"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


01 September 2016

A story from a folksinger - लोक गायक से एक कहानी

जो यहाँ लिखा है वह सार है. विस्तार से नीचे दिए ऑडियो में कहा है.

बचपन में एक हम मज़ेदार कामेडी गाना सुना करते थे - सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई, जो की थी लड़ाई, तो मैं क्या करूँ! कौरव ने पांडव से की हाथापाई, जो की हाथापाई तो मैं क्या करूँ! उसमें एक उखड़े हुए स्टूडेंट की तकलीफ़ थी. उस समय की स्कूली पढ़ाई और व्यवहारिक जीवन के बीच की दूरी या गैप उसमें हँसी पैदा करता था.

भारत में जो इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें बहुत से गैप हैं. गैप को खोद-खोद कर गुम इतिहास को निकालना हमने अंग्रेज़ों से सीखा. वरना पंडित से सुनी कथा ही हमारे लिए इतिहास था. शिक्षा और विज्ञान के साथ बुद्धि बढ़ी तो विद्वानों ने कहानियों पर सवालिया निशान लगाना सीखा. उदाहरण के तौर पर अब भाषा-विज्ञानी बताते हैं कि संस्कृत में लिखी किताबें दो हज़ार साल से अधिक पुरानी नहीं है. सम्राट अशोक के समय लिखे गए शिला लेखों में संस्कृत का एक भी शब्द नहीं है. इतिहास की नई खोज ने चाणक्य के ऐतिहासिक पात्र होने पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

जब श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया कि एक लोक गायक राँझाराम मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ता था तो यह मेरे लिए एक नई बात थी. गोत्रा जी ने इसका उल्लेख एक सोशल साइट पर किया तो एक अन्य सज्जन ने उनका समर्थन किया. गोत्रा जी से एक अन्य संकेत भी मिला कि श्री राँझाराम की रिश्तेदारी श्री सुदेश कुमार, आईएएस से है जो मध्यप्रदेश काडर से सेवानिवृत्त हैं. 29-08-2016 को सुदेश भगत जी से बात हुई तो उन्होंने पुष्टि की कि श्री राँझाराम उनके पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे और वे लोक गायक थे. यहाँ बताता चलता हूँ मेघ समुदाय के अपने लोक गीत लगभग नहीं के बराबर हैं.

23-08-2016 को मैंने एक अन्य मित्र कर्नल तिलकराज भगत जी से फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि उनका बचपन स्यालकोट के पास अपने गाँव मयाणापुरा में बीता है जहाँ राँझाराम के कार्यक्रम वे देख चुके हैं. राँझाराम की कथाएँ इतिहास भले न हों लेकिन उनमें ऐतिहासिक संकेत तो हो ही सकते हैं. वैसे भी लोक गायक घटनाओं को अपने शब्दों में ढालते आए हैं. कर्नल तिलकराज ने संकेत किया है कि मेघों के कुछ गोत्रों के नाम ग्रीक शब्दों से निकले प्रतीत होते हैं. यह खोजबीन का मामला है. ज़ाहिर है राँझे जैसे अन्य कई लोक गायकों के हाथों में उन दिनों कलम-दवात या पोथियाँ तो थी नहीं लिहाज़ा पंडितों से सुनी-सुनाई बातें वे अपने गीतों में कहते रहे.

गोत्रा जी ने यह प्रश्न एक से अधिक बार पूछा है कि बाह्मन समुदाय में सिकंदर नाम रखने की एक परंपरा दिखती है, तो कहीं सिकंदर ही आर्यों का देवता आर्यवंशी इंद्र तो नहीं था? पता नहीं, मैं नहीं जानता. लेकिन पंडित जयशंकर प्रसाद का नाटक 'चंद्रगुप्त' पढ़ा है जिसमें एलेक्ज़ांडर यानि सिकंदर का नाम अलक्षेंद्र (अलक्ष+इंद्र) रखा गया है.

सिकंदर लंबा रास्ता तय करके मेदियन और पर्शियन साम्राज्य के इलाके से होता हुआ झेलम और चिनाब क्षेत्र तक आया. उस क्षेत्र में मेघों के होने का साफ़ ज़िक्र सर एलेग्ज़ैंडर कन्निंघम ने किया है जिनकी रिपोर्टें 1871 में छपी थीं यानि सिकंदर के आने के लगभग 2200 साल बाद. कन्निंघम ने जब रिपोर्ट लिखी तब मेघ उन इलाकों में काफी गिनती में बसे थे.

वक्त के साथ चलता इतिहास बदलता रहा है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सिकंदर ने पोरस को हराया और कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पोरस ने सिकंदर को हराया. एक और बात भी देखने में आती है कि इतिहासकार जिस व्यक्ति का इतिहास दफ़्न करना चाहता था वो उसका नाम ही बदल देते था और अपनी पसंद के व्यक्ति को हीरो बना देता था.

सिकंदर अपने सेनापति सेल्यूकस को यहाँ छोड़ गया जिसने अपनी बेटी चंद्रगुप्त को ब्याह दी थी. ग्रीकों की बहुत सी निशानियाँ यहाँ रह गईं होंगी. वैसे भी जिस रास्ते से सिकंदर आया उस रास्ते में बहुत गोरे और बहुत साँवले लोग भी रहते थे. यह जुगलबंदी रक्तमिश्रण (ब्लड मिक्सिंग) की कहानी कहती है.

फिलहाल राँझाराम की कथा इतना संकेत करती है कि सिकंदर की फौज के साथ हमारा कुछ न कुछ लेना-देना तो रहा है. इतिहास लिखने की अनुमान पद्धति (inference methodology) में यह माना हुआ सिद्धांत है. दूसरी ओर यह एक प्रमाण है कि मेघों के प्राचीन इतिहास का एक अंश लोक-स्मृति (Public memory) में सुरक्षित है. मेघवंश के इतिहासकार वैज्ञानिक खोज के साथ अपना अतीत खंगालते रहेंगे. उस अतीत का दीदार मेदियन साम्राज्य से लेकर ग्रीस तक के इलाके के इतिहास और वहाँ की जनसंख्या की जानकारी (Demography) के अध्ययन से हो सकता है. डीएनए की खोज क्या कहती है यह भी देखने की बात है.

प्राचीन (pre-historic) इतिहास किसी एक जगह समाप्त नहीं हो जाता क्योंकि नई खोजें होती रहती है. किसी समय पराजित हुए भारतीय समुदायों ने अब पुरातत्व (आर्कियालोजी), लोक-स्मृति (पब्लिक मेमोरी), तर्क (लॉजिक), प्रमाण (प्रूफ, एविडेंस) पर आधारित लोकतांत्रिक इतिहास बोध (Democratic Sensibility of History) के साथ अपना इतिहास खुद लिखना शुरू किया है. जाट और सैनी समुदायों सहित कई दूसरे समुदाय पोरस को 'अपना बंदा' कहते हैं. कहने का तात्पर्य है कि भारत के कई समुदाय अब अपना-अपना इतिहास खुद लिख रहे हैं. आगे चल कर उन सब के समन्वय (Coordination) की ज़रूरत होगी.

आप भी ज़रूर कुछ कहना चाहते होंगे? ज़रूर कहिए. बल्कि बेहतर है कि लिख डालिए. शुभकामनाएँ.

02 August 2016

Deers of Chinua Achebe - चिनुआ अचीबी के हिरण


चिनुआ अचीबी ने कहा है - ''जब तक हिरन अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे तब तक हिरणों के इतिहास में शिकारियों की बहादुरी के किस्से गाए जाते रहेंगे''. : चिनुआ अचीबी (Chinua Achebe)

भारत में अभी तक पढ़ाया जा रहा इतिहास वही कड़ुवा सच है जिसकी बात चिनुआ अचीबी ने की है. कुछ देवताओं के नामों का गुनगान, कुछ पुराने ज़माने में हुए-अनहुए राजाओं की तारीफ़ या फिर उनकी लुभाने वाली और दिलचस्प बातों से इतिहास तो भरा हुआ है ही साथ ही साथ साहित्य में भी वो कहानियाँ-किस्से भर दिए गए हैं. इतिहास बताए जाने वाले उन पुराणों में जो लोग हारते हुए, मरते हुए या नरक जाते हुए दिखाए गए हैं वो वही लोग हैं जिनके वंश के लोग आज हिस्ट्री की क्लासों में बैठे हुए महसूस करते हैं कि उन्हें पढ़ाए जा रहे इतिहास में उनके पुरखों के बारे में तो कुछ है ही नहीं.

आज भारत का पढ़ा-लिखा लेकिन बिखरा हुआ वो वंचित समाज इस ओर ध्यान दे रहा है कि इतिहास कहे जाने वाले उन पुराने किस्सों और इतिहास में आम लोगों की बात तो है ही नहीं. हाथ से काम करने वाले मेहनतकश लोगों, मेहनती किसान-कमेरों और महिलाओं के सामाजिक हालात का बयान भी उसमें नहीं मिलता. ब्राह्मणों को खूब दान देने वाले राजाओँ-महाराजाओं की कहानियों में इतना ज़रूर कहा जाता है कि 'उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी'. ग़ैर-ब्राह्मण प्रजा की माली हालत कैसी थी उसकी किसी प्रकार की डिटेल अकसर वहाँ नहीं मिलती. 

चलिए सबसे पहले इतिहासकारों की प्यारी जगह मुअनजोदाड़ो की बात करते चलते हैं. मुअनजोदाड़ो की खुदाई में तलवारें, भाले या लड़ाई में काम आने वाले हथियार नहीं मिले हैं. ज़ाहिर है वहाँ के रहने वाले अमनपसंद थे. काफी कुछ हिरनों जैसे. बाहर से आए हथियारबंद हमलावरों यानि आर्यों के मुकाबले उनकी हालत बेबस लोगों जैसी थी जो आर्यों के हथियारों का मुकाबला करना नहीं जानते थे. जीतने के बाद उन हमलावरों ने लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया. गुलामों के साथ जो हिंसा और अत्याचार हुआ उसके बारे में शिकारी क्यों कुछ कहने लगे? शिकारियों ने अपनी बहादुरी के किस्से बनाए, अपने नियम-कायदे लागू किए, धर्म और नीति पर ग्रंथ लिखे और लिखवाए, 'सुर-असुर संग्राम' को मशहूर किया, धर्म-अधर्म और नीति-अनीति की अपनी बातों को मनवाया. जो वो ख़ुद करते थे उस पर अच्छाई का ठप्पा लगाया और जो उस सभ्यता के लोग करते थे उस पर बुराई का लेबल चिपका दिया. गुलाम बनाए गए लोगों पर किए गए ज़ुल्मों को उनके धार्मिक ग्रंथ अभी तक न्याय कहते हैं. धार्मिक किताबें लिखने वाला वो पुरोहित वर्ग उन लगभग निहत्थे हिरनों की बात नहीं करता जो गुलामों के रूप में उनके खूँखार हाथों में आ गया था. आज तक भारत की अधिकतर राजनीति और बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ उसी धार्मिक या कह लीजिए कि धार्मिक-राजनीतिक समझ को ले कर चल रही दिखती हैं. ये उस इतिहास की वही अक्ल है जो महिलाओं और मेहनतकशों की हालत सुधारने की बात आज भी नहीं करती. उसे तो बस धर्म और धर्म से जोड़ी गई चीज़ों के सहारे राजनीति करनी है. धर्म से उपजाया गया जातिवाद उसका बहुत बड़ा हथकंडा है.

उनके हथकंडों की झलक आपने पिछले दिनों सोशल और अन्य मीडिया पर देखी होगी. आपने देखा होगा कि जब आप अपना जीवन स्तर को सुधारने की बात करेंगे तो वो आपको सरहद पर खड़े आपके भाइयों की राष्ट्रभक्ति का आदर्श दिखाएगी और आपको चुनौती देगी कि बताओ - "असली राष्ट्रभक्त कौन है, वो फौजी, या आप?" आप बैंको से अपना पैसा निकलवाने के लिए लाइन में न लग कर, सारे सिविल कार्य छोड़ कर फौज में भर्ती होने के लिए लाइन में खड़े हो जाइए. चलेगा क्या? यदि आप उनके जुमलों की वजह से अपना आर्थिक-सामाजिक एजेंडा भूल जाएँगे तो यह आपकी कमज़ोरी है. आप अपना एजेंडा छोड़ने लगेंगे और अनजाने में उनकी गुलामी करने लगेंगे यानि उनके भक्त हो जाएँगे. इसके बाद आपको धर्म के नाम पर डराने का सिलसिला शुरू होगा. वे कहेंगे कि वो देखो आपको मुसलमानों और ईसाइयों से ख़तरा है. इसके बाद वो जातिवाद का हथकंडा अपनाएँगे. आपको बताने लगेंगे कि छुआछूत के लिए हिंदुत्व ज़िम्मेदार नहीं बल्कि इस्लाम ज़िम्मेदार है. लेकिन वो इस बात का जवाब नहीं दे पाते कि यदि जातपात मुग़लों ने फैलाई थी तो 'मनुस्मृति' क्या हज़रत मोहम्मद या हज़रत ईसा ने ने लिखी थी?

कुल मिला कर कह सकते हैं कि शिकारी अपने धर्म का एजेंडा कई प्रकार से आप पर थोपता है. आपको एक ऐसा हिरन बना कर रखना चाहता है जो शिकार के लायक हो. आपको अपना कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाने देता. आपको धर्म, जाति और दंगों में उलझाए रखता है. अब आप देखिए कि आपका एजेंडा क्या होना चाहिए, आपके परिवार के लिए रोज़गार, सेहत और चिकित्सा या कुछ और, ISIS या लग़ातार घटती आपकी ख़रीदने की ताक़त, गौ-माता है या महँगी होती शिक्षा या फिर हिंदुत्व या महँगी होती दवाइयाँ और डॉक्टर? जब आप उनके उनके बनाए हुए एजेंडा को अपना मानने लगेंगे तो आप अपना एजेंडा कैसे तय करेंगे?

हज़ार बातें छोड़ दीजिए, इस ज़ाहिर सच्चाई को समझ लीजिए कि आपकी माली (आर्थिक) हालत का भविष्य राजनीति और सत्ता में बैठे लोग लिखते हैं. डॉ. अंबेडकर का लिखा इतिहास जानिए. ख़ूब पढ़िए और ख़ुद भी लिखिए. इतना तो जान कर और मान कर चलिए कि हिरन वो होते हैं जिनका अपना कोई एजेंडा का हथियार नहीं होता. जो अपना एजेंडा ले कर चल पड़ते हैं वो हिरन नहीं रह जाते.