राजनीति दुनिया के चार बड़े धंधों में से एक है. राजनीतिज्ञ (politician) किसी विचारधारा पर चलता है लेकिन समझौते भी करता चलता है, वह विचारधारा से हट भी जाता है ताकि सत्ता में बना रहे. उसके वादे कोई गारंटी नहीं देते. उसके अस्तित्व की सार्थकता सत्ता में या सत्ता के पास रहने में है. वह मुद्दों की छीना-झपटी करता है और मुद्दों का उत्पादन करता है. वह कसम तो संविधान की खाता है लेकिन कार्य पार्टी के एजेंडा पर करता है, जैसे - युद्ध, दंगे, गाय, हिंदुत्व, धर्म आदि. उसका कार्यकर्ता (political worker, activist) उसके एनेक्सचर-सा होता है, स्थान दोयम दर्जे का और कुल मिला कर इस्तेमाल करके फेंक देने वाली चीज़. राजनीतिज्ञ की पहचान उसकी राजनीतिक समझ है और राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी सामाजिक सक्रियता और सामाजिक कार्य से सम्मान पाता है. अपने नेता की गलती का परिणाम जनता के साथ-साथ कार्यकर्ता को भी भुगतना पड़ता है. जब कोई कार्यकर्ता ख़ुद राजनीतिज्ञ बन जाता है तो समाज को सीधे तौर पर नुकसान होता है. राजनीतिज्ञ और उसके कार्यकर्ताओं के मुकाबले सामाजिक कार्यकर्ता अधिक सम्मान का हक़दार है.
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"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह
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12 October 2018
17 September 2017
Social boycott, A Social Evil - सामाजिक बहिष्कार, एक सामाजिक बुराई
कबीलाई संसार में सामाजिक बहिष्कार की सज़ा को सबसे बड़ी सज़ा माना जाता था. वैसे तो दुनिया के कुछ भागों में पत्थर मार-मार कर मार डालने या ऐसी ही अमानवीय सज़ाएं देने की प्रथा थी. लेकिन मानवाधिकारों को मान्यता मिलने के बाद से उन कबीलाई परंपराओं में काफ़ी सुधार आया है. हालाँकि सामाजिक बहिष्कार, हुक्का-पानी बंद करने जैसी प्रताड़ना देने का रिवाज़ खापों और शासकीय प्रणाली का हिस्सा कहलाने वाली पंचायतों में आज भी किसी न किसी रूप में खुले या चोरी-छिपे से जारी है. कई बार तो ये संस्थाएँ न्यायालयों का मज़ाक उड़ाती दिखती हैं. मीडिया और सोशल मीडिया में सक्रियता आने की वजह से अब ऐसी सज़ाएँ देने वाली संस्थाएँ कुछ शर्माने लगी हैं.
ऐसी अमानवीय रीतियों के ख़िलाफ़ धार्मिक और दक्षिणपंथी राजनीतिक संस्थाओं ने कभी आंदोलन किया हो याद नहीं पड़ता. इन्हें परंपरा को ढोने वाली संस्थाओं के रूप में अधिक जाना जाता है. इनकी रुचि समाज सुधार में कम और अपने व्यवसाय को चलाए रखने में अधिक होती है. सामंतवाद इसी परंपरा का वाहक है और जनक भी. यह सामाजिक बहिष्कार जैसे मारक हथियार का प्रयोग अपने हित में करने के लिए सभी हथकंडे अपनाता है. सामाजिक बहिष्कार के शिकार अधिकतर ग़रीब, दलित और महिलाएँ होती हैं. वे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए किसी पर निर्भर होते हैं. यदि वे अपने सामान्य से अधिकार के लिए मांग उठाते हैं तो सामाजिक बहिष्कार का सांप उनकी आँखों के सामने कर दिया जाता है. उसे डराया जाता है कि उसके अपने ही उसे ख़ुद से दूर कर देंगे. ग़रीब के ख़िलाफ़ ग़रीब, दलित के ख़िलाफ़ दलित और महिला के ख़िलाफ़ महिला को खड़ा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. ऐसे में आर्थिक और सामाजिक रूप से ‘अपनों’ पर निर्भर व्यक्ति अपने आप अपने अंतर में मरने लगता है. सामंतों और उनके गुंडों के प्रभाव में जीने वाले लोग काफी मजबूर होते हैं.
याद रहे कि जातिवाद सामाजिक बहिष्कार की देन है. यही कारण है कि सामंतवादी परंपराओं के कुप्रभावों से टक्कर लेने और सामाजिक बहिष्कार जैसी परंपराओं के विरुद्ध लड़ने में वामपंथियों ने ही कुछ कार्य किया है.
आज के वैज्ञानिक युग और लोकतंत्र में सामाजिक बहिष्कार जैसी अमानवीय प्रथाओं का विरोध सभ्य और शिक्षित समाज करना पड़ेगा. ख़तरा छोटा नहीं है. पिछले तीन साल के राजनीतिक माहौल ने जातिवाद और सामाजिक बहिष्कार के भय को बढ़ाया है. जाति और जातिवाद के इस्तेमाल को लेकर तो सभी सियासी पार्टियों और मीडिया ने अपने कपड़े उतार फेंके.
ध्यान रहे कि सामाजिक बहिष्कार और शुद्धिकरण एक कुचक्र है. छुआछूत, ग़रीबी, और भ्रष्टाचार इसके मुख्य उत्पाद (major product) हैं. इनका सिलसिला तब तक नहीं टूटता जब तक चालू व्यवस्था को पूरी तरह तहस-नहस करके नई व्यवस्था न बनाई जाए. इसके लिए बड़े सामूहिक प्रयास की ज़रूरत होती है.
सामाजिक बहिष्कार पर काबू पाने के लिए महाराष्ट्र की सरकार ने क़ानून बनाया है और छत्तीसगढ़ की सरकार इस दिशा में कदम उठाने जा रही है. क़ानून बनाना बहुत आसान है. उसे लागू करने वाली एजेंसियों का क्या कीजिएगा जिनके भीतर जातिवाद (सामाजिक बहिष्कार) भरा हुआ है? ख़ैर, पहले तो क़ानून बनाने का स्वागत करना चाहिए.
“सामाजिक बहिष्कार मृत्युदंड से भी बड़ी सज़ा है.” - डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर.
09 July 2017
History - Investigation and Notes / इतिहास - पड़ताल और नोट्स
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| Sh. R.L. Gottra |
मैंने श्री आर.एल. गोत्रा जी को पहले पहल सोशल मीडिया से जाना फिर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला. वे सन् 1998 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और तीन चार साल बिजनेस में रहे. फिर बिजनेस छोड़ कर धार्मिक पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. वेद पढ़े, मनुस्मृति और गुरुइज़्म से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं. इस्लाम, इसाईयत, सिखिज़्म और अन्य धर्मों के बारे में पढ़ने के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे कि धार्मिक किताबें इस नज़रिए से पढ़नी चाहिएँ कि उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है. मत-मतांतरों की पृष्ठभूमि में क्या कुछ जुड़ा हुआ है. धार्मिक ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और उनकी सूचना के स्रोत और आधार क्या थे. उनकी मानसिकता क्या थी, उनका व्यक्तित्व कैसा था, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (biases) क्या थे.
धार्मिक पुस्तकों की राह से ग़ुज़र कर वे जहाँ पहुँचे वह तर्क का मुकाम था. यानि आंखें बंद करके कुछ भी मत मानो. देखो, जानो, पहचानों, पड़ताल करो, जाँचो फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की तैयारी करो ताकि आपको खुद की समझ से संतुष्टि रहे और आगे चल कर अपनी न्याय बुद्धि पर पछतावा न हो. सब से बढ़ कर यह कि इतनी सावधानी ज़रूर बरती जाए कि किसी पुस्तक या धार्मिक विचारधारा की मानसिक गुलामी को ख़ुद ही अपने कंधों पर न डाल लिया जाए.
देश में शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी को उन्होंने रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की टेक्नोलॉजी के संदर्भ में परखा है और भविष्य में बेरोज़गारी को लेकर जो कार्यनीति अपनाई जा सकती है उसके बारे में अपने विचार दिए हैं. राजनीतिक पार्टियों ने जिस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में गंदगी फैलाई है उसके तीन वाहकों का वे उल्लेख करते हैं - धर्म, जाति और विवेकहीन राजनीति. उनका मानना है कि पार्टियों ने जानबूझ कर चुनावी प्रक्रिया में ये ख़ामियाँ पैदा की हैं.
इस विषय पर श्री आर.एल. गोत्रा जी का पॉडकास्ट यहाँ उपलब्ध है जो पंजाबी में है. उनके साथ हुई बात का विस्तृत ब्यौरा हिंदी में यहाँ उपलब्ध है जो स्वतंत्र अनुवाद है.
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