"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


09 September 2019

Aryan Invasion? - आर्यों का आक्रमण?

डीएनए रिपोर्टों ने अभी तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में कई जगह निशान लगा कर बताया है कि हुज़ूर यहाँ-यहाँ कुछ गड़बड़ है. 2018 में राखीगढ़ी में 4500 साल पुराने (हड़प्पा सभ्यता के समय के) नरकंकाल मिले. डीएनए रिपोर्ट आने से पहले ही तब मीडिया मालिक (पत्रकारों के अवतार में) अपने-अपने सिद्धांतों के साथ टूट पड़े. “ये हमीं है, यह हमारा है, वो सभ्यता हमारी थी, हमने उसे नष्ट नहीं किया था, हम सिंधुघाटी के ही हैं, हमीं ने उसे विकसित किया था, आर्य आक्रमण का सिद्धांत गलत है, अंग्रेज़ों ने हमारे इतिहास को गलत लिखा”. (यानि अंग्रेज़ों के जाने के 70 साल बाद आज तक पढ़ाए जा रहे इतिहास में यदि कुछ गलती है तो उसके ज़िम्मेदार अंग्रेज़ हैं, वग़ैरा).

अब सितंबर 2019 में उन कंकालों की डीएनए और अवशेषों  के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं तो मीडिया फिर उस पर झपट पड़ा कि इसमें यह मेरा है, तुम्हारा क्या है, हम तो पहले से ही कह रहे थे, तुम्हारा तो सिद्धांत ही गलत था, कोई आक्रमण नहीं हुआ बल्कि बाहरी लोग थोड़े-थोड़े करके आए थे, कुछ उधर से इधर आए और कुछ इधर से उधर गए (ऐसी कई बातें और उनसे जुड़े सवाल अपेक्षित थे इसलिए डीएनए रिपोर्ट अपनी सीमाएँ बता गई है और कई स्पष्टीकरण दे गई है) लेकिन सवाल मुख्यतः उस इतिहास पर उठाया जा रहा है जो बच्चों को बताता रहा है कि भारत के लोग असभ्य थे और उन्हें सभ्य बनाने के लिए आर्य लोग बाहर से यहाँ आए थे. डीएनए रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दक्षिण एशिया की किसानी यहाँ के स्थानीय लोगों ने ही शुरू की थी. उसका कोई संबंध ईरान या पश्चिम से नहीं है. यानि भारत प्रायद्वीप की सभ्यता यहाँ के स्थानीय बाशिंदों ने ही विकसित की थी.
फिर वो आर्यवर्त क्या चीज़ है? ऊपर उठा हाथ पूछ रहा है कि आर्य का तात्पर्य रेस (नस्ल) से है या श्रेष्ठ से है, यदि श्रेष्ठ से है तो श्रेष्ठता का सिद्धांत कहाँ से आया, किसने पढ़ाया? आज के भारत में जातीय श्रेष्ठता का औचित्य क्या है? उससे अधिक प्रखर सवाल यह हो सकता है कि जातीय श्रेष्ठता पर आधारित व्यवस्था क्यों है.

इसी संदर्भ में कुछ विद्वान यह बात दोहरा रहे हैं कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि आर्य बाहर से नहीं आए बल्कि वो यहीं के हैं. इस उद्धरण को भी मीडिया मालिक भुनाते फिर रहे हैं. प्रकारांतर से वे उस धारणा को झुठलाना चाहते हैं जो बहुत प्रचारित हो चुकी है कि ‘ब्राह्मण विदेशी’ है. इसी संदर्भ को दूसरे विद्वान कहते हैं कि अंग्रेज़ों के आने से पहले ही भारत के कुछ लोगों ने ख़ुद को बाकियों से श्रेष्ठ कहना शुरू किया था. "आर्य बाहर से नहीं आए" वाली बात को वे डॉ. आंबेडकर की राष्ट्रनिर्माण संबंधी अवधारणा से जोड़ कर देखते हैं और मानते हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग भारत के ही हैं. सभी को मिल कर एक राष्ट्र का निर्माण करना है और उसमें जातीय श्रेष्ठता वाली सोच को बाधा बन कर नहीं आना चाहिए.

फिलहाल संदर्भित रिपोर्ट यह स्थापित कर रही है कि पहले जो पढ़ाया जाता था कि प्राचीन विकसित सभ्यता का विकास बाहर से आए लोगों ने किया वो ग़लत है. वास्तव में वो विकास मूलनिवासियों ने किया था.

अब मेघों के लिए दो शब्द. 'मूलनिवासी' नाम के तहत जो मेघ पहले असहज महसूस कर रहे थे वे अब सहज हो कर बैठ सकते हैं. 

16 August 2019

भाषाशास्त्र में समाजशास्त्र की मिलावट है - Philology is adulterated with Sociology

कहते हैं कि माँ बोली (मातृभाषा) सबसे मीठी और प्यारी भाषा होती है. जब भाषाविज्ञान की कक्षाओं में पढ़ाया गया कि संस्कृत उत्तर भारत की सब भाषाओं की जननी है और बाकी सब भाषाएं भ्रष्ट (अपभ्रंश) भाषाएँ हैं तो अजीब-सा लगा था बल्कि तकलीफ हुई थी. पंजाबी को जिस वर्ग में रखा गया उस वर्ग का नाम ही ‘पैशाची’ रखा गया. कारण समझ में नहीं आता था कि देश भर की इतनी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई. क्या ‘संस्कृत से इतर’ भाषाएँ या ‘भारत में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाएँ’ कह कर नहीं पढ़ाया जा सकता था? वैदिक संस्कृत का भी विकास हुआ है. कालिदास आदि की उस विकसित संस्कृत को ‘अपभ्रंश संस्कृत’ कहने की युक्ति और उक्ति नहीं सूझी और न ही हिंदी साहित्य को ‘अपभ्रंश साहित्य’ कहा गया.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाषा विज्ञान में नई खोजों के सदके जानकारी में आया कि संस्कृत भारत की सब भाषाओं की तो क्या किसी एक अन्य भाषा की भी जननी नहीं है. प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा प्रमाणित हो चुकी है जिसकी बोलियों में पाली, मागधी आदि आती हैं. इस निष्कर्ष पर पहुँचाने वाले ऐतिहासिक और पुरातत्त्वशास्त्रीय (आर्कियॉलोजिकल) संदर्भ और प्रमाण उपलब्ध हैं.

भारत की अन्य भाषाओं के लिए पूर्ववर्ती भाषा विज्ञानियों ने हीनार्थक शब्दों का प्रयोग क्यों किया? कहीं उन शब्दों में सामाजिक संरचना में व्याप्त उच्चता-हीनता की भावना का कोई कोड (कूट) तो नहीं था या यह किन्हीं भाषाओं में शूद्रता स्थापित करने की युक्ति तो नहीं थी?

पिछले दिनों डॉ.राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ पढ़ी. भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब दे रहा है कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है. वास्तव में भाषाई स्थापनाओं (उदाहरण के लिए ‘अपभ्रंश भाषा’ जैसी स्थापना) के कुछ विकृत रूप इतने अधिक प्रचारित कर दिए गए हैं कि उनमें कुछ भी नया जोड़ना या उसमें सुधार की बात उठाना हो तो बहुत से तार्किक सबूतों की ज़रूरत होती है. इसकी भी जांच करनी होगी कि संस्कृत के नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र और महिला पात्र प्राकृत में और उच्च श्रेणी के पात्र संस्कृत में ही क्यों बात करते हैं. पात्रों के बीच भाषा की यह दूरी क्या संकेत करती है इसकी ईमानदार व्याख्या होनी चाहिए.

भाषा में निहित समाजशास्त्र को समाजशास्त्र के नज़रिए से ही परखना पड़ेगा कि वो ‘तत्सम’ और ‘तद्भव’ वाला मकड़जाल क्या है. कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘तद्भव’ शब्द ही वास्तव में ‘तत्सम’ हैं और उन्हें संस्कृत में अनूदित करके उनके संस्कृत रूप को ‘तत्सम’ बता दिया गया हो?

भारत में मुंडा भाषाओं का अपना एक परिवार है जिसमें लैंगिक नस्लवाद नहीं है यानि उनमें प्रत्येक शब्द का लिंग निर्धारण नहीं किया जाता. लेकिन संस्कृत और उसके संपर्क में आई भाषाओं में यह घुसा है. “ईंट या कंप्यूटर ऐसी चीजें नहीं है जिनकी पूँछ उठाकर उनका लिंग निर्धारण किया जाए कि यह शब्द पुलिंग है या स्त्रीलिंग.” 

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का यह स्पष्ट मत है कि ‘धातुओं का निर्णय शब्दों को मथने के बाद किया गया है. यानी धातु की खोज से पहले शब्द विद्यमान थे. इसलिए शब्दों की बनावट की व्याख्या करने वाला ‘धातु’ नामक तत्त्व प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है.’

समाजशास्त्रीय संदर्भों में संस्कृति और अतीत का गौरव उन लोगों के लिए आकर्षण का विषय हो सकता है जिनको व्यवस्था ने बहुत सुख सुविधाएं दे रखी थीं और दी हुई हैं. वंचित लोग किसी सांस्कृतिक गौरव को नहीं ढोते. वे तिरस्कार को ढोते रहे हैं.

जहाँ तक शब्द भंडार का सवाल है पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार और रंगकर्मी बलवंत गार्गी ने एक बार कॉफी पीते हुए मुझे कहा था कि ‘किसी गाँव में तरखाण (बढ़ई) के पास जाओ. वो बताएगा कि कौन-सी लकड़ी की किस गंध को क्या कहते हैं’. इससे ही अहसास हो जाता है कि बढ़ई के पास जो शब्द भंडार है वो संस्कृत और नागर संस्कृति वाली साहित्यिक भाषाओं में नज़र नहीं आता. दरअसल वो भाषाएँ श्रमसंस्कृति के शब्द भंडार के मुकाबले बहुत दरिद्र हैं. ज़रा दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और बताइए कि बढ़ई या तरखाण (कारपेंटर) को संस्कृत में क्या कहते होंगे?

संस्कृत की धारा से अलग विकसित भारत की मुख्य भाषाओं के लिए ‘अपभ्रंशता’ की हीन दृष्टि क्यों? मूल पंजाबी भाषा का पता पूछना हो तो वह साहित्यक पंजाबी में या पंजाबी व्याकरण की किताबों में नहीं मिलेगा. उसे बहुत ध्यानपूर्वक पंजाब के रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन में प्रयुक्त शब्दों और ध्वनियों में से चुन-चुन कर इकट्ठा करना पड़ेगा. इस विषय में कार्य करते हुए आप जल्दी ही जान जाएँगे कि पंजाबी संस्कृत और पर्शियन से प्रभावित तो हुई है (उनके कई शब्द यहाँ बस गए हैं) लेकिन पंजाबी का मूल स्वरूप प्राकृत और पाली भाषा वाला है. तुहाड्डा (तुम्हारा), थोड्डा (तुम्हारा) शब्द इसके उदाहरण हैं. पंजाबी में दुद्द (जिसे ‘दुद’ की तरह भी उच्चारित किया जाता है) बोलना पारंपरिक रूप से आसान है. दुग्ध नकली शब्द है लेकिन पढ़ाया यह गया कि दुग्ध से बिगड़ कर दुद्द हो गया है. संस्कृत के ‘दुग्ध निर्मित’ शब्द और ‘दुद्दों बण्या’ (दूध से बना) या ‘दुद्द तों बण्या’ (दूध से बना) शब्दों का विकास एक ही पटरी पर नहीं है. ‘दुग्ध निर्मित’ की पटरी अलग है. पंजाब की बोलियों के मूल में बैठे प्राकृत और पाली के शब्द ही ‘तत्सम’ हैं, इसमें संदेह कैसा?

(इस आलेख का प्रेरणा स्रोत डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र है.’ डॉ. सिंह का हृदय से आभार.)

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