"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


02 November 2020

Use of Social Media - सोशल मीडिया का उपयोग

बहुत से लोगों को याद होगा कि कई वर्ष पहले भगत महासभा ने जालंधर से सोशल मीडिया पर एसएमएस के ज़रिए मेघ समुदाय के बारे में छोटी-मोटी जानकारियाँ भेजने का सिलसिला शुरू किया था. मेघ समुदाय के किसी भी सामाजिक संगठन की सोशल मीडिया पर यह एक पहलकदमी थी. कई लोगों के लिए यह चौंकाने वाला कार्य था और कुछ कारणों से कुछ के लिए चिढ़ाने वाला कार्य. लेकिन इस संस्था ने अपने नाम का बहुत विज्ञापन किया. विज्ञापन शब्द को हमें भूलना नहीं चाहिए. इस बीच उन्होंने अपने संगठनात्मक ढाँचे के साथ प्रयोग किए. जम्मू में उनकी उपस्थिति काफी ताकत के साथ दर्ज हुई. लेकिन जैसा कि होता रहता है उसके बाद संगठन से लोग जुड़े और टूटे भी. लोगों ने उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रम विभिन्न शहरों में देखे हैं. कुछ कार्यक्रम मैंने भी देखे हैं.

मैं यहाँ सोशल मीडिया की बात को रेखांकित कर रहा हूँ. इन दिनों कोरोना काल या वायरस युग चल रहा है. इसमें सामाजिक संगठनों की गतिविधियाँ तो छोड़िए शादी-ब्याह, यहाँ तक कि राजनीतिक जलसे-जुलूस तक घरों में छिप गए. बड़े राजनीतिक संगठन, जिनके पास व्यापक मीडिया था वे अपनी बात लोगों तक पहुँचा पा रहे थे. प्रकाशित अख़बारों को नुकसान उठाना पड़ा. सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए लोगों की निर्भरता टीवी, कंप्यूटर-स्मार्ट फोन यानि फेसबुक, व्हाट्सएप, युट्यूब वगैरा पर बढ़ गई.

यह बात ध्यान खींचती है कि इन दिनों भगत महासभा (रजि.) ने भगत नेटवर्क के नाम से सोशल मीडिया पर ख़ुद को विस्तारित किया. उन्होंने कुछ राज्यों में जिला स्तर तक अपने पदाधिकारी या अपने लिंक स्थापित किए, प्रभावी आवाज़ की धनी एक युवा छात्रा नेहा भगत को अपना ब्रांड एंबेसडर भी नियुक्त किया जिसके माध्यम से संदेश दिए गए. यह विज्ञापन का असरदार तरीका है. जानकारी से भरे ऐसे धारा प्रवाह बोलने वाले बहुत से युवाओं-युवतियों की मेघ समाज को ज़रूरत है.

कहने का तात्पर्य है कि सोशल मीडिया किसी भी संगठन को एक बहुत बड़ा रोड मैप देता है. सोशल मीडिया का ऐसा इस्तेमाल अन्य मेघ संगठनों को भी करना चाहिए.

29 October 2020

Madra, Megh and Jhelam - मद्र, मेघ और झेलम

 मद्रों, मेघों के संदर्भ में कई जगह ‘वितस्ता’ का उल्लेख पढ़ा है जिसे कई जगह वैदिक काल की ‘झेलम’ नदी या झेलम का वैदिक कालीन नाम बताया गया है. इस 'झेलम' शब्द की उच्चारण ध्वनि इतनी सख़्त है कि संदर्भित क्षेत्र में उसकी लोक प्रयुक्ति का काल लंबा नहीं हो सकता. इसकी उच्चारित ध्वनि लोक-भाषा में 'जेह्लम' जैसी है. वितस्ता जैसे कई नाम नकली प्रतीत होते हैं. मुझे लगता है कि इन नामों के मूल स्वरूप की खोज प्राकृत और पाली भाषाओं की मदद से की जानी चाहिए जिससे कई अन्य शब्दों (मद्र, मेदे, मीडी आदि) की यात्रा को ट्रैक करने में मदद मिलेगी. जहाँ कहीं भी लिखा हो कि यह ‘वैदिक काल’ का है तो उससे यह संकेत अवश्य लेना चाहिए कि उस शब्द का संस्कृत में परिवर्तित रूप ऐसा भी हो सकता है जिसका मूल ध्वनि से शायद कोई संबंध ही न रह जाए. 'जेह्लम' और 'वितस्ता' में उच्चारित ध्वनियों में कोई समानता कोई भाषा-विज्ञान स्थापित नहीं कर सकता जब तक कि किसी दूरस्थ क्षेत्र की ध्वनि का आक्षेप उसमें न दिख जाए.

यह भी देखेंः  मेदे, मद्र, मेग, मेघ