"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


31 March 2014

A drop of History of Meghs - मेघ इतिहास की एक बूँद

(Frederic Drew की पुस्तक के पृष्ठ 55-57 तक का अनुवाद)

अंत में वे जातियाँ आती हैं जिन्हें हम अंग्रेज़ सामान्यतः हिंदुओं की 'निम्न जातियाँ' कहते हैं लेकिन ऐसा किसी हिंदू के मुँह से नहीं सुना जाता; उन्हें हिंदू के तौर पर कोई मान्यता नहीं दी जाती; उन्हें हिंदुओं में नीचा स्थान भी प्राप्त नहीं है. उनके नाम हैं मेघ और डूम और मेरा विचार है कि इनमें धियार नामक लोगों को भी शामिल करना चाहिए जिनका पेशा लोहा पिघलाना है और जिन्हें आमतौर पर उनके साथ ही वर्गीकृत किया जाता है.

ये कबीले आर्यों से पहले आने वाले कबीलों के वंशज हैं जो पहाड़ों पर रहने वाले थे जो हिंदुओं और आर्यों द्वारा देश पर कब्ज़ा करने के बाद दास बना लिए गए थे; आवश्यक नहीं था कि वे किसी एक व्यक्ति के ही दास हों, वे समुदाय के लिए निम्न (कमीन) और गंदगी का कार्य करते थे. उनकी स्थिति आज भी वैसी है. वे शहरों और गाँवों में सफाई का कार्य करते हैं*. (* मेरा विचार है कि धियारों का रोज़गार ऐसा कम है कि वे जातीय रूप से मेघों और डूमों से जुड़े हैं.) डूमों और मेघों की संख्या जम्मू में अधिक है और वे पूरे देश, जो निचली पहाड़ियों और उससे आगे की ऊँची पहाड़ियों, में बिखरे हैं. वे ईँट बनानें, चारकोल बर्निंग और झाड़ू-पोंछा जैसे रोज़गार से थोड़ी कमाई कर लेते हैं. इन्हें प्राधिकारियों द्वारा किसी भी समय ऐसे कार्य के लिए बुलाया जा सकता है जिसमें कोई अन्य हाथ नहीं लगाता.

केवल उनके द्वारा किए जाने वाले ऐसे श्रम की श्रेणी के कारण ही ऐसा है कि उन्हें एकदम अस्वच्छ गिना जाता है; वे जिस चीज़ को छूते हैं वह गंदी प्रदूषित हो जाती है; कोई हिंदू सपने में भी नहीं सोच सकता कि वह उनके द्वारा लाए गए ऐसे बर्तन से पानी पीएगा जिस बर्तन को एक सोंटी के किनारे पर लटका कर ही क्यों न लाया गया हो. जिस गलीचे पर अन्य बैठै हों वहाँ इन्हें कभी आने नहीं दिया जाता है. यदि संयोग से उन्हें कोई कागज़ देना हो तो हिंदू उस कागज़ को ज़मीन पर गिरा देगा और वहाँ से वह उसे ख़ुद ही उठाएगा; वह उन्हें उनके हाथ से नहीं लेगा.

मेघों और डूमों के शारीरिक गुण भी हैं जो उन्हें अन्य जातियों से अलग करते हैं. उनका रंग सामान्यतः अधिक साँवला होता है जबकि इन क्षेत्रों में उनका रंग हल्का गेहुँआ होता है, इनका रंग कभी इतना साँवला भी हो सकता है जितना दिल्ली से नीचे के भारतवासियों में है. मेरा विचार है कि आम तौर पर इनके अंग छोटे होते हैं और कद भी तनिक छोटा होता है. अन्य जातियों की अपेक्षा इनके चेहरे पर कम दाढ़ी होती है और डोगरों के मुकाबले इनका चेहरा-मोहरा काफी निम्न प्रकार का है, हालाँकि इसके अपवाद हैं जिसका कारण निस्संदेह रक्तमिश्रण है, क्योंकि दिलचस्प है कि अन्य के साधारण दैनिक जीवन से इनका अलगाव उस कभी-कभार के अंतर्संबंधों को नहीं रोकता जो अन्य जातियों को आत्मसात करता है.

डूमों के मुकाबले मेघों की स्थिति कुछ वैसी है जैसे हिंदुओं में ब्राह्मणों की, उन्हें न केवल थोड़ा ऊँचा माना जाता है बल्कि उन्हें कुछ विशेष आदर के साथ देखा जाता है.

जम्मू-कश्मीर के महाराजा (गुलाब सिंह) ने इन निम्न जातियों की स्थिति में सुधार के लिए कार्य किया और सैंकड़ों लोगों को सिपाही के तौर पर खुदाई और खनन कार्य के लिए भर्ती किया. इन्होंने कुछ नाम कमाया है, वास्तव में युद्ध के समय ऐसा व्यवहार किया है कि उन्हें सम्मान मिला है, उच्चतर जातियों के समान ही अपने साहस का परिचय दिया है और सहनशक्ति में तो उनसे आगे निकले हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि डूगर के अधिसंख्य लोग हिंदू हैं जिनमें पुराने कबीलों के भी लोग हैं. वे किस धर्म से संबंधित हैं यह नहीं कहा जा सकता........

(From 'The Jummoo and Kashmir Territories, A Geographical Account' by Frederic Drew, 1875)










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https://archive.org/stream/jummooandkashmi00drewgoog#page/n308/mode/1up

28 March 2014

Ravish Kumar (NDTV) shows political picture of Megh/Bhagat/Ravidasia - रवीश कुमार (एनडीटीवी) ने दिखाई मेघ/भगत/रविदासियों की राजनीतिक तस्वीर

NDTV ने जालंधर के भगतों की एक बड़ी साफ राजनीतिक तस्वीर दी है जिसे रवीश कुमार ने दिखाया है. लीजिए नीचे लिंक हाजिर है. क्लिक कीजिए,  देखिए, समझिए और सोचिए.



आपकी सहूलियत के लिए रवीश की प्रारंभिक टिप्पणी को मैंने लिपिबद्ध करके नीचे दिया है:-.

"नमस्कार मैं रवीश कुमार (साथ में एनडी टीवी की सहयोगी रिपोर्टर सर्वप्रिया सांगवान), हिंदुस्तान में सबसे ज़्यादा दलित पंजाब में रहते हैं और पंजाब में गरीबी रेखा से नीचे के जो लोग हैं उनमें से भी सबसे ज़्यादा दलित हैं. लेकिन इसके बावजूद एक तबका दलितों में ऐसा है जो ठीक-ठाक से बेहद के स्केल पर आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ है. लेकिन अगर आप उत्तर प्रदेश से तुलना करेंगी तो उसकी तुलना में पंजाब के दलितों ने राजनीति में अपना वर्चस्व कायम नहीं किया है और उसके अनेक कारण रहे होंगे कि क्यों नहीं किया है. मगर एक कमी यह रह जाती है कि हम अकसर अपनी चुनावी रिपोर्टिंग में जो रिज़र्व सीट है उसके भीतर की विविधता और अंतर्विरोध को बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं देते हैं क्योंकि उन सीटों पर कोई अरविंद केजरीवाल या नरेंद्र मोदी या मुलायम सिंह यादव इस स्तर के नेता नहीं होते हैं और इसका नतीजा यह होता है कि वो सिर्फ गिन लिए जाते हैं कि लोकसभा की 70 से 80 सीटें हैं और उनमें जा कर यह जीतेगी या इस पार्टी ने यह उम्मीदवार दिया है. पंजाब में दलित राजनीति की कामयाबी और उसकी नाकामी दोनों को समझना हो तो जालंधर सबसे अच्छा सेंटर है. यह उसके पूरे संकट को बताता है कि किस तरह से यहाँ का जो दलित है उसको पार्टियों ने रविदासिए समाज में, वाल्मीकि समाज में और बरार समाज में और कबीरपंथी जो अपने आप को भगत कहते हैं उन तमाम तरह के समाजों में बाँट दिया है.

दलित चेतना यहाँ पर अलग-अलग सामुदायिक-सांप्रदायिक चेतना में बँटी हुई है. दलितों का कोई एक नेतृत्व नहीं है खासकर जब यह अहसास हुआ है कि हमें हिस्सेदारी नहीं मिली, हमारा भी दो लाख वोट है दलितों के भीतर और सिर्फ रविदासियों को मिलता है टिकट, तो उसी से चुनौती मिल रही है. उसने पंजाब की दलित राजनीति को ज़्यादा इंटरेस्टिंग बना दिया है."

इसी ब्लॉग से अन्य लिंक-
मेघों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा


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