"इतिहास - दृष्टि बदल चुकी है...इसलिए इतिहास भी बदल रहा है...दृश्य बदल रहे हैं ....स्वागत कीजिए ...जो नहीं दिख रहा था...वो दिखने लगा है...भारी उथल - पुथल है...मानों इतिहास में भूकंप आ गया हो...धूल के आवरण हट रहे हैं...स्वर्णिम इतिहास सामने आ रहा है...इतिहास की दबी - कुचली जनता अपना स्वर्णिम इतिहास पाकर गौरवान्वित है। इतिहास के इस नए नज़रिए को बधाई!" - डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह


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07 May 2017

Megh and Aryasamaj - मेघ और आर्यसमाज

मेघ होने के नाते ख़ुद को सियालकोट और आर्यसमाज के नाम से प्रभावित महसूस करता रहा हूँ. पिता जी ने मुझे मेघों के उत्थान में आर्यसमाज की भूमिका के बारे में बताया था. तब पिता जी से अधिक सवाल करने की आदत नहीं थी. आज वे होते तो उन्हें कुछ सवालों का जवाब देना पड़ता.

कई मेघों को कहते सुना है कि मेघ मूलतः ब्राह्मण हैं. उनके रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों से मिलते-जुलते हैं. वो कैसे मिलते-जुलते हैं मुझे पता नहीं. आर्यसमाज में प्रवेश मिलने से पहले उनके कौन से रीति-रिवाज़ ब्राह्मणों जैसे थे यह बात बहस का विषय हो सकती है. यहाँ एक मुख्य उदाहरण मेघों की देरियों का दे सकता हूँ जो मेघ-सभ्यता का रेखांकित उदाहरण है और उनके ब्राह्मणीकल मूल को झुठलाता जाता है.

लेकिन तर्क के तौर पर यदि श्री भीमसेन विद्यालंकार द्वारा लिखित “आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास” नामक पुस्तक से संदर्भ लिया जाए तो एक बात-जैसी-बात निकलती दिखती है. उसमें उल्लेख है कि आर्यसमाज ने "मेघ और उनकी शुद्धि " नामक पुस्तक सन् 1936 में प्रकाशित की थी जिसमें मेघों को ब्राह्मण घोषित किया गया था. इस पुस्तक में उल्लेख है कि भक्त पूर्ण के सुपुत्र श्री रामचंद्र मेघ जाति से प्रथम स्नातक (ग्रेजुएट) हुए. उन्हें सियालकोट आर्यसमाज ने गुरुकुल में शिक्षा दिलाई. पुस्तक के पृष्ठ 172 पर दर्ज किया गया है कि सन् '1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया. उस समय इन मेघों का ‘हिंदुओं के साथ’ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था.' ज़ाहिर है कि आर्यसमाज का ‘समाज’ ने विरोध किया. यह समझने की ज़रूरत है कि आर्यसमाज का किस समाज ने विरोध किया लेकिन आर्यसमाज ने मेघों को ‘शुद्ध’ करने का विचार किया यह बड़ी बात है. सन् 1903 में आर्यसमाज के वार्षिक उत्सव पर 'मेघ बिरादरी के चौधरियों को एकत्रित करके' उनका शुद्धिकरण किया गया.

उन्हीं दिनों या उसके आसपास - “लाला गणेशदास ने ‘मेघ और उनकी शुद्धि’ नाम का ट्रैकट (ट्रैक्ट के हिंदी/अंग्रेज़ी पर्यायवाची शब्द हैं - निबंध, Dissertation, treatise, thesis, tractate, system, method, mode, channel, manner.) प्रकाशित किया और मेघ जाति को ब्राह्मण जाहिर करके उनके पतन के कारण लिखे और उनकी शुद्धि शास्त्रोक्त करार दी.” - यह बात ध्यान खींचती है. यह आलेख सुरक्षित रखा गया है तो मुझे हैरानगी होगी और यदि वह उपलब्ध हो तो वह संदर्भ देने योग्य ज़रूर होगा क्योंकि आज भी बहुत से मेघ मानते हैं कि वे ब्राह्मण हैं या फिर ब्राह्मणों से निकले या फिर निकाले हुए हैं. वो ट्रैक्ट मेघों की स्थिति को दूर तक स्पष्ट कर देगा. वहीं एक और वाक्य लिखा है कि - “सन् 1901 में पहली बार ‘आर्य-भक्त’ भाइयों ने समाज में आना आरंभ किया.” ‘आर्य-भक्त’ शब्द कई अर्थ देता है. आर्य एक रेस (वंश) है और रेस मानव-विज्ञान का एक ऐसा घटक है जो अपरिवर्तनशील है जिसमें डीएनए स्थिर खड़ा है. आर्यों (ब्राह्मणों) का वंश कभी नहीं बदला यह सामाजिक तथ्य है. ब्राह्मणों की जाति बदली है ऐसा सुना है लेकिन जब तक वो जाति समूह ख़ुद इसे स्वीकार न करे तब तक उसे उदाहरण के रूप में नहीं रखा जा सकता.  दूसरा शब्द ‘भक्त’ है. कहा जाता है कि इसी शब्द को ‘भगत’ के रूप में मेघों ने अपनाया. लेकिन इससे भी समस्या का समाधान नहीं होता. ‘आर्य-भक्त’ शब्द को समास पद्धति से लिखा गया है जिसका एक अर्थ है ‘आर्यों का भक्त’. जैसे ‘राम-भक्त’ शब्द है. अब ‘भक्त’ शब्द की परिभाषा करें तो यह भारत की गुलामी-प्रथा तक खिंचने की क्षमता रखता है. ‘भक्त’ उसे कहा जाता रहा है जो अपने समाज से टूट कर आर्यों के पाले में चला गया जैसे विष्णु-भक्त प्रह्लाद, राम-भक्त विभीषण, भक्त हनुमान आदि. संस्कृत में ‘भक्त’ शब्द की धातु ‘भज्’ इसी ओर संकेत करती है.   

उक्त संदर्भ में आई यह बात भी ध्यान खींचती है कि - “मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर संध्या-हवन करना आश्चर्यजनक था.” आखिर वो आश्चर्यजनक क्यों था? एक नज़रिए से ऐसा कहना उस पुरानी बहस की ओर इशारा करता है कि क्या मेघ हिंदू थे? कल नहीं थे तो आज कैसे? मेघ समाज में इस पर (ख़ास कर सोशल मीडिया पर) बहस होती रहती है. बहस होना एक अच्छा संकेत है.

अंत में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर का उक्त प्रकाशन के लिए आभार और ताराराम जी का आभार जिन्होंने उक्त प्रकाशन के संदर्भित पृष्ठों की फोटो भेजी है.

'भक्त' शब्द की एक व्याख्या. संदर्भ है जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'भारत की खोज' (Discovery of India) :-

08 July 2019

Your narrative and your theme - आपका कथ्य और आपकी कथा

कुछ जगह ‘मेघ-इतिहास Megh History’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है. उसका आशय ‘मेघों का इतिहास’ रहा होगा ऐसा मैं मानता हूँ. ‘मेघ-इतिहास’ का दूसरा अर्थ ‘बड़ा इतिहास’ हो सकता है. यहाँ ‘‘आर्य-भक्त’’ या ‘आर्यों का भक्त’ वाली प्रयुक्ति याद हो आती है. यह समास पद्धति का कमाल है. इन शब्दों के बारे में यह किसी वैयाकरणिक (ग्रामेरियन) का नेरेटिव है. इस बारे में आपके मन में जो चल रहा है यदि उसे आप लिख देते हैं तो वो आपका नेरेटिव होगा. शब्द का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके विभिन्न प्रयोगों की कथा में उसका अर्थ क्या-क्या रहा है. शब्द का वो यात्रा वृत्तांत या ‘कथा’ किसी भाषाविज्ञानी का ‘नेरेटिव’ है. इस बारे में हर व्यक्ति का नेरेटिव अलग हो सकता है. यह तो बात हुई दो-तीन शब्दों के ‘नेरेटिव’ की. इसके आगे अब दूसरी कथा है.

पंजाब में 'आप' पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी डॉ. शिवदयाल माली ने गढ़ा, जालंधर की आर्य-समाज में सेमिनार का आयोजन किया था जिसमें अपनी बात रखने का मुझे भी मौका मिला. मेरा विषय था- ‘मेघों का पीछोकड़ (अतीत, इतिहास)’. इस विषय पर कहने के लिए काफी कुछ था लेकिन समय की पाबंदी थी, मैंने बात को सीमित रखा. ख़ासकर आर्य-समाज के साहित्य में मेघों के उल्लेख पर मैंने अपनी बात रखी.

मेघों में कहीं-कहीं एक अवधारणा बनी हुई है कि उनके इतिहास का उदय ‘आर्य-समाज’ के शुद्धिकरण आंदोलन के साथ होता है. इसकी वजह है. मेघों की शिक्षा का पहला प्रबंध ‘आर्य-समाज’ संस्था ने किया था जिसके साथ-साथ ‘आर्य-समाज’ ने उन्हें यह भी बताया-पढ़ाया कि मेघों का उद्धार ‘आर्य-समाज’ ने कैसे किया और उसके साथ कौन-सी सामाजिक और धार्मिक कड़ियां जुड़ती थीं. राजनीतिक कड़ियां तो थी ही नहीं और अगर थीं तो वे सवर्ण समाज से जुड़ी  थीं. आशय यह कि जो इतिहास मेघों को पढ़ाया गया वो उतना ही था जितना ‘आर्य-समाज’ ने अपने मिशन को गौरवान्वित करने के लिए लिखा और बताया. लेकिन दूसरी ओर ऐसे इतिहासकार भी हो चुके थे जिन्होंने मेघ (रेस) के ऐसे संदर्भ अपनी पुस्तकों में दिए थे जिनसे मेघों की उपस्थिति दो-अढाई हज़ार वर्ष पहले के इतिहास में नज़र आती थी. मेघों के बारे में आर्य-समाजियों का नेरेटिव अधिकतर ‘शुद्धीकरण’ की संकरी गली में आता-जाता रहा. उससे बाहर के मेघों की बात नहीं हुई. ‘सिंह सभा आंदोलन’ से जुड़ कर जो मेघ सिख बने ‘आर्य-समाज’ के नेरेटिव ने उनसे दूरी बनाए रखी.

‘आर्य-समाज’ द्वारा पढ़ाए गए इतिहास की परंपरा को बढ़ाते हुए मैंने प्रो. कस्तूरी लाल सोत्रा को देखा-सुना-पढ़ा है उनके अलावा कुछ अन्य बुजुर्ग भी इसी कथा के पक्षधर होंगे. इस बारे में मेरी रुचि रहेगी कि क्या उनमें से किसी ने कुछ लिखा भी है. सोत्रा जी ने यहां-वहां कुछ लिखा है. आजकल वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं.

मेघों के लोक-गायक रांझाराम के बारे में कहा जाता है कि वे ‘मेघों की कथा’ सुनाते थे और उस कथा को सिकंदर (Alexander The Great) से जोड़ते थे. कलाकार का अपना थीम होता है जिसे वो अपनी कथा में बताता है. रांझाराम क्या कथा कहते थे उसका कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. तो इस तान को यहीं तोड़ते हैं कि संभव है रांझाराम ने सिकंदर और पोरस (पुरु) की वे कथाएं जानी-सुनी हों जो हमें अन्य स्रोतों से अब मिली हैं. यहाँ जान लेना अच्छा होगा कि पोरस का पुरु के रूप में जो महाभारतीकरण और पौराणीकरण हुआ है वो एक अलग ही कथा है. किसी के लिए वो रोचक हो सकती है.

मेघों के बारे में एक कथा श्री आर.एल. गोत्रा जी की है जिसे उन्होंने दो शीर्षकों से लिखा है ‘Meghs of India’ और ‘Pre-historic Meghs’. इनमें वैदिक और ऐतिहासिक दोनों प्रकार के संदर्भ हैं. गोत्रा जी ने कई जगह स्पष्ट कर दिया है कि इतिहासिक संदर्भ अपनी पृष्ठभूमि के साथ अधिक उपयोगी होते हैं. पौराणिक संदर्भ बात को उलझा देते हैं ('पुराण' शब्द धोखेदार है. कुछ पुराण अंग्रेज़ों के शासन काल में लिखे गए. हो सकता है कुछ पुराण आज लिखे जा रहे हों. मतलब कि ज़रूरी नहीं कि पुराण बहुत पुराने हों). यदि अपने बारे में किसी ने खुद अपनी कही हो तो उसका अलग ही महत्व होता है. आपको और आपकी पृष्ठभूमि को आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. अपने बारे में अपना इमानदार लेखन आपका इतिवृत्त (इतिहास) होता है. आपके बारे में अन्य का लेखन उनकी आपके बारे में कम जानकारी के कारण पूर्वग्रह (prejudice) और पूर्वाग्रह (bias) से ग्रस्त और अधूरी समझ वाला हो सकता है. इस सब का परिणाम आपके बारे में एक ऐसी छवि का निर्माण हो सकता है जो आपका सत्य ना हो.

पिछले दिनों कर्नल तिलकराज जी ने बताया था कि किसी ने भार्गव कैंप (जिसे मैं कभी-कभी अनधिकारिक रूप से ‘मेघनगर’ कह देता हूं) में रहने वाले लोगों के बारे में किसी ने कहा है यहाँ रहने वाले लोग बहुत ‘सहनशील’ हैं. मैंने ख़ुद कहीं लिखा है कि ‘मेघ समाज कमोबेश एक संतुष्ट समाज है’. मेरे वैसा कहने के पीछे मेघ समाज के व्यापक जीवन के कई संदर्भ समेटने की एक कोशिश थी अन्यथा पूरा समाज संतुष्ट कैसे हो सकता है. लेकिन ‘सहनशील’ शब्द से मेरा माथा ठनका. इसे ठनकने की आदत है. कोई पूरा समुदाय ‘सहनशील’ कैसे हो सकता है? यह किसकी कथा है? है तो ऐसी क्यों है? मेघ समाज क्या समाज के रूप में कभी प्रतिक्रिया नहीं करता? क्या मेघों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि उनकी सहनशीलता (बरदाश्त) की ताकत जवाब दे गई हो?

‘सहनशील’ शब्द बहुत मुलायम, नाज़ुक और सौम्य अभिव्यक्ति है जिसमें किसी की शिक्षा, ग़रीबी, मूलभूत संसाधनों की कमी आदि से उठे क्रंदन को छिपाया जा सकता है. फिर भी लिखने वाले की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए. लेकिन जो लिखा गया है उसका व्यापक अध्ययन करके अपना नेरेटिव बताया जाना चाहिए.

कबीरपंथ के बैकड्रॉप में मेघों के बारे में डॉ. ध्यान सिंह का पीएचडी की डिग्री के लिए लिखा शोध-ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण है. यह मेघों से संबंधित कई कथाओं को ख़ुद में समेटे हुए है. प्रत्यक्षतः यह सबसे पहले डॉ. सिंह का है लेकिन मुख्य रूप से डॉ. सेवा सिंह का है जो शोध के कार्य में ध्यान सिंह जी के गाईड थे. ज़रूरी नहीं कि इसमें जो जिस तरह से लिखा गया है वो डॉ. ध्यान सिंह का ही हो. इसमें सेवा सिंह जी का नेरेटिव शामिल है. ग़ौर से देखें तो शोधकर्ता और गाईड में यदि मतभेद हो तो अधिकतर मामलों में शोधकर्ता को गाईड के आगे नतमस्तक होना पड़ता है. ख़ैर. इस शोधग्रंथ में पौराणिक कथाओं, आर्य-समाज आंदोलन, सिंह सभा आंदोलन, कबीरपंथी आंदोलन आदि के नेरेटिव से काफ़ी कुछ शामिल किया गया है. शोधग्रंथ के लिए प्रयुक्त पुस्तकों की सूची अकसर बहुत लंबी होती है तो यह मान कर चलना चाहिए कि उसमें अनेक नेरेटिव शामिल किए गए हैं. लेकिन सबसे रुचिकर यह है कि मेघों पर किए गए शोध का शीर्षक ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ ही क्यों रखा गया. क्या मेघों की कथा का संबंध कबीरपंथ से है? है तो कितना है और कब से है? उसका एक स्पष्टीकरण तो इस तथ्य में मिल जाता है कि जब यह शोध हुआ (सन् 2008 में प्रस्तुत) तब तक कई जगह मेघों ने ख़ुद को जनगणना के आंकड़ों में ‘कबीरपंथी’ भी लिखवाया हुआ था. मेघ समाज के अपने कबीर मंदिर थे और कबीर साहब की पूजा का प्रचलन था. कहने का तात्पर्य यह कि ‘कबीरपंथ’ नाम का सामाजिक आंदोलन मेघ समाज में दस्तक दे चुका था. उसके रूप-स्वरूप पर अलग से बहस हो सकती है. साथ ही एक बात का नोटिस लिया जाना चाहिए कि मेघ समाज के शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की कथा को छोड़ दें तो मेघों के जीवन और व्यवसाय में हुई उन्नति और नए व्यवसायों में उनकी कुशलता और प्रोफेशनल स्किल के बारे में दर्ज की गई पहली सकारात्मक टिप्पणियाँ भी डॉ. सिंह के शोधग्रंथ में आई हैं. मेघों की लोक-परंपराओं का पहला लेखा-जोखा इसी शोधग्रंथ में मिलता है. इसके अलावा याद रहना चाहिए कि लेखक का कोई भी कार्य अंतिम नहीं होता. आशा करनी चाहिए कि आगे चल कर डॉ. ध्यान सिंह वो नरेटिव लिखेंगे जो उनका ख़ुद का होगा जिसे वो साधिकार लिखना चाहेंगे.

जागते रहिए. अपना नेरेटिव अपनी कथा ख़ुद, मतलब 'ख़ुद' लिखिए. अपना कथ्य (थीम) ख़ुद तय कीजिए और दर्ज कीजिए. भोजपुरी में जीने का आशीर्वाद यों दिया जाता है- "जिअऽजागऽ". जिओ और जागते हुए जिओ.
अपने बारे में बोलिए और लिखिए.



19 May 2017

Megh Civility - मेघ सभ्यता



हमारा जो भी इतिहास मिलता है वो हमने नहीं लिखा दूसरों ने लिखा और वो जो लिखना चाहते थे वो उन्होंने अपने आत्मगौरव (self pride) के लिए लिखा और उसे अपने हक़ में भुनाने के लिए लिखा. इसीलिए क्लासरूम में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में हमें अपना कुछ नहीं मिलता. मेघ जाति सदियों तक शिक्षा से वंचित रही. अपना अतीत पूछती रही. दूसरों ने जितना बताया उतना मानती रही. शिक्षित होने के साथ मेघों को नई जानकारियाँ मिलने लगी है. वैज्ञानिक सोच आने लगी है.

मेघों को यदि मानवजाति विज्ञान (Ethnology) के अनुसार देखना हो और मूलनिवासी की कसौटी पर कसना हो तो ऐसे उल्लेख मिल जाते हैं जो प्रमाणित करते हैं कि मेघों ने आर्यों से पहले आकर सिंधु दरिया के आसपास अपनी बस्तियाँ बसाईँ. मेघों को कोलारियन ग्रुप का कहा गया है जो सेंट्रल एशिया से इस क्षेत्र में आ कर बसा था. जो समूह सबसे पहले आ कर बसा उसे ईरान में तूरानियन (तूरान नामक स्थान के लोग) कहा गया है. वो तूरानियन ग्रुप मंगोलॉयड था. यह ग्रुप ईरान की ओर से हो कर नहीं आया. 'तूरानियन' को संस्कृत में किरात कहा गया. दूसरा कोलारियन मंगोलॉयड ग्रुप असम की ओर से भारत में आया और उसका संपर्क द्रविड़ियन रेस से हुआ. उस ग्रुप को संस्कृत में निषाद कहा गया. जो उत्तर-पश्चिम में कोलारियन ग्रुप बसा वो आर्यों और मुग़लों के संपर्क में आया. इस कोलारियन ग्रुप के लोगों का रंग आमतौर पर गेहुँआ होता है. लेकिन इनमें बहुत गोरे और काफी साँवले रंग के लोग भी पाए जाते हैं. यह रक्तमिश्रण की कहानी है जो पूरे विश्व में एक फिनॉमिना है. लेकिन कोलारियन एक ऐसा सांस्कृतिक ग्रुप है जिसकी अपनी एक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था थी.


मेघों का आर्यसमाज में आना-जाना हुआ तो उन्होंने वेदों का गुणगान सुना और माना. धर्म में वेदों-पुराणों की इतनी महिमा गाई गई कि हम आदतन अपना पिछोकड़ (इतिहास) वहीं ढूँढने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक बात को समझने की ज़रूरत है कि आर्य ब्राह्मणों ने जो साहित्य लिखा वो अपने आत्मगौरव के लिए लिखा है. उसमें दूसरों की जगह कम है. यह बात भी समझ लेनी ज़रूरी है कि यदि वेदों-पुराणों में इतिहास ढूँढने की बात करनी हो तो पहले यह निर्धारित करना ज़रूरी है कि वेद लिखे कब गए थे. अब भाषाविज्ञानी इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि संस्कृत भारत की सब से पुरानी भाषा नहीं है. दूसरे यह भी जानना पड़ेगा कि वेदों में नायक कौन है और खलनायक कौन है. वेदों में इंद्र आर्यों का हीरो है. उसके विरोध में जो लोग खड़े हैं वे असुर और राक्षस हैं जिन्हें आजकल मूलनिवासी कहा जाता है. मूलनिवासियों को वैदिक और पौराणिक कथाओं में निहायत गंदे तरीके से दिखाया गया. वे मूलनिवासी लोग यूरेशिया की ओर से आए आक्रमणकारी आर्यों से अपने दरियाओं के पानी, जंगलों और ज़मीन की हिफाज़त कर रहे थे. वे नए दुश्मन का सामना कर रहे थे जो बहुत बर्बर था. कहते हैं कि लगभग 500-600 वर्ष तक चले युद्धों के बाद वे आर्य यहाँ के दरियाओं और उसके आसपास की ज़मीन पर कब्ज़ा जमाने में कामयाब हो गए और हारे हुए लोगों को उन्होंने गुलाम बना लिया जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था. उस जीत का बखान और अपना गौरवगान आर्यों ने वेदों और उसके बाद लिखे अपने ग्रंथों में दर्ज किया. हारे हुए लोगों में मेघवंशी भी थे. वेदों में बताई गई उन कथाओं की पड़ताल करके हमारे अपने समाज के श्री आर.एल. गोत्रा ने एक लंबा आर्टिकल ‘Meghs of India’ शीर्षक से लिखा जिसकी तारीफ़ ताराराम जी भी करते हैं जिन्होंने ‘मेघवंश : इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लिखी है.


Meghs of India में किया गया अध्ययन बताता है कि आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र के लोग एक ‘वृत्र’ नाम के पुरोहित नरेश के अनुगामी थे या उसके प्रभाव-क्षेत्र में बसे थे. काबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका प्रभाव था. ऋग्वेद में उसे प्रथम मेघ, अहिमेघ भी कहा गया है. बहुत से मेघवंशी वृत्र को अपना वंशकर्ता मानते हैं. एक जाट नेता मनोज दूहन ने भी कहीं लिखा था कि वृत्र उनका वंशकर्ता है. क्योंकि वृत्र को अहि यानि नागमेघ भी कहा गया इससे पता चलता है कि मेघवंशियों और नागवंशियों का कभी निकट संबंध रहा होगा.


मेघऋषि को लेकर एक समस्या सोशल मीडिया पर उभरी है. लोगों में मेघवंश और मेघवंशी जातियों को लेकर शंकाएँ हैं. हो सकता है यह समस्या नहीं होती अगर हिंदू व्यवस्था के तहत जातियाँ न होतीं. लेकिन हिंदू व्यवस्था (वास्तव में ब्राह्मणीकल व्यवस्था) के लागू होने के कारण वंश या रेस का कई जातियों में बँटवारा हुआ. आज मेघवंश के तहत आने वाली मेघवाल, मेघवार, मेघ आदि जातियाँ निश्चित रूप से जाति के रूप में अलग-अलग हैं. नागवंशी जातियों की भी काफी बड़ी संख्या है.


दूसरी समस्या मेघऋषि की पूजा और उसके नाम पर हाल ही में स्थापित मंदिर हैं. जो लोग सनातनी परंपरा से प्रभावित हैं वे मेघऋषि को पूज्य देव के रूप में स्थापित रहे हैं. अन्य विचारधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे. इस समस्या का समाधान नहीं सुझाया जा सकता. भारतीय संविधान से मशविरा करना पड़ेगा.


इतिहास में लिखे 'अंधकार युग' (dark period या dark ages) के बारे में पढ़ें तो पता चलता है कि आधुनिक इतिहासकारों के.पी. जायसवाल, नवल वियोगी, एस.एन. रॉय-शास्त्री ने ऐसे राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन किया है जिनके नाम के साथ ‘मेघ’ शब्द सरनेम की तरह लगाया जाता था. ‘मेघ’ सरनेम वाले जो राजा थे उनसे पहले और बाद के राजाओं का इतिहास मिला लेकिन ‘Megh’ सरनेम वाले राजाओं का इतिहास नहीं मिला. उनके शासनकाल को अंधकार काल कहा गया. ज़ाहिर है कि परंपरावादी इतिहासकार उन राजाओं के बारे में लिखना ही नहीं चाहते थे. लेकिन आधुनिक और ईमानदार इतिहासकार इस पर और अधिक रोशनी डाल रहे हैं.


अपने पिछोकड़ के बारे में जानना हो तो लोकगीत उसमें मदद करते हैं. अभी तक की जानकारी के अनुसार मेघ समुदाय के अपने लोकगीत नहीं हैं. इसका ज़िक्र डॉ. ध्यान सिंह ने अपने थीसिस में किया है. एक बार श्री आर.एल. गोत्रा जी ने बताया था कि हमारे एक लोकगायक राँझाराम हुए हैं जो कथावाचक थे और कई कथाओं के साथ-साथ मेघों की कथा भी सुनाते थे. इसकी पुष्टि कर्नल तिलकराज जी ने भी की. राँझाराम जी मेघों की कथा को सिकंदर से जोड़ते थे. कैसे जोड़ते थे, वो कथा क्या थी उसका रिकार्ड नहीं मिलता. फिलहाल इस बात का इतना महत्व तो है कि मेघों की कथा में सिकंदर है. सैनी और जाट सहित कई समुदाय पोरस को अपना आदमी बताते हैं. और तथ्य यह भी है कि सिकंदर के रास्ते में मेघों की घनी बस्तियाँ थीं. उस युद्ध में मेघों की कोई भूमिका न रही हो, ऐसा हो नहीं सकता. बाकी आपकी कल्पना पर छोड़ रहा हूँ. अच्छी कल्पना कीजिएगा. प्रसंगवश हमारे कमाल के लोकगायक राँझाराम जो थे वो श्री सुदेश कुमार, आईएएस के पिता श्री तिलकराज पंजगोत्रा के फूफा थे.


मेघों के अतीत का एक और महत्वपूर्ण पन्ना है उनका आर्यसमाज द्वारा शुद्धिकरण. अब पढ़े-लिखे लोग हँस कर पूछते हैं कि क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे जो हमारा शुद्धिकरण किया गया. पिछले दिनों श्री ताराराम जी ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक के एक सफ़े की फोटोकापी मुझे भेजी जिस पर ऐसा कुछ लिखा था जो चौंकाने वाला था. लिखने वाला सही था या नहीं, पता नहीं, उसमें लिखा है, “1901 में पहली बार आर्य-भक्त भाइयों ने समाज में आना प्रारंभ किया. उस समय इन मेघों का हिंदुओं के साथ मिल बैठ कर एक स्थान पर संध्या-हवन आदि में सम्मिलित होना आश्चर्यजनक था.” मेघों के शुद्धिकरण की बात वहाँ की गई है. इससे एक सवाल तो खड़ा होता है कि क्या शुद्धिकरण से पहले मेघों का धर्म कुछ और था कि उनका हिंदुओं के साथ बैठना आश्चर्यजनक हो गया? इस विषय को एक सवालिया निशान के साथ यहीं छोड़ रहा हूँ. आर्यसमाज ने मेघों की शिक्षा के लिए जो शुरुआती प्रबंध किया उससे मेघों को बहुत फायदा हुआ इसमें शक नहीं होना चाहिए. लेकिन एक बात साफ कर लेनी चाहिए कि नैतिकता (Morality) और सभ्य व्यवहार से क्या कोई समुदाय ख़ाली हो सकता है चाहे उसकी पहचान किसी धर्म से न भी हो? क्या नैतिकता सिखाने का हक़ सिर्फ़ धर्म को ही है? मेरा विचार है कि जब हमारे पुरखों को किसी धार्मिक स्थान में जाने नहीं दिया जाता था तो उन्हें नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाता था. हमारे समाज में उन दिनों माताएँ किस धर्म के आधार पर अपने बच्चों को सिखाती थीं कि झूठ मत बोलो, पशु-पक्षियों पर दया करो, दिल में करुणा रखो, बूढ़ों-बुज़ुर्गों की सेवा करो वगैरा वगैरा. वो कौन-सी सभ्यता (civility) थी जो हमारे पुरखों के ख़ून में रची-बसी थी? यहाँ धर्म और सभ्यता को इसलिए अलग-अलग कर के देख रहा हूँ क्योंकि सभ्य व्यवहार धर्म के माध्यम से ही आए यह ज़रूरी नहीं. हमारी पृष्ठभूमि में कोई तो सभ्यता ज़रूर रही होगी जिसने सदियों से हमें सभ्य व्यवहार सिखाया है. थोड़ा याद कीजिए कि क्या हमारे समाज में महिलाओं को सती कर डालने की परंपरा थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ विधवा विवाह की कोई समस्या थी? नहीं. क्या हमारे यहाँ दहेज हत्याओं की कोई समस्य़ा थी? नहीं. मैंने कई साल पहले पढ़ा था कि मेघ अदालतों में नहीं जाते. वजह थी कि हमारी एक अपनी पंचायत जैसी न्याय प्रणाली थी. कभी सुना नहीं कि उस व्यवस्था के अधीन किसी को क्रूर सज़ा सुनाई गई हो. अगर हुक्कापानी बंद करने की बात छोड़ दें तो मेघ अपनी न्याय प्रणाली से संतुष्ट थे. इन सभी ख़ासियतों को आप ‘मेघ-सभ्यता’ कह सकते हैं. ऐसी ‘मेघ-सभ्यता’ जिसमें इंसानियत सबसे सुंदर रंगों में खड़ी दिखाई देती है.


अब कुछ बेसिक से सवालों पर अपनी राय दे रहा हूँ. क्या मेघऋषि से ही हमारा वंश चला? बच्चा भी कहेगा कि मेघऋषि का भी कोई बाप ज़रूर रहा होगा. हाँ भई ज़रूर रहा होगा. बच्चे की बात में सच्चाई है और उसे मान लेने में भलाई है. वैसे भी मेघऋषि हारे हुए पुरोहित नरेश की कहानी है. आप चाहें तो मेघऋषि के प्रति आँखें मूँद कर चलते रह सकते हैं.


बड़ा मशहूर डायलॉग है कि ‘मेघों में एकता नहीं हो सकती’. यह सच्चाई है कि सियासी पार्टियाँ और धर्म या डेरे बनाने वाले लोग यह काम लोगों में एका लाने के लिए नहीं करते. उन्हें वोट, पैसा और आपकी सेवा चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि पार्टियाँ और धर्म-डेरे आपको आपस में बाँट लें. आप जिसके यहाँ जाते हैं उसका ठप्पा या स्टिकर जाने-अनजाने में आप पर लग जाता है. जब ठप्पे और स्टिकर अलग-अलग हो गए तो पहचान अपने आप अलग हो गई और एकता की भैंस भी पानी में चली गई. मेघों के अपने कई छोटे-छोटे सामाजिक संगठन बने हुए हैं. सभी चौधरी हैं. वे इकट्ठे नहीं हो सकते. चलिए इस बात को एक ही बार में मान लें कि बिरादरी के तौर पर मेघों में एकता नहीं हो सकती. तो क्या कोई दूसरा रास्ता है? हाँ है जिसे अपनाया जाना चाहिए. मेघों में कार्य कर रही सियासी पार्टियों और सामाजिक संगठनों को आपसी कंपिटीशन और गतिविधियाँ बढ़ानी चाहिएँ. इससे निश्चय ही बेहतर रिज़ल्ट निकलेगा और वो मेघ-भगत समाज के लिए लाभकारी होगा. शुभकामनाएँ.


जय मेघ, जय भारत.
भारत भूषण भगत, चंडीगढ़.


(यह आलेख डॉ. शिवदयाल माली द्वारा गठित 'मेघ जागृति मंच' के 21-05-2017 को आयोजित कार्यक्रम के लिए लिखा गया था. मैं चाहते हुए भी कारणवश इसमें भाग नहीं ले सकूँगा. रिकार्ड के लिए इसे यहाँ रख लिया है.)

विशेष नोट - इसी तरह का एक सेमिनार 30 अगस्त, 2015 को जालंधर में हुआ था जिसकी शुरुआत मैंने इस प्रकार की थी, "पहली बात यह है कि मैं इतिहासकार नहीं हूँ. आपकी तरह अपना इतिहास जानने में मेरी रुचि थी. मैंने जो पढ़ा उसके नोट्स बनाता रहा. मेरे नोट्स इतिहासकारों की देन हैं. आपका इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं है. ये नोट्स अब आपकी सेवा में हैं." ऊपर प्रस्तुत जानकारी पर भी मेरी यह टिप्पणी उसी प्रकार से लागू है.

16 December 2018

Comprehending the history - इतिहास की बूझ


कुछ लोग अपने पिछले इतिहास से बहुत ख़ौफ़ खाते हैं. वे 'मेघ' शब्द से भी दूरी बनाते दिखते हैं. इस बीच 'आर्य-भक्त' शब्द 'भगत जी' का स्वरूप ले चुका है. यह बात सच है कि जब कोई उनके इतिहास की बात कहता है तो वे उसका विरोध करते दिख जाते हैं. लिखने वाले का एक नज़रिया होता है और दूसरा नज़रिया उसका विरोधी. यानि दृष्टि-संघर्ष (conflict).

वह भी एक तरह का विरोध होता है जब सुनना पड़ता है कि- ‘तुम इतिहास की बात करने वाले लोग तो अतीतवादी (pastist) हो’. यह आँशिक रूप से सही है. यद्यपि हमारा अधिकतर कार्य वर्तमान में होता है लेकिन अपना इतिहास जानने के इच्छुक लोग अतीत की एक खिड़की खुली रखते हैं. उस खिड़की से दिख रहे इतिहास के प्रति मेरे दिल में भी अनुराग है. क्यों न हो? वो एकदम धुँधला नहीं है. आखिर मुझे वहाँ से अपना अतीत दिखता है जो एक निरंतर गतिशील पथ की कथा कहता है जहाँ से मानवता सिर उठा कर चली आ रही है. वहीं होता है मानव-मूल्यों के साथ चलते रहने का बोध जो मानव सभ्यता की ओर इशारा करता हुआ कहता है ‘चलते रहो, बढ़ते रहो’. वही हमें वर्तमान तक ला कर बेहतर भविष्य की अपार संभावनाओं के खुले राजमार्ग पर ले आता है. इसी लिए अतीत को खंगालने वाले लोग ‘अतीतवादी (pastist)’ या ‘अतीतरागी (nostalgic)’ जैसे शब्दों से विचलित नहीं होते भले ही ये शब्द अतिकटुता के साथ परोसे गए हों.

इतिहास में दर्ज हमारी समझदारियों और मूर्खताओं के कई आयाम होते हैं. यदि हम उनको नहीं जानते और उनसे नहीं सीखते तो इतिहास हमें तब तक सबक सिखाता है जब तक हम सबक सीख न लें. जब हम बिना सीखे चलते हैं तो उसका असर समाज के व्यवहार में दिखता है यहाँ तक कि अपने ही लोगों को कहना पड़ता है कि वे आपस में एक-दूसरे को कोसना बंद करें. इतिहास ग़ज़ब का 'गुरु' है, गुरु जी !

इतिहास-बोध एक बेशकीमती औज़ार है जिसे समाज के सभी जनों की जेब में और समाज के संगठनों की अलमारियों में उपलब्ध होना चाहिए ताकि समस्त समाज उसके महत्व को जाने और जान कर लाभान्वित हो. अपने बारे में जानने, अपने से सीखने और ख़ुद से ही समझदारी विकसित करने को ‘इतिहास-बोध’ कह दिया जाता है. यही ‘इतिहास बोध’ व्यक्ति और समाज के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है. इससे समाज में जुड़ाव और सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता पैदा होती है. जब यह क्षमता मज़बूत हो गई तब समझिए कि समाज का हर सदस्य अपनी जानकारी के आधार पर समाज के हित में कार्य करने लगेगा.

24 April 2018

The Illusion of Purification - शुद्धिकरण का छलावा

‘शुद्धिकरण’ शब्द सुनने में कितना ही पवित्र शब्द क्यों न लगे लेकिन जब-जब यह किसी पिछड़े समुदाय के संदर्भ में प्रयोग हुआ है, तब-तब अपमानजनक और शरारतपूर्ण सिद्ध हुआ है. किन्हीं धार्मिक संस्थाओं के हाथों में इसे राजनीतिक औज़ार के रूप में देखा गया है.

मेघ समुदाय के संदर्भ में इसका प्रयोग बीसवीं शताब्दी के शुरू में आर्यसमाज ने अपने ‘शुद्धीकरण’ नामक आंदोलन के दौरान किया था. इसमें आर्यसमाज ने मेघों, डूमों, महाशयों आदि का शुद्धिकरण करने का दावा किया था. शुद्धिकरण का मूल प्रयोजन था मूलनिवासी कबीलों के लोगों को इस्लाम या ईसाईयत की ओर झुकने से रोकना या उनसे बचाते हुए मनुवादी सिस्टम में लाना.

डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ ‘पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास’ में आर्यसमाजी तथा अन्य विद्वानों की लिखी किताबों के हवाले से लिखा है कि हज़ारों (तीस हज़ार से छत्तीस हज़ार तक उनकी गिनती बताई जाती है) मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें मनुवादी हिंदू दायरे में लाया गया था. वहां इस्तेमाल किए गए ‘हिंदू’ शब्द के व्यापक अर्थ में स्थिति को तौला जाए तो मेघ पहले भी हिंदू ही थे और कई अन्य हिंदू कबीलों की तरह एक कबीलाई जीवन जी रहे थे. यहाँ "पहले भी हिंदू ही थे" से तात्पर्य यह है कि मुग़लों के समय में सप्तसिंधु क्षेत्र के लोगों को हिंदू कहा गया था. यदि ‘हिंदू’ शब्द को किसी ‘धर्म’ से जोड़ने की बात है तो ‘हिंदू’ शब्द की जगह उसे मनुस्मृति वाला ‘मानव-धर्म’ कहना बेहतर होगा उसे ‘मनुवाद’ के नाम से बेहतर तरीके से व्यक्त किया जाता है.

मेघों के शुद्धिकरण को लेकर एक 80 वर्षीय मेघ प्रो. के.एल. सोत्रा जी से कई बार फोन पर बातचीत हुई. एक आर्यसमाजी की लिखी पुस्तक में छपे फोटोज़ के आधार पर वे कहते हैं कि मेघों के शुद्धिकरण की सच्चाई दरअसल दूसरी है. उनके अनुसार कुल सात-एक परिवारों का शुद्धिकरण किया गया था जो इस्लाम क़बूल कर चुके थे. वे बताते हैं कि मेघों की शिक्षा का प्रबंध आर्यसमाज ने बड़े स्तर पर करने का बीड़ा उठाया था जिससे मेघ समुदाय के सामाजिक जीवन को एक गति मिली. प्रो. सोत्रा के कुछ परिजन आज भी पाकिस्तान में रहते हैं. सोत्रा जी बताते हैं कि उनके परिजनों ने आज तक इस्लाम नहीं अपनाया. वे अपनी जीवन शैली के साथ पाकिस्तान में जी रहे हैं. सोत्रा जी बताते हैं कि मेघ कभी भी बड़े पैमाने पर इस्लाम या ईसाइयत में नहीं गए. 1947 में स्यालकोट से लगभग सभी मेघ परिवार भारत आ गए. गिनती के मेघ ही स्यालकोट में रह गए थे. वे सब हिंदू थे. पब्लिक मेमोरी (लोक स्मृति) में दूर-दूर तक कहीं नहीं है कि मेघों ने कभी बड़े पैमाने पर इस्लाम ग्रहण किया हो. तो आर्यसमाज से जुड़े लेखकों के प्रकाशित साहित्य में क्यों लिखा गया कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में मेघों का शुद्धिकरण किया गया था?

पहली नज़र में यह आर्यसमाज के प्रचारात्मक कार्य का हिस्सा लगता है. उसके पीछे राजनीतिक कारण भी रहे हो सकते हैं जैसा कि डॉ. ध्यान सिंह ने अपने शोधग्रंथ में उल्लेख किया है कि शुद्धिकरण से स्यालकोट के क्षेत्र में हिंदू-मुसलमान जनसंख्या का अनुपात बदल गया. वे यह भी बताते हैं कि जम्मू के क्षेत्र में मेघ कबीलाई जीवन जी रहे थे. उनके शुद्धिकरण का एक ही अर्थ था कि उन्हें शुद्धिकरण की प्रक्रिया से 'हिंदू (मनुवादी) घेरे' में लाया जाए. संभव है उनमें कुछ इने-गिने ऐसे मेघ भी रहे हों जिन्होंने इस्लाम अपना लिया हो. वैसे शुद्धिकरण को लेकर आज भी कई पढ़े-लिखे मेघ कड़ुवाहट के साथ पूछते हैं कि ‘क्या हमें कीड़े पड़े हुए थे कि हमारा शुद्धिकरण किया गया था?’ वे जानते हैं कि उन्होंने या उनके पूर्वजों ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिसकी वजह से अन्यथा उनका शुद्धिकरण किया जाता. वैसे मनुवादी जाति व्यवस्था ऐसी है कि उसमें मंत्रोच्चार के साथ सिर मुंडवा कर नहा लेने से किसी की जाति या वंश नहीं बदलता. अलबत्ता शिक्षित करके स्वीकार्यता दे कर और धन प्रवाह को उनकी तरफ मोड़ कर उनकी जीवन-शैली में परिवर्तन किया जा सकता है. शिक्षित होने के बाद मेघों को प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का अधिकार संविधान के तहत मिला भी जो आज नाममात्र को बचा है.



बात शुद्धिकरण की हो रही है. शुद्धिकरण क्यों किया जाता है इसकी जानकारी एक जाट नेता श्री राकेश सांगवान से मिली. उन्होंने सितंबर 2017 में बताया कि रोहतक में खाप पंचायत नाम से पंचायत का एक फ़रमान जारी गया था और पंचायत का विषय था 'मूला जाटों का शुद्धीकरण और जाट - मूला जाटों के बीच आपसी रिश्ते शुरू करवाना'. इस पर श्री राकेश सांगवान की निम्नलिखित टिप्पणी शुद्धिकरण के राजनीतिक पक्ष को प्रभावी तरीके से रेखांकित करती है.

“पहली बात तो ये जो शुद्धीकरण शब्द ही बड़ा अटपटा सा है। जाट चाहे किसी भी धर्म सम्प्रदाय में गया या उसने जो भी अपनाया, उसने अपनी जाति कभी नहीं छोड़ी, जहाँ भी गया जाति साथ ही ले गया, और सिर्फ़ जाट ही नहीं इस देश में जिस भी जाति के व्यक्ति ने जो भी धर्म अपनाया वह अपनी जाति उस धर्म में साथ ही ले गया। अब समझ नहीं आता कि कौन किसका किस आधार पर शुद्धीकरण चाहता है? यदि इनका आधार सिर्फ़ धर्म को लेकर ही शुद्धीकरण है तो फिर इस खाप पंचायत के नाम पर सिर्फ़ जाट को ही क्यों टार्गट किया गया? खाप पंचायत सभी जातियों की होती हैं और सभी धर्मों में सभी जातियाँ हैं, फिर इस पंचायत में सिर्फ़ जाट और मूला ही टार्गट क्यों? और जाट-मूला जाट के नाम पर पंचायत में विश्व हिंदू परिषद, बंसल, परमार, शर्मा आदि का क्या काम? और यदि तुम्हारा इस शुद्धीकरण का आधार धर्म ही है तो फिर तुम्हारे इस शुद्धीकरण के टार्गट पर मूला जाट यानी मुस्लिम जाट ही क्यों, तुम्हारी ख़ुद की जातियाँ क्यों नहीं? और क्या सिर्फ़ हिंदू होना ही शुद्धता है? ये सर्टिफ़िकेट किस लैबॉरेटरी (laboratory) से जारी हुआ?

शुद्धीकरण और आपसी रिश्तेदारी, दोनों में बहुत फ़र्क़ है इसलिए जाट चाहे किसी धर्म मज़हब पंथ से ताल्लुक़ रखता हो उसे ऐसे विवादित विषयों से परहेज़ ही रखना चाहिए। ऐसे मुद्दों से तो हमारे रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम भी दूरी रखते थे, जब भी धर्म का मुद्दा उठता तो उनका एक ही जवाब होता कि धर्म निजी मामला है इसे दूसरे पर मत थोपो। जो भी ठेकेदार इस शुद्धीकरण की बात करे उसे कह दो कि शुद्धीकरण और धर्म के बोझ से हम जाटों को माफ़ी दे दो, हम जाटों को तुम अपनी साज़िशों का मोहरा ना बनाओ। जो करना है पहले तुम अपने से शुरू करो, पहले अपनी जातियों का शुद्धीकरण कर लो, और जहाँ तक जाट-मूला जाटों की आपसी रिश्तेदारी का मामला है वह हमारा आंतरिक मामला है उसे हम जाट ख़ुद देख लेंगे।”

मेघ भी स्यालकोट के क्षेत्र में शुद्धिकरण से बावस्ता हुए थे. वहाँ तब अंग्रेजों का शासन था. अंग्रेजों की उदारवादी नीतियों के तहत समाज की निम्न जातियों को प्रतिनिधित्व देने पर विचार किया जा रहा था (शायद आपको साइमन कमिशन याद हो) और उसके तहत एक योग्यता यह भी रखी गई थी कि प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों को दिया जाएगा जो पढ़े-लिखे हों. इस दौरान मिशनरी स्कूल पिछड़ी और निम्न जातियों को शिक्षित करने का कार्य शुरू कर चुके थे. आर्यसमाज ने भी फैसला किया कि ग़ैर-हिंदुओं को जितना जल्दी हो सके ‘हिंदू’ दायरे में लाया जाए और हिंदू जातियों में उनका स्थान भी परंपरा के अनुसार निर्धारित कर दिया जाए ताकि आने वाले समय में वे हिंदू के नाम पर सवर्णों के अधीन खड़े दिखें. तब शिक्षा से वंचित मेघ इस व्यवस्था को कितना जानते-समझते थे पता नहीं लेकिन उस समय के साहित्य से जानकारी मिलती है कि मेघों ने शुद्धिकरण की वास्तविकता को पहचान लिया था. वे महसूस कर रहे थे कि शुद्धिकरण ने सामाजिक व्यवस्था में उनकी प्लेसिंग नहीं बदली. यह तर्कशीलता मेघों की शक्ति के रूप में देखी जा सकती है. लेकिन क्या शुद्धिकृत मेघ 'आर्य-भक्त' और 'द्विज' का अर्थ भली भाँति जानते थे? यह सवाल बहुत महत्पूर्ण है.

1947 में पाकिस्तान बनने के बाद स्यालकोट से अधिकांश मेघ भारत आ गए. इसके साथ ही मेघों के बारे में आर्यसमाज का शुद्धिकरण का एजेंडा पृष्ठभूमि में चला गया. (ऊपर मूला जाटों के शुद्धिकरण को लेकर हुई हलचल में उसे फिर से ज़िंदा होते देखा जा सकता है). 

आज़ादी से पहले के समय में 'शुद्धिकृत' तबकों को स्वभाविक ही कांग्रेसी वोटर की पहचान मिली. (कांग्रेस उस समय नज़र आने वाली एक ही बड़ी राजनीतिक पार्टी थी). ये वोटर मूलतः श्रमिक तबकों के थे. कांग्रेस का उनके प्रतिनिधित्व (आरक्षण) को लेकर जो नज़रिया था उससे श्रमिक वर्गों और कांग्रेस दोनों को फ़ायदा हुआ. आज़ादी के बाद वाले ‘हिंदुस्तान’ में शुद्धिकरण आंदोलन की पहले जैसी जरूरत नहीं थी और न ही निम्न जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में शासन-प्रशासन में नुमाइंदगी (प्रतिनिधित्व, representation) देने की ज़रूरत महसूस की गई. इस्लाम अपना चुकी श्रमिक जातियों की बड़ी जनसंख्या वाला बड़ा भू-भाग (आज का बंगला देश और पाकिस्तान) पहले ही अलग किया जा चुका था. मुख्यधारा में शामिल होने के भ्रम के साथ वे शुद्धिकृत जनसमूह अपने परंपरागत निम्न सामाजिक स्तर पर बने रहे. मेघों को महज़ म्युनिसिपल कमेटियों और म्युनिसिपल कार्पोरेशंस में कुछ प्रतिनिधित्व मिला.

'शुद्धिकरण' निश्चित रूप से राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व (hegemony) के लिए हो रहे संघर्ष का हिस्सा रहा है जिसकी पहचान जातिवादी धार्मिक-राजनीतिक एजेंडा के औज़ार के रूप में होती है. इस नज़रिए से शुद्धिकरण का लक्ष्य शुद्धिकृत लोगों के सामाजिक स्तर में बढ़ौतरी तो नहीं ही हो सकता. 'शुद्धिकृत' लोगों की आर्थिक और राजनीतिक अपेक्षाएँ असंतुष्ट हैं. प्रतिनिधित्व के नाम पर मिलने वाले आरक्षण जैसे प्रावधान को न्यायालयों और सरकारों तक ने निष्फल (irrelevant) कर दिया है. फिर भी शुद्धिकृत होकर कोई धन्य-धन्य हो रहा है तो वो धन्य है.

15 July 2016

Meghs and Kabir - मेघ और कबीर

ग़रीब का दिमाग़ स्वभाविक रूप से ऐसा बन जाता है कि उसमें 'ईश्वर-परमेश्वर' नाम की खरपतवार अपने आप फैलने लगती है. उसे रोज़गार देने वाला चाहता भी यही है. इसकी वजह यह है कि उसे जो भी रोशनी नजर आती है वह इसी विचार में होती है कि कोई तो उसका ईश्वर, मालिक, स्वामी, रोज़गारदाता वगैरा है जो कभी-न-कभी उसकी सुनेगा और उसे सहारा दे कर बेहतर जीवन देगा. उसी विचार को बल देते हुए वह जीवन काटता है. कुछ मिला तो ठीक, नहीं तो न सही जबकि उसे यह समझने की ज़रूरत होती है कि उसके हालात को सरकारी नीतियाँ बदलती हैं और उस बदलाव का रास्ता राजनीति से हो कर ग़ुज़रता है.

कठिन जीवन में आँखें बंद करके अपनी ही सोच से अपने ही विचारों में मिलने वाला आध्यात्मिक आनंद उसे सुकून देता है. वंचित व्यक्ति ईश्वर, परमेश्वर, आध्यात्मिकता, आत्मा-परमात्मा के विचारों में खुशी हासिल करता है बिना जाने कि उनका वजूद है भी या नहीं. यही वजह है कि गरीब तबकों के लोग अधिक आस्थावान हो जाते हैं. संतुष्ट रहना उनकी मजबूरी है- “रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चोपड़ी मत ललचावे जी.” लेकिन यदि कोई बेहतर जीवन की कामना को लालच और 'औक़ात से ज़्यादा' की केटेगरी में डाले तो उसे धूर्त ही समझना चाहिए. अब आगे चलते हैं.

मेघ भगत सदियों से अपने पुरखों, वड-वडेरों की मान्यता/पूजा के अतिरिक्त भगती और रुहानियत के क़ायल रहे हैं जिसका सीधा रिश्ता उनकी गरीबी से रहा. आर्य समाजियों ने शुद्धिकरण करके उन्हें अपना भगत बना लिया. तो चलो जी, हम 'मेघ' से 'भगत' हो गए.

भगती के रास्ते की एक विशेषता यह है कि वह गरीबी दूर करने का तरीका नहीं बताता. उसका काम यह बताना है कि गरीबी में कैसे रहा जाए. फिर जहाँ तक माँगने की आदत का सवाल है कबीर ने साफ़ कहा है- "माँगन गए सो मर गए मत कोई माँगो भीख, माँगन से मरना भला यह सत्गुर की सीख." 


अद्भुत कबीर

चौदहवीं शताब्दी के कबीर, रविदास जैसे संतों की मंशा ग़रीब तबकों को भगती भाव में डुबोने की बल्कि उन्हें सामाजिक चेतना की ओर मोड़ने की थी. यह उन संतों का बोया हुआ क्रांति का बीज था. मेघों और अन्य ग़रीब जातियों ने संतों का जो मार्ग अपनाया और ख़ुद को उनका अनुयायी बताया उसे संतों की उस सामाजिक जागृति के लक्षण के तौर पर देखना चाहिए. बहुत से मेघ अब ख़ुद को कबीरपंथी लिखना पसंद करते हैं. यहाँ समझने की बात है कि पंद्रहवीं शताब्दी के कबीर को मेघों ने 20वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर अपनाया. सुना है 15 अगस्त, 1947 (जो पंजाब के मेघ भगतों के आधुनिक इतिहास की कट-ऑफ़ डेट भी कही जाती है) के बाद पठानकोट और जम्मू के इलाकों में मेघों ने कबीर का प्रकाश उत्सव मनाना शुरू किया और कबीर मंदिरों बनाने के काम में तेज़ी आई.

इन दिनों पंजाब और जम्मू में अनेक कबीर मंदिर और उनकी कमेटियाँ बनीं हुई हैं जिनमें परस्पर प्रतियोगिता है. सियासी धड़ेबंदियाँ उन पर हावी हैं और क्यों न हों आख़िर उन्हें कोई बना-बनाया वोट बैंक अपने आक़ा को दिखाना होता है. 'धन् कबीर' और 'जय कबीर' का जयकारा इस वोट बैंक की धार्मिक-राजनीतिक पहचान बन जाती है. इसी सिलसिले में सोशल मीडिया पर कबीर की ऐसी वाणी परोसी जाने लगी है जो भगती की नुमाइंदगी करती है. सामाजिक क्रांति लाने वाली कबीर की वाणी वहाँ शायद ही दिखाई दे. सियासतदानों की पूरी कोशिश मेघों को अपना भक्त और वोट बैंक बता कर पेश करने की है. मेघ भगत चाहे राधास्वामी मत में हों, किसी डेरे-गुरु को मानने लगे हों या सनातनी या आर्यसमाजी हो गए हों, धर्म ग्रंथों का अखंडपाठ या जागरण करवाते हों, हैं वो भगत ही. उनकी अपनी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक ताक़त दूर तक नहीं दिखती.

कुछ कबीर मंदिरों में ज़रूरतमंद बच्चों के लिए कंप्यूटर या अन्य प्रकार शिक्षा और ट्रेनिंग का प्रबंध किया गया है. कबीर मंदिरों का यह सबसे खूबसूरत इस्तेमाल है जिसका सीधा फ़ायदा समाज को पहुँचता है. उधर सवालिया निशानों से घिरे 'ईश्वर-परमेश्वर' या 'देवी-देवताओं' ने वंचित समाजों को कोई फ़ायदा नहीं पहुँचाया, उनकी सामाजिक स्थिति को तो बिल्कुल ही नहीं बदला.

तीन सौ वर्ष पहले दुनिया के कई देशों ने विज्ञान को महत्व देना शुरू किया. वे देश बहुत तरक्की कर चुके हैं. इसे देखते हुए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific temperament) यानि वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की बात की गई है. कबीर भी बुद्ध और उनके जैसी तार्किक और वैज्ञानिक सोच रखने वालों की तरह तर्कशील और विवेकशील थे. ऐसे में उनके मंदिरों या उनसे होने वाली कमाई का शिक्षा और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिए इस्तेमाल करना समाज के लिए अधिक लाभकारी होगा.

मेघ समाज ने कबीर की 'भक्ति-वाणी' के अपने कुछ प्रचारक पैदा कर लिए हैं. देखा-देखी अन्य समाजों के लोग भी मेघों में आ कर वही धंधा करने लगे हैं. जब धर्म एक व्यापार के तौर पर जाना जाता है तो उसके नियम सीखने चाहिएँ. व्यापारिक घुसपैठ, व्यापारिक तोड़-फोड़ और व्यापारिक हमलों के ख़तरे पहचानने पड़ेंगे. अपने आर्थिक स्रोतों को बर्बाद न करें.

जानने की बात है कि ईसाइयत और इस्लाम के मानने वालों के बाद अब ऐसे लोगों की गिनती बहुत ज़्यादा है जो वैज्ञानिक नज़रिए से लैस हैं. वे दुनिया की आबादी का लगभग एक तिहाई हैं और उनकी गिनती तेज़ी से बढ़ रही है. सवाल बनता है कि हम भगत या कबीरपंथी कहलाने वाले भोले-भाले भगत लोग भक्ति को ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त दे कर विज्ञान की दुनिया में पिछड़ तो नहीं रहे? हमारा भगतपना तरक्की के रास्ते में देरी की वजह तो नहीं है?

(आपके पास आर्थिक और मानव संसाधन बहुत थोड़े हैं. ऐसे में

उनका उपयोग आप कैसे करना चाहेंगे, सोचिएगा.)