीं कि उन देरियों में ऋषियों-मुनियों की देरियां हों. मेघों में देरियों की परंपरा किस समय की है या किस सभ्यता से संबंधित है और ऋषि गोत्र की परंपरा कितनी पुरानी है, ये शोध के विषय हो सकते हैं. इस बारे में कुछ संदर्भ या संकेत कल्हण लिखित राजा मेघवाहन के आख्यान से मिल सकते हैं.

आज कई मेघों को यदि किसी कारण से अपना गोत्र याद नहीं तो वे मौखिक परंपरा में अधिक सुने गए ऋषि गोत्र का सहारा लेते हैं. शादी के उद्देश्य से वे पंडित-पुरोहित को ऋषि गोत्र बता देते हैं. यदि दोनों पार्टियों का ऋषि गोत्र एक ही निकल आए तो फिर जाति (गोत्र) पूछ ली जाती है. यानि भारद्वाज गोत्र के बाद बताना होता है कि वे लुचुंबे हैं या साकोलिया या ममुआलिया या मंगोच हैं, तभी मामला सुलटता है. शादी-ब्याह के मामले में मेघों की सभ्याचारक (cultural) परंपरा वही गोत्र प्रणाली है जो ऋषि गोत्र से मुक्त है.

यह आलेख भी ज़रूर देख लीजिए. → गोत्र प्रथा. दो लिंक और देख लीजिए पहला और दूसरा.



22 June 2011

Gotras of Megh Bhagats - मेघ भगतों के गोत्र

डॉ. ध्यान सिंह, पीएचडी

डॉ. ध्यान सिंह का शोधग्रंथ कई मायनों में उपयोगी है. इसमें मेघ भगतों के गोत्रों को भी समेकित किया गया है. इस विषय में मुझे कुछ जानकारी तो थी लेकिन डॉ. सिंह द्वारा तैयार गोत्रों की सूची से बहुत कुछ नया भी मिला. गोत्रों की सूची इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे संकेत मिलते हैं कि हम कौन हैं, कहाँ से आए थे और हमारे पूर्वज क्या करते थे. इस सूची में दिए नाम सिद्ध करते हैं कि हमारे कुछ पूर्वज अस्सीरिया से संबंधित थे. इस दृष्टि से अस्सरिया और एरियन शब्द अपनी कहानी कहते हैं. इसी प्रकार इस सूची में केशप (कश्यप) और प्राशर (पराशर) ऋषियों के नाम से गोत्र होना और विवाहों आदि में हमारा ऋषि गोत्र के रूप में भारद्वाज, अत्रि आदि ऋषियों का नाम बताना एक शोध का विषय हो सकता है क्योंकि कुछ अन्य ऋषियों के नाम हमारे समुदाय से जुड़े नहीं हैं.

सूची से स्पष्ट है कि गोत्रों का नामकरण कई प्रकार से हुआ है. गोत्र के मूल में गाँव, रेस, ऋषि, व्यवसाय, किसी नई जाति विशेष से संपर्क में आने के बाद नया नाम, रंग और छवि, विशेष आदत, गुण विशेष, क्षेत्र विशेष, पशु-पक्षी (व्यवसाय के रूप में भी), इष्ट, शारीरिक बनावट, महँगे पत्थरों आदि के नाम हैं. बहुत से गोत्रों के नाम ऐसे हैं जो संभवतः कभी शुद्ध रूप में तत्सम् (संस्कृत स्पैलिंग के अनुसार) रहे हैं और बाद में अन्य जातियों ने उनका रूप ज़बरदस्ती बिगाड़ दिया है या वे घिसते हुए इस तद्भव रूप को प्राप्त हुए हैं.

अंत में एक बात जोड़ना चाहूँगा कि गोत्रों की सूची को मैंने शब्दकोश विज्ञान (Lexicography) के नियम के अनुसार वर्णक्रम में लगा दिया है. आने वाले समय में शोधकर्ता इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रयोग कर सकेंगे.

भारत भूषण, चंडीगढ़
ईमेल- bhagat.bb@gmail.com


मेघ भगतों के गोत्रों की सूची
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अगर, अस्सरिया,
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एरियन,
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कंगोत्रा, ककड़, कतियाल, कड़थोल, कपाहे, कम्होत्रे, कलसोंत्रा, कलमुंडा, करालियाँ, कांचरे, कांडल, काटिल, काले, किलकमार, कूदे, केशप, कैले, कोकड़िया, कोण,
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खंगोतरे, खंडोत्रे, खड़िया, खढ़ने, खबरटाँगिया, खरखड़े, खलड़े, खलोत्रा, खोखर, खोरड़िये,
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गंगोत्रा, गाँधी, गुटकर, गड़गाला, गड़वाले, गिद्धड़, गोत्रा, गौरिये,
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घई, घराई, घराटिया, घराल, घुम्मन,
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चखाड़िये, चगोत्रा, चगैथिया, चबांते, चलगौर, चलोआनियाँ, चितरे, चोकड़े, चोपड़ा, चोहड़े, चोहाड़िए, चौदेचुहान, चौहान,
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छापड़िया, छोंके,
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जजूआं, जल्लन, जल्लू,
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टंभ, टनीना, टुंडर, टुस्स, टेकर, टोंडल,
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डंडिये, डंबडकाले, डग्गर, डांडिये, डोगरा, डोगे,
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ढम, ढींगरिये,
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तरपाथी, तराहल, तरियल, तित्तर,
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थंदीरा, थिंदीआलिया, थापर,
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दत्त, दमाथियां, दलवैड, दरापते,
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धूरबारे,
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नजोआरे, नजोंतरे, नमोत्रा,
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पंजगोत्रे, पंजवाथिए, पंजाथिया, पकाहे, पटोआथ, पडेयर, पराने, परालिये, पलाथियाँ, पवार, पहाड़ियाँ, पाड़हा, पानोत्रा, पाहवा, पूंबें, पौनगोत्रा, प्राशर (पराशर),
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बकरवाल, बजगोत्रे, बजाले, बदोरू, बक्शी, बग्गन, बाखड़ू, बादल, बटैहड़े, बरेह, बिल्ले, बैहलमें,
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भगोत्रा, भलथिये, भसूले, भिंडर, भिड्डू,
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मंगलीक, मंगोच, मंगोतरा, मंजोतरे, मड़ोच, मनवार, मन्हास, ममोआलिया, मल्लाके, मांडे, मुसले, मैतले,
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रतन, रत्ते, रमोत्रा, रूज़म,
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लंगोतरा, लंबदार, लालोतरा, लचाला, लचुंबे, लसकोतरा, लातोतरा, लासोतरा, लीखी, लुड्डन, लेखी, लोंचारे,
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शौंके,
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संगलिया, संगवाल, संगोत्रे, सकोलिया, सपोलिया, समोत्रा, सलगोत्रे, सलगोत्रा, सलहान, सलैड, सांगड़ा, साठी, सिरहान, सीकल, सीहाला, सोहला, सुंबरिये, सेह्,
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हरबैठा, हितैषी.
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(गोत्रों की यह सूची डॉ. ध्यान सिंह के पीएचडी के लिए स्वीकृत शोधग्रंथ पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकाससे ली गई है.)